Saturday, 24 November 2018

#अयोध्या_वापसी

#अयोध्या_वापसी
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" अम्मी मुझे डर लद लहा है ...ये लोग इतना तिल्ला त्यूँ लहें है ..अम्मी ...इनसे तहो सब दाओ यहाँ से....

अयोध्या ,सरजू के आईने में दिखती राम की वह नगरी ..जहाँ कभी राम जन्मे थे ...और जन्मी थी उनके साथ राम राज्य की अवधारणा .....

मुनीर के अभी पूरे कच्चे दाँत भी नही उखड़े ,..और उसके अब्बू अल्लाह को प्यारे हो गए ...उसकी अम्मी शकीना ने मन बना लिया है कि अयोध्या छोड़ देंगी .....

राम भी जब अयोध्या छोड़ रहे थे ...तो उन्हें भी बेहद गम था ..हाँलाकि उन्होंने चेहरे और भाव से कभी जाहिर नही किया वरना " माँ कौशल्या " का क्या होता ...?

लेकिन शकीना ने जिद पकड़ ली ..उसे लगा कि जैसे अब अयोध्या ..अयोध्या न रहकर एक अखाड़ा बन गई है,,, जहाँ कभी भी कुछ भी घटित हो सकता है ....

राम भी इस शंका से आहत थे कि उनके जाते ही अयोध्या का क्या होगा ...? क्या भरत सम्हाल पायेंगे ...? लेकिन फिर उन्होंने भरत के वो समस्त नैतिक गुणों को स्मरण किया और सुकून से अपना पहला कदम अयोध्या  से बाहिर निकाला !

बस में बैठी शकीना भी अयोध्या को आखरी बार बस की खिड़की से घूर रही थी ......

वैसे ही जैसे मर्यादापुरषोत्तम अयोध्या की सीमा को पार कर पलट कर अपनी सूनी  अयोध्या को निहार रहे थे

राम और शकीना के आँसुओं में एक बात बहुत सामान थी कि दोनों अयोध्या को अपनी जान से जियादह मुहब्बत करते थे ।।।।

बस स्टार्ट हुई ही थी , कि तभी सुंदरलाल मय पत्नी के दौड़ता आया और बस की खिड़की से झलकती शकीना से बोला -

"वाह भाभी वाह ! मतलब आपने दिखा ही दिया कि आप अयोध्यावासी बाद में हैं और पहले एक मुसलमान है ...अरे ! आपके शौहर कहा करते थे कि सुंदर जिन्दा रहा तो मैं राम का और मर गया तो मैं अयोध्या का ....और भूल बैठी आप अपने अब्बू मरहूम की बातें ...जो अक्सर कहा करते थे कि अयोध्या जितनी राम की उतनी मेरी !"

" लेकिन सुंदर दादा ...आप हालात नही देख रहें है ..क्या अब हकीकत में अयोध्या ..पहले जैसी अयोध्या रह गई ..."

" नही बोलिये ...बताइये न कि क्या बदला है अयोध्या में ...अरे भाभी जिस दिन मस्जिद ढही थी क्या एक भी अयोध्या के मुसलमान को आँच आई ...बोलिये जबकि लगभग पूरा देश सुलग रहा था ...क्या अयोध्या में कोई उबाल दिखा ...?.आप दुनिया के किसी कोने में उतना महफूज नही जितना की राम जन्म भूमि यानि अयोध्या में सुरक्षित हैं "

बस बढ़ चली थी ...मुनीर जिद करने लगा कि अम्मी हम यहीं रहेंगे ...कहीं नही जायेंगे ....लेकिन शकीना ने उसे सीने से चिपकाया और सजल नेत्रों से सुंदरलाल और उसकी भार्या को अलविदा कहा !

बस आगे बढ़ी ही थी कि रामलला का नजारा हुआ ..सभी यात्रियों ने उन्हें देख हाथ जोड़े और शकीना ने अदब से सीने में अपना हाथ रख लिया ...

और तब उसको पता चला कि उसके सीने की कुर्ती के पास के बटन खुले हुए हैं ..और बगल वाली सीट पर बैठे दो आदमी उसका सीना घूर रहें है ....शकीना ने सीना ढँका और आँख बन्द कर राम को शुक्रिया कहा .....

तभी ट्रैफिक में बस फिर रुकी और नये  यात्री बस में चढ़ने लगे ...शकीना को एहसास हुआ कि उसकी जाँघ पर किसी ने हाथ फेरा है ...भीड़ इस कदर बढ़ चुकी थी कि शकीना ये जाँच न पाई कि वो कौन था ....लेