#वतनपरस्त_पतंगबाज
~~~~~~~~~~~~~
" सलीमा देखियो... ये तुम्हारा ही लौंडा है न ?"
लौंडेपन से खतरनाक पतंगबाज रहा हूँ ..मतलब जिस छत पर माल खड़ा दिखे ..गोता उधर ही टेकता हूँ....
पतंग तिरंगा ..सद्दी नागिन मार ..और नेवला छाप सूता हुआ माँझा ..
मुहल्ले की ऐसी कोई लौंडिया नही जिसका बाप मेरे घर आकर मेरे बाप की लोई न उतार गया हो ...अंदर खाने तो ये भी उधम कूटता हूँ कि मुहल्ले की कंटाप लुगाइयों पर भी एक झाँप की नजर ढीली छोड़ी है मैंने ....
बस प्यार न हुआ मुझे ...घंटा होता भी कैसे ..जैसे ही सोचता हूँ ..फँसी से ख़ुशी -ख़ुशी प्यार कर लूँ ...उसी बकत दूसरी उससे हाई जम्पर माल दिख जाती है और प्यार ट्रान्सफर हो जाता है ,,,,,
ट्रान्सफर से याद आया मेरे अब्बा का बाई पास हो गया है बोले तो दिल का ...इसलिए अब हुक्का और गुस्सा भी कम फूँकते हैं ....
धंधा सीधा टिका है अपना फंदे में .. मतलब दो बड़े भाई और राइज मिल के तीन हिस्से ...वो खर्चा दे देते हैं और मैं क्या सिंदबाद का बहनोई हूँ जो फोकट के खर्चे के बाद राइज मिल में अपना लंगर डालूँ ...
पूरा दिन सिटियाबाजी ..औरतबाजी ..लौंडियाबाजी और पतंगबाजी के नाम ...कभी -कभी स्मार्ट फोन में नंगी औरतें भी देख लेता हूँ ..
देखने से याद आया मेरा बाप मेरी शक्ल देखना पसंद नही करता ..उसके पास दो पिचहत्तर की गाली हैं मेरे लिए ...हारमखोर और सिर्फ हरामखोर ....
मैं सोचता हूँ ..अगले अटैक तक झेल लो...क्यूँकि अगला वाला सीधे एक खींच में अब्बा की पतंग काट देगा ....
मेरे बाप ने आखरी बार मेरे ऊपर फक्र कब किया था ..पता नही ...लेकिन अम्मी तो अक्सर कहती है कि वो मुझ पर फक्र करती है ...जानता हूँ वो झूठ बोलती है ..मेरा दिल रखती है लेकिन चलो कोई तो है जिसकी वजह से घर लौटने का दिल करता है ..
मेरा बाप मुझे कभी अपनी औलाद कह कर नही पुकारता ..बल्कि कहता है सलीमा का लौंडा ...सलीमा मेरी अम्मी का नाम है ...।
जैसे ही रात को खाने में हाथ डालता हूँ ..बाप , साँप की तरह डंक मारने लगता है ....अम्मी अक्सर समझाती है कि काम में दिल लगा अपने भाइयों के साथ वरना भाइयों की शादी के बाद ये तेरा खर्चा -पानी भी बन्द हो जाएगा ...और रो देती है ....बस यही चीज हैं जहाँ मेरा मन भारी होने लगता है ...नही तो रोज मुहल्ले की और हर घड़ी बाप की सुनने के बाद भी मेरा बाल टेढ़ा नही होता .....
हुआ वही जो अम्मी ने कहा था ...भाइयों की शादी हो गई ...और 15 दिनों में ही लंगोट के कच्चे खसम ...लुगाईयों की सलवार का नाड़ा बन गए ....
खर्चा बन्द करने से पहले बोले ..काम में हाथ बंटा नही तो एक ढेला भी नही देंगे अब ....
सोचा माँ की बकूँ लेकिन अम्मी से बेशुमार मुहब्बत के चलते बाप की बकी साले बेशर्मों को .... और बोल दिया ..कि अब तुमसे खर्चा मांगें मेरा लोटा -लस्सन ....
तड़ी में तो बोल दिया लेकिन फिर फट गई कि खर्चा आयेगा कहाँ से फिर ... कमला पसन्द की पन्द्रह पुड़ी ..दो डब्बे सिगरेट .. और चाय पानी ..सूतम -सूत अलग !!!!!
अम्मी से खर्चा माँगना जेबा नही दिया ...ये उम्र तो उसको देने की है .... दोस्त यार भी कटने लगे ..और कर्जदार सर पर चढ़ने लगे ....
जब हालत बिलकुल मजनू के फ़टे निक्कर सी होने लगी ...तो सोचा शहर छोड़ दूँ ...वगरना जिसने मेरी रईशी की अय्याशी देख अपनी सुलगाई वो आज मेरी हालत देखेगा तो मेरी जला देगा ,,,
दिल्ली, दिलवालों की.. सुना यहाँ काम और हराम दोनों की पूछ है ....
हफ्ता तो गले की बारीक गोल्डन चैन से निपटा लिया लेकिन अब कुछ करना था वरना सुना तो ये भी है कि दिल्ली बड़े-बड़े रुस्तम भी निगल गई ....
जिंदगी में खुदा को कभी याद नही किया ...क्यूँकि मुसीबत या तंगी कभी छू कर नही गुजरी ...लेकिन आज खुदा कस कर याद आया ...जब भूखी पेट की आँतें मेरा पेट ही खाने लगी .... तभी एक शादी के पंडाल पर नजर गिरी ...और तय हुआ कि प्लेट साफ़ करने के एवज में खाना और ऊपर से पाँच सौ रूपये नकद ....
आज एक -एक प्लेट की चिकनाई उतारते वक्त पता चला कि जिस पैसे को मैं यूँ ही फूँक देता था उसे कमाना कितना मुश्किल है ....खैर काम खत्म होते ही जब मुझे मेरी जिंदगी की पहली मेहनत की कमाई मिली ..मेरी आँख में आँसू आ गए ...और अम्मी तेज याद आई ..सोचा दौड़ के उसके पास जाऊँ और कहूँ उससे कि ले अम्मी मेरी मेहनत का पहला तोहफा ...लेकिन ये तो घर का एक तरफ का किराया भी नही था ...
रात आसमान के मीठे सितारे चुगते हुए कट गई ...और सुबह मैंने फिर काम की तलाश शुरू की ...न चाहते हुए भी एक बदलाव मेरे अंदर करवट ले रहा था ....
मैं एक बंगले में पहुँचा किसी आर्मी रिटायर्ड का बंगला था सुना उसे एक ड्राईवर की जरूरत थी ...गेट कीपर ने अंदर फोन कर कुछ बात की और फिर मैं अंदर गया ...
घर का बड़ा सा दरवाजा खुला था ..और मैंने अंदर कदम रखा ..पूरा घर जैसे किस्से -कहानियों का जंतर लग रहा था ...तभी ऊपर से एक कड़ी आवाज आई ....
" नही मेजर ऐसा नही हो सकता आई एम् कमिंग "
वो कर्रे बुजुर्ग सीढ़ियों से नीचे उतरे और मुझे देखा ...मैंने उनकी शक्ल पर रौब देख एक साँस में दुम अंदर डाल सारा माजरा बयाँ किया ....फिर वो कड़ककर बोले -
" बाद में आना अभी मैं अपने बेटे की डेथ बॉडी लेने काश्मीर जा रहा हूँ "
लोटा -लस्सन मुझे उसके बेटे से क्या लेना ...तभी वो बोले ..आज कोहरे की वजह से प्लैन और ट्रेन नही चल रहे ...ड्राइव कर सकते हो कश्मीर तक ....
कश्मीर ..बोले तो ..जमीन में जन्नत ..बोले तो लाल चिनारों गालों वाली लौंडियाएँ ....
" बिलकुल सर ..."
खैर ड्राइव की ..और बुड्ढे की शक्ल देखकर एक भी हो -हल्ला वाला गाना न रौंद पाया ....
" सॉरी सर ! लेकिन आपके अपने बेटे मर गये है और आपके चेहरे पर एक भी सिकन नही ..?"
" यू.. ...जो देश के लिए जान देता है ..वो शहीद कहलाता है ...और जिसका बेटा शहीद होता है वो उसकी शहादत पर फक्र करता है ..न कि आँसू बहाता है '
मुझे लगा बॉर्डर फ़िल्म का ऑडियो सुन रहा हूँ ...खैर काश्मीर पहुँचे ...और वाकई में कर्नल का बेटा शहीद हो चुका था ...उस छोटी सी सैनिक छावनी में कर्नल अपने बेटे की लाश को निहार रहा था तभी एक एक मोर्टार छावनी में गिरा ...और एक जख्मी जवान भागते हुए करीब आया ...
