Friday, 19 April 2019

दादी जान

#दादी_बनाम_भीड़
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" आप लोग आगे जुलूस नही ले जा सकते !"

" एस.पी . साहब अपनी बिरादरी का होता तो क्या ऐसे ही रोकते ...?"

" जी ! बिलकुल ... "

" लेकिन हम कायर नही ..राम के सच्चे भक्त हैं... और जुलूस आगे बढ़ कर रहेगा ... आगे बढ़ो !"

इतना जोश भर गया था भीड़ के अंदर कि मानों वो भीड़ महज भीड़ न होकर समन्दर लगने लगी मुझे ...जय श्री राम के नारों से कान के पर्दे थर्राने लगे...लेकिन सबसे जियादह जिगर में कँपकपाहट थी ...और एक सवाल कि ...कैसे इस भीड़ को नूर बस्ती जाने से रोकूँ ...?

भीड़ महज 50 कदमों की दूरी पर थी ..और मैंने कोई भी फैसला करने से पहले एक बार आँख बन्द करना गंवारा किया .....

" प्यारे अनवर ..फिर राम जी ने अपनी सेना से कहा ..कि यहीं रुक जाओ ..अपने कदमों को विराम दो ..क्यूँकि लंका में वो मासूम बच्चे और औरतें भी हैं जो हमारी सेना ..और उनके हाथ में अस्त्र-शस्त्र देखकर व्याकुल हो सकतें है...भयाकुल हो सकतें हैं..."

" तो दादी राम जी ने लंका पर चढ़ाई नही की ...?"

" नही मेरे लाल ...राम जी चाहते तो लंका के महल में धावा बोल सकते थे ..लेकिन उन्होंने युद्ध के लिए चुना लंका से दूर एक सुनसान स्थान ..."

" फिर क्या हुआ दादी ...?"

" कुछ नही फिर उन्होंने अपनी सेना से कहा कि हथियार नीचे करो और स्मरण करो कि हम सत्य पर अडिग हैं "

मैंने झट से आँख खोली ..और भीड़ की तरफ देखा ..भीड़ हमसे सिर्फ 10 कदम की दूरी पर थी ..मैंने तुरन्त माइक थामा और -

" सभी पुलिस के ऑफिसर्स ..और जवानों अपने डंडे ..प्रोटेक्टर ..जमीन पर रख दो ..कोई भी इस भीड़ पर न गोली चलाएगा ..न लाठीचार्ज करेगा ....डेट इज माय ऑर्डर ...और सब जवान एक दूसरे के हाथ पकड़ लो ......

पता नही क्या जादू हुआ कि भीड़ ने अपने कदम रोक लिए .. वो भीड़ जो अब तलक हमें यानि पुलिस बल को अपने और श्री राम के बीच के मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा समझ रही थी ...वो भीड़ अब शांत थी ...और भीड़ ने अपना रास्ता बदल लिया ....वगरना ये भीड़ अगर नूर बस्ती चली जाती तो गजब हो सकता था ...क्यूँकि वहाँ भी कुछ उपद्रवी इस  भीड़ के वहाँ पहुँचने का इन्तेजार कर रहे थे .....

अगले दिन अख़बार की सुर्ख़ियों में पुलिस का ये काम और रूप सुनहरे अक्षरों में दर्ज हुआ ...लेकिन ईनआम की शक्ल में मुझे मिला ट्रान्सफर आर्डर ....

क्यूँकि दोनों मजाहिब के कुछ मुट्ठीभर सियासती इन दोनों सम्प्रदायों के आमने-सामने आने का इन्तेजार कर रहे थे ...ताकि हिंसा ..और आगजनी के बाद वो अपने -अपने लोगों को बोतल में उतारकर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखे ....

खुदा का शुक्र रहा कि उनके अरमान ..अरमान ही रह गए ..और मेरा फर्ज भी बचा रहा ...

ट्रांसफर की आदत है मुझे इसी लिए किसी भी जिले का कप्तान बनता हूँ तो सामान नही खोलता ..लेकिन खोलता हूँ वो डायरी जिसमें एक तस्वीर बड़ी इज्जत से आराम फरमा है ....मेरी दादी मुबारक मरहूम आबिदा बेगम !

वो औरत जिसने मेरे अम्मी-अब्बू के इंतेक़ाल के बाद मुझे वो परवरिश दी ..कि जिसकी वजह से आज मैं इस कद और पद पर खड़ा हूँ ...

अपने अम्मी-अब्बू का इकलौता बेटा ...जिसको दादा मरहूम की पेंशन से पाला-पोशा उसकी दादी मुबारक ने ....

