" अऊर उसके हिमालय से भी ऊँचे स्तन ...जो ऐसे प्रतीत हो रहे है मानो किसी ने सपाट थाल में दो चन्द्र गोले सजा दिए हो ...उसके भारी सुडौल ढहते नितम्ब....
" व्हाट दा हेल सर ...आर यू क्रेजी ...आर यू मेड ..."
" क्या हुआ कन्या ..क्यूँ व्याकुल हो ...क्यूँ उत्कंठा से तुम्हारे अधर फ़ड़फ़ड़ा रहे हैं ......"
" सर आपको थोड़ा तो तमीज होना चाहिये ये क्या पढ़ा रहे हैं आप हमें ...और क्यूँ पढ़ा रहे हैं ...इसका इम्प्लीमेन्टेशन कहाँ होगा ...कौन ये सुन और सुनाकर हमें जॉब देगा ..किस कम्पटीशन में ये वल्गर टॉपिक आता है..न फैमली में इसका यूज है ...न समाज के किसी ग्रोथ रेट में ...न किसी और स्ट्रीम में तो आखिर क्यूँ ....?
" बैठ जाओ ..मैंने कहा बैठ जाओ ...वल्गर ये नही बल्कि तुम्हारी सोच अश्लील है ! क्या खराबी नजर आई तुम्हे इसमें बोलो ?
...
" सर इसमें अच्छाई भी क्या है ...ये सीधे -सीधे एक स्त्री का सार्वजनिक अपमान है उसकी देह , उसके स्वाभिमान ...सर एक सवाल पूछ सकती हूँ प्लीज ...?
हुंह ...पूछो !
" सर क्या अगर इस क्लास में आपकी बेटी आपकी बहन आपकी माँ बैठी होती.. तो ...क्या आप ये स्तन ..नितम्ब की उपमाएं उन्हें भी समझाते ?
बदतमीज ...निकल जाओ हमारी कक्षा से ...
जानती हो जिसने ये प्रबंधक पद्य लिखा है वो महाकवि हैं ...महान भारत के गौरव ...कलम सम्राट ..शब्दों के शिल्पी ...भाव के भगवान , कल्पनाओं के...
" गो टू हेल विथ योर चीप एंड वेरी वल्गर पोएट ....आई एम् लिव योर क्लास डेट्स इट ! एन्ड..लिसन ... लिसन सर ये कवि नही बल्कि कोई बेहद सरफिरा इंसान था ...जिसने स्त्री को रस और गोश्त की दुकान बनाकर प्रस्तुत किया ...कवि तो वो होता है सर जो शब्दों से देह स्पर्श भी करे तो देह पवित्र हो जाती है ..मलिन मन पावन हो जाता है ... और एक स्त्री का आत्मसम्मान और गौरव बना रहता है !
और उस दिन के बाद येरु लोतसिंग ने जहाँ वो कॉलेज छोड़ा ...वहाँ छोड़ी हिंदी की दीवानगी ....हिंदी बचपन से उसे बड़ी पसन्द थी ...उसने अपनी जिंदगी के कई सुहाने पलों को चुराकर .. हिंदी की जादू , परी , जानवरों ,राजकुमारी की कहानियों को अपने वो ही पल समर्पित किये है ....
पता नही येरु को कैसे लत पड़ गई हिंदी की ...क्यूँकि माता-पिता दोनों सुदूर नार्थ ईस्ट से है ...और दोनों ही उत्तर भारत में जॉब करते हैं...उन्होंने येरु का एडमिशन भी शहर के सबसे हायर अंग्रेजी मीडियम स्कूल में करवाया ताकि उसे भाषा से सम्बंधित परेशानियां न हो...
हिंदी में येरु का रुझान एक दिन स्कूल फेस्टिवल में दिखाई गई हिंदी फ़िल्म काबुली वाला देख कर हुआ ...फ़िल्म में एक पठान का एक बच्ची से लगाव का भाव तो वो समझ गई और आँखों में आँसू भी आ गए ...लेकिन वो फ़िल्म के डायलॉग नही समझ पाई ...उसकी इस मजबूरी को समझा उस विद्यालय के एक बेहद योग्य हिंदी शिक्षक श्री व्योमेश शास्त्री ने और उन्होंने येरु को हिंदी सीखाने में जहाँ कुछ अतिरिक्त समय दिया वहीँ येरु ने भी रात दिन एक कर दिए हिंदी सीखने में ...
और अपने बचपन से ही हिंदी में ऐसी रमी की कोई भी हैरत करेगा कि नागालैंड की एक लड़की इतनी विशुद्ध और प्रवाह में हिंदी कैसे बोल लेती है... ...
