#दीप_अली
***********
" कैसी दीपावली ..मौलवी जब ' अली ' ही अयोध्या छोड़ चला ! "
" ऐसा न कहो महंत ! ...राम जी ! आने वाले है चलो ' दीप ' रोशन करो ! "
और इधर पुलिस वैन में एक मासूम जान की आँख से गिरते आँसूओं को पोंछकर ...जिला मंगलपुर के एस. पी श्री एल्बर्ट जोजफ यादों के एक छोटे पलछिन में डूब गए .....
जिला मंगलपुर सम्भवतः भारत का सबसे अशांत , सबसे विवादास्पद और सबसे जियादह सांप्रदायिक उन्माद का केंद्र है ..जिस जिले में कोई भी एस.पी या डी.एम नियुक्त नही होना चाहता ..
केरल के एल्बर्ट जोजफ जिन्होंने पुलिस कसम परेड में , शपथ ली थी कि परिस्थितिया चाहे कितनी भी प्रतिकूल हो वो अपना फर्ज अदा करते चलेंगे आज जब अपनी ब्याहता जो गर्भ से हैं .. के साथ मंगलपुर एस.पी हॉउस का दरवाजा खोल रहे थे तो उनके पैर और लहू एक साथ थर्रा रहे थे ...रात भर ड्राइंग रूम में सिगरेट के कस भरते रहे ....और मंगलपुर को एक आम सा शांत जिला बनाने के उपाय ढूंढते रहे ......
लेकिन मंगलपुर जहाँ हिन्दू -मुसलमान बराबर की संख्या में सदैव आमने -सामने रहकर ये ठान चुके थे कि मंगलपुर शांत किसी एक समुदाय की लाशों पर ही होगा ...उसपर एस. पी जोजफ का कोई भी उपाय असर करेगा ये सोचना भी प्रहसन मात्र था .....
एक सुबह एस.पी.. मंगलपुर की टोह लेकर लौट रहे थे तभी उन्होंने भीड़ के दो गुच्छों को आमने सामने नाक -भौंह चढ़ाये पाया ...उन्होंने गाड़ी रुकवाई और निहत्थे भीड़ को चीर आगे निकल गए ....
सामने का मंजर एस.पी के लिए उनकी रूह तक कँपाने वाला था ....मंगलपुर की एक मस्जिद और मन्दिर जिनकी सीढियां भी आपस में बिल्कुल सटी है में एक नवजात बच्चा रखा था ...जिसका सर मस्जिद की सीढ़ियों में और बाकि धड़ मन्दिर की सीढ़ियों में विस्तार पा रहा था ....
" मौलवी रहमत ! हमनें कहा उठा लो इस पाप को वरना आज मंगलपुर में प्रलय आ जायेगी ! "
" महंत ! कयामत का जिक्र शायद तुमने नही सुना ...अगर फौरन इस नजासत ( गन्दगी ) को उठा कर मस्जिद की सीढ़ियों को पाक नही किया तो ...आज मंगलपुर कयामत का मंजर देखेगा .."
भीड़ में दो समुदाय के लोग अपना -अपना धार , नुकीला और भेदन हथियार लिए बस आज्ञा का इन्तेजार करने मात्र ही रुके थे .....पुलिस फ़ोर्स भी मौके पर पहुंच गई ...
" रुको ! मैंने सुना था कि मंगलपुर में चाहे कितनी भी नफरत , कितनी भी रंजिश , कितना भी उन्माद हो लेकिन यहाँ के बाशिंदों के दिल बड़े हैं ....लेकिन ये झूठ था ...क्यूँकि यहां तो असंख्य लोगों के दिल और घर में एक बच्चे के लिए भी जगह नही ...रहने दो इस बच्चे को मैं अपने साथ ले जाता हूँ ...आप विवाद खत्म करो !"
