#सुमित_अग्निहोत्री_जयते
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" आप अगर जिलाधिकारी बन गए तो आपका पहला स्टेप क्या होगा ..? सच बोलियेगा ...!"
" जिलाधिकारी बनते ही सर सबसे पहले में अपने दोस्तों के साथ शराब पीकर नंगा नाच करूँगा ... !"
आज यू .पी.एस.सी का रिजल्ट आने वाला था ..मैं अमजद खान ...एक कश्मीरी युवा ..उम्र 23 साल ...रंग ज़र्फ़ गोजर दूध में छिड़के केशर सा...
तभी मुझे सर का एक मेसेज आया ...और मुझे पता चला कि मैंने यू.पी.एस.सी टॉप किया है ...रैंक फर्स्ट !
पैर लड़खड़ाने लगे ..हर चीज झिलमिलाने लगी ..न खुद पर यहीं हुआ न अपने कानों पर ...तभी हवा का एक तेज झोंका आया और खट से खिड़की खुली .. दीवारों पर चिपकाया जी.एस मेटेरियल काँपने लगा ..फड़फड़ाने लगा ...किताबों के सफे खुलने लगे ...और गिरी एक शराब की खाली बोतल ...!
खैर मैंने इंटरनेट को खोला और इत्मिनान किया कि मैं वाकई एक तवारीख बना चुका हूँ ....वो तवारीख जो बिना शराब के मैं क्या मेरा बाप भी नही बना सकता था ....
मुसलमान हूँ मैं ..लेकिन ये मुझे तब पता चला जब मैं 8 साल का था ... अनाथाश्रम में मुझे सब " लकी 7 "कहते थे ...क्यूँकि रजिस्टर में मेरा क्रमांक, मेरे कमरे का नम्बर , मेरा थाली नम्बर और मेरा सन्दूक नम्बर सब 7 था .....
अनाथाश्रम में रमाकान्त जो हमारा खाना पकाते थे उन्होंने मुझे बताया था कि जब उस रात तेज बारिश हो रही थी तब उन्होंने देखा कि कश्मीरी फेरन पहने एक शख्स आया था ..और उसने तुम्हे यहाँ अनाथाश्रम की सीढ़ियों पर छोड़ दिया था ...मैं खिड़की से सब देख रहा रहा लेकिन नीचे आते ही वो न जाने कहाँ चला गया .....बहुत तलाश हुई उसकी ..लेकिन कोई सुराग न मिला ....
लेकिन एक पर्चा मेरी सफेद चादर में लिपटा था ..जिसपर लिखा था कि मेरा नाम अमजद खान है ....मेरे पिता ने अपनी मजबूरी के मद्देनजर सिर्फ ये बात लिखी थी कि मुझे पैदा करते ही मेरी अम्मी नही रही ..और वो इस लायक नही कि उसे अकेला पाल ले वो भी तब,, जब उसने सब की मर्जी के बगैर मेरी अम्मी से निकाह किया था...वो अपने पेट के कैंसर की बात भी लिख गये थे ...शायद अब वो भी जिन्दा न हो !
लेकिन कई गोद लेने भी आये मुझे ...लेकिन मेरी पोलियो खाई टाँग देखकर वापस हो लिए ....
आश्रम में रहते-रहते मैंने अपनी पढ़ाई भी की ...बड़ा तेज हूँ दिमाग का इतना कि जब 16 का हुआ तो आश्रम का सारा गुणा-भाग बैठाने लगा ...लेकिन आश्रम में रहने की इक मियाद थी ...मुझे जिंदगी भर वहाँ आसरा मिल सकता था ...लेकिन अब किसी पर बोझ नही बनना चाहता था ...
मैंने एक दिन अपनी राह चुन ली ...रमाकान्त जी मुझसे बहुत प्यार करते थे ..और जाने नही देते ...इसलिए रात के आखरी पहर में मैंने हौले से आश्रम का दरवाजा खोला और फिर पीछे मुड़कर नही देखा ....
दुनिया बहुत बड़ी है ..ये मुझे तब महसूस हुआ जब जेब में पैसे खत्म होने लगे...और कोई ठिकाना न मिला ...
21 की उम्र काम के नाम होती है ...मुझे नही पता था कि मेरा बाप खुद्दार था या नही लेकिन मुझमें खुद्दारी टूट कर भरी थी ...हर जगह काम माँगा ..लेकिन काम देने वाले ने काश्मीरी सुनते ही कोई गारंटर या परिचित होने की बात दोहराई ...