" सर ..सर ..वो ..पाकिस्तानी दहशतगर्द ...हमारी प्लाटून की कॉनवोइ में हमला करने आगे बढ़ रहें है ... सर सारे सेटेलाइट फोन ..मोबाईल फोन और वायरलैस फोन उन्होंने जैम कर दिये हैं ..सर उनके पास एक पूरा मिनी ट्रक आर .डी एक्स है ."
और उस जवान ने जान दे दी .....पहाड़ी के दूसरी जानिब श्रीनगर शहर था .. सेना और शहरी दोनों की जान खतरे में थी ..छावनी में अफरा-तफरी मच गई ...कुछ जवान दौड़े भी लेकिन बीच पहाड़ी के उस तरफ पहुँचने में उनके कदम हार जाते ....अब एक ही तरीका था ...और वो था हवाई मार्गे लेकिन छावनी में न कोई हेलीकॉप्टर था ...न कोई मिनी जेट ....जब सब मायूस होकर बैठ गए तो मैंने दौड़कर ...छावनी को खंगाला ..... मुझे वो मिल चुका था जिसकी मुझे तलाश थी ..मैंने कोई 10 मिनट लिए और साहब से बोला -
" साहब आप बस इसमें वो लिख दीजिये जिससे जवानों को पता चल जाए कि उनके पीछे मौत दौड़ रही है ..."
" क्या बकवाश कर रहे हो ..ये पन्नी की पतंग ?"
" साहब यकीन करो ...अपने मुहल्ले का नामी पतंगबाज हूँ ..हवा चाहे कोई भी जिद बना ले ...लेकिन आसमान में पतंग मेरी मर्जी से उड़ती और डूबती है "
न उम्मीद थे सब इसलिए इसे एक बचकानी उम्मीद मान कर मेजर ने एक खत उस पतंग संग बाँध दिया और अब बारी मेरी थी ...मोम का भारी धागा और स्टेपलर की पिनों से जुड़ीं ये पतंग अब कई जानें बचाने निकलने वाली थी ....
पहली बार किसी काम को अंजाम देने से पहले बिस्मिलाह पढ़ा और जैसे ही पतंग ने जमीन से उठना शुरू किया ...पूरी छावनी में हर -हर महादेव ,, जय माता दी की आवाजें गूँजने लगी ...मोम का खींचा धागा मेरे हाथ छीलने लगा लेकिन मेरी नजर पतंग और उसकी पिनों पर टिकी थी ...जैसे ही मुझे जवानों की कॉंनवोई नजर आई ....वैसे ही मैंने पतंग को गोता दिया और वो जाकर चिपकी सबसे आगे चलती गाड़ी के शीशे पर .....और फिर दहशत का ट्रक उन्हीं दहशतगर्दो की कब्र का अंगार बन गया ....
खूब उछाला मुझे ..हवा में ..जवानों ने और फिर रातों -रात में अपने मुल्क का एक स्टार ..एक देशभक्त बनकर आवाम की नजरों में चढ़ गया ....
आँखों में बेहिसाब आँसू थे कि आज मैंने वो कर दिखाया जो मैं ख्वाब में भी नही सोच सकता था ...घर में फोन लगाया ...अम्मी ने फोन उठाया ...लेकिन तभी उन्हें अब्बू ने आवाज दी -
" सलीमा देखो ये तुम्हारा ही लौंडा है न ..?"
" हाँ ये हमारा ही बेटा है जिसने आज पूरे मुल्क में हमारा सर फक्र से उठा दिया ..."
" हाँ सलीमा हम नसीब वाले हैं कि ये वतनपरस्त पतंगबाज हमारा ही बेटा है "
अब क्या ... जिंदगी को मराहिल मिल गया ..और मुझे मुल्क के जेवरों की जान बचाने के एवज में फौज में नौकरी .... अब जिंदगी पहले जैसे नही रही लेकिन कुछ तो है जो अब भी पहले का बाकि है मुझमें और वो है ....
" पतंगबाजी "
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
No comments:
Post a Comment