Sunday, 31 March 2019

सीटी अंकल

#सीटी_अंकल
************

" पीछे..पीछे...चल आगे . काट ... रुक ...."

और फिर सीटी की कर्कश आवाज लेकिन सिर्फ उसके लिए जिसने इसे पहली बार सुना ...

मगर बचपन से सुनता आया हूँ इस आवाज को मैं इसलिए इससे सुरमई ..शाहनवाज ..दिलखुश चश्मई...सुंदर ..निरुपम और मनोहर आवाज मुझे फिर  कोई और नही लगती ...

हाँलाकि संगीत मेरी कमजोरी है ...मेरी माँ आरती सिंह सितार बजातीं हैं ...लेकिन मैं क्या करूँ इस सीटी को सुनते ही मेरी तबियत हरी हो जाती है ...   मेरे पिताजी  आई जी रिटायर्ड  हैं ...मैं अनिल  सिंह उम्र 23 साल ...

बचपन से एक नाता है रानीपुर से ...हाँलाकि मूल रूप से रहने वाला मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हूँ लेकिन ये पहाड़ी जिला मुझे जन्नत से भी हसीन लगता है ...पापा को यहीं पर पहली नियुक्ति  जिला एस.पी के रूप में मिली थी ...पापा जिनका नेताओं के साथ अच्छा खासा उठना -बैठना था लेकिन मुझे ये कभी रास नही आया ....

मेरे पिताजी ..और मेरे मध्य बचपन से ही एक पर्दा था ..मेरा बचपन जहाँ लाड़ और शरारत माँगता था वहीँ पर मेरे पिताजी ने मुझे अनुशासन का कठोर चाबुक दिया ... माँ कभी पिताजी के खिलाफ इसलिए भी नही गई क्यूँकि वो खुद मुझे पैदा करके मेड के सहारे छोड़ संगीत कार्यक्रम ..मुशायरों में जाने से खुद को कभी न रोक सकी...

मेरा बचपन ..जब गीली मिट्टी में नंगे पैर चलना चाहता था तो मुझे कंक्रीट का फर्श मिला ..जब धूल उड़ाकर फिजा में नाचने का दिल किया तो मुझे मात्र पंखे के नीचे की हवा नसीब हुई ...जब अपनी उम्र संग खेलने को ललचाया तो मुझे समझाया गया कि मैं अपना स्टेट्स और पेरेंट की रेपो देखूँ ....

और भी ऐसा बहुत कुछ जिसको मेरी अबोल उम्र ने झेला ...इसलिए किताबों की दुनिया के पात्र ही मेरे दोस्त ...साथी और सगे बनते गए ....

मैं वास्तविक दुनिया को भी किताबों से समझने लगा ...लेकिन अक्सर बहुत गुस्सा आता था क्यूँकि मेरे रूम के जस्ट नीचे ट्रैफिक पॉइंट था जिसकी वजह से मुझे रोज अपने कानों में रुई डालकर अपनी स्टडी एन्ड रीडिंग करनी पड़ती थी ....

लेकिन जब एक दिन मैं जॉन मिल्टन की एक पोइट्री में खोया हुआ था और कल्पनाओं के जंगल में बहुत आगे निकल गया था तब मुझे जो ध्वनि मेरी मूल वास्तविकता में खींच कर लाई वो थी ......

एक विस्सल की आवाज ... यानी सीटी !

मैंने झट से कमरे की खिड़की से नीचे झाँका और पहली बार मेरी मुलाकात हुई ... नजीर अहमद से  ।

ट्रैफिक हवलदार नजीर अहमद ....मुझे बहुत गुस्सा आया कि अब इस पॉइंट पर एक सीटी वाला हवलदार भी खड़ा कर दिया गया है ...पहले ही गाड़ी-मोटरों की आवाज कम थी क्या ....?

उम्र के चौदहवें पड़ाव पर मैंने अपना बचपना प्रदर्शित किया और खिड़की खोल उस हवलदार को पुकारा -

" ऐ सीटी अंकल ...विस्सल मत बजाओ डिस्टर्ब होता है ....कल एग्जाम है मेरा ..."

हवलदार ने ऊपर देखा ..और झट से मुझे सेल्यूट किया ....और फिर दुबारा विस्सल बजाकर अपने काम में लग गया ....ये सब मेरे फादर भी देख और सुन रहे थे और तुरन्त उन्होंने अपने रूम से हवलदार को ऊपर आने को कहा....

हवलदार अपनी जगह से नही हिला और अपने काम में व्यस्त हो गया ...

पापा आग -बबूला होकर मॉर्निंग गाऊन में ही नीचे सड़क पर आ गए -

" क्यूँ बे ! साले बहरा है या चर्बी चढ़ गई है आँखों में ...जानता नही कौन हूँ मैं ..?"

" जय हिन्द साहब  ! आप जिला कप्तान साहब हैं ..वो कोई रिलीवर नही था साहब मेरी जगह ..और मेरे साहब ने ऑर्डर दिया था कि बिना रिलीवर पोस्ट मत छोड़ना "

" कौन है तेरा साहब ...?"

" इंस्पेक्टर निर्मल चौधरी साहब !"

