#मेघा_दीदी
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" अल्लाह कसम जब भी मेघा दीदी को देखता हूँ ऐसा लगता है उनको देखता ही रहूँ ...कितनी गोरी हैं वो ..कितनी प्यारी "
मैं जुबैर मलिक ...उम्र 16 ...रंग साँवला ... दुर्गापुर में एक बिजली के खम्बे से सटकर अपनी रेहड़ी के ऊपर मौसमी फल बेचता हूँ ...और शाम को जब धूप थोड़ी ठण्डी होती है तो रेहड़ी घुमाकर आवाज लगा -लगा कर अपना माल बेचता हूँ ...अब्बू पर फालिस गिर गया है ..सो बिस्तर पर पड़े रहते हैं ...अम्मी घर में लेई से लिफ़ाफ़े बनाती है..एक छोटा भाई है मेरा जो जमात 2 में पढता है ... ...
हमेशा एक बहन की कमी खली लेकिन जियादह नही ,,क्यूँकि मेघा दीदी मुझे भईया कहा करती है ...
मेघा दीदी जिनके नाम का मतलब तो नही पता लेकिन लगता है उनके किरदार की तरह ही उनका नाम भी होगा ...दो बहनें हैं वो ...बड़ी मेघा दीदी और छोटी राधिका ।।
राधिका मुझे देखकर ही मुँह खींच लेती है ..बिलकुल अपने बाप विश्वनाथ पर गई है ..बुड्ढा भी न जाने क्यूँ मुझे देखकर हमेशा खिसियाता रहता है ..लेकिन मेघा दीदी बिलकुल माँ जी पर गईं हैं ...माँ जी भी हमेशा मेरा ख्याल रखती हैं ...शायद इसलिए भी उनकी ममता मुझ पर टूटती जाती है क्यूँकि उनका कोई बेटा नही .....
लेकिन बेटा कौनसा जन्नत का टिकट है ...जिसकी मेघा दीदी जैसी औलाद हो उस माँ -बाप को और क्या चाहिये .....
कॉलेज को आते -जाते ..मेरे सर पर हाथ रखकर जाती है ...कभी ग्राहकों के साथ बीजी रहूँ तो सर के बाल बिखरा जाती है ...बहुत खूबसूरत हँसती हैं कि अल्लाह उनकी हँसी जैसे सूखी कलियों को खिला जाती है ...
मैं भी इसलिए उनसे बेशुमार प्यार करता हूँ क्यूँकि मेरी भी कोई बहन नही ... जब भी दीदी कॉलेज को जाती है ...कुछ न कुछ जबरदस्ती उनके हाथ में थमा देता हूँ ..दीदी को सन्तरे बहुत पसन्द है ..और जिस दिन दीदी का ब्रत रहता है तो वो दिन पहले से ही रटे रहतें हैं मुझे ..
उस दिन तो फल की सारी वैरायटी उनके बैग में ...लेकिन दीदी भी तो रोज मेरे लिए कभी आलू के पराठे ..कभी दलिया ..कभी खीर ..पूरी कचौड़ी लाती है ...और लौटते वक्त बिना धुला टिफिन ले जाती है ....
ये रिश्ता इतना शफ्फाक है कि दीदी की आँख में अगर जरा सा भी पानी दिख जाये तो ..मचल उठता हूँ अंदर तक ... कभी कोई कच्ची बात कर दे तो झपट पड़ता हूँ उसपर ...एक बार तो चार लोगों के गुच्छे से भिड़ गया ..फिर क्या था खूब पिटा लेकिन उसको नही छोड़ा जिसने दीदी को छेड़ा था ....
राखी भी बांधती है दीदी मुझे और उस दिन मेरे और उनके दोनों के संग आँसू भी निकल जाते हैं ....
दीदी उस दिन बहुत खुश थी ....बहुत खुश ...दीदी सुधाकर नाम के किसी लड़के से मुहब्बत करती थी और उससे ही उनकी शादी भी पक्की हो गई थी ...
हाँलाकि सुधाकर पता नही क्यूँ मुझसे नफरत करता था ..और दीदी को अक्सर टोकता था कि मुझसे बात न करे ...लेकिन मेरी फ़रिश्ता दीदी ने जब अपने बाप की नही सुनी तो मेरे होने वाले जीजाजी की क्या सुनती ....
दीदी दौड़ कर मेरे पास आई और बोली -
" चल जुबैर जल्दी बता ..शादी में कोट-पेंट पहनेगा या शेरवानी ....अब चल रोना -वोना बाद में चट बोल मैं शॉपिंग करने जा रही हूँ "
" प्यारी दीदी आपको जो समझ में आये ...लेकिन क्या सच में मुझे छोड़े जा रही हो ...?"
" धत्त ..पगला ....मेरा बस चले तो तुझे दहेज छोड़ अपने साथ ले जाऊँ ..अच्छा शाम को मिलती हूँ "
आँख दीदी की भी झिलमिलाने लगी थी ..लेकिन मैं दिन भर बस टपकता रहा ...न भूख ..न प्यास ..न कोई चैन ..
