Saturday, 6 April 2019

Thank my panty

#थैंक्स_माय_पेंटी
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आप की कसम देख रही थी टी .वी पर ...बाहर हल्की -हल्की झिलमिल बारिश...सौंधी बादामी मिट्टी की खुशबू ...और उसपर राजेश जी का मुमताज को बाँहों में भरकर .... हौले से कहना कि -

" करवटें बदलते रहे सारी रात हम ,,,,

आप की कसम ....आप की कसम "

इतने से ही सिहर उठी मैं ...मैं यानि सरिता उम्र 40 ..कद 5 ' 4 इंच ...रंग गोरा ...चेहरा गोल ...घने मुलायम परन्तु कुछ सफेद बाल भी ...खड़ी नाक ...रसीले होंठ ...ठोडी पर एक काला तिल ...

गर्दन जैसे फ्लेमिंगो का चिकना  भीगा बदन..और वक्ष......

तभी  डोर बेल बजती है -

" जी आप...?"

" एक्चुवल मैडम ...हम नोरा कम्पनी से हैं ...यू नो ..मीन आप एडवरटाइजमेंट तो देखते होंगे हमारा ..."

" हूं..हाँ याद आया कॉस्मेटिक्स वाला न ..?"

" नो मेम अंडरगारमेंट्स वाला ...! "

मैं थोड़ा सकपका सी गई ..और हाँ में सर हिला दिया ...

" तो दिखाऊँ आपको ...मीन यही प्रोडक्ट आप सीधे परचेज करेंगी तो रियल प्राइस में मिलेगा बट सीधे डोर टू डोर खरीदेंगी तो 10 %डिस्काउंट्स "

घर पर कोई नही था ...नीलिमा स्कूल गई थी और राकेश ऑफिस तो मैं सॉरी कहने ही वाली थी कि तभी उस सेल्समैन ने अपने बैग से एक पेंटी का डब्बा निकाला और उसमें से एक पेंटी निकाल के मेरे हाथ में देकर कहा ...

" फेब्रिक तो देखिये मेम !"

मैं उस पेंटी को देखती रह गई ....हाँलाकि ये किसी स्त्री के लिये कोई नई बात नही लेकिन ....किसी गैर मर्द का इस तरह से पेंटी हाथ में देना .....

बहरहाल मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को सामान्य किया और बोली -

" सॉरी भईया मैं अभी परचेज नही कर सकती ....कभी नेक्स्ट टाइम "

और दरवाजा बन्द कर दिया ...लेकिन जो दरवाजा खुल चुका था उसका क्या ......एक पेंटी ने एक पल में मुझे मेरा लड़कपन याद दिला दिया वो लड़कपन जिसने मेरी आज की साँसों को मुझे सौंपा है ...या यूँ कहूँ एक नई जिंदगी .... या फिर ये कहूँ कि वो जिंदगी जहाँ मुझे किसी गैर मर्द ने यूँ ही एक पेंटी दी थी ........

बात तब की है जब मैं कक्षा 10 में पढ़ती थी ...उम्र यही कोई 16 की थी मेरी ...शरीर में रचनात्मक और जैविक परिवर्तन ने मुझे स्वयं बता दिया कि अब मैं वो बच्ची तो हरगिज नही रही ..जिसकी दुनिया मर्दों से अब बेपरवाह रहने की है ...मतलब उससे पहले मुझे कभी किसी प्रकार की हलचल अपने शरीर में महसूस नही हुई ....कहीं भी आना ...कहीं भी जाना ...कुछ भी खा लेना ...कहीं भी ओट देखकर पेशाब के लिए बैठ जाना ..अपने पिता या अन्य मर्द परिवारजनों की गोद पर बैठ जाना आदि..

लेकिन धीरे -धीरे एहसास होने लगा कि पिता के इतर मेरे अपने मुझे गोद में बैठाने हेतु आतुर होने लगे ...कभी बालात् गोद में बैठाने लगे तो कभी कोई लालच देकर ...मुझे अब भी ये असमान्य नही लगता था ....लेकिन तब थोड़ा खटका जरूर होता था जब वो मेरे  माता-पिता के सामने मुझे गोद में नही बैठाते थे और अकेले में तो गोद से उतारते ही नही थे .....