" मादरजात ..इंस्पेक्टर और एस.पी के रुबाब और ओहदे में कोई अंतर नही समझता ...रुक अभी ! "

मुझे नजीर अहमद फिर तीन महीने तक उस पोस्ट में  दिखाई नही दिया ....वो सस्पेंड हो चुका था ...अब उसकी जगह बिना सीटी वाला एक ट्रैफिक हवलदार मेरी खिड़की के नीचे खड़ा होता था जो पोस्ट में कम और हमारे घर के कामों और पापा की जी हुजूरी में जियादह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ था .....

पापा का ट्रांसफर हो गया ...और हम सब एक जन्नत से पहाड़ी  जिले से निकलकर तराई में शिफ्ट हुए ...यहाँ हर तरफ सीटी ..कोलाहल ..आवाजें और धुंवा था ....और जब धुंवा हटा तो फिर मुझे नजर आया वो धूप से बिलकुल झुलसा और स्याह चेहरा जो अकेला ट्रैफिक से लोहा ले रहा रहा था ...जिसके गले की नसें पानी माँग रही थीं और हिलते कदम कुछ देर का आराम ...

" पापा वो देखो सीटी अंकल !"

" अनिल जस्ट शटअप ...मिरर ऊपर करो सन लाईट स्किन डिजीज़ करेगी "

पता नही क्यूँ आँख से आसूँ गिर गया ...वो भी तो धूप में खड़ा है ..बिलकुल न्यूड धूप में ..क्या उसका कोई पापा नही ..क्या उस बेचारे को कोई आराम नही ..तभी पापा की गाड़ी उस हवलदार के सामने रुकी -

" जय हिन्द साहब ! "

" क्यूँ बे तू यहाँ ...? पोस्ट पर मुश्तैद बने रहना वरना इस बार लम्बा घर भेजूँगा समझा "

उसने मुस्कुराह कर जी साहब बोला ...और अपने काम पर लग गया लेकिन पता चला आज अपने पिता की निर्दयता का शिखर .. माना सॉरी नही भी बोल सकते थे तो कम से कम मीठा तो बोल जाते .....

अगले दिन सन्डे था ...पापा एक आपात मीटिंग में दिल्ली गए हुए थे और मेरी ममा उनके साथ ...मैंने मेड को चुपचाप अपनी पॉकेट मनी से कुछ पैसे दिये और कहा कि वो मुझे बाजार घुमा कर लाये ...वो नही मानी लेकिन जब मैंने उनसे बहुत रिक्वेस्ट की तो वो मान गई ....पुलिस महकमे का एक ड्राईवर आया और वो भी एक थाने की पुलिस वैन लेकर ....

मुझे अटपटा लगा कि यदि अपराधी का पीछा करने की बात हुई तो किस गाड़ी से पीछा किया जाएगा खैर हम बाजार में जब उसी ट्रैफिक पॉइंट के पास से गुजरे तो ....मैंने जीप रुकते ही आव देखा न ताव ..और उस हवलदार के पास पहुँच गया -

" सॉरी सीटी अंकल ...उस दिन के लिए भी ...और कल पापा के मिसबिहेव के लिए भी "

धूल चढ़ी पलकों और कालिख खाये होंठों पर उन्होंने थिरकन दी और मुझे झट पहचान गये ...और बोले -

" बाबा ...कोई बात नही .मैं भी सॉरी बोलता हूँ उस दिन सीटी से आपको डिस्टर्ब हुआ ...लेकिन आपका इम्तिहान कैसा रहा ...?"

" इम्तिहान मतलब ...?"

" ओह्ह्ह एग्जाम ..!"

" फर्स्ट क्लास सीटी अंकल ..नाऊ फ्रेंड .."

सीटी अंकल के हाथ कँपकपाने लगे ..लेकिन उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और बोले -

" अल्लाह तुम्हे मेरी भी उम्र दे बेटा ...तुम बहुत नेक मासूम हो ...अब जाओ ट्रैफिक खुलने वाला है "

उस दिन के बाद मेरा और सीटी अंकल का एक रूहानी रिश्ता बन गया ...वो जब भी मुझे देखते मैं स्माइल करता ..वो हाथ हिलाते तो मैं सीटी बजाने को बोलता ...वो खिलखिला कर हँसते और सीटी बजाते ...वक्त निकलता गया और मैं दिल्ली चल दिया .. सिविल सर्विस की कोचिंग के लिए ...आई .पी . एस कैडर गेन किया और फिर असोम पोस्टेड हो गया ...शादी हुई बच्चे हुए और पापा का रिटायरमैंट भी ....

अगली पोस्टिंग रानीपुर हुई वही पहाड़ी जिला जहाँ मेरा जन्म हुआ था ....पूरे परिवार संग शिफ्ट हुआ ...

अगले दिन प्रदेश के मुख्यमन्त्री की चुनावी रैली थी ...और मैं चाक चौबन्द .. मुख्यमन्त्री के सभा स्थल में मेरी ड्यूटी थी तभी वायरलैस सेट पर मुझे खबर मिली की मुख्यमन्त्री की गाड़ी ट्रैफिक में फँस गई हैं ....मैंने आनन -फानन में अपनी गाड़ी को ट्रैफिक पॉइंट को रवाना किया ....मेरे पिता मुख्यमन्त्री के साथ थे ...क्यूँकि वो अब राजनीति में आने को नेताओं की जी हुजूरी में मुब्तिला  थे ....