दीदी के पिताज़ी ज्योतिष हैं .. ...बड़ा परेशान थे दीदी के रिश्ते के लिए ....उस दिन मेरे पास आये और बोले -
" देख जुबैर तेरी बहन पराये घर जा रही है ...मेरा कोई बेटा नही ...और काम बहुत पड़ा है सर पर ...मैं दो- एक दिन के लिए लख़नऊ जा रहा हूँ ....अपनी दीदी और माँ का ख्याल रखना "
साला ..अंधे को क्या चाहिये तीन शेर रौशनी ..और वो मिल गई .. आज बाबूजी ने मुझे अपना लिया ..अपने घर का सदस्य मान लिया ...नही..नही ..हाँ. ये बोले
थे कि " मेरा कोई बेटा नही " ....साला ईद हो गई ...फल भरे झव्वे में और सीधे दुड़की ली ..दीदी के घर ...और लग गया अपनी बहन को विदा करने के मुक़द्दस दिन की तैयारी में .....
जब पेंट कर रहा था तो बाबूजी के कमरे में जाना हुआ ..और आँख भर आई ...पूरा कमरा दीदी की छोटी से छोटी तस्वीर उनके इस्तेमाल की गई चीजों ..उनके खिलौनों से भरा पड़ा था ...तभी किसी ने कन्धे पर हाथ धरा -
" जुबैर तेरे बाबूजी एक पल नही रह सकते मेघा के बिना ...बहुत प्यार करते हैं मेघा से ...."
और फिर माँ जी भी रोने लगी ...लेकिन मुझे लगा वजह दीदी नही कुछ और है ...
" माँ जी बोलिये क्या बात है ...?"
" कुछ नही बेटा तू काम कर..."
" नही माँ जी बेटा दिल से माना है तो बताओ क्या बात है आपको मेरी कसम .."
" कुछ नही बेटा...सुधाकर के पिताजी ने 5 लाख रूपये माँगे हैं ..दहेज में पहले ही हम गिरवी हो गयें हैं ...लेकिन रिश्ता तोड़ भी नही सकते क्यूँकि सुधाकर,, मेघा की पसन्द है ...और तेरे बाबूजी जान दे देंगे लेकिन मेघा की किसी भी पसन्द को नजरअंदाज नही होने देंगे ..और तुझे मेरी कसम मेघा को इस बात का पता नही चलने देगा ..."
मेरे पास कुछ जमा 60 -70 हजार रूपये थे ..वो लेकर मैंने माँ जी को दे
दिए ...लेकिन उन्होंने लेने से कड़ा ऐतराज किया और बोली ..इंतेजाम हो गया है तू बस काम सम्हाल ...
विदाई के दिन ...बन्द कमरे में बाबूजी और सुधाकर के पिताजी की कुछ बातें हुई ..बाबूजी को मैंने शादी पक्की होने से आज विदाई तक बहुत करीब से देखा ...वो खुश इसलिए नही थे कि उनके जिगर का टुकड़ा पराये घर जा रहा है ...लेकिन परेशान इस कदर थे कि समझ में आ रहा था कि दहेज की रकम ने उनका बाल-बाल कर्जे में डुबो दिया है ...मैं कहना चाहता था बाबूजी से कि फ़िक्र न करो अब दुगुनी मेहनत करूँगा और आपका कर्जा उतारने में आपकी मदद करूँगा लेकिन माहौल न बन सका कुछ भी कहने का ...
खैर दीदी विदा हुई और मैं खुद को न सम्हाल सका ..दीदी की दी हुई शेरवानी आंसुओं से भीग गई ...बहुत फूट-फूट कर रोया ..मेरी समझदार दीदी भी उस दिन खुद की आँखों में आँसुओं का सैलाब लाने से न रोक पाई ...बाबूजी के गले लगकर भी खूब रोई ...लेकिन बाबूजी पत्थर बने रहे ...एक कतरा उनकी आँख से न गिरा ....ये चुप्पी मुझे एक बहुत बड़े हंगामे की बू सी लगी ...खैर
सात दिन तक मैंने भी चुप्पी खींची रखी ..न दुकान में मन लगता था न घर में ...माँ जी ..कभी हाल पूछ लेती थी लेकिन फिर न जाने क्या हुआ कि बाबूजी अक्सर मेरी रेहड़ी के पास आकर घण्टो बैठे रहते ...न मुझसे जियादह बात करते न ..अपनी ही कुछ कहते ....चाय पिला देता था ..और कुछ खाने को मना कर देते ....
लेकिन एक बात अक्सर मैं बाबूजी से पूछता कि
" दीदी कब आ रही है ..?"
बाबूजी मुझे डाँट देते और बोलते ..अब वो पाराये घर की हो गई है ..अब उसका आना या न आना उनके हाथ है मेरे नही ....
तीन महीनों बाद जादू हुआ और मेरी दीदी मुझे बस से अकेले उतरती दिखाई दी ...लेकिन जैसे उतरी वैसे लगा जैसे वो दीदी नही ज़िंदा लाश है ...दीदी का उजला चेहरा काला पड़ गया था ..सेहत बिलकुल खस्ता ...
मैं चिल्लाया दीदी ...लेकिन वो मुझे अनदेखा कर टैक्सी में बैठ गई ...मैं दुकान खुल्ली छोड़ दीदी की टैक्सी के पीछे दौड़ा लेकिन मशीन और इंसान में इस बार फिर जीत मशीन की हुई ...सोचा शाम को मिल लूँगा ...
शाम को गया तो पता चला दीदी वापस लौट गई है ...कुछ समझ में न आया ...और किसी ने कुछ बताया भी नही लेकिन एक खटका हुआ ...
दिन बीतते गए और एक दिन जब फज्र की नमाज अदा करके दुकान की जानिब जा रहा था तो पता चला कि दीदी नह रही ....
मैंने खबर देने वाले का कॉलर पकड़ कर उसके जबड़ो को अपने घूँसे का टारगेट बनाया लेकिन जब उसने कसम खाई तो वहीँ घुटनों के बल बैठ गया ...और फिर कुछ देर बाद खड़ा होकर मस्जिद की जानिब मुँह करके अल्लाह से सवाल किया -
"ए अल्लाह ..ए मेरे मालिक ..क्या कमी रही मेरी दुवाओं में ..बोल.. कौनसा सजदा तुझे पसन्द नही आया ..हर नमाज में अपनी दीदी की लम्बी उम्र और खुशियों की दुआ की ...बता मालिक मेरी खता "
और जब जवाब कुछ भी न आया तो दौड़ा दीदी के घर ..और उनकी लाश देखकर इत्मिनान हो गया कि दुनिया अब इंसानियत ..ख़ुशी ..और अपनेपन . ..से बेवा हो गई ....
दीदी की मौत का राज समझ में न आया क्यूँकि दीदी कल ही मायके आई थी ..सब बोल रहे थे कि बीमारी के चलते दीदी न रही ...लेकिन तभी दीदी की लाश से कफ़न उठा और उनके बाजू में चोट के निशान बता रहे थे कि दीदी की साँसे दहेज से हार गई ....
बार -बार बोला बाबूजी से कि चलो पुलिस स्टेशन लेकिन वो बस खामोश थे ..लेकिन मेरी रगों में खून का उबाल था ..और मैंने टेबल पर पड़ा चाकू उठाया तो बाबूजी ने तुरन्त मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने कमरे में ले गए ....दीदी की तस्वीर हाथ में लेकर बोले -
" कि तीन महीने बाद राधिका का ब्याह है ...बस इसे निपटाने दे ..फिर एक काम करना पहले तो उन दहेज के भूखे भेड़ियों को पुलिस के हवाले करना फिर अपने बाबूजी को ..."
" कय्याआ ...क्या कह रहे हो बाबूजी ...?"
" हाँ बेटा...पल -पल मर रही थी मेरी बच्ची ..5 लाख में से 3 लाख दे चुका हूँ लेकिन हर दिन उसपर जुल्म होते थे ..उसको दागा जाता था ..उसको मारा जाता था ..शरीर देखा था उसका खाना तक नही दिया जाता था ...ले आया कल उसे उस नर्क से ...लेकिन रात को वो बिस्तर पर बैचैन थी ..पागलों की तरह चीख रही थी ...बहुत दर्द में थी वो .. अब उसपर कुछ न गुजरे इसलिए उसे हर दर्द ..हर रिश्ते ..हर उलझन से मुक्त कर दिया ...हाँ मैंने अपनी बेटी के मुँह पर तकिया रखकर उसे मुक्ति दे दी ....
मैं ज़िंदा लाश बना सब सुनता रहा ...दहेज ने एक ऐसी लड़की का शिकार कर दिया जो अगर और जीती तो न जाने कितने जुबैरों को इज्जत बख्शती..वो जो कुछ और जीती तो ये दुनिया देखती कि मुहब्बत के लिए ये ही उम्र कम है ..तो नफरत क्यूँ जमा की जाये ....
खैर मेरी दीदी को न उसके पिता ने कत्ल किया न उसके ससुराल ने ..मेरी दीदी को उस निजाम ने फनाह किया जिसका नाम दहेज है ...एक बाप, बेटी की शक्ल में जब अपने कलेजे की जागीर किसी को सौंपता है तो फिर दहेज किस रस्म का नाम है ..... बाबूजी चुप हैं क्यूँकि एक और बेटी उनको ब्याहनी है ..लेकिन बाबूजी काश समझते कि एक और बेटी कल फिर सुधाकर के घर ब्याह के जायेगी ....उसका क्या ?
खैर ! मुझे क्या मेरी इकलौती बहन थी ..वो चली गई ..और वो भी ऐसा ही सोचकर इस किस्से को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जायेंगे जिन्होंने या तो दहेज की हर शक्ल खरीद ली या फिर अपनी बहन और बेटी के दहेज की हर क़िस्त वक्त पर जमा कर दी ......
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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