आगे बढ़कर पुलिस कप्तान ने बच्चे को उठाया और सीने से लगाया और कुछ कदम चले ...तभी
" ठहरो ! कप्तान साहब आज दीपावली है और आपने ठीक सुना है कि मंगलपुर के हिंदुओं के हृदय में आपार स्थान है ...लाइए ये बच्चा मुझे दीजिये मैं स्वयं इसे अपने प्रभु राम का उपहार समझ कर पालूंगा ....."
" कप्तान साहब ! आपने जो सुना है वो महज मंगलपुर के मुसलमानों के बारे में सुना हैं....लाइए दीजिये मेरी बीवी इसे अपनी औलाद सा पालेगी और हम इसे अपना नाम देंगे ....
बड़ा अजीब नजारा था, पहले जिस बच्चे के अतिक्रमण के लिए दो समुदाय जूझ रहे थे ..अब उसको हड़पने के लिए दो समुदाय त्यौरियां चढ़ा रहे थे ....कप्तान ने माहौल शांत किया और दोनों समुदायों के कुछ समझदार लोगों के संग एक वार्ता की ....फल ये निकला कि बच्चा मौलवी और महंत के पास 3-3 दिन रहेगा और बाकि एक दिन रविवार वो कप्तान के पास रहेगा ....
अब नाम पर दोनों समुदाय फिर आमने -सामने आ गए ...मौलवी ने " अली " नाम दिया तो महंत ! ने कुछ ग्रह दशा का अनुमान लागकर बच्चे को " दीप " कहकर पुकारा ! खान-पान पर भी निर्णय हुआ कि बच्चा माँस नही खायेगा ...तो यज्ञोपवीत भी धारण नही करेगा ...यानि बच्चे के बारे में एक न्यूटल फैसला हुआ कि जब ये समझदार हो जाएगा तो ...जो मन आयेगा वो धर्म अथवा मजहब या नाम स्वीकार लेगा ।।
दीप या अली ..अब पूरे मुहल्ले की जान बन गया ...तीन-तीन दिन कि उसकी परवरिश ने एक चमत्कार ये भी किया कि ..अब मौलवी की बीवी उसे लेने महंत के घर के आँगन में पैर रखने लगी ...तो महंत की भार्या भी मौलवी के हुजरे के पास जाकर पूछने लगी कि -
"बहन शबनम क्या दीप जाग गया ....?"
अब जब दो मठाधीश पास -पास आने लगे ...तो आवाम भी ..राम -राम ! जुबैर भाई ..सलाम ! हरिश भाई पर उतर आई ... जैसे -जैसे दीप-अली बढ़ा हुआ उसके संग मस्जिद के आँगन में हिन्दू मासूम बच्चे खेलने लगे तो मन्दिर में उचक -उचक कर घण्टियाँ मुस्लिम मासूम बजाने लगे ... आज दीप-अली लगभग 10 साल का हो गया ..और हैरत ये कि इन दस सालों में एक भी सुई बराबर विवाद या हिंसा की खबर मंगलपुर से न मिली ......
लेकिन उस दीपावली की रात जब पुलिस कप्तान एल्बर्ट जोजेफ की बीवी के प्राणों पर आ पड़ी ...और उसने प्राण देने से पूर्व दीप-अली को अपने कलेजे से लगाने उसे देखकर दम देने की गुहार अपने पति से लगाई तो ..कप्तान टूट गए ..क्यूँकि आज दिन बुद्धवार का था और वो दीप-अली को सिर्फ रविवार को प्राप्त कर सकते हैं ....दीप-अली जो उनकी ही सगी औलाद है ..जिसको उन्होंने मंगलपुर के अमन और शांति के लिए योजनाबद्ध रूप से कुर्बान कर दिया और पत्नी को ये बताया कि पैदा होते ही उनकी औलाद मर गई ...लेकिन माँ का कलेजा अपने जिस्म, अपने खून के हिस्से को सूंघ लेता है ...जितना इन्तेजार दीप -अली का क्रम से मौलवी की बीवी ..महंत की भार्या को होता उतना ही रविवार के दिन कप्तान की मिसेज उसके लिए आँखों और कलेजे में जन्नत सजा कर बैठी रहती ...