एक मस्जिद में आसरा लिया ..और वहीँ रहने लगा ... मुहल्ला मुझे पसन्द करने लगा क्यूँकि मैं उनके बच्चों को तालीम देने लगा ..लेकिन फिर खुद का क्या ...? क्या मैं जिंदगी इसी तरह फनाह कर दूँगा ...?
वहाँ से भी हिजरत की और पहुँचा दिल्ली ...दिल्ली मैं मुझे एक कम्पनी में काम मिल गया ..एक दिन जब मैंने अपने हिसाब में 1200 रूपये कम होने की बात कहकर मालिक से बात की तो वो बोला-
" अबे लँगड़े एक तो तुझे बिना किसी गारंटर के काम दिया ...अच्छा नही देता जा तुझे जो उखाड़ना है उखाड़ ले ..."
जिंदगी उस मराहिल पर आ गई जहाँ चीखूँ भी तो आवाज अपने की कानों को खाये ..आश्रम लौटने का इरादा किया ...लेकिन फिर खुद को रोक लिया कि आखिर वहाँ भी जाकर मिलेगा क्या ...?
काश्मीर अपनी मादरे जमीन जाने की भी सोचा लेकिन वहाँ आखिर पहचानेगा कौन ...?
रात के अँधेरे में यूँ ही गमजदा होकर एक सुनसान जगह में बैठकर आँसू बहा रहा था कि तभी -
" शराब पीयेगा ..पी ले ..फ्री में पिला रहा हूँ "
" मुसलमान हूँ मैं...शराब नही पीता ..."
" ग़ालिब तो पीता था.. ..वो भी तो मुसलमान था "
" आप से मतलब ...आप प्लीज मुझे अकेला छोड़ दें "
" सुन बे ! भूतनी के ..दिल्ली अपनी ..दिल अपना ..बोतल अपनी ..पैसा अपना ...अकेला छोड़ दूँगा तो दिल्ली खफा हो जायेगी ...चल नही पीता तो कुछ खा ले ...ये ले भुने हुए चने ..."
पता नही क्यूँ हाथ आगे बढ़ा दिए ...और फिर वो शराबी मेरे लिए शराबी नही रहा ....
अपने घर ले गया और पनाह दी ...घर एक कूड़े का ढेर था ...अगले दिन शराबी के घर से निकलते ही मैंने उसे रहने योग्य बनाया ...और जब शाम को शराबी लौटा तो बोला ..
" ये ले पता ..कल यहाँ मिल लेना ...तुझे कोई काम मिल जायेगा .."
" आप का नाम ...?"
" सुमित अग्निहोत्री ...प्रोफेसर ऑफ़ सी .यू यूनिवर्सिटी ..'
" क्याय्य्य्य्य्या ...और फिर ऐसी जिंदगी ..शराब ? "
"क्यूँ जब देवता शराब पी सकते हैं ..तेरी जन्नत में जन्नती शराब मिल सकती है तो मैं तो फिर भी इंसान होकर पी रहा हूँ "
उसके बाद फिर उन्होंने शराब की बोतल खोली ..और वो शराब में डूब गए ...लेकिन मुझे इल्म हो गया था कि कोई वजह तो जरूर है ...तो उनके पास जाकर उनसे पूछा ..उन्होंने पहले टाला फिर मैंने उनके हाथ को अपने हाथ में लेकर जब पूछा तो वो बोले -
" यू.पी .एस.सी सपना था मेरा ..एक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बनना ..कई बार ट्राई किया ..और अपने आखरी एटेम्पट में इंटरव्यू तक पहुँचा नम्बर शानदार थे मेरे और यकीन था इस बार सपना पक्का लेकिन बाहर हो गया .. ये मेरा देश जो सच्चाई की बात करता है ..जिसमें स्कूल बच्चों को सत्य की ताकत बताते है ..धर्म जो असत्य पर सत्य की जीत सुनिश्चित करता है वहाँ हमेशा मेरा सच बोलना मुझे मेरे सपने से दूर ले गया ...यहाँ मुल्क में अब वो ही सुखी ..समाज सेवक ..धर्म -मजहब का ठेकेदार ..जनता का लोकप्रिय नेता और अभिनेता है जो झूठ पर अपना ईमान सेंकता है...यकीन कर सच सिर्फ एक ढकोसला है साला जो बोला कहीं का न रहा ..."