लेकिन आज हिंदी से उसका मोह भंग हो चला था ...उसने वक्त के साथ हिंदी की इज्जत प्रेम चन्द्र को माना ...उसने माँ महादेवी वर्मा ..कवि दिनकर , निराला आदि हिंदी लेखकों और कवियों को पढ़कर समझा कि हिंदी क्यूँ भारत की राजभाषा है और क्यूँ इसे गर्व से मातृभाषा कहा जाता है ......
खैर ..दिन बदले ..दस्तूर बदला .... लेकिन उसका हिंदी से अब लगाव न था ...आज येरु एक बच्ची की माँ है और ..नागालैंड में ही जॉब करती है ...बीते दिनों उसको सात दिन के एक ऑफिशियल ट्रिप से उत्तर भारत जाना पड़ा ...दिल्ली निजामुद्दीन जंक्शन में उतरते ही जैसे ही वो ट्रेन कम्पार्टमेंट बाहर निकली ..उसकी नजर एक बुक शॉप पर पड़ी एक बुक के कवर में एक पठान जिसकी गोद में एक बच्ची थी ...उसे एक पल में अपना पूरा बचपन याद आ गया...उसका मन कर रहा था कि वो ये बुक खरीदे लेकिन उसे खुद पर गिल्ट फील हो रहा था...
आखिर में जीत बचपन की हुई ...मगर जैसे ही उसने उस किताब में हाथ रखा उससे पहले वो किताब किसी और शख्स ने उठा ली ...
" सर...व्योमेश सर...आप "
" अगर मैं ठीक पहचाना तो मेरी सबसे मेधावी विद्यार्थी ..येरु ...!
" यस सर व्हाट अ सरप्राईज.. नाइस टू मीट यू सर ....
" येरु ...इतनी अंग्रेजी ...जबकि मुझे तो लगा था तुम हिंदी कभी न भूलोगी ...
" उसने एक साँस में सर को सब कुछ बता दिया .."
" प्रिय येरु ! तुमने जल्दीबाजी में बहुत सख्त निर्णय लिया ...भला एक आद साहित्य पसन्द न आया तो हिंदी से इतनी ईर्ष्या क्यूँ ...जो अंग्रेजी तुम बोल रही हो हिंदी से जियादह अश्लीलता तो इस जुबान में है तो क्या तुम इसे भी ठुकरा दोगी ...फिर ढुंढोगी तो कई नागा साहित्य भी ऐसे मिल जायेंगे जिनमें कुछ न कुछ अश्लीलता होगी तो क्या वो जुबान भी भूला दोगी ....तो फिर किस जुबान को अपनाओगी जबकि हर जुबान में कुछ न कुछ अश्लीलता मौजूद है ...बेचारी हिंदी को क्यूँ दोष देती हो बेटा ! हिंदी का क्या दोष ...जहाँ " म" वर्ण से माँ बनता है वहीं कोई उससे माँ की गाली भी बना सकता है तो हिंदी को क्यूँ कठघरे में खड़ा कर रही हो ...जबकि हिंदी कोई जुबान कोई भाषा नही बल्कि विभिन्न जुबानों और संस्कृतियों का एकजुट भारत है ... यही समूल विश्व की वो जुबान है जिसने आगे बढ़कर दुनिया की हर संस्कृति उसके शब्दों को अपनाया है ... और भारत को एकजुट करने में अपनी महती भूमिका निभाई है ...बाकि बात रही कॉलेजेज की तो जिस दिन सैकड़ों स्वाभिमानी लड़कियाँ तुम्हारी तरह कक्षा का बहिष्कार करने लगेंगी उस दिन कम से कम हमें एक ढुलमुल और फिजूल की शिक्षा पद्धति के साथ हिंदी की आड़ में बरसों से पढ़ाये जा रहे इन ओछे साहित्यों से भी मुक्ति मिलेगी ....और हिंदी इन बाबा आदम के विवादास्पद ...बे सर पैर की अतिशयोक्तिपूर्ण और अश्लील उपमाओं के भौंडे जाल से निकलर अपनी वैज्ञानिकता और तार्किकता में साँस लेकर अपभ्रंशों का ये जुवां उतार देगी...
" थैंक्स सर ...आज आपने फिर मुझे हिंदी से जोड़ दिया ...फिर मुझे हिंदुस्तान से जोड़ दिया ...लेकिन एक रिक्वेस्ट है सर ...?
" हाँ बोलो न !"
" सर ये जो आपके हाथ में हिंदी वर्जन काबुली वाला बुक लिया है ...उसे मैं खरीद लूँ वो क्या है न एक ही दिख रही है पूरे स्टॉल में ...
" हा हा हा .क्यूँ नही.. ....जय हिन्द ...जय हिंदी ......नवाज़िश
#जुनैद.............
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