Tuesday, 20 November 2018

सर्द मसीहा

#सर्द_मसीहा
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बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगों की रिपोर्टिंग कर रहा था ....रात बेशक सर्द थी और घरों , टायरों और इंसानों में लगती आग उससे जियादह गर्म ....खैर आग ठण्डी हुई तो रात कड़कती गई ...हिन्दू -या मुसलमान नही वो सिर्फ इंसान थे... जो उजड़ चुके घरों के बाद आसमान की छत के नीचे सोने को मजबूर थे .....तभी एक शख्स  निरन्तर दौड़ता आता ..और एक-एक कम्बल उन सोते ठिठुरतों को उड़ाता जाता ...मैं अपने होटल की खिड़की से पूरी रात सिगरेट पीते -पीते देखता रहा उस दौड़ते आदमी को ..उसने एक -एक जमीन पर बिखरे हिन्दू -मुसलमानों की सर्दी अपने कदमों और कम्बल से चीर दी ....

खैर फिर ये शख्स मुझसे टकराया एक साम्प्रदायिक उन्माद में   ......उस वक्त और घना ताज्जुब हुआ जब मैंने इसे फिर उस सर्द माह में अपने कम्बल से लोगों के लिए तम्बू बनाते हुए देखा....

लेकिन इस बार मैं इस आदमी की हकीकत जाने बिना इसे जाने नही दे सकता था.. तो तुरन्त दौड़ लगा कर इसके कन्धे को पकड़ कर पूछा -

" ऐ ..कौन हो तुम .?"

लेकिन तभी एक इमरात की जलती बल्ली ऊपर से गिरी और मैंने इसका कन्धा छोड़ा ...धूं..धूं..करके धधकती बल्ली हम दोनों के दरमियान आकर गिरी ...और ये शख्श मौका पाकर फरार हो गया .....

ये शख्स अब मेरे दिमाग में एक पहेली बनकर दौड़ने लगा ...मेरी बीवी , मुझे छोड़ कर मायके चली गई ...उसे लगा कि मैं किसी और के ख्यालों में गुम रहने लगा हूँ ...दोस्त मुझे सलाह देते कि मैं किसी अच्छे साइकेट्रिस्ट से मिलूँ ...अखबार के मालिक ने मुझे लम्बी छुट्टी पर भेज दिया ...लेकिन मैंने अपने दिमाग में दौड़ते इस आदमी को किसी से साझा नही किया ,, .......

जब मैं इसकी खोज -खराज में हारकर थक गया तब मैंने वो किया जो शायद एक पत्रकार और एक शिक्षित व्यक्ति करने में 10 बार सोचे ....मैंने अखबार में इश्तिहार दिया कि अमुक व्यक्ति जो मेरा भाई है ...एवं मेरे पिता की दूसरी ब्याहता से जन्मा है ....महीने भर से लापता है ...इसकी सूचना देने वाले को 5 लाख का इनाम दिया जाएगा ...अपने टेलीफोन नम्बर ..अपना एड्रेस देकर ...मैं घण्टों अपने दरवाजे के पास कुर्सी लगाकर बैठा रहता ...और जब भी अपने स्वर्गवासी पिताश्री की तस्वीर देखता तो ऐसा लगता वो मुझे कन्टीन्यूस श्राप दे रहें है ....क्यूँकि मेरे पिता एक सम्मानित व्यक्ति थे और उनका मेरी माता के अतिरिक्त किसी और के बारे में स्मरण भी करना पाप था ....

मेरे जिस -जिस परिचित ने ये खबर पढ़ी वो मुझपर थुत्कार करके गया ....भाइयों और बहनों ने सम्बन्ध विच्छेद कर दिए ...परन्तु मुझे अपने किये पर कोई प्रश्चियत नही हुआ ....क्यूँकि मन ही मन पता नही क्यूँ उस आदमी के लिए मेरे मन में असंख्य संवेदनाएँ उठने लगी थी ...और प्रतिदिन उसके प्रति मेरा आकर्षण और स्नेह मुझे उसके और करीब करता जा रहा था ....

कई महीने बीत गए लेकिन किसी चींटी ने भी मेरी दहलीज नही लाँघी ...तंगी बढ़ती जा रही थी इसलिये एक सस्ते लोकल अख़बार में मैंने नौकरी का आवेदन किया ...और उन्होंने इसे स्वीकार भी लिया ....