गोद में बैठना मेरा कोई शगल नही था ..बल्कि अपनों की चहेती और लाडली बनकर घर के दूसरे बच्चों पर रौब जमाना था ....लेकिन जिस दिन बड़े ताऊजी ने मुझे ऊपर छत पर बुलाया और जबरदस्ती गोद में बैठाया ...तो मुझे कुछ चुभने जैसा महसूस हुआ ...और फिर जब ताऊजी ने मेरे अंगो को छेड़ना प्रारम्भ किया तो मैं समझ गई कि ये प्रेम ..वात्सल्य नही अपितु कुछ और है ....

मैंने छी कहकर वहाँ से दौड़ लगा दी ...और उस दिन के बाद फिर मैं कभी किसी की गोद में न चढ़ी ...काश मुझे मेरी माँ यानि एक औरत ,, पुरुष की ये पशुता समझाती लेकिन मुझे समझाया तो एक मर्द ने कि अब मैं बच्ची नही रही ...माहवारी के आरम्भिक दिनों में भी फिर मन में अनेकों सवाल उठे लेकिन फिर सब सामान्य सा हो गया .....

स्कूल में लड़कियों की चटख बात...उसपर विषय लड़कों का ...कक्षा के लड़कों से नैन -मटक्का ...कभी किसी शिक्षक का अंगों को घूर कर देखना ...ये अब मेरे रूटीन में आने लगा ....मुझे इससे असहजता नही होती थी बल्कि अब न जाने क्यूँ एक फूली-फूली सी ख़ुशी रहती थी जीवन में ....

जीवन में वो दिन भी आया जब पिताजी स्वर्गवासी हो गए ..और छोड़ गए मेरी माँ , मुझे  और मेरे दो भाइयों को ...

मैं अत्यंत सुंदर थी ...ऐसा मुझे तब लगने लगा जब मुझपर पुरुष जमात का हर आयु वर्ग रीझने लगा ...मेलों में मेरे पीछे लड़कों का रेला ...विद्यालय में आये दिन  मेरे लिए लड़कों में मार-पीट ...मैं ये कहने में गुरेज न करूंगी कि मुझे सिर्फ पुरुषों ने चाहा मेरा भोग तो स्त्रियाँ भी करना चाहती थी ....रश्मि मैडम जो अविवाहित थी और हमें हिंदी पढ़ाती थी कई बार मुझे अपने कमरे में ले जाती और जब रात को मैं उनके साथ ही सोती तो वो मेरे जिस्म से अपने जिस्म को रगड़ती और आँहें भरती थी ....

मैंने कभी विरोध नही किया क्यूँकि मुझे ये सुखद नही भी लगता था तो असहज भी नही ....

सुबह से शाम तलक मैं मर्दो के  इशारों , नजरों और सपनों में रहने लगी ...उसका परिणाम ये हुआ कि जहां मैं पढाई में पिछड़ती गई वहीँ मैं सेक्स की तरफ आकर्षित होने लगी .....लेकिन अपनी सुंदरता पर मुझे विशेष अभिमान था .....और मैं चाहे आग कितनी लगाऊँ ...कितनी बिजलियाँ गिराऊँ ....लेकिन स्वयं को उसी व्यक्ति को सौंपना साहती थी जो मुझसे भी बढ़कर हो ....

गाँव का जीवन सरल था ...हफ्ते में कभी एक तो मुश्किल से कभी दो ही दिन में नहाती थी ...सजना मेरा शौक था ...लेकिन मेर पास कपड़े नही थे ...पिताजी की मृत्यु से परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट गई ...और ताऊजी जो घर खर्च में मदद करते मैं उनके साये से भी घिनयाती थी ....

एक दिन स्कूल में जब हम लोग प्रार्थना सभा में खड़े थे ...तभी एक चमचमाती कार ने स्कूल में प्रवेश किया ...हम सब बच्चों की नजरें उसी गाड़ी को घूरने लगी ...तभी उसमें से उतरा एक राजकुमार ...बिलकुल शहरी ..बिलकुल किसी फ़िल्मी हीरो जैसा ... हम सब लड़कियाँ उसको एकटक देखती रही ...लेकिन मुझे लगा की ये तो वही है जिसको मैं सपनों में देखती हूँ ...जिसकी याद में .. मैं एफ.एम के गीतों संग खुद भी गाने लगती हूँ ...वो हमारी प्रिंसिपल मैडम का लड़का तुषार था ...उम्र में जरूर मुझसे कुछ 10 -12 साल बड़ा था लेकिन मैं पहली ही नजर में उसकी हो चुकी थी ...वो दिल्ली में कोई जॉब करता था ...मैंने उसका नाम अपनी कलाई में भी लिख लिया ...और अपने हाथ की मेहँदी में भी ....