" हरामजादे तू अब तक जिन्दा है ...तुझ जैसा कामचोर ..निठल्ला ..घामड़ मैंने अपने पूरे सेवाकाल में नही देखा ...आज तेरी लम्बी छुट्टी करवाता हूँ ..."

मुख्यमन्त्री भी अंदर गाड़ी में दाँत पीस रहे थे .....मेरी तरफ उस ट्रैफिक वाले की पीठ थी और मैं गाड़ी से उतरकर  भाग कर उसकी जानिब बढ़ा .....

जैसे ही मैंने उसका चेहरा देखा फिर मानो ऐसा लगा जैसे पूरा ट्रैफिक में भूल गया ...हर जज्बात ...हर बात...हर जिम्मेदारी ..हर ओहदा और हर कर्म ....उसने मुझे देख के काँपते हुए सैल्यूट बनाया ..उसकी आँख का चश्मा उसकी नाक से नीचे गिरने लगा ...मैंने हाथ आगे बढ़ाया वो पीछे बढ़ा ..फिर लड़खड़ाया उसके जूते का  फीता खुला था ...मैंने अपने घुटनों पर बैठकर पहले उसका फ़ीता बाँधा फिर न जाने क्यूँ उसको सैल्यूट बना दिया ...ये प्रोटोकॉल के खिलाफ था ...लेकिन मैं खुद में नही था ...

पापा शर्म से गड़े जा रहे थे ...लेकिन मेरी दशा शर्म की नही फक्र की थी ...वो सीटी अंकल जो दुनिया में बिलकुल अकेला था ..एक दिन उसी ने मुझे बताया था ...जिसका रिटायरमेंट बिलकुल पास खड़ा था ...जिसने कर्म से बढ़कर कभी किसी की जी हुजूरी नही की ...वो बुझी आँखों को फैलाकर मुझे पहचान गया ....और अब प्रोटोकाल उसने तोड़ा और मेरे गले से लगकर फूट-फूट कर रोने लगा ....ट्रैफिक तो कोतवाल और सी .ओ सिटी ने खुलवा दिया ..लेकिन मेरे पिता आवाक् थे ...और मुख्यमन्त्री खफा ...लेकिन जो आम जनता इन्हें अपना नेता बनाती है ...वो आम जनता जिनके बीच से निकलर एक अफसर उन्ही पर रौब चलाता है उसने तालियों की बौछार से हमें नहला दिया ....आम पुलिस का साधारण छोटा कर्मचारी आँखों में आँसू ले आया ....और मैंने हौले से सीटी अंकल के कानों में कहा -

" एक बार सीटी तो बजा दो सीटी अंकल ! "

बदले में कोई प्रतिक्रिया नही आई ....सीटी अंकल की लटकी हुई सीटी जरूर हिल रही थी लेकिन दिल, में कोई हलचल नही थी ....मैं समझ चुका था वो जा चुके हैं ...मैंने वहीं उनको अपनी गोद में लेटाया ...और जी भर कर रोया ....जब एम्बुलेंस आई तो मैंने सीटी अंकल के जेब में कुछ कागजात देखे ...उन्हें पोल्युसन से कैन्सर हो गया था ...दिन -रात बिना ठहरे , बिना मास्क के अपनी ड्यूटी अदा करता वो भी बिना जी हुजूरी के ऐसा इंसान अब नही बनता ...लेकिन मैंने आँख पोंछी और जब सीटी अंकल को आखरी बार एम्बुलैंस में देखा ....तो उनके कन्धे का इक इकलौता  सितारा ऐसा चमक रहा था जैसे ईमानदारी का कोई आखरी सूरज अपनी चमक बिखेर कर अस्त होने चला हो .....

मैं एस.पी  अनिल सिंह इस घटना के बाद देश के हर घर-घर जाना जाने लगा ...सबका चहेता और लाडला बनकर.. लेकिन मेरा आदर्श वो सीटी अंकल आज भी मेरे ड्राइंग रूम में अपनी तस्वीर के माध्यम से मुझसे बात करता है....और शायद ही कोई यकीन करें मैंने अक्सर उनकी सीटी की आवाज अपने कानों में गिरती  सुनी है ...

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

Thursday, 28 March 2019

न्याय

#न्याय
*******

" आह ! ससुर जी ..आपने तो आज मुझे तृप्त कर दिया ...."

" ओह्ह्ह्ह.. मधु मेरी जान तुमसी गर्म कच्ची जवानी नही ......"

तभी दरवाजे पर भड़-भड़ होती है ...और हम सकपका के जागते हैं... इतना मीठा ..रसीला ..और कामुक स्वप्न अवश्य मेरी मनहूस धर्मपत्नी ने ही तोड़ा होगा ...ये साढ़े साती जौंक जब से मेरे जीवन में चिपकी तब से आज तलक बस मेरा खून ही पीती जा रही है....

