#अयोध्या_वापसी
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" अम्मी मुझे डर लद लहा है ...ये लोग इतना तिल्ला त्यूँ लहें है ..अम्मी ...इनसे तहो सब दाओ यहाँ से....
अयोध्या ,सरजू के आईने में दिखती राम की वह नगरी ..जहाँ कभी राम जन्मे थे ...और जन्मी थी उनके साथ राम राज्य की अवधारणा .....
मुनीर के अभी पूरे कच्चे दाँत भी नही उखड़े ,..और उसके अब्बू अल्लाह को प्यारे हो गए ...उसकी अम्मी शकीना ने मन बना लिया है कि अयोध्या छोड़ देंगी .....
राम भी जब अयोध्या छोड़ रहे थे ...तो उन्हें भी बेहद गम था ..हाँलाकि उन्होंने चेहरे और भाव से कभी जाहिर नही किया वरना " माँ कौशल्या " का क्या होता ...?
लेकिन शकीना ने जिद पकड़ ली ..उसे लगा कि जैसे अब अयोध्या ..अयोध्या न रहकर एक अखाड़ा बन गई है,,, जहाँ कभी भी कुछ भी घटित हो सकता है ....
राम भी इस शंका से आहत थे कि उनके जाते ही अयोध्या का क्या होगा ...? क्या भरत सम्हाल पायेंगे ...? लेकिन फिर उन्होंने भरत के वो समस्त नैतिक गुणों को स्मरण किया और सुकून से अपना पहला कदम अयोध्या से बाहिर निकाला !
बस में बैठी शकीना भी अयोध्या को आखरी बार बस की खिड़की से घूर रही थी ......
वैसे ही जैसे मर्यादापुरषोत्तम अयोध्या की सीमा को पार कर पलट कर अपनी सूनी अयोध्या को निहार रहे थे
राम और शकीना के आँसुओं में एक बात बहुत सामान थी कि दोनों अयोध्या को अपनी जान से जियादह मुहब्बत करते थे ।।।।
बस स्टार्ट हुई ही थी , कि तभी सुंदरलाल मय पत्नी के दौड़ता आया और बस की खिड़की से झलकती शकीना से बोला -
"वाह भाभी वाह ! मतलब आपने दिखा ही दिया कि आप अयोध्यावासी बाद में हैं और पहले एक मुसलमान है ...अरे ! आपके शौहर कहा करते थे कि सुंदर जिन्दा रहा तो मैं राम का और मर गया तो मैं अयोध्या का ....और भूल बैठी आप अपने अब्बू मरहूम की बातें ...जो अक्सर कहा करते थे कि अयोध्या जितनी राम की उतनी मेरी !"
" लेकिन सुंदर दादा ...आप हालात नही देख रहें है ..क्या अब हकीकत में अयोध्या ..पहले जैसी अयोध्या रह गई ..."
" नही बोलिये ...बताइये न कि क्या बदला है अयोध्या में ...अरे भाभी जिस दिन मस्जिद ढही थी क्या एक भी अयोध्या के मुसलमान को आँच आई ...बोलिये जबकि लगभग पूरा देश सुलग रहा था ...क्या अयोध्या में कोई उबाल दिखा ...?.आप दुनिया के किसी कोने में उतना महफूज नही जितना की राम जन्म भूमि यानि अयोध्या में सुरक्षित हैं "
बस बढ़ चली थी ...मुनीर जिद करने लगा कि अम्मी हम यहीं रहेंगे ...कहीं नही जायेंगे ....लेकिन शकीना ने उसे सीने से चिपकाया और सजल नेत्रों से सुंदरलाल और उसकी भार्या को अलविदा कहा !
बस आगे बढ़ी ही थी कि रामलला का नजारा हुआ ..सभी यात्रियों ने उन्हें देख हाथ जोड़े और शकीना ने अदब से सीने में अपना हाथ रख लिया ...
और तब उसको पता चला कि उसके सीने की कुर्ती के पास के बटन खुले हुए हैं ..और बगल वाली सीट पर बैठे दो आदमी उसका सीना घूर रहें है ....शकीना ने सीना ढँका और आँख बन्द कर राम को शुक्रिया कहा .....
तभी ट्रैफिक में बस फिर रुकी और नये यात्री बस में चढ़ने लगे ...शकीना को एहसास हुआ कि उसकी जाँघ पर किसी ने हाथ फेरा है ...भीड़ इस कदर बढ़ चुकी थी कि शकीना ये जाँच न पाई कि वो कौन था ....लेकिन शकीना डर से काँपने लगी ....उसकी इस मनोदशा को समझा एक साधू ने ....और गरज कर बोला -
" ये राम की भूमि है और यदि राम का व्यक्तित्व आत्मसात नही कर सकते तो उसे कलंकित न करो ...अरे ! परभार्या पर कुदृष्टि डालने की हिम्मत तो रावण ने भी न कि तुम दुष्टों को यदि मेरे श्राप से बचना है तो स्त्री का सम्मान करो ! "
बस में एकाएक शांति स्थापित हो गई ...और जब बस फिर रुकी तो वो यात्री और साधू उतरने लगे ....तभी शकीना ने चिल्लाकर उस साधू से कहा -
" शुक्रिया बाबा ! आज आप न होते तो ..... ये मेरा बेटा मुनीर है इसके सर पर हाथ रखकर इसे दुवाएँ दे दीजिये -
साधू मुस्कुराहकर बोले -
" बेटा मैंने कुछ नही किया बल्कि जो किया राम ने किया या मुझसे करवाया और उस बच्चे के सर पर हाथ फेरकर आगे बढ़ गए "
फिर एक हल्ला बस में चढ़ा ...जो राम -मन्दिर का जूनून पाले हुए था ...शकीना को हिजाब में देखते ही उनमें से एक युवक बोला -
" मन्दिर वहीं बनाएंगे ..बाबर को नीचा दिखायेंगे ...हम राम राज्य से प्रजा का अभिषेक करते जायँगें "
उस युवक ने ठसका दिया तो दो अन्य युवक भी शकीना को चिढ़ाने के लहजे में यही जुमला दुबारा बोले ......
