Monday, 12 November 2018

छत

#छत
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" बेशर्मों..तुम्हें  सिर्फ ये एक हादसा लगे ....लेकिन ये छत गिरी है जमीन पर ...और अब आसमान से आफतें उतरने का इंतजार करो ! "

इन्तेजार तो मैं भी कर रहा था " जीतराज बाबू " का ...नाम जरूर ओल्ड लगे लेकिन बाबू जी इतने  भी वृद्ध नही ...महज 45 साल की आयु है ...हाँ कपड़ो और वेशभूषा से अपने को जबरन बूढ़ा कर लिया है ...लेकिन अभी भी कुछ जवान उम्मीदों का हवन उनके दिल में रोशन है ......

शिप्रा उनकी बेटी ...मुहल्ले का सबसे टिच माल ...लेकिन अपन को घास नही डालती ...अपन ठैरा एक मामूली मैकैनिक ...और शिप्रा शक्ल और मिजाज से बिल्कुल कोई फ़िल्म की हीरोईन ... उसके पिता जीतराज बाबू एक दफ्तरी है लेकिन शिप्रा की स्टाइल और  नखरें देख लगता नही कि वो एक भोले दफ्तरी बाबू की वैध सन्तान है .....

मैंने शिप्रा को पटाने के हर जतन और जंतर आजमायें और उस दिन  हार के सरेंडर कर दिया ...जब अपने से कोशों गुना हैंडसम और पैसेवाले लौंडे की चमचमाती कार से उसे उतरते और उस लौंडे को फ़्लाइंग किस देते हुए देखा .....आजकल मेरा चक्कर जीतराज बाबू की कॉलोनी में एक हॉउस वाइफ से चल रहा है ...आना जाना लगा ही रहता है अक्सर .....

जब तक शिप्रा के पीछे था ,, फ्री में कई दफा हजामत की मैंने जीतराज बाबू के पुराने -पुटल्ले स्कूटर की ..लेकिन अब जबसे शिप्रा अंगूर खट्टे कर गई तब से पूरे पैसे लेता हूँ ..और अब तो टालना भी सीख गया हूँ उन्हें .....

खैर बहुत ही भले आदमी है...कभी मोल-भाव नही करते ...कभी इधर का पुर्जा उधर भी कर दूँ तो भी शिकायत या पूछताछ नही करते ....पहले जब आते थे तो चाय -समोसे मंगा लेता था लेकिन अब पानी को भी नही पूछता ....

एक दिन जब ..अपनी फन्टू से मिलने कॉलोनी गया तो ..बाबू जी के दरवज्जे के आगे से गुजर हुआ ....बाबूजी को पहली बार भड़का और तमतमाया हुआ देखा ...हैरत हुई मुझे ...तो कान दरवज्जे पर टेक दिये !

" शिप्रा ! तुम्हे शर्म नही आती ऐसे कपड़े पहनने में ...जाओ बदल के आओ इन गन्दे कपड़ो को ! "

" ओ हैलो पापा ये गन्दे नही बल्कि आपकी सोच गन्दी ,घटिया और आऊटडेटेड  है ...ये फैशन है आजका ...आप मुझे अपनी तरह भोंपू टाइप बनाना चाहते है ...ताकि जैसे लोग आप पर हँसते है .. मुझ पर भी हँसे ..तभी मैं आपके साथ कहीं आना -जाना नही करती ..और न आपको पेरेंट मीटिंग में अपने साथ चलने को बोलती हूँ ...."

मैंने खिड़की से झाँका ..बाबूजी होंठ चबा कर गुस्सा पी गए ...और शिप्रा दरवज्जा खोल के सीढियां उतर गई ...अच्छा हुआ उसने मुझे नही देखा ...लेकिन मैंने उसका सब कुछ बड़ी तबियत से देखा ...कपड़ों के नाम पर उसने सिर्फ इतना ही कुछ पहना और ढका था ताकि उसके शरीर के साथ उसके गुप्तांग झिलमिलाये तो सही मगर स्पष्ट नजर न आये .....उसके बाद बाबूजी की बीवी पर्दे पर नजर आई ...और उन्होंने भी बाबूजी की ओल्ड और प्रचलन से आऊट सोच को लताड़ा और उसका बहिष्कार किया ...साथ ही धमकी दी कि यदि ये ही सोच  के साथ रहना है .. तो मैं और शिप्रा आप के साथ नही रहेंगे .......

अपन का क्या सुना और अपनी महबूबा की बाहों में जाकर सब भूल गया ...लेकिन पता नही क्यूँ एक टीस सी उठी .. अगले दिन जब बाबूजी फिर दुकान पर स्कूटर ठीक कराने पहुँचे तो मैंने उन्हें बड़े विश्वास में लेकर रात की घटना का जिक्र किया ...पहली बार मैंने बाबूजी की आँखों में नमी देखी ....तो उन्हें ढाँढस दिया कि आप ही अपने आप को बदल लें.. क्यूँकि आप की मिसेज और बेटी हरगिज बदलने वाली नही ....

लेकिन आज बाबूजी ने भी शिप्रा को उसी अमीरजादे की गाड़ी से उतरते हुए और चुम्मापट्टी करते देखा तो गढ़ गए जमीन पर ... मैंने थाम लिया हाथ.. कि कसम दे रहा हूँ बाबूजी खुदा की आपको ...शिप्रा से कुछ मत कहना ...वरना इस उम्र में लड़कियाँ कुछ भी कर गुजर जाती हैं ...

उस दिन बाबूजी स्कूटर ख़राब होने के कारण पैदल चलकर आये और बोले जमशेद मुझे जरा शिप्रा के स्कूल छोड़ दोगे आज फ़ीस भरनी है उसकी..उत्साहित थे उन्हें लगा शिप्रा का मन जीत कर उसे सुधारा जा सकता है ....उन्हें दमका हुआ देखकर कसम पैदा करने वाले की अपन को तो जैसे जन्नत ही मिल गई !

स्कूल गेट पर ही प्रिंसिपल मिले ...और आश्चर्य करने लगे कि आप ज़िंदा है ? ...शिप्रा ने आज से तीन महीने पूर्व बताया कि आप का निधन ...ओह्ह्ह माय गॉड ...

पैदल ही मुड़े और तेज चलने लगे ...मैंने कहा बाबूजी बैठ जाओ ..कहाँ तलक चलोगे ....हठी है बहुत ..तो मैं भी बाइक से उतर गया और हाथों से फटफटिया खींचते हुए मुझे मेरे अरमानों के आसमान के तारे याद आ गये ....

रात को शिप्रा ने स्कूल आने पर बाबूजी को खूब लताड़ा ...खूब जमकर बाबूजी की क्लास ली ...अब तो फन्टू की सीढ़ी चढ़ने से पहले 2 मिनट का कान बाबूजी के मकान के दरवज्जे पर लगा ही लेता हूँ ...

बाबूजी बेचारे ये तक न पूछ सके... कि बेटा आखिर मैं मरा कब ये तो बता दे  ?....लेकिन शिप्रा समझदार थी उसने सब स्पष्ट कर दिया बोली -

" आप को मुझे नीचा दिखाने में ख़ुशी मिलती है तो ठीक है ....आज से मर गए आप मेरे लिए ......"

शिप्रा के क्रोध को वैध करार दिया ..बाबूजी के साथ कई रस्मों के छोंको में बँधी उनकी ब्याहता ने ...और क्यूँ न देती शिप्रा को उसके भी कई राज पता थे ....

आज दरवज्जे से शिप्रा नही बल्कि बाबूजी बाहर निकले ...और मेरा काम बिगाड़ दिया ...मैं पीछा करता रहा उनका ...शायद वो कोई कोना तलाश रहे  थे अँधेरे में किसी अँधेरी जगह का ... शायद फूट -फूट कर रोने के लिए ...और मिला भी उनको ..भला कोई मर्द पेड़ के पीछे छिपकर ऐसे बच्चों की तरह रोता और माँ को शिकायत करता है ....

उस दिन ये भी पता चला कि बाबूजी अपनी माँ से बेहद प्यार करते थे ...माँ जो अब उनके साथ नही है ....

खैर दिन आगे बढे ...और बाबूजी से एक लगाव सा हो गया ...इतना गहरा ..इतना गाढ़ा कि ऐसा लगने लगा कि साला अपन जैसे लावारिस का भी कोई बाप होता तो बाबूजी जैसा होता ....अब हिम्मत नही होती थी बाबूजी के दरवज्जे पर कान टेकने की ...और बिना टेके रहा भी नही जाता था ...तो अपनी फन्टू से ही रिश्ता तोड़ लिया ....

कुछ दिन बाद जब एक गाड़ी का नट खोल रहा था  ...सामने से आते बाबूजी दिखाई दिए ..बाबूजी जिन्हें मैंने आज पूरे 17 दिन बाद देखा था ..मैंने टीकाराम को हाथ से चाय का इशारा किया ....लेकिन बाबूजी पीछे से  दौड़ते ट्रक का इशारा और हॉर्न न समझ पाये ..... बाबूजी का चश्मा ही महफूज रहा और उस दिन पता चला ..बाबूजी भी अपन की तरह खून - माँस पहने एक आम आदमी ही थे ....वो आम आदमी जो एक फरिश्ता होने के बाद भी एक मामूली छटांग की खुशहाल जिंदगी न जी सका ....

बाबूजी की लाश टायर के नीचे थी और मैं सीधे दौड़ा बाबूजी के घर की जानिब ...बगल की आंटी बोली आज 15 दिन हुए ..उर्मिला, शिप्रा संग  घर छोड़ मायके चली गई ....

अब पता चला कि बाबूजी इतना बेसुध होकर क्यूँ चल रहे थे ......सीधा एक गाली को जुबान पर दाब के .. मायके ही पहुँचा ...शिप्रा अँगुलियों का नेल पेंट फूँक मारकर सूखा रही थी ...और उसकी माँ अपने सर के अजीबोगरीब जूड़े को पिन से सम्हाल रही थी .....

" अरे तुम ! क्या हुआ जमशेद ...?"

" बाबूजी को मार डाला है तुम दोनों ने मिलकर...?..एक ट्रक अभी- अभी कुचल गया है उन्हें ...!'

माँ बेटी कुछ देर सहमे फिर रिलेक्स होकर ..उर्मिला बोली ....

" पागल हो क्या खुद कह रहे हो ट्रक कुचल गया उन्हें और कह रहे हो हमनें मारा ...इसे हादसा कहते है ...हादसा !"

" बेशर्मों..तुम्हें  सिर्फ ये एक हादसा लगे ....लेकिन ये छत गिरी है जमीन पर ...और अब आसमान से आफतें उतरने का इंतजार करो ! "

मैं आँखों में आसूँओं का समन्दर भरकर लौट रहा था ..लेकिन बाबूजी जैसे इंसान फिर कभी इस गलीच और बेशर्म दुनिया में न लौटे ....या खुदा कसम है तुझे तेरी खुदाई और नीली छत की .....नवाजिश
#जुनैद............

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