मेरी दोस्त मुझे उसका नाम लेकर छेड़ती थी और मैं उनपर झूठा-मूठा गुस्सा दिखाकर मन ही मन लुत्फ़ लूटती थी ....

तुषार कुछ दिन गाँव में ही रहने वाले थे ...और वो भी मेरी तरफ आकर्षित होने लगे ... प्रेम -पत्र का आदान -प्रदान होने लगा ...और फिर दिन आया मुलाकात का ...पहली बार जब मैं कार में बैठी तो लगा जैसे कोई उड़न खटोला हो ...तुषार से नजरें मिलाने की मेरी हिम्मत नही हुई ..बस उनकी हर बात का हाँ ..हाँ में जवाब देने लगी ...

तुषार ने पहली ही मुलाकत में मुझे होंठो पर किस किया ....और फिर मैं शरमा गई ...दूसरी मुलाक़ात में तुषार ने मुझे एक गिफ्ट दिया और बोले -

" सरिता ..इसमें इम्पोर्टेड ब्रा  एन्ड पेंटी है ...कल जब आओ तो इसको पहन कर आना ...तुम्हे मेरी कसम "

घर आकर जब मैंने वो गिफ्ट खोला तो सिहर गई ..सरगोशी मेरे अंग-अंग में जलतरंग बनकर दौड़ने लगी ... मैं इतनी भी नादान नही कि इसका मतलब न समझूँ ..मैं समझ चुकी थी कि तुषार मेरे साथ सेक्स करना चाहते हैं ...और शायद अब मैं भी .....

तभी दरवाजे पर खटका हुआ और मेरी सहेली मधु ने प्रवेश किया ...तो मैंने जल्दी बाजी में वो गिफ्ट अपने स्कूल बैग में डाल दिया ...मधु से बात हुई और मैं  उसके लिए पानी लेने गई ....

अगले दिन जब मैं तुषार से मिलने के लिए तैयार हो रही थी ..कि तभी मुझे धक्का लगा ...बैग में मात्र ब्रा थी पेंटी नही ...हर तरफ ढूंढा और समझ गई ये मधु की शरारत है ...मुझे उसपर बहुत गुस्सा आया ...लेकिन उसका घर बहुत दूर था ...और वक्त बहुत कम था ....

मेरे पास कोई अच्छी पेंटी नही थी ...सब पुरानी सस्ती ..और फ़टी हुई ...मैंने बड़े बेमन से उनमें से एक पेंटी पहन ली ...और तुषार से मिली ....

जब हम एकांत में मिले तो तुषार ने मुझे बाँहों में जकड़ लिया ...बहुत चूमा और मसला भी ..और मैं भी खोती गई ...लेकिन जैसे ही तुषार ने मेरी सलवार के नाड़े को खोलने की कोशिश की मैं फौरन एक नींद से जागी ....माना मुझमें भी नशा था कि मैं तुषार को वो सब कुछ सौंप दूँ जो मेरे पास मौजूद है ....लेकिन मुझे भय था की कहीं तुषार ने पेंटी देख ली तो कहीं वो भड़क न जाए ...या फिर मुझे खुद पर आत्मग्लानि हो रही थी कि इतनी सुंदर और अनुपम होने के उपरान्त मेरी फ़टी और सस्ती पेंटी को देख तुषार मुझे रिजेक्ट न कर दे या फिर अपने लायक न समझकर मुझे हेय दृष्टि से देखे .....

मैंने उसका विरोध किया ...वो मिन्नत करते रहे लेकिन मैं अडिग रही और आज नही ..फिर कभी कहकर वक्त को टाल दिया ...तुषार मुझसे खफा हो गए ..और मुझे वहीं छोड़ लौट गए ....

तीन दिन हो गए तुषार को मिले हुए ...हर बार एफ .एम् में किसी सैड सांग का वेट करती और उसके आते ही खूब रोती ...अपनी दोस्त को मैंने अपनी जिंदगी और मित्रता सब से बाहर कर दिया ...उसने मुझे वो पेंटी भी दे दी लेकिन मैं नही मानी ....