वो शुक्रवार की सर्द सुबह थी ...सूर्य ऊर्जा और ऊष्मा दोनों से आकिंचन था ...मैंने पिताजी का रशियन ब्लेज़र पहना और सर पर मॉफरल लपेट कर जैसे ही दरवाजा खोल देहलीज लाँघी ...तो वैसे ही चौंक कर और भय से दो कदम पीछे आ लगा ....

" कौन है आप ...? "

" मैं रंजन हूँ ! "

" कौन रंजन ..? "

" वही रंजन जिसके बेटे की तस्वीर को तुमने अपने भाई की तस्वीर कहकर अख़बार में छापा है ....मैं सीधे पुलिस स्टेशन जा रहा था ...लेकिन मैंने सोचा तुम्हारी इस मूर्खता और उद्दण्डता की पहले सुध ले लूँ ..."

मैंने बड़ी इज्जत से उन्हें अपने घर मैं आमंत्रित किया ...और उन्हें एक साँस मैं सारी ..उलझन , आश्चर्य एवं जिजीविषा  बता दी ......वो बस मुझे घूरते रहे और फिर आँखों में आँसू जमाकर बोले -

" शरद नाम है मेरे बेटे का ,, मेरी चार औलादों में सबसे छोटा ..लेकिन अपने चरित्र और कार्यों में तुमसे ..मुझसे और हम सबसे ऊँचा .... बचपन से ही बहुत शर्मिला ..संकोची ..और ईमानदार ...पढाई-लिखाई में महामूर्ख ..हमेशा लगता था कि इसका क्या होगा ...कभी फटकार भी देता था तो कभी पिटाई भी कर देता था ...वो फौरन अपनी माँ से जा लगता ...माँ से बहुत प्यार करता था अपनी ...इतना प्यार कि उसके मरते ही उसकी देह को कांधे में लेकर जो गया तो अब तलक वापस नही लौटा ...

" क्या हुआ था माँ जी को रंजन साहब ...? "

" निमोनिया से मौत ...सर्दी बर्दाश्त नही थी उसे ...लेकिन जिद कर बैठी थी कि एक बार कैलाश यात्रा करेगी ...शिव को पूजती थी इसलिए शिव से ही जा मिली ........

कुछ -कुछ समझ में आ रहा था ....खैर रंजन साहब मुझे माफ़ करके लौट गए ...ये कहते हुये कि कहीं पता लगे या दिखे तो मुझे भी खबर कर देना !

इसी तरह कई साल बीत गए लेकिन शरद का कुछ पता न चला .....शरद को भूल बैठा तो बीवी -बच्चों और यारों को याद किया .... जिंदगी आम सी हो गई ....एक शाम रात तकरीबन सात बजे मुझे फोन आया कि फरीदपुर में दंगे भड़क गए ...महीना जून का था ...मैंने तुरन्त कैमरा उठाया क्यूँकि दंगों का नाम सुनकर मुझे शरद याद आया .....दंगा स्वभाव से जियादह उग्र और हिंसक था....लेकिन शरद ..जलती लाशों ..धधकते घरों ...भड़कते टायरों ....उबाल खाती पेट्रोल बोतलों और चीखती सिसकियों में कहीं भी नजर न आया ...

दिन बीते और सूरज ठंडा हुआ तो एक रात मैं बीवी बच्चों को सिनेमा दिखाकर लौट रहा था ....बीवी बोली कि देखो सामने सेल लगी है चलो गर्म कपड़े खरीद लें .....वो बच्चों की नाप -झाप लेकर ..दुकानदार से सेल के बावजूद दामों पर अड़-खड़ रही थी ...तो मैंने हौलती ठण्ड को खदेड़ेने के लिए एक सिगरेट जला ली ....एक कश मारा ही था कि तभी मुझे सड़क के दूजे किनारे एक शख्स नजर आया जो एक गहरे पेड़ के नीचे सोते हुए एक भिखमंगे परिवार पर अपने कन्धे पर दोनों और लटके  झोलों से कम्बल निकालकर उनको ओढ़ा रहा था .....