भांग -भसड़ .. नफरत हो चुकी है मुझे धर्म-कर्म से भला इतना भी कोई आस्तिक होता है ..इतना पूजा-पाठ नेम वाला ...

मुझे यानि आत्माराम चौबे को आज भी वो सुहागरात भूले से नही भूलती जब मैंने लाजवंती के बीज   ..काजू की सूरखी ..खस-खस का घोटा दूध में फेट कर निगला था ...और तत्पर था बिस्तर पर एयर स्ट्राइक के लिए .. जैसे ही गाढ़े कत्थे का पान रम्पुरिया  132 संग अफीम चबा कर मैंने निर्मला का घूँघट खोला ये फूँकनी की लज्जा छोड़ किसी मन्त्र का जाप करती नजर आई ...

मैंने सोचा शुभ के संगत ये कोई यन्त्र होगा परन्तु पता चला उसने तीन दिवस का पुरुष  स्पर्श रहित कोई व्रत लिया है ...और लग गई लंका ..मिन्नत की ..जबरन साढ़े तीन चुम्मा टेके ...लेकिन इरोटा न खुद गर्म हुई न बिस्तर को गर्म होने दिया ....बल्कि दीनानाथ  की ठण्डी लस्सी ने मेरे भी अरमान और शौक ठंडे कर दिए ....

सुहागरात की लंका लगते ही हमनें सोच लिया कि आगे की जिंदगी अजन्ता -एलोरा की पच्चीकारी देखकर ही गुजरने वाली है ...

जब स्वाधीन लोहा ढाल न बन सके तो उसे तलवार बनाना न्यायिक होता है ..तो हमनें जबरदस्ती अपने हिस्से का हक लूटा ..और इसी जबरदस्ती का परिणाम ये रहा की सूखे पेड़ पर दो फल लटके ...

मेरा बड़ा बेटा नकुल और छोटी पुत्री राधिका ...मेरी कामुकता के शीर्ष का एक समय ये रहा कि पत्नी की उपेक्षा से मैंने वो सब हथकंडे अपनाये जिसकी एक भद्र पुरुष मात्र कल्पना करता है ....कल्पना में ही नही बल्कि वास्तविकता में भी मैंने कई गोल दागे ...जिले और सदर जिले का कोई कोठा नही ..कोई छिनाल नही जो मुझसे होकर न गुजरी ...लेकिन फिर जब 60 का हुआ तो लगा बस ये ही मेरा स्टॉप पॉइंट है ...

ये कोई हृदय परिवर्तन नही अपितु जिस्म में जोश की समाप्ति का अलार्म था ...खैर बड़े पुत्र की शादी करवाई और वो भी एक अत्यंत सुंदर चरित्र और देह की युवती से...नकुल दुबई में जॉब करता था और फिर बेटी राधिका भी पराये घर की हो चली ...

जिंदगी शांत और आम सी थी.. बहू में मुझे राधिका ही नजर आती थी ..और वो भी मुझमें अपना पिता ही तलाशती थी ..समझ में नही आता था कि ये सब कुछ तूफान से पहले की शांति थी या  मस्तराम की कहानी की तरह जिंदगी सिर्फ किसी एक घटना से बदलने वाली थी ....

उस दिन मेरी मनहूस अर्धांग्नी सत्संग में गई हुई थी ...और गर्मी इस कदर भड़क रही थी कि मैं पंखे के नीचे लेट कर भी पता नही क्यूँ गर्म होता जा रहा था ....

तभी मैंने सोचा नहा लिया जाये ताकि शरीर को तरावट और ठंडक मिले ...जैसे ही मैंने अपने रूम का दरवाजा खोला ...मुझे बाथरूम से बहू निकलती हुई दिखाई दी ...

जिस्म में उतना ही बड़ा  तौलिया चिपकाये जितना मैं कमीज का कपड़ा दर्जी को देता हूँ ...सुर्ख सफेद और गुलाबी बदन ...उसमें नाचती बूंदों की रिमझिम ...गीले रेशमी बाल और वो भी देह पर चिपके हुए ...

तभी मधु की नजर मेरी नजर से टकराई और उसने अपने जिस्म में मेरी नजरों को लपलपाता पाया हम दोनों सिहर उठे ...मधु शर्म से और मैं उत्तेजना से ...ये आखरी दिन था जब तलक मधु मेरी बेटी रही क्यूँकि इसके बाद न ही कभी मैंने फिर उसको बेटी की नजर से देखा और न किसी रिश्ते के नयन से ...

अब वो मेरे लिए मात्र एक भोग मूरत थी ...शरीर में जोश पुनः लौटने लगा ...खून नसों में दुगने बहाव से दौड़ने लगा ...हर वक्त मधु की देह दर्शन मेरे लिए रिटायरमेंट के बाद  पुनः एक रोजगार  सा बन गया ...

कल्पनाओं में मधु सदैव मेरी देह से लगी होती और उष्ण कल्पनाओं में  समाधि से सम्भोग की ओर ...

मधु भी मुझसे बचने लगी थी ...क्यूँकि एक स्त्री होने के नाते वो समझ चुकी थी कि मेरी नजरें उसके किन-किन अंगो का शिकार करने हेतु अभ्यस्त हो चुकी है ....वो कम से कम मेरे सामने आती ...कम बोलती ..इतना कुछ होने पर भी कभी मधु ने न कभी मुँह बनाया न कोई प्रतिरोध दर्ज किया ...

ये मेरे लिए नैसर्गिक चिंतन का अवलम्बन था ...और स्वतः ही परिस्थितियों का आंशिक मूल्यांकन कि पति विरह ने उसके भी नेम और धैर्य को ध्वस्त कर दिया है ...अब वो भी व्याकुल और उत्तेजित है ..लेकिन लज्जा और मर्यादाओं की छद्म कच्ची डोर से उसने स्वयं का खूँट टिका रखा है ....

लेकिन मैं औरतबाज और रंगबाज आदमी रहा हूँ ..और निश्चित रूप से जानता हूँ कि पहल सदैव पुरुष का ही कर्म है ...तो मैंने आते-जाते उसकी देह से अपनी देह का घर्षण करना प्रारम्भ कर लिया ...उसके सुकुमार अंगों को भी अप्रत्यक्ष रूप से छेड़ना प्रारम्भ कर दिया ....परन्तु एक दिन -

" बस बहुत हो गया ससुर जी ! आप को नीच भी नही कह सकती क्यूँकि आप को अपना पिता जैसा नही अपितु पिता ही माना है ...बचपन में ही अपने पिता को खो चुकने के बाद मुझे लगा था कि अवश्य मुझे ससुर के रूप में मेरे पिता मिले है ...लेकिन आप तो  ...अगर आप ने अब कोई बदतमीजी की तो मैं सब कुछ सासु माँ और नकुल को बता दूँगी "

कव्वे की बीट सी शक्ल हो गई मेरी और पहली बार लगा कि मेरी स्त्री के इतर और भी स्त्रियां वुजूद में हैं जिनको काम विचलित नही कर सकता..मधु का ये टेढ़ा लेक्चर मेरे अंदर के जोश
और उमंग को साप्ताहिक तोड़ गया ...पूरे सात दिन मधु से नजरें मिलाने की मेरी हिम्मत नही हुई ...लेकिन माँसाहारी पशु की भूख मात्र माँस ही शांत कर सकता है ...और मधु का गुदाज जिस्म मेरे लिए मेरी भूख के साथ मेरा काम ज्वर निवारण भी बन चुका था ....

मैंने अंतिम फैसला करने में पूरे सात घंटे लिए और इरादा कर लिया कि ऐसी देह भोगने के लिए यदि मुझे प्राणदण्ड भी मिल जाए तो ये मेरे लिए एक प्रशस्ति से कम नही ....

अपने ही हमउम्र ठरकी से मैंने बेहोशी की गोलियाँ ली ...और बड़ी सावधानी से उसे पकते भोजन में मिला दी जिसे मधु तैयार कर रही थी ...इससे दो फायदे निश्चित थे एक तो बेसुध मधु का जिस्म और दूसरा मेरी मनहूस पत्नी को भी सुबह तक की गहरी कुम्भकर्ण नींद  ...

गोलीयों ने अपना असर दिखाया और मैं अपने कमरे में वैसे ही तैयार होने लगा जैसे मैं अपनी सुहागरात में तैयार हुआ था ...बस पान चबा न सका क्यूँकि नकली दाँत इसकी अनुमति नही देते ....लेकिन उसमें रखी अफीम चूस ली ....

खुशबू से सराबोर ..देह में उत्तेजना लिए में मधु के कमरे की ओर बढ़ने लगा ...मधु पूर्ण रूप से बेहोश होकर अपने बिस्तर पर पड़ी थी ..मैंने देहलीज से उसके जिस्म के आरोह -अवरोह पर अपने जिस्म को फूलता सा पाया ...और उत्तेजना का ज्वर लेकर जैसे ही मैं मधु को रौंदने आगे बढ़ा तभी लैंड लाइन फोन की घंटी बजी -

मैंने बेमन से रिसीवर उठाया-

" हैलो ! "

" पापा में लुट गई ...पापा आप जल्दी आ जाइए ..प्लीज पापा ..मेरे ससुर जी ने मेरे साथ बलत्कार ....."

फोन का रिसीवर मेरे हाथ से छूट गया ...और मेरा गर्म शरीर एक पल में उत्तरी ध्रुव बन गया ...सब कुछ घूमने लगा ..मैं फ़टी आँखों से कभी मधु को निहारता कभी दिवार पर लगी उस आदियोगी शिव की तस्वीर को ...

पैर जड़ता को प्राप्त हो गए ...रिसीवर से छनती राधिका के रोने की आवाज मुझे जता रही थी कि जिस साँप ने मुझे ये नींद की गोलियाँ दी उसी ने इसी जहर से डश कर मेरी बच्ची को निगल लिया ....

तभी हवा का एक तेज झोंका खिड़की से अंदर आया और एक किताब का सफा खुला जिसमें एक सूफी की तस्वीर के नीचे लिखा था

" अपनी ही करनी का फल है नेकियाँ रूसवाइयां,,,,

आपके पीछे चलेंगी आप की परछाइयाँ ....."

