मेरे नाम में पठान गढ़ा है लोग मुझे मुसलमान ही समझते है .....
.............
अबे काबुली वाला भी तो पठान था फिर फित्ते भर की हिन्दू लौंडियाँ काहे उसे इंसान समझती थी सिर्फ इंसान , खालिस इंसान , आला इंसान ...
....
मैंने भी एक मन्दिर से गुजरते हुए वहाँ से उठती महक और उस महक में वेदों के मन्त्रो ,ऋचाओं और हरि नाम के बीच धारा ब्रांड रिफाइंड तेल में तलती पूरियों को अपना नाम पुकारते हुए सुना -
अबे ओये पठान इधर मुड़ ले हॉटल के 60 बचेंगे और पेट के कीड़े भी न बढ़ेंगे !
कह तो ठीक रही थी जैसा मेरी काठमांडु वाली खाला कहती थी कि ये बर्रा चावल ठूँस ले वरना आज घर जायेगा तो मार भी सूत में मिलेगी और भूख भी ब्याज में ! खैर अक्ल की पेशकस को तो दाखिल -ख़ारिज किया मगर दिल ने रजिस्ट्री में मुहर चस्पा की , कि पूरी खाला बुला रही है जाना पड़ेगा अबे दिल रखने ही चल दे ., ईमान से भूख बहुत थी लेकिन पूरियों का दिल रखने चल दिया ....
देखा कोई बसन्ती धोती , कोई बसन्ती कुर्ता तो कोई गेरवी टोपी और गमछे में घूम रिया था ,, ईमान से बहुत शुद्ध माहौल था , धूप , चन्दन , अगरबत्ती के छोंके और उसमें गोभी की सब्जी , हलुवे की कस्तूरी , रायते का केवड़ा , और खाला की मुश्क वाह पेट की सात पुरजोर आँतों ने कहा बेटा बिन नाम और सनद बताये ठूँस ले और सुन ले बे कोई पूछे कौन -कहाँ से तो बोल दिया कि गोत्र भारद्वाज , नाम जुनैद से बना जितेन्द्र और जात पठान से हो गई पाण्डे ते बस ठूँस लियो ...मैंने बेशर्म आँतों से कहा क्यूँ री सुसरी पता चल गया तो कोई आरोप टेकदेगा कि लव जिहाद के बाद अब भूख जिहाद पर उतर आये है विधर्मी तो क्या बदनामी बेमोल न मिलेगी ? वहाँ भी तो एक का किया सबके सर ठोका गया यहाँ भी एक ही है !
इंटेस्टाइन सेड -अच्छा खसमानू खा और जो करता है कर नालायक !
...
अपन भी वही बैठ गया तो पत्तल आया , सब को नंगे पैर बैठा तो मोज़े भी खोल आया , फिर एक बन्दा , बाल्टी में सब्जी ,पूरी , हलवा ,रायता , छोले लेकर आया बस फिर कुछ याद ही नही रहा अग्गल -बग्गल कौन बैठा कितने उठे - कितने लपके बस चार आदमी ही मुझे उस दौर सबसे भले और उपयोगी दिखे जो मेरी भूख का सामान बाँट रहे थे ... अच्छा 22 मिनट लगे पेट का नर्क भरने में फिर पानी का डिस्पोजल पकड़ा और जो गले तक फँस चुका था उसे नीचे ढकेला और डकार के साथ मुँह से यकायक निकला " अल्हमदुलिल्लाह (अल्लाह तेरा शुक्र है ) अच्छा और टाइम बहुत हल्के निकलता है पता नही उस दिन काहे इतना लाउड होकर क्राउड के बीच निकला लेकिन अब निकलते ही रजिया फँस गई मुंडो में बीच .. जैसे ही सोचा लपक लूँ जाकर जूत्ता - मोज्ज़ा वैसे ही एक मुंडा आकर में विशाल और कसरती पहलवान बोला ..कहाँ से हो भाई क्या नाम है ?
मैंने दस्सा - माय सेल्फ जुनैद पठान आई ऍम फ्रॉम रानीखेत सर नाइस टू मीट यू सर !
लौंडा बोला मुसलमान हो !
हाँ भाई !
यहाँ कैसे आये (बहुत नॉर्मल होकर बोला )
मैं बोलिया - भाई भूख लगी ते आ गया !
ये जानते -बूझते की ये मन्दिर है और ये भण्डारा एक परिवार विशेष ने एक निश्चित लोगों के लिए करवाया था !
हरगिज न घुसता अंदर भाई गर कहीं भी साइन बोर्ड पढ़ लेता कि मुस्लिम नॉट अलाव !
लेकिन भाई यहाँ मुस्लिम -हिन्दू बनकर न घुसा यहाँ तो इंसान बनकर आया और भी भूख से मचलता और पूरियों को तरसता इंसान बन ...वैसे मास्टर हूँ मेहनताना भी ठीक मिलता है पूरियाँ रोज बनाकर चट कर सकता हूँ मगर बहुत आलसी हूँ और लम्बर दो बात ये कि ससुरी जब भी पूरी बनाता हूँ तो रोटी जैसी बन जाए ससुरी वो फूल के नाही देती , और बन गई तो बिस्कुट जैसी ..अच्छा घर जाने का भी नही हो रहा जो अम्मी खिला दे बना के .. होटल का तो आप जानते ही है कि ससुरे बासी मल तल के खिला देते है तो भाई बस यही कारण था यहाँ घुसने का बाकि छान्दोग्य उपनिषद में भी लिखा है --
भूख असंतृप्त करती हो तो उसका त्याग करो यदि न होता हो तो वैराग्य करो और सम्भव ये भी न हो तो भोजन करो नैतिक -अनैतिक भोजन में समाग्रहित नही होता , होता तो है परन्तु जीव कल्याण और भक्षण नृवृत्त हो !
मुंडा बोला अकेले रहते हो मैं बोला हाँ ?
तो खाना भी खुद बनाते होगे ?
जी बेशक !
दो मिनट रुको !
सात मिनट बाद लौंडा एक पार्शल सा लाया !
ई का है ब्रदर ?
आज रात खाना बनाने से मुक्ति मिलेगी ये लो इसमें प्रसाद है .....
....
अपन बहुत चौंका लेकिन फिर हिनहिनाते हुए बोला पूरी कौन सी चार दिन तक ख़राब होती है तो ब्रदर कल अपन नाश्ता भी इसी का कर लेगा लौंडा हँसा सेक हैण्ड हुआ और इस बार कमबख्त सपना पूरा होकर टूटा .....लेकिन बहुत ढूंढा ऊ पार्शल नाही मिला .... नवाजिश
#जुनैद.......
Thursday, 8 November 2018
भंडारा
Labels:
भंडारा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment