Monday, 5 November 2018

धनतेरस

#धत्ततेलस
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" अरी पगली धत्त तेलस नही  धन तेरस ..हा हा हा ... "

अमजद मूर्तिकार जो पंचवक्ता नमाजी है , मैंने कई बार उसके कान में कभी हल्के तो कभी जोर से फूँका है कि मूर्तियाँ बनाना इस्लाम में हराम या नाजायज है ....जब भी कान में हल्के से बोला तो अमजद मुस्कुराह देता लेकिन जब भी जोर से जोर देकर बोला तो एक जूट के फायों से सीली चप्पल मेरे सर में आकर पड़ी है .....ये चप्पल ए बदतमीज उस हराम औरत , उस मनहूस , उस बुढ़िया की होती है जो अमजद की दादी है ....

जो घर के अंदर पलंग तोड़ती , स्मैक , गांजा , हेरोइन की एरा में हुक्का चूसती , पान चबाती  पता नही जालिम , बेगैरत बुढ़िया का निशाना इतना सटीक इतना सच्चा कैसे होता है ...और खिड़की के किसी सींकचे (सलाखों ) से उसकी चप्पल टकराती क्यों नही ...इस पहेलीनुमा  सवाल का जवाब न जामा मस्जिद के ऊँची , आसमानी किताब पढ़े मौलवी के कन्ने है ...न सरकारी इस्कूल के विज्ञान पढ़ाते रामकिशोर के पास ....लेकिन बुढ़िया सिर्फ चप्पल ही नही मारती बल्कि चिल्लाकर ये भी कहती ~

" बेवकत की औलाद ,मन्नूस ....हराम सिर्फ मूरत बना कर अपने बच्चे पालने में ही नजर आये है तुझे ...मेरे अमजद को अल्लाह ने ये हुनर बख्शा है ....ताकि वो अपनी बूढी दादी और अपनी तीन मासूम औलादों का पेट इज्जत और हलाल की कमाई से भर सके .....

ये वाकई जहन्नमी औरत है मरदूद ..इसे कभी न नमाज पढ़ते देखा , न कभी कोई इस्लाम से सगी बात करते ..खैर काम वाकई हराम और अल्लाह की नजर में नापसन्द है.. तभी तो एक सरकारी प्रांगण में विशाल  डॉक्टर कलाम की मूरत बनाते वक्त उस मूरत का सर धड़ से जुदा हो गया और अमजद के सर पर आ गिरा जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई ...

आज बुढ़िया ने पलंग छोड़ी ...और खूब दहाड़े से रोई ..अमजद सिर्फ उसका पोता नही बल्कि उसकी रोटी, उसके हुक्के , उसके पान की कतरन का एक काशिद भी था ...और था वो तीन मासूम जिंदगियों का मुहाफिज भी  ..जिन मासूमों की अम्मी पीलिये से पीली होकर फनाह हो गई ...

कल रात ईदगाह की कहानी पढ़ते हुए आँख भर आई लेकिन आज सुबह पता चला कि अब से कुछ रोज बाद दीवाली है ...इन मासूम बच्चों को देख अब तरस आता है ..लेकिन गुस्सा आता है मनहूस बुढ़िया को देख भला इस उम्र में  सलवार घुटनों में चढ़ा कर , साँस फुला कर कोई चाक चलाता है ...लेकिन कसम खुदा कि ,, जिस देवी लक्ष्मी पर मेरा रत्ती भर यकीन नही उसे क्या खूब शक्ल दी है बुढ़िया ने ...इतनी खूबसूरती से उसने रंग भरें है जैसे लगता है पूरी कायनात के सादिक रंग उसकी चुटकी में भर गयें हो .....एक पल तो उस लक्ष्मी को देख मैं भी एकटक घूरता ही रह गया और जुबान से सुब्हानअल्लाह जारी हो गया ... लेकिन अगले ही पल तौबा ,, तौबा कर अपने काम में निकल ही रहा था कि ..७ साला कासिम बोला ...

" अम्मा तलो मेले में ...अम्मा तलो मेले में .."