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

Wednesday, 27 March 2019

इश्क_ऑन_बस_स्टॉप

#इश्क_ऑन_बस_स्टॉप
*******************

हाँलाकि दुनिया मुझे एक सड़कछाप लेखक समझती है लेकिन अगला बुकर मेरा है ....ये नासमझ दुनिया वाले नही जानते ...नरेश चौधरी उर्फ़ ' आग ' नाम है मेरा ...उम्र 40 के पार ..और रंग गुड़ पापड़ी की सोंधी सिकाई  वाला ....मैं अपना तआरुफ़ इसलिए जल्दी बाजी में दे रहा हूँ क्यूँकि अब जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ  ...वो कहानी ..कहानी न होकर एक मकड़जाल है ...जिसमें मेरी मनहूस किस्मत ने मुझे भी उसका एक अप्रत्यक्ष पात्र बना दिया ....

दिल्ली की एक सुबह  सर्द मद्धम हवाओं के मध्य उड़ते कोहरे के छँटते ही मुझे नजर आये दो इंसान एक नर और एक मादा ...

नर की उम्र तकरीबन कोई 40 से 42 के मध्य और मादा यही कोई 35 साल पहने हुए ...

मैं हाथ में अख़बार लिए हुए जब उनके और करीब पहुँचा तो दोनों  बल्लीमारान की बस का वेट कर रहे थे ...

बल्लीमारान यानि मेरे मुँह बोले चचा " ग़ालिब " की कलम ए आशनाई की जमीन ....

" आज  लगता है बस कुछ लेट है ..?"

" जी मुझे भी लगता है ! "

" आप कॉलेज कर रहीं हैं ..? "

" जी बी .ए फर्स्ट इयर "

" जी मैं भी बी. कॉम सेकंड इयर ..."

घण्टा इतना कर्रा और घिनौना झूठ ...साले उम्र की जिस पिच पर खड़े हैं वहाँ से  दो दशक पूर्व की फेक बॉल फेंक रहें हैं ।।

" जी आपका गुड नेम ..?"

" डौली ! "

" मैं राकेश श्रीवास्तव ..नाइस नेम एन्ड नाइस टू मीट यू "

" सेम हियर !"

तभी बस आती है और एक महिला  बस से चिल्लाती है !

" अरे नीरजा चल जल्दी आ सीट घेर रखी है !"

मैंने इधर -उधर टाप के देखा हम तीन जनों के इतर उधर कोई नही था ...एक मिनट दो जन के इतर क्यूँकि वो पुरुष अर्थात राकेश कुमार अब वहाँ नही था !

वो महिला फिर चिल्लाती है और मेरे साथ खड़ी महिला अर्थात डौली उसे हाथ हिलाकर बोलती है

" आ रही हूँ बाबा ! "

ये मेरे लिए आज सुबह का एक और बड़ा शॉक था ...साला अभी डॉली बता रही थी अपना नाम जब लौंडिया बनी हुई फेंक रही थी ...जाना तो था मुझे चाँदनी चौक लेकिन मेरे अंदर का एक गिलमिलाया लेखक मुझे डौली ..यानि नीरजा यानि लौंडिया ...इसकी माँ का पता नही क्यूँ उस फेंकूँ औरत के पीछे बस चढ़ने को मजबूर कर बैठा ...

" क्यूँ जी ! किस्से गप्पे लड़ा रही थी ...मेरी तरफ पीठ थी उस जेंटलमैन की इसलिए पहचान नही पाई ..बता न कौन था ..?"

" कोई नही यार  ..बस की आवाजाही की इंफॉर्मेशन ले रहा था बस ..."

" ओके और बता भाईसाहब कैसे हैं ? ...सरिता कह रही थी तुम नेक्स्ट मन्थ इजिप्ट जाने वाले हो ...?"

" हाँ यार ...बस प्लान बन गया है ..."

" मतलब फिर हनीमून ..वो भी शादी के 15 साल बाद ..."

दोनों ठहाके से हँसे लेकिन मेरी अक्ल दीपावली के उस घनचक्कर की भाँति हो गई जो आग पकड़ते ही उल्टा हो जाता है ...

खैर बात आई -गई हो गई और फिर अगले दिन की सुबह ने आँख खोली ...और फिर अख़बार लिए मैं बस पकड़ने आगे बढ़ा तभी -

" ओ हाय ..डौली जी ..."

" हैलो राकेश जी ...कल अचानक से आप कहाँ चले गये थे ..?"

" जी बस एक काम याद आ गया था  ..कॉलेज जा रहीं हैं ...?"

" जी ! और आप ..?"

" आज हमारे कॉलेज में इलेक्शन  वोटिंग है .. आई हेट पॉलटिक्स सो ऐसे ही सोचा आज दिल्ली घूम लूँ "

" वोटिंग तो हमारे कॉलेज में भी है ...और बिलीव मी आई एम आल्सो हेट पॉलटिक्स "

" वाओ ..सेम थिंकिंग ...तो चलिए फिर आज दिल्ली घूमते हैं ...इफ यू डोंट माइंड ..."