मैंने सिगरेट फेंकी ..और दौड़ उठा ...बीवी बच्चे चिल्लाते रहे .....लेकिन न मुझे आती -जाती गाड़ियों की परवाह थी न अब जिंदगी की .....बेशक वो " शरद "था जो अपनी माँ की चिता की राख उठाकर शायद ये प्रतिज्ञा कर बैठा था कि -

" माँ जब तलक जिन्दा रहूंगा तेरी तरह किसी को सर्दी से मरने नही दूँगा "

बड़ी मुश्किल से उस पार पहुँचा ...लेकिन शरद इस बार फिर मेरी आँखों से ओझल हो गया ....लेकिन मैंने भी हस इलाके के हर चलते -फिरते इंसान ...हर घर और उसकी दीवार से पूछ लिया ...लेकिन शरद का पता कोई नही बता पाया ....एक फ़क़ीर भी मिला ...मैंने उससे भी पूछा तो वो बस इतना बोला -

" कि भगवान भी कभी किसी को मिला है !"

शरद फिर मेरे दिमाग में दौड़ चुका था ....लेकिन इस बार मैंने ठान लिया कि शरद को दिमाग में पुनः नही पलने दूंगा ....

खैर हफ्ता बीत गया ...और एक रात ठण्ड  बहुत बढ़ गई थी ...नींद भी नही आ रही थी  ..एक   पैग रम का  मारा ..एक सिगरेट जलाई और सोफे में बैठकर  टी.वी ऑन किया ...सामने न्यूज एंकर बता रहा था कि इस बार की ठण्ड शहर के कई जानदार इंसान निगल गई   ...कुछ बिछी हुई लाशें भी दिखाई ...और मैं उन लाशों में एक लाश को देखकर पत्थर सा हो गया ....और दौड़ पड़ा उसी हालत में जहाँ से ये न्यूज लाइव आ रही थी ...मेरे घर से ये  जगह दूर नही थी .....पुलिस का कोई घेरा नही था ..कोईं नेता या मंत्री नही था ...सिर्फ एक पत्रकार और कुछ ठण्ड से काँपते अलाव सेंकते मरगिल्ले बेसहारा गरीब थे ....मैंने उन लाशों में उसी तीसरी लाश को देखा ...शरद मौत की नींद सो रहा था ...वो गुमनाम सर्द मसीहा ...जिसने अपनी पूरी मुकम्मल जिंदगी लोगों की सर्द रातों और सर्द जिंदगी को  दूर करने में लगा दी...वो सर्द मसीहा जो साल की बाकि ऋतुओं में कोई काम -धंधा करके कमाता और सर्दियों में उस कमाई को गर्म कम्बल खरीद कर लुटा देता ...ताकि कोई मरे तो जुरूर मगर सर्दी से नही वगरना वो अपनी माँ को क्या मुँह दिखायेगा !

तभी एक सर्द , काँपती आवाज कान पर टकराई -

" साहब ठण्ड न झेल पाया ये ...दो बार कहा भी था मैंने कि कुछ करके अपने लिए कम्बल खरीद ले ...नही माना ...और सामने वो जो पेड़ देख रहे हो न बस वहीं पर बिना कम्बल के सिमट कर बैठा रहता और ऐसे ही सो जाता .........

आँखों में इतना दर्द पहले कभी महसूस नही हुआ ...इतना पानी आँसू बनकर गिरा कि जितना तुषार आसमान से नही गिरता .....मैं बिलख के रोना चाह रहा था लेकिन सिर्फ होंट दबा कर गले में भर्राती आवाज से  गूं ..गूं ..करके ही सुबक सका...मैं घुटनों पर था क्यूँकि शरद तो चला गया लेकिन शरद ऋतु हर साल लौटेगी और न जाने कितने जिस्म सर्द कर के अपने साथ ले जाएगी......तभी मेरे आँसू जम गए ...दिल झनझना उठा ....और एक उम्मीद फिर जिन्दा हो गई ...क्यूँकि सामने एक बाइक रुकी उसमें से एक नौजवान उतरा और उसने अपने पिट्ठू बैग से एक कम्बल निकाला और सड़क पर सोते कुछ दो जनों पर ओढ़ा दिया  और बाइक स्टार्ट कर फरार हो गया ....मैं एक आँख से बाइक में दौड़ती उस जिन्दा छवि को देख रहा था और एक से शरद की मृत देह को ......तभी उसी  फकीर का फिर गुजर हुआ ..और वो  बड़बड़ाने लगा ...

" कि आत्मा कभी नही मरती ..वो तो सिर्फ शरीर बदलती है ..."....नवाज़िश
#जुनैद.....

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