मेरी सुबह की शुरुवात यकीनन फज्र की नमाज से शुरू होती थी लेकिन उसके बाद मेरी दादी मुबारक मुझे अपने और सबके मजाहिब की अच्छी बातें सीखाया करती थी ...और उसका फल ये रहा कि जब भी मैं मुश्किल में होता हूँ तो दो घड़ी के लिए आँख बन्द कर लेता हूँ और मुझे रास्ता खुद  ब खुद दिखाई देने लगता है .....

खैर ...अगला जिला जो मुझे दंगा न होने देने के एवज में ईनआम में मिला वो था ... करीमपुर ....!!

करीमपुर जिसकी 80 फीसदी आबादी मुस्लिम थी ... मेरे जिले का चार्ज लेते ही ..मेरे लिए मुस्लिम मआशरे के कुछ सियासतपरस्त एक शिष्टमण्डल बना कर मेरे स्वागत में मेरे ऑफिस आये .....

मेरे सीने में चिपकी नेम प्लेट ..अनवरुद्दीन बख्श काफी थी उनको बताने के लिए कि मैं उनकी कौम का या उनका आदमी हूँ ...लेकिन मैंने पहली ही मुलाकात में शक -शुबा दूर कर दिया कि मैं इस जिले की 100 फीसदी जनता का नौकर हूँ ....

मेरे आते ही ..सबसे पहले बेतरतीब दुकानों का अतिक्रमण पीछे होने लगा ..सड़के जो हिंदुस्तान के आम आदमी के टैक्स से बनती हैं वो दिखने लगीं... जलसों ..मजलिस और तकरीरों का टाइम निर्धारित होने लगा ...और लाउड स्पीकर भी 10 बजे बाद बजना और गरजना बन्द होने लगे ....

मेरा ये अक़ीदा था कि बच्चों की पढाई इससे प्रभावित होती है ..बीमार ..बुजुर्गों को नींद आने में तकलीफ होती है .... सड़के अगर खुली रहीं तो आग लगने पर दमकल की गाड़ियां और एम्बुलेंस मौके पर पहुँच कर कोई भी अनहोनी टाल सकती है .....

लेकिन मेरा नजरिया मेरी अपकीर्ति बनने लगा ...कुछ मुसलमानों को बरगलाने वाले नेता ..मुझे किसी विशेष विचारधारा एजेंट कहकर आवाम को भड़काने लगे ....

लेकिन मुझे कोई फर्क नही पड़ा ..क्यूँकि मैं हक पर काबिज था ....

उस दिन इतवार को जब मैं जौहर की नमाज अदा करके खाने को बैठा और पहला निवाला बिस्मिल्लाह कह कर अपने मुँह में जैसे ही डाला ...तभी मेरा फोन बजा...

" सर ..ज़ामा मस्जिद की सीढ़ियों पर एक जानवर विशेष  का कटा सर रखा है ...सर यहाँ हालत बहुत नाजुक है ..सर आदेश करें ..."

" रुको मैं आया ..."

जिंदगी ने बचपन से ही हमेशा मेरी कड़ी आजमाइश ली है ..वरना और भी पुलिस ऑफिसर है जिनको अपनी पूरी सेवा के दौरान ऐसी चुनौतियाँ न के बराबर मिलती हैं ...या मिलती भी हैं तो उसे डील पोलिटिशियन करते हैं ....

मैं अपनी टीम के साथ मौके पर पहुँचा ...और फिर एक भीड़ तैयार थी..  ...एक अनहोनी को अंजाम देने के लिए ...मैंने आर्डर दिये कि इस बस्ती के एक -एक हिन्दू परिवार के घर को प्रोटेक्ट करो ... भीड़ में नारे गूंजने लगे ...भीड़ में बीच में भड़काऊ तकरीरें गूँजने लगी ...जब मैंने जीप की छत पर चढ़कर देखा तो पाया ये वही लोग आवाम को भड़का रहे थे जो मुझसे मिलने आये थे ....

अब भीड़ नारो के साथ  आगे बड़ी...सवाल ये बना कि  अब क्या करूँ .?..मैंने एक बार फिर आँख बन्द की ...भीड़ तादाद में बहुत जियादह थी ...दादी मुबारक का चेहरा तो नजर आ रहा था लेकिन वो जो बोल रहीं थी वो मैं सुन नही पा रहा था ....

पेट्रोल बम की पहली बोतल हवा में लहराई..और जमीन पर गिरते ही उसने आग पकड़ ली ... और भीड़ ने पथराव करना शुरू कर दिया ...

पूरी टीम मेरे आदेश का इन्तेजार कर रही थी ...और मैं अब भी बार -बार आँख मीचकर ये कोशिश कर रहा था कि दादी मुबारक कोई रास्ता बताये ....

भीड़ टायरों में आग लगा चुकी थी ..उन्होंने दो दुकानें भी फूँक दी ...और अब वो हमसे महज कुछ फासले पर थी ....