" हूं..हूं . ओके ! "

ये अपने प्रेम की मोमबत्ती जला रहे थे या मेरे दिमाग की सुलगा रहे थे ...साले इतने बड़े झूठे आज तलक नही मिले और मिले तो दोनों एक साथ ...मेरी दादी गप्पियों की कहानी सुनाती थी लेकिन ये महागप्पी उन सबसे आगे हैं ...जो मेरी ही तरह अच्छी तरह जानते हैं कि दोनों एक दूसरे के सामने फेंक रहें है  ...खैर मेरी जगह कोई मुर्दा भी ये सब देख -सुन लेता तो श्मशान या कब्रिस्तान में राख या खाक होने से  पहले इनका पीछा करता ...

पहले ये क़ुतुब मीनार गए ..वहाँ इनकी मुहब्बत का पहला अध्याय जवां हुआ ..फिर हुमायूं के मकबरे ..जहाँ इन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड़ा ..फिर जहाँ -जहाँ ये घूमते -फिरते मुहब्बत और गाढ़ी होती ...शाम के सूरज का बदन जब छिपने लगा तो ये एक दूसरे की बाँहों में थे ....

ये कैसे मुमकिन है और कैसे मयस्सर ...मतलब ये सब नामुमकिन है ...ऐसा कहीं किसी लव स्टोरी में नही होता ...जबकि ये लव है ही नही ...ये सब तो झूठ की जमीन पर फैला एक रायता भर है ...

उस रात मैं सिर्फ सिगरेट पीता रहा ...रम की दो बोटल खलाश कर दी ..सारा गुस्सा कागजों पर निकाला और डस्ट बिन के पेट को कागजों के निवाले से बदहजमी कराने के बाद भी मुझे मुठ्ठी भर नींद मयस्सर नह हुई ....अगली सुबह का बेसब्री से इन्तजार था कि आखिर अब आगे क्या होगा ...

रात की आखरी साँस टूटने से पहले मैं बस स्टॉप पर जा पहुँचा ...

कुछ 20 मिनट के इन्तेजार के बाद गप्पी नम्बर वन और टू भी आ गए ...लेकिन मुझे ये ज्ञात नही कि इनमें नम्बर वन कौन और नम्बर टू कौन है ...? खैर -

" सॉरी राकेश अब हम नही मिल सकते ...मेरी शादी पक्की हो गई '

बहुत जोर की खाँसी आई मुझे और पूरा गला भर गया ...कल कुतुबमीनार के पीछू ये ही बोल रही थी कि शादी तो तब करूँगी जब अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ ...तो क्या अब अपने पैरों पर खड़ी हो गई है तो फिर कल क्या फिर ये आर्टिफिशयल पैरों से  दिल्ली में भसड़ रौंद रही थी ....

" डौली मैं अब तुम्हारे बिना नही जी सकता हमारे प्यार को आज पूरे पाँच साल हो गए और अब तुम मेरे लिए मेरी मुहब्बत से ज्यादा मेरी एक आदत ..मेरा एक जूनून बन गई हो ...."

" तो मुझे हमेशा के लिए अपना बना लो राकेश ...मैं भी तुम्हारे बिना नही जी सकती ...मुझे ले चलो राकेश "

इनकी माँ का ..ता था .थैय्या ..इनके बाप का हो गया भैया ...साले दो दिन पहले मिले और आज पाँच साल पूरे हो गए ...कल बड़ी मुश्किल से पौने दो पर हाथ पकड़ा और सवा चार पर गले लगे और आज मुझे ले चलो ..तुम जूनून ..तुम लोटा ..तुम लस्सन ....

खैर ...

" तो चलो डौली ...आओ बस आ गई है ...चलो कहीं दूर चलते हैं..."

वो दोनों बस पर चढ़े और उनको देखकर कुछ देर के लिए तो मैं भी इमोशनल हो गया ...लेकिन जब चूतियापा टूटा तो मैं भी बस पर चढ़ गया....

सीट खाली होने के बावजूद भी उनके पीछे खड़ा हो गया ...उन दोनों के चेहरे में एक युवा प्रेम जोश था ..और प्रेम की एक जीत का हकीकी सच ...वो दोनों किसी और दुनिया में थे ...

उन दोनों को देखकर लगता ही नही था कि ये दोनों ढोंग कर रहें हैं...इतना दमकता विश्वास असम्भव था दो दिन के प्यार और मुलाकात में ...मैनें सोचा जाने दो ..शायद बहुत दूर चले जायेंगे ....लेकिन मुझे तो उतरना ही था ....अगले स्टॉप के बाद मेरा पड़ाव था तभी बस रुकी और वो जोड़ा उतर गया ...खट से मैंने सोचा शायद किश्तों में सफर तोड़ -तोड़ कर पूरा करेंगे ...मैं भी उनके पीछे उतर गया ..मैंने सोचा शायद अब कोई टैक्सी पकड़ेंगे लेकिन वो तो चलने लगे ...और मैं भी उनके पीछे हो लिया ...तभी

" देखो डौली आज हम दिल्ली को छोड़ आये ...आज हम इतने दूर निकल आयें हैं जहाँ पर कोई भी हमें न पहचानता हैं और न कोई हमपर बन्दिश लगाने वाला न कोई आवाज उठाने वाला ..."