ऐसा फटकारा जालिम बुढिया ने बच्चा वहीं सहम गया ....लेकिन अगले ही पल न जाने क्या सूझा मरदूद को ,कि आँख में कतरे भर... हिलते -डौलते उसके पास पहुँच कर उसे अपनी छाती में समेट लिया ...अंदर दो और जानें भी थी ...जिनको क्रम से बाहिर निकाल बुढ़िया ने नहलाया ,, घेरे मिट्टी के फुरफुरी पत्थर से उनकी गर्दन , उनकी कनपट्टी उनके घुटने घिसे ..आँख में सुरमा गेरा ..सरों को तेल से चपेढ बीचली मांग बनाई और लौंडिया की चोटी को  अल्बट देकर अपनी पुरानी रेशमी  चुन्नी की कतरन से बांधा ....चुन्नी बाँधते-बाँधते निगोड़ी फिर फूट-फूट कर रो पड़ी ...और आँखों में मेरे भी आँसू भर आये ....तीनों को क्रम से आँगन की चटाई पर बैठाया और अपना टाट पर्दे के गुशलखाने में जाकर गुस्ल (स्नान) करने के बाद ....सुथरे कपड़े पहन ,, चुन्नी के कोने में कुछ कमजोर और सस्ते सिक्के बाँध कर लक्ष्मी की उस इकलौती मूरत को एक कपड़े के झोले में डाल कर मेले को चल पड़ी .....

मैं दूर से उनका पीछा कर रहा था ...ऐसा लग रहा था जैसे तीन मासूम एक भीने - गहरे साये की अँगुली पकड़े उसे खींचें ले चले जा रहें है ....

मेले पहुँच कर बुढियां ने एक चुन्नी वहीँ किनारे जमीन पर फैला दी
..छुटकी झट से कुछ फूल तोड़ ले आई ...कासिम ने झोले से अगरबत्ती निकाली और साजिद ने माचिस .....लक्ष्मी की वो मूरत अब फूल और अगरबत्ती की सुगंध के बीच महकने लगी ...लेकिन दिन चढ़ गया और उसका एक कतरा और पिघल गया मगर मूरत जस की तस चुन्नी पर सजी रही ...फूलों ने सूख कर महक खो दी ...अगरबत्ती ने जिस्म लेकिन कुछ भी न बन पाया .....

बच्चों को एक पेड़ की  घनी शाख के नीचे बैठाकर बुढिया दिन भर की पूरी कड़कती धूप पी गई लेकिन उसकी कला का कोई कद्रदान न मिल सका बच्चों की एक वक्त की भूख प्यास ने उसके चुन्नी के सिक्के निपटा दिए  ...और अब सब कुछ लक्ष्मी की उस मूरत पर दाँव पर लगा था ,सूरज मगरिब में गिरते ही बच्चे भी बेशुध होकर बुढ़िया पे आ लगे मासूम साजिद तो अम्मा की गोद में गिरकर नींदगति को प्राप्त हुआ ...बड़ा दर्दनाक था वो नजारा ,, बच्चे भूख से तड़प रहे थे और बुढ़िया हुक्के और पान के बिना तभी बुढ़िया का सब्र टूटा और वो एक चलते को रोक कर पूछ बैठी -

" क्यूँ बेटा ! आज भीड़ भी भरी पूरी है ..फिर लक्ष्मी की मूरत न बिकी मेरी ...?

" अरे अम्मा ! आज धन तेरस है ये भीड़ बर्तन खरीदने में जियादह व्यस्त है कल ले आइयो लक्ष्मी माँ ...हम ही खरीद लेंगे ...

जब सिर्फ एक छींट उजाला रह गया और अजान मेरे कानों से टकराई ...मैंने वहीं अल्लाह की बारगाह में आँखों में आँसू भर कुछ अर्ज किया .....

कुछ देर बाद जब बुढ़िया समान समेटने लगी ...एक मुँह पर शॉल ढके आदमी बुढिया के करीब आया और उससे वो लक्ष्मी खरीद ली ....बुढ़िया जैसे जिन्दा हो गई ...उसे मुँह माँगा दाम जो मिल गया ..और रात की रोटी का सामान ....बच्चे भी इठला कर प्राण वापस ले आये ।।।

घर लौटते वक्त छुटकी बोली ...अम्मा धत्ततेलस त्या होता है ?

" अरी पगली धत्ततेलस नही ..धनतेरस.. हा हा हा ...

खैर तमाम उम्र अमजद को मूरत बनाने के लिए उलाहने देने वाला मैं जुनैद आज उसी मूरत को खरीद के अपने साथ ले आया ....और आज यकीन हुआ कि लक्ष्मी सिर्फ एक मूरत नही बल्कि एक पूरे परिवार की रोटी ,उनकी ख़ुशी और जिंदगियों का मुस्तकबिल बन गई ...और जिस मूरत में इतनी शक्ति है वो मूरत अल्लाह की कसम हराम हो ये और समझे,, मैं जुनैद उस मूरत को अपने घर में आज भी एक अदब की जगह देकर अपने खुदा का शुक्र अदा करता हूँ .......नवाजिश
#जुनैद.............

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