कप्तान टूट गए और महंत के पास पहुँचकर बच्चे को सिर्फ कुछ घण्टे को माँगा ...महंत सौंप ही रहे थे कि महंत की बीवी अड़ गई कि आज त्यौहार का दिन है हरगिज 'दीप ' को न दूँगी ...उसकी आवाज सुनकर मौलवी की बीवी भी अड़ गई कि सही कहा ' पदमा ' बहन ...कल तो ये मुझसे भी किसी बहाने ' अली ' को माँगने आ जायेंगे ...हवलदार आत्माराम जिसने कप्तान की आज्ञा से गुपचुप बच्चे को सीढ़ियों में रखा था ....आँख में आँसू भर चिल्लाकर बोल पड़ा -
" किस बच्चे पर अपना हक जता रहे हो तुम लोग ...ये बच्चा कप्तान साहब का है ...नही साहब चुप नही रहूँगा आज चाहे सेवा से बेदखल कर दो ...तुम हिन्दू -मुसलमान के नाम पर एक दूसरे को काटते -मारते कसाइयों के बीच इस कप्तान साहब ने अपने दिल के टुकड़े को पैदा होते ही मुझसे यहां सीढ़ियों में रखवा दिया .......
कप्तान के रोकने से पहले ही आत्माराम सब कुछ बता गया ...कोई भी कोख से पैदा नही बचा जिसकी आँख न भीग गई हो ...उसी दौर सबने एक साथ मुक़द्दस कुरआन और पवित्र गीता पर हाथ धरा और मुहब्बत ,, अम्नो- शांति की कसम खाई ....दोनों माँओ ने मिलकर दीप -अली को रुख्सत किया .....
कप्तान वर्तमान में लौटे और कुछ इरादा कर चलती वैन को वापस मंगलपुर मोड़ने का आदेश दिया ....
कप्तान ने गाड़ी को एक अँधेरे स्थान पर रुकवाया और दीप -अली संग पैदल चलने लगे ....नजारा जन्नत का था या स्वर्ग का पता नही ..लेकिन नजारा जमीन का भी नही था ...मंगलपुर का छोटे से बड़ा मुसलमान दीप सजा रहा था ...उनकी औरतें उसमें तेल भर रहीं थी ...हिन्दू मस्जिद को दुल्हन की तरह सजा रहे थे ...तभी मौलवी बोले -
चलो महंत दीप रोशन करो !
कैसी दीपावली मौलवी ! जब ' अली ' ही अयोध्या छोड़ चला ...
ऐसा न कहो महंत ! राम जी आने वाले है ....चलो ' दीप ' रौशन करो !
जैसे ही महंत ने पहला दीप रोशन करने हेतु अपना हाथ आगे बढ़ाया ..उनके हाथों को एक नन्हें हाथों ने थाम लिया .....
हर जानिब जय " श्री राम ! " के नारे गूंजने लगे ... ' दीप-अली ' के लौट आने से दीपावली जगमगाने लगी ...हर तरफ खुशियाँ और रौशनी ....लेकिन दो कदम अब भी आँखों में बेशुमार कतरे और होंठों पर फफकती मुस्कुराहट बिखेरे गाड़ी की तरफ अपने को ये दिलाशा देकर लौट रहे थे कि ....हजारों जिंदगियों के बीच मुहब्बत पनपाने के लिए सिर्फ दो कुर्बानियाँ ही तो दी है ....आत्माराम ने आँखों में आँसुओ का सैलाब भरके कप्तान को सैल्यूट बनाया और कहा-
"साहब ! मंगलपुर को "दीप-अली " देने का शुक्रिया " .....नवाज़िश
#जुनैद............
No comments:
Post a Comment