तुषार दिल्ली जा चुके थे आज उनको जाये हुए कुछ 6 महीने हो गए है ...और मैं गाँव में तिल-तिल करके मरती जा रही थी ...एक दिन प्रिंसिपल मैडम को अचानक दिल्ली से स्कूल के लेंड लाइन पर फोन आया ...और वो दिल्ली के लिए निकलने लगी ...मैंने उनसे कहा मैडम मैं भी साथ चलूँ तो वो तैयार हो गई ।।।

मेरे मन में उमंगो का वेग फिर पर फ़ैलने लगा ...और मैंने इरादा कर लिया कि तुषार के मिलते ही मैं उनके चरणों पर गिर जाऊँगी और उनको स्वयं को पूरी तरह सौंप दूँगी ...

घर जाकर जल्दी से मैंने अपने कपड़े पैक किये...और पैक की वो ब्रा और पेंटी  भी ....

दिल्ली में प्रिंसिपल मैडम मुझे सीधे लेकर एक अस्पताल पहुँची और पहले  एक डॉक्टर से मिली ....

जैसे ही डॉक्टर ने उन्हें कुछ् बताया वो रो पड़ी ...मेरी समझ में कुछ नही आ रहा था ...क्यूँकि समझ में तुषार का चेहरा जो छाया हुआ था ....

तभी मैडम रूम से बाहर निकली और पेसेंट रूम की तरफ दौड़ी..मैं भी उनके पीछे दौड़ी ....सामने जो नजारा देखा तो देखती ही रह गई ....

6 माह पूर्व का आकर्षक और सुंदर तुषार आज का अत्यंत कुरूप और कमजोर इंसान दिख रहा था ....वो तो वो था ही नही जिसे मैंने सच्चे मन से  प्रेम किया है ...

मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो मैं सीधे डॉक्टर मेडम के पास गई ....

" मेडम प्रिंसिपल मेम क्यूँ रो रही है ...क्या हुआ है तुषार को ...वो इतना ..."

" आप बाहर जाओ बेटा ...आप नही समझोगी ..प्लीज .."

" नही मेम मुझे बताओ मैं तुषार से प्रेम करती हूँ और वो भी सच्चा प्रेम "

डॉक्टर सन्न रह गई ....और फिर बोली -

" बेटा क्या तुमने उससे फिजिकल रिलेशन तो मतलब ...म ...सेक्स तो नही किया ...?"

मैं धांय से स्तब्ध हो गई ...और होश सम्हाल के बोली -

" नही ! ... लेकिन "

" लेकिन -वेकिन कुछ नही बेटा ...तुमने अपनी जिंदगी बचा ली .. तुषार को एड्स है ...मतलब ये बीमारी  होने के कुछ रीजन है लेकिन सबसे बड़ा रीजन है एक से अधिक लोगों के साथ असुरक्षित सेक्स ...तुषार ने स्वयं स्वीकारा है की उसके कई लड़कियों के साथ सेक्स रिलेशन थे ..."

और भी बहुत कुछ इस बीमारी के बारे में और तुषार के बारे में डॉक्टर मेम ने बताया ....खैर तुषार से मिली लेकिन अब न उसके लिए मन में प्रेम था और न ही कोई हमदर्दी ...हर अति की इति सुनिश्चित है ...न जाने कितनी मासूम लड़कियों को उसने अपने प्रेम के जाल में फँसाकर न केवल उनका कौमार्य उनसे छीना बल्कि उनकी जिंदगी भी...

उस समय पहले मैंने ईश्वर को  धन्यवाद नही दिया ..बल्कि कहा " थैंक्स माय पेंटी " ...उसके बाद मैंने सिर्फ पढाई की और उसके उपरान्त राकेश से विवाह ...आज एक बेटी की माँ भी हूँ लेकिन ....आज जब भी अपने परिवार के साथ खुद की कल्पना करती हूँ तो अपने जीवन की रक्षक उस पेंटी को थैंक्स कह देती हूँ ...और कहती हूँ उन समस्त बच्चियों ..किशोरियों एवं युवतियों से कि जीवन में सब कुछ करो लेकिन ध्यान ये रखो कि प्रेम निश्छल भावना को समर्पित है ..प्रेम में वासना गौण होती है और विश्वास प्रथम ..शरीर से प्रेम करने वाला भाव सिर्फ बर्बादी ..पतन ..बदनामी और ..पछतावा  लेकर आता है या लाता है साक्षात काल ...... किसी से प्रेम करो तो मन सौंपो ...और जो मन से तन को श्रेष्ठ समझे तो समझ लो जिंदगी मेरी तरह हर किसी को थैंक्स माय पेंटी कहने का दूसरा मौका नही देती  !

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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