Thursday, 22 November 2018

#देवता_दलन ************

#देवता_दलन
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मैंने पहली बार जिंदगी में अंग्रेजी शराब देखी ,,, और देखे अंग्रेजी बोलते लोग....
मुझे थोड़ा सा बहकना होता है तो घर में गुड़ की भेल से ताड़ी बना लेता हूँ ,,,मेरे पहाड़ी इष्ट को भी यही ताड़ी चढ़ती है ,,,

मेरा और मेरी तरह हम सब पहाड़ियों का विश्वास है कि हमारे पहाड़ी देवता हमारी रक्षा करते हैं ...तभी बचपन से लेकर आज तक मैंने कभी इन पहाड़ो के पार नही देखा ....

यहाँ शिव भी हैं ...और पांडवों के जागृत पद चिन्ह भी ...हम माँ पार्वती को नंदादेवी भी बोलते हैं ...माँ का डोला जब भी उठाता हूँ उपवास रखता हूँ ...ताड़ी ..माँस , खपेड़ हाथ भी नही लगाता ... हम देवभूमि के वो बच्चे हैं जिन्हें हमारी भूमि हमारी माँ की तरह पालती है ,,,

और हमारी माँ नही चाहती कि हम पहाड़ी कभी बिगड़े इसलिए उसने न कभी शहर के लिए यहाँ जमीन बिछाई ...न हमारे पैरों में वो जान दी कि हम कभी पर्वत लांघे .....खुश थे हम ,, जीते-मरते हुए भी दमकते थे ...अपना खान-पान अपनी संस्कृति पर हमें गर्व था ...

फिर एक दिन मैं बकरियाँ चरा रहा था ...कि तभी एक विस्फोट हुआ ...हमारा इष्ट ..हमारा देवता वो पहाड़ मोम की तरह गलने लगा ...और पहली बार उसके पिघलते ही मुझे दूसरी दुनिया और उस दुनिया के लोग दिखाई दिए ...

वो हँस रहे थे ...और हम भरभरा कर अपने देवता के मरने का शोक आँखों में लिए उसी नदी की तरह बहने लगे जिसके वेग को मेरे पहाड़ज्यू ने रोका था .. वैसे ही जैसे माँ गंगा का वेग शिव की जटाओं ने ....

सुना ये लोग ऐसे ही हमारे और देवताओं का भी वध करेंगे ...देवता भी कभी मरता है यही सवाल मैंने अपने पिताजी से किया ...और वो बोले ...देवता मरा नही अपितु हमसे रुष्ट होकर स्वर्ग चला गया ...

दरअसल वो शहरी लोग हमारी देवी , हमारी माँ इस बहती नदी की प्रकृति बदलने आये हैं ...वो इसपर कोई बाँध बनायेंगे ...ताकि शहरों में उजाला और ऊर्जा रह सके ....

लेकिन हमारा क्या ...हम तो नंगे हो गए साहब ...शहर से आती वायु एवं सोच से हम अपवित्र हो गए साहब....

पिताजी बोले ...शायद यही नियति है ....वरना हमारे देवता अवश्य इन्हें दंड देते .....

बात ठीक थी ...पूरे के पूरे हम जैसे कई गाँव जहाँ एक ओर इस बदलाव से भयाकुल थे वहीं कई घर इस बाँध से  रोजगार की मजूरी पर पलने लगे ...

मैंने हुड़का ( पहाड़ी वाद्ययंत्र ) पीट-पीट कर अपने लोगों को समझाया कि मत बहो इनके रोजगार और झाँसे में जिस दिन ये बाँध बन गया ...उस दिन के बाद ये हमें ऐसे भूल जायँगे जैसे हमारा देवता हमें भूल गया ....

समझाया मैंने उनको कि हमारी गैया -भैंस कहाँ चरेंगी ..कौन बचाएगा हमें जब इन धमाकों से खोखले मिट्टी -गारे के ये कृत्रिम पहाड़ दरकेंगे ..कौन रोकेगा फिर हमें जंगली जानवरों का निवाला बनने से ...कौन रोकेगा जब हम बहेंगे साथ इसके ......

लेकिन सब ने मुझे नकार और नजरअंदाज कर दिया ....लेकिन एक नीरू ही थी जिसको मुझपर विश्वास था ...क्यूँकि मैं उससे हृदय से प्रेम करता था , माँ नंदा की कसम ,, मेरा प्रेम उसके प्रति मेरा समर्पण भी है ...और जब उसने कहा -

" मोहना समझती हूँ तुम्हे ...लेकिन बहाव के साथ तैरकर ही प्राण और सम्मान बचता है ..सारा गाँव शहर और शहर वालों के साथ खड़ा है ...जाओ तुम भी उनको सहयोग करो ...तुम्हे मेरी सौ (कसम) !

नीरू तन और मन दोनों से बहुत सुंदर है ...16 पूरे नही हुए लेकिन बात इतनी गहरी और गठ्ठी करती है जैसे पहाड़ देवता गलने से पहले सारा ज्ञान उसको सौंप गए ....