इस 11 साल की सेवा में मुझे लगने लगा कि मेरा पढ़ा -सुना सब जाया होने वाला है ...अब कुछ बाकि नही रहा इस दुनिया में ...न इंसानियत , न मुहब्बत  , न ऐतबार ...अब लोगों पर सिर्फ एक धुन सवार है और वो है - बदला

दादी का सर्वधर्म सम्भाव और सदभाव  का पाठ अब फेल होने लगा था ...पूरा देश और इसके मासूम नागरिक सियासत की कठपुतली बन चुके हैं ...

वो भूल चुकें हैं कि आपसी मुहब्बत से ही ये मुल्क मुकम्मल होता है ..उन्हें याद नही कि विविधताओं की ये भूमि ही इसकी समानता की प्रतीक है ....

अब कोई रास्ता  और कोई सूरत नही बची थी .. भीड़ को रोकने कि अब इनको सिर्फ रोका जा सकता था एक ही  जुमले से और वो था ....फायर !

जैसे ही मैंने इस लफ्ज को अपनी जुबान पर चढ़ाया तो आँख भींच ली और पूरी सेवा और  जिंदगी में पहली बार मैंने इस लफ्ज को किसी मुश्किल का हल समझ इस्तेमाल किया ....

मैंने अपनों कानों के परदों को तैयार कर लिया ..कि उनमें हलचल हो ...लेकिन  अगले कुछ सेकेण्ड में ही सब खामोश सा हो गया ..इतनी ख़ामोशी ..इतनी तन्हाई कि मुझे लगा कि मैं बेजुबान बादलों के ऊपर खड़ा होकर अपने रब्ब को महसूस कर रहा हूँ ....

तभी -

" सर ..देखिये ..."

मैं उस दुनिया से वापस लौटा ...और झटके में आँख खोली

देखता हूँ हमारे और भीड़ के फासले के बीच औरतों ,बूढ़ों और मासूम बच्चों की एक भीड़ घुटनों पर बैठी है ...और उन औरतों ,बूढ़ों और बच्चों में दोनों मजहब के मानने वाले इंसान हैं ...

भीड़ का लावा ..बर्फ बनने लगा ...और फिर मैंने अपने कानों पर कुछ गिरने की आवाज महसूस की ...जिसका मैंने एक -एक लफ्ज अपने कानों से पीया ...और फिर माइक पकड़कर बोला -

" जिस मजहब के तुम नुमाइंदे हो ...उस मजहब के आला सुतून हजरत अली ने बदले को हराम मानकर खुद पर थूकने वाले को मुआफ़ किया था ...जिसके तुम उम्मती हो ..उस अल्लाह के रसूल ने अपने आमालों से करकर और कहकर दिखाया है ...कि हर जिहाद में बच्चे..बूढ़े ,,औरतों और बीमारों को चीर कर आगे नही बढ़ा जाता ...और जो तुम कुछ चन्द लोगों की खुदगर्जी और जाती फायदे के लिए कर रहे वो हरगिज जिहाद नही बल्कि खूँरेजी है वो खूँरेजी जिसे खुदा ने कुरान में ये कहकर तुम्हे नसीहत की -

" कि तुमने एक मासूम को कत्ल किया तो गोया तुमने पूरी इंसानियत को कत्ल किया "

भीड़ छँटने लगी ..और नजर आया इक चेहरा ...जिसे देख कर मेरे होश फाख्ता हो गये ...मेरी दादी मुबारक मेरे सामने खड़ी थी ....और उन्होंने मुझे देख कर मुस्कुराहट बिखेरी और फिर वो नजरों से ओझल हो गई ...

मैं समझ गया कि ये औरतों ,बच्चों का हुजूम किसने जोड़ा ...पर कैसे ..इस सवाल का जवाब अपना सामान पैक करते-करते  खोज रहा था  क्यूँकि ट्रांसफर आर्डर कभी भी आ सकता था लेकिन इस बार आई कुछ आवाजें ...जो मेरे आवास के सामने मेरी तरफ पीठ करके खड़ी होकर उस ट्रान्सफर आर्डर को मेरे दरवाजे पर आने से रोक रही थी ...

ये भीड़ जिसमें हर मजहब का नुमाइंदा खड़ा था ...ये भीड़ जिसमें मेरा भारत खड़ा था ....

और जब पूरा भारत एक आवाज में एक साथ मिलकर खड़ा होता है तो फिर किसी कि मजाल नही की उसे चीर कर कोई भी आर्डर या कोई भी बुरी नजर आगे बढ़ सके ।।।।

दादी मुबारक के पास होने का एहसास हो रहा था ...क्यूँकि मेरी आँखों में आँसू छलछला रहे थे ...

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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