" क्या हुआ था सर ..?"
उन्हीने तफ़सील से सब समझाया और अंत में उस इंटरव्यू पर बोले कि जब उन्होंने पूछा -
" आप अगर जिलाधिकारी बन गये तो आप का पहला स्टेप क्या होगा ..? सच बोलियेगा "
मैंने कहा -
" जिलाधिकारी बनते ही सबसे पहले में अपने दोस्तों के साथ शराब पीकर नंगा नाच करूँगा ... !"
उसके बाद मेरा सेलेक्शन नही हुआ ..लेकिन मैंने तो उनसे सच ही बोला था ..
ये सच था ..क्यूँकि मैंने अपने दोस्तों से यही वादा किया था .लेकिन उन्हें कुछ् और सुनना था जो आज तक सुनते आयें है ..देश सेवा...समाज सेवा ..ये सेवा ..वो सेवा ..अगर यही हर जिलाधिकारी तबसे आज तलक तक करता तो क्या आज देश यहाँ होता...? ये शराब सिर्फ इसलिए पीता हूँ क्यूँकि इसको पीकर मेरी सत्य बोलने की शक्ति और बढ़ती जाती है या फिर मेरा वो अरमान मुझे नही काटता जो मेरे सत्य बोलने की सजा के रूप में कभी पूरा न हो पाया "
खैर रात भर वो पीते रहे और रात भर मैं रोता रहा ..लेकिन अगले दिन जब वो कॉलेज जाने लगे ..तभी दरवाजे पर एकदम से पलटे और बोले -
" क्यूँ बे D.M बनेगा ..? "
सवाल अचानक तो था लेकिन मेरे सपने और जिस्म की कमजोरी से कहीं ऊंचा और ताकतवर ...
शाम को वो जल्दी घर आ गए ..और फिर वो तमाम किताबें और नोट्स निकाले ..और निकाली शराब की बोतल ..अब वो खुश रहने लगे ..खूब हँसते और मुझे पढ़ाते ..मेरे लिए न्यूज़ पेपर ..रेडियो ..मोबाईल ..और वो हर पत्रिका उपलब्ध हो गई ..जो मुझे एक बड़े निशाने को भेदने में मजबूती देती ...वो शराब पीते रहे और मुझे पढ़ाते रहे ...दिन बीतते गए ..और मैंने प्रि लिम क्वालीफाई किया ..इसके बाद उन्होंने मुझे और कसी तैयारी करवाई और कॉलेज से मेडिकल ले लिया ...हर वक्त मेरे साथ ..हर वक्त सिर्फ तैयारी ...मैन्स भी क्रेक हो गया ...और आया इंटरव्यू उस दिन जब मैं इंटरव्यू के लिये निकलने लगा तो वो पीछे से बोले -
" देख ! सब कुछ करना लेकिन मेरी तरह गलती मतकरना ..गलती सच बोलने की ..समझा "
वाकई में मैंने गलती नही कि और जो इंटरव्यू बोर्ड सुनना चाहता था वो उन्हें सुनाया ...लेकिन मन में एक टीस उबाल ले रही थी कि आखिर झूठ की ईंटों से कोई कैसे अपना सपनों का महल बना लेता है ...बड़ा फक्र हुआ सुमित अग्निहोत्री पर कि जिसने राजयोग और सत्य में सिर्फ सत्य का चयन किया और उस स्थान पर भी सत्य का साथ नही छोड़ा जहाँ से मैं सिर्फ झूठ बोलकर अपना राजयोग सुनिश्चित कर रहा हूँ ...माना सब झूठ नही लेकिन सत्य तो ये भी है कि अधिकांश सत्य नही ....
खैर टॉप किया और ...और ट्रेनिंग में निकल गया ..लौटा तो पता चला शराब सुमित अग्निहोत्री को पी गई ...लेकिन आज भी वो जिन्दा हैं क्यूँकि सत्य जिन्दा है ..वो सत्य का चरम थे ..और आज जब एक कार्यक्रम में मुझे " सत्यमेव जयते " का उदघोष करना था तो न जाने क्यूँ आँख भर आई और न जाने क्यूँ खुद ब खुद मुँह से निकल पड़ा -
" सुमित अग्निहोत्री जयते ! "
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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