नीरू भी मेरे साथ सुबह-शाम बाँध पर ही मजूरी करने लगी ... लेकिन बाँध जहाँ मेरे देवता लील गया वहीँ मेरा प्रेम भी हड़पने लगा ...

मैंने एक दिन नीरू को शहरी इंजीनियर की शहरी बातों में लिपटा देखा ..वो बाँध से भी बड़े सपने नीरू को दिखा रहा था ....मैंने कलाई दाब ली नीरू ली ...और उसे कड़ा पाषाण बनकर समझाया कि ये सब स्वांग है नीरू ...ये मात्र तुम्हारे तन का उपभोग करना चाहता है ...लेकिन नीरू नामक  कोमल कच्चा पत्ता अब प्रेम बहाव को समर्पित था ,,, नीरू ने पहली बार मुझे रागनी से चण्डी बनकर देखा और मैं समझ गया उसके मन में मेरे लिए सिर्फ वात्सल्य और सम्मान था प्रेम तो हरगिज नही ।।।।।

शाम ढ़ले नीरू को इकलौती पहाड़ी से नीचे शहरी इंजीनियर के कैम्प की ओर उतरते देखा ..और मैं समझ गया कि नीरू इस शहरी प्रेम के पाषाण को आज ग्राम का निर्मल जल समर्पित कर देने हेतु चल पड़ी है .....

जब देर तलक नीरू नही लौटी तो मैं भी पहाड़ी उतरा ..लेकिन तब तक नीरू देह पर विश्वास का जुआ खेल चुकी थी .....

मेरे लिए मेरा सर्वस्व आज समाप्त हो चुका था ,,, पहाड़ देवता क्या रूठे मेरा भाग्य और विधेय रूठ गया ...मासूम , भोली नीरू उस कच्ची उम्र में शहर की भड़कीली कहानियों और स्वप्नों में अपने गाँव का कौमार्य लुटा चुकी थी ...

कहते हैं कि धर्मराज ने मय भ्राताओं और भार्या के इसी गुफा में  शरण ली थी , ताकि कौरवों की नयन ज्योत उन्हें न ढूंढ पाये ....आज मैं उसी गुफा में विलीन होना चाहता हूँ ताकि अब शहर मेरा और कुछ न लूटे .....

एक धमाका और हुआ और मेरा इकलौता देवता भी धरती पर भर- भर करके बिछ गया ...उस दिन मेरे अश्रु अन्य देवताओं की मृत्यु की अपेक्षा अपने इस देवता की मृत्यु पर अधिक गिरे क्यूँकि यही इकलौता देवता था ....जो मेरे परिवार को पालता था ...इसी पर नाली दार खेत थे हमारे ..सरसों , लाई , पालक , मेथी , मक्का , गेंहूँ , चावल.. चारा यही हमको देता था ...इसपर ही मेरे बैल कुलेल करते थे ..बकरियाँ ममियाती थी ..गैया -भैंस जुगाली करते थे ...वो पानी का सोता ( भूमिगत जल का सतही मुहाना )भी भूमि में ही विलीन हो गया है .. और साथ ही साथ इसमें वो पीपल का पेड़ भी था जिसमें हमारे कुल का एक छोटा सा मन्दिर भी था ....और वो बुराँश का पेड़ भी जिसपर मैंने अपना और नीरू का नाम लिखा था ......

आज बाँध बन गया है ...बहुत सारी गाड़िया , हेलीकॉप्टर , नेता , सन्तरी , मंत्री पहुँचने लगे हैं ....शहर के लिये बिजली भी निकल चुकी है ... लेकिन हमारे घरों में अब भी मिट्टी के दीये और कुप्पी ही जल रही है ....

धीरे -धीरे सब कुछ लौटने लगा है ....अब बाँध पर चहल-पहल नही है....लोग फिर बेरोजगार हो चुके हैं... क्यूँकि अब न खेत बचे हैं ,,न मवेशी ....पहाड़ी लोग भी रोटी की मजबूरी के कारण.. लौटती शहरी गाड़ियों के पीछे अपने बचपन , अपने संस्कारों और अपने देवताओं को पीठ दिखाकर शहरी होने निकल पड़े हैं ....गांव के गांव पलायन से सूने हो गयें हैं ..... अब या तो मैं हूँ या मेरा निर्जन मन या फिर घर के आंगन में पंजों के बल उचक-उचक कर एक आस एक उम्मीद से शहर से आते रास्ते पर टकटकी लगाये दो और जानें .....एक नीरू और एक उसके पेट में पलता उसका गर्भ .....

" माँ नंदा ...ये देखकर निश्चय ही अश्रु नही रोक पाई ...और झमाझम वर्षा होने लगी ...जो शहर से आते और शहर को जाते हर पदचिन्हों को धोने और मिटाने लगी .....नवाज़िश
#जुनैद............

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