तभी उसी उत्तेजक दल का सरगना ऊंचे स्वर में बोला -
" ये क्या कर रहे हो ...हमारा ध्येय राम मन्दिर है न कि किसी इंसान को उकसाना या सताना ..."
तभी मुनीर ने अपनी उम्र के मुताबिक़ अपनी अम्मी से सवाल किया -
" अम्मी ये बाबल तौन था ?"
वही सरगना घुटने में बैठा और बोला-
" बेटा बाबर मेरे और तुम्हारे जैसा नही था ...हम हिन्दुस्तानी है..और वो हिन्दुस्तानी नही था !"
कुछ भड़के युवक होंठ चबा कर अपने सरगना को कोसते रहे क्यूँकि वो बाबर और मुसलमानों को एक डोर से जोड़ कर कुछ और बोलना चाहते थे ...."
" शुक्रिया भाई ...आपने बड़ा मान रखा मेरा और मेरे बच्चे का "
" मैंने नही ये जो कुछ मुझसे करवाया है राम ने करवाया है ....जय श्री राम "
सफर बीच में पहुँच चुका था ..और अयोध्या कोशों पीछे छूट गई थी ...
तभी साम्प्रदायिक उन्माद की एक लहर दौड़ी ...पुलिस की गाड़ी ने बस को रोका ...और वापस लौटने का इशारा किया .....
तभी एक भीड़ का छोटा उन्मादी टुकड़ा बस के करीब आता दिखाई दिया ....पुलिस वालों ने बस को घुमाने को कहा ...और वो खुद भी घूम कर फरार हो गये -
" भैय्या जी बस घुमाइए ...अरे ड्राईवर साहब बस घुमाइए ...मैंने कहा !"
" अरे ! पण्डित जी बैठे रहिये ...अपने ही आदमी है ...राम सेवकों का जत्था है ...क्या जय श्री राम की आवाजें नही सुन रहें आप .."
"लेकिन क्या तुम उनके हाथों में बन्दूक , जलती मशालें और धारधार हथियार नही देख रहे ....और नही देख रहे हो क्या इस बस में बैठी इस मुसलमान औरत और उसके मासूम बच्चे को ...बस घुमाइए ...सुन रहें हैं आप !
लेकिन देर हो चुकी थी ....तभी मासूम मुनीर बोला
" अम्मी डर लद लहा है ...ये लोद इतना तिल्ला त्यूँ लहें है ..अम्मी ...इनसे तहो सब दाओ यहाँ से "
शकीना के कुछ कहने से पहले ही पण्डित जी बोल पड़े ..
" माफ़ करना बेटी ...मेरी बेटी भी तुम्हारी उम्र की है ...ये हिजाब उतार दो...बच्चे की जान भी तुमसे जुड़ी है ....
" शुक्रिया पण्डित जी ! लेकिन मैं हिजाब नही उतार सकती ...जियादह क्या होगा मार देंगे ...बस अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चे को अयोध्या वापस ले जाना ...मेरे मुँह बोले भाई सुंदरलाल हैं वहाँ ...इसको उनको सौंप देना ..
पण्डित जी सजल नेत्रों से बच्चे को देखकर कुछ बोलते इससे पहले ही भीड़ बस के करीब आ गई ..
मारो . ...काटो ..ढूँढों की रट लगाते हुए वो जैसे ही बस में चढे ....पंडित जी बिजली की गति से खड़े हुए और अपने राम नाम के पीताम्बर दुशाले से बच्चे और शकीना को ढाँक लिया ....
भीड़ ने पूरी बस खँगाली और जब वो ख़ाली हाथ उतरने लगी ... तब एक उन्मादी वापस पलटा और पण्डित जी से बोला-
" ये लोग कौन है ...?
" मेरी बेटी और मेरा नाती हैं ये ....स्वास्थ्य ठीक नही है इसलिए दिल्ली ले जा रहा हूँ "
जब उन्मादी लौट गए तब आँखों में सैलाब भरकर शकीना बोली ....
" अगर आप न होते तो ...."
उसके जुमला पूरा करने से पहले ही पंडित जी बोले ..
" मैंने कुछ भी तो नही किया जो करवाया वो सब मेरे राम ने करवाया ....बेटी ! बस विनती है कि वापस अयोध्या लौट चलो क्यूँकि राम जी भी यही चाहते हैं ...
शकीना कुछ न बोल पाई और बस वापस अयोध्या मुड़ गई ...जैसे -जैसे अयोध्या निकट आ रहा रहा था ,, वैसे -वैसे मुनीर पुलकित और आनंदित होता जा रहा था बिलकुल वैसे ही जैसे अयोध्या लौटने पर " श्रीराम " गौरवान्वित और हर्षित हो रहे थे .....नवाज़िश
#जुनैद.........