दोनों ने एक दूसरे को हग किया और फिर डौली बोली -

" अच्छा राकेश अब चलती हूँ ..सुमित आज बैंगलोर से आने वाले हैं ... मुझे जाना होगा..."

" थैंक्स डौली ! "

"थैंक्स मत बोलो यार ...मुहब्बत जीत गई बस ये ही काफी और मुकम्मल है "

जैसे ही दोनों एक दूसरे से विदा लेने लगे ...मुझ सूखी डाल पर बैठे उल्लू की गिल्लियाँ गिरने लगी ...मैंने सीधे उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठकर बड़ी अकीदत से उन दोनों से अर्ज किया -

" तुम दोनों जो भी हो ...उसकी जले लंका ..बस मुझे इतना बता दो कि आखिर ये सब चक्कर क्या है ...तीन दिन और दो रातों को मेरी राख कर चुके हो तुम ...घण्टा तुमसे बड़ा फेंकूँ न ही कभी देखा न कभी सुना ...ये सब क्या ड्रामा है ...तीन दिन से पीछा कर रहा हूँ तुम्हारा ...वो भूतनी का कौनसा हाथी का हिलोरा कॉलेज है जहाँ तुम इस उम्र में लौंडे -लौंडिया बनकर पढ़ते हो...और वो कौन सी शक्ति है जिससे तुम इतनी बकलोली करके दूसरे के दिमाग का बलत्कार कर सकते हो बोलो वरना मैं यहीं अपनी जान दे दूँगा या फिर मैं पागल हो जाऊँगा ...बताओ क्या है ये सब कुछ ...?"

वो दोनों सकपका गए ...और फिर एक दूसरे को देखकर आपस में आँखों में बात करकर ..एक सहमति लेकर राकेश बोला -

" दरअसल ये मिसेज सुमित श्रीवास्तव हैं ...इनका पति एक बिजनेस मैन है ...इनके दो बच्चे हैं ...और मेरे भी एक लड़का और एक लड़की ....मैं एक कम्पनी में काम करता हूँ ...लेकिन आज से तकरीबन कई साल पहले ऐसा कुछ नही था ..."

फिर डौली बोली -

" हमारी मुलाकत इसी बस स्टॉप पर हुई थी ..जब हम दोनों कॉलेज में पढ़ते थे..एक छोटी सी मुलाकत जो धीरे-धीरे प्यार में बदल गई ...पूरे पाँच साल हम प्यार में रहे ..लेकिन मेरे घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने मेरी शादी पक्की करा दी ...और मैं जब आखरी बार राकेश से मिली और उस को कहा कि मुझे कहीं दूर ले जाओ तो ...अचानक मेरे भाई आ गए और राकेश को बहुत पीटा ...और हमारा प्यार जिस बस स्टॉप पर जवां हुआ उसी में दफ्न होकर  रह गया ....हम दोनों एक दूसरे के साथ भागने को तैयार थे ...और अपने इश्क को एक मंजिल देने वाले थे ....."

इतना कहते ही डौली फूट-फूट कर रोने लगी ...तो मंच सम्हाला राकेश ने

" तीन नही चार दिन पहले हम अचानक से एक रेस्त्रां में मिले और मिलकर एहसास हुआ कि हम आज भी एक दूसरे से इश्क करतें है ...एक दूसरे को अब तक नही भूल पाये हैं ...लेकिन अब कुछ नही हो सकता ...क्यूँकि अब हम तन्हा नही बल्कि कई जिंदगियाँ हमारे साथ जुड़ी हैं लेकिन इतना तो हमारे हाथ में था कि जो इश्क जिस बस स्टॉप पर बेमुकम्मल और लहू से लाल हुआ ...उसे पूरा करें ...और एहसास कमाये कि हमनें इश्क करके उसे मुकम्मल कर  दिया ...हमारे पास सिर्फ तीन दिन थे क्यूँकि आज डौली के हसबैंड आने वाले हैं....इसलिए  सब कुछ जल्दी में होता रहा ..जो आपने देखा और जो सुना ....."

सब समझ गया मैं ....आज हाँलाकि जब भीड़ तालियाँ बजा रही है और मेरे हाथ में बुकर अवार्ड है ...तो फिर भी दिल में एक बैचैनी एक मायूसी है कि काश जिन दो इश्क करने वालों की  कहानी लिखकर मैंने ये तमगा हासिल किया काश कोई ये सब कुछ  मुझसे छीन कर वो दौर वापस लौटा देता कि जब इन दोनों की आखरी मुलाकत हुई थी ...काश कोई इन्हें सकुशल उस बस पर चढ़ा देता ...काश ये दुनिया से दूर निकल जाते ...काश इनका इश्क एक मुकम्मल रिश्ते की शक्ल ओढ़ लेता ...काश मुझे ये कहानी फिर कोई न सुनाता ...काश आज राकेश और डौली यूँ जल्दीबाजी में इश्क मुकम्मल करके अपने -अपने हिस्से का इश्क बिछड़ कर अदा नही करते .....खैर तालियाँ फिर बजी और मैंने आँखों की नमी साफ़ करके आवाम से कहा -

" नवाजिश "

Junaid Royal Pathan