#तुझे_फिर_अवतार_लेना_होगा
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हावड़ा के ब्रिज पर खड़ा वो... हुगली को अपने आँसू देता रहा ,,,,और अंत में वो हुगली में समा गया ,,,मैं दूर से आवाज देता रह गया ...मेरी चीख ब्रिज पर दौड़ती गाड़ियाँ चबा गई ...दो चार पैदल -चलते वहाँ जमा भी हो गए ...उनको यकीन था कि डूबा एक बार ऊपर जुरूर आयेगा ...लेकिन उससे हुगली की मुहब्बत देखते ही बनती थी ...हुगली ने उसका एक बाल भी फिर दुबारा दिखने न दिया ......
मैंने कूदते देखा था उसको ,, जब वो नीचे गिर रहा था तो एक कागज का टुकड़ा उसकी जेब से निकल कर हवा में बह गया ....और वो ही टुकड़ा अब मेरे कदमों में गिरा था ...
मैंने उस टुकड़े को उठाया ..और घूर कर देखा ....उस टुकड़े में उसकी आत्महत्या की कोई कहानी मुझे नजर न आई ...लेकिन कुछ तो था जो मुझे उस टुकड़े से समझ में आया .....
उसमें पेन्सिल से लक्ष्मी लिखा था ...लक्ष्मी कौन थी ...? उस इंसान की मेहबूबा, पत्नी , बहन या माँ ..?
मौके पर एक सस्ती , कम जगी और इंट्रस्टलैस पुलिस टीम पहुँची...मुआयना ऊपर से ही हुआ ...वहीं पर अदालत लगी .. साहेब बहादुर ने कहा दिमागी विक्षिप्त होगा कोई ..केस तत्काल आत्महत्या का बना , एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता सिकड़ा , भ्याज लौंडा बोला कि गोताखोर तो बुलवाइए ...
साहेब धार्मिक थे...तत्काल हुगली में मुँह का गुटखा थूक कर बोले ...मैया हुगली की ग़हराई त्रेता , द्वापर न समझ पाया इस कलजुग में हम का खपेंगे ...अब सीधे सुंदर वन डेल्टा लगेगी लाश .....
धर्म का बड़ी चालाकी से प्रयोग कर साहेब फन्ने अपने फर्ज और कर्तव्य की चिता जलाकर फरार हो गए ।
लेकिन मैं वहीं था , क्यूँकि मेरे पास कुछ काम भी तो नही था ...उसी टुकड़े को फिर दुबारा घूरा ... तो पाया लक्ष्मी के नीचे कीरत नगर लिखा था .... तुरन्त बस को हाथ दिया ...और कीरत नगर मूव किया ।
कीरत नगर बंगाल की एक अदनी मलिन बस्ती जहाँ इंसान के साथ उसका पसीना भी गरीब होकर मरता है ...पूरी बस्ती में चारों तरफ गरीबी की कर्री बू बिखरी पड़ी थी ...और बिखरे पड़े थे कल के गरीबी के वाहक मासूम बच्चे ...मैंने एक बू मारते बच्चे को पकड़ा और पूछा -
" क्यूँ बे ये लक्ष्मी कहाँ मिलेगी ? "
वो मेरी पैंट -शर्ट की इस्त्री , शर्ट के अंदर से आती परफ्यूम की खुशबू ..और मेरी जुबान से महकती सुबह के नाश्ते के दही -पराठे की महक से लार गिरा बैठा ....शायद दो -एक दिन का भूखा था वो ,, जिसने महज मेरे कपड़े और रंगत से मेरे अमीर होने.. यानि खूब सारे पकवान खाने वाले की एक छवि अपने दिमाग में उकेर ली और अपनी भूख को ज़िंदा करके मेरे कदमों में वार दिया .... मैंने उसे तत्काल ऐसे छोड़ा जैसे हथेली से अंगार....
उसका हुलिया आजाद भारत का नही था .. क्यूँकि आजाद भारत में भूख या गरीबी नही होगी ऐसा मैंने किताबों में पड़ा था .....कुछ आगे बढ़ा तो एक औरत को झेरे से पानी भरते देखा -
" इस पानी का क्या करोगी ..ये तो बहुत गन्दा और बदबूदार है ! "
" साहब ! जियादह क्या होगा मर जाऊँगी न ...तो अभी कौन सी जिन्दा हूँ "
कदम फिर बढ़े तो एक मरगिल्ले ,पसली के ऊपर गोश्तगुम बीड़ी चूसते लगभग 30 की उम्र के बूढ़े से पूछा -
" क्यूँ भाई ये लक्ष्मी कौन है यहाँ ..?"
बड़ी हैरत पहनी उसने आँखों में ..खाँसा ,, झुनझुनाया ..फिर बोला -
" हर घर में लक्ष्मी है साहब ..हम कीरतवासी अपनी हर बच्ची का नाम लक्ष्मी ही रखते है जियादह... क्यूँकि इसी की जुरूरत है हमें ...लेकिन लक्ष्मी कभी इधर प्रवेश ही नही करती ..हम गन्दे हैं न ...गरीब और बेइज्जत हैं न ...मजूर , भिखमंगे हैं न इसलिए "
दिमाग सांय-सांय करने लगा ...तभी अपने जैसा एक कपड़ों से भद्र और महकाहुआ इंसान आता दिखाई दिया .. मैं उसको कुछ बोलता इससे पहले ही वो एक मिट्टी के लिपे घर में घुसा ...मैंने कुछ देर उसके बाहर आने की प्रतीक्षा की ...उसे देर हुई तो मैं उस घर के आगे खड़ा हुआ परदा टाट का था ...तो मैंने खिड़की से झाँका ...एक मासूम 11-12 साल की लड़की को वो अपनी हवश का शिकार बना रहा था ...वो बच्ची दर्द से जमीन पर एड़िया रगड़ रही थी ,, मैं जैसे ही अंदर दाखिल होकर उस बच्ची को उस आदमखोर से बचाता ..इतने में मेरे कन्धे पर एक हाथ आ लगा ....
साहेब लक्ष्मी आज दूसरा बर्दाश्त न करेगी आप सामने वाले घर हो लो वहाँ भी एक लक्ष्मी है
" नीच.. बेगैरत .. रण्डी !
शर्म नही आती तुझे ... ऐसा बोलते हुए ..मैं इतनी बड़ी बच्ची का बाप हूँ और तुम नीच यहाँ इन मासूम बच्चियों से धंधा करवा रही हो ! "
" ओये साहब ! साला नीच तुम लोग हो ...हम नही जाते तुमको शहर बुलाने ..तुम ही आते हो यहाँ ..सिर्फ अपने तन की प्यास बुझाने और तुझे इतना तरस आ रहा है तो ला दे दे मुझे दौलत और रोजगार ...दे ..दे रोटियाँ , कपड़े और इज्जत देख कल से ये काम न छोड़ दिया तो फिर थूक जाना मेरे मुँह पर "
लेकिन ये सब मैं कैसे दे सकता हूँ ये तो नेता देंगे या देंगे उनके अफसर जो इस देश को चलाते हैं ..जो इसी को देने के वायदे करते हैं....मन में बड़बड़ाकर आगे बढ़ा ...और इरादा कर लिया लक्ष्मी के इस जंगल में उस एक लक्ष्मी को ढूंढ़ना भूसे के ढेर में से सुई चुनने से जियादह मुश्किल है ।
मायूस होकर पक्की सड़क की राह ली .... तभी एक घर से आवाज आई ...
" माँ ! बापू कब लौटेंगे ...माँ ! जोर की भूख लगी है ..माँ ! बापू कह रहे थे आज वो मुझे भगवान के नाम लिखना सिखायेंगे ...माँ ...माँ...बोलती क्यूँ नही...."
तभी वो बच्ची चीखी ....और मैंने पर्दा हटाकर अंदर झाँका ...उसकी बेहाल , बीमार , खस्ताहाल माँ ...एक सफेद झीनी साड़ी में जमीन पर कुछ चीथड़े बिछाकर लेटी नजर आई ...जो पेट से थी ...और दर्द और भूख से व्याकुल शायद बेहोश हो गई थी ....सामने से एक ताई दौड़कर अंदर आई उसने मुझे आँखे तैर कर देखा ..और बोली -
"साहब ! यहाँ धंधा नही होता ये कैलाश का घर है ये उसकी बीवी और ये उसकी बिटिया है ...पाँचवी पास है वो ...जूता फैक्ट्री में काम करता है ....नोट बदलवाने गया है साहब से बताओ तो पूरा हफ्ता काम करवाया और दे दिया हाथ में ख़राब नोट ....
तुरन्त जूता फैक्ट्री दौड़ा और मुंशी के गले को दाब लिया -
" क्यूँ बे हरामजादे ..पूरा हफ्ता गरीब का खून चूसता है और उसके एवज में देता है नम्बर जला नोट "
उसके आदमियों ने तबियत से कूटा मुझे ...लेकिन दर्द नही हुआ मुझे ...मैं तो बस कैलाश की बेबसी देख रहा था ...पत्नी पेट से ...उसपर कोशो भूखी ...फूल सी प्यारी बच्ची और उसके पेट में भी कुछ नही ....
एक भले गुजरते ने ...काँधे पर हाथ धरा और बोला -
" लगता है कैलाश के लिए बलवा करे हो अंदर ..अरे भैया बहुत भला और सीधा है कैलाश ...लेकिन जियादह न जी पायेगा ...ये जूते का कुँआ उसे भी कैंसर जैसी अमीर बीमारी दे गया ..."
वो कहकर चला गया लेकिन मैं ..फिर डूब गया ..कैलाश पहले मुंशी से अड़ा होगा ...उसने नौकरी से निकलने की धमकी दी होगी ...उसने फिर वो नोट हर दिशा में चलाने की जी तोड़ कोशिश की होगी ...फिर हार-थक के घर गया होगा ...उसकी बेटी ने उस नोट को रोटी की शक्ल में देखा होगा और उस रोटी में अपना नाम लिख दिया होगा ...जब आज भी वो हर ओर से हार गया होगा ...बैंक , दुकानें वैसे भी गरीब को खरीदती है उनकी गरीबी नही ..तो अपनी लाचारी अपनी बिमारी और अपनी जिम्मेदारी से हारकर उसने हुगली में ..........
वो कागज का टुकड़ा वो दो हजार का नम्बर जला नोट अब भी मेरी हथेली में है ...और आँखों में है गरीब होने का नंगा सच ....लक्ष्मी का मैं भी उपासक हूँ ....लेकिन उस लक्ष्मी से मैं क्या कहूँगा ..?कैसे उसको तसल्ली और उसका बाप लौटाऊँगा ..? मुझे इस धर्मसंकट से और इस समूल धरा को इस गरीबी नुमा गाली से उबारने के लिए फिर तुझे अवतार लेना होगा लक्ष्मी के स्वामी ....तुझे फिर अवतार लेना होगा ....नवाजिश
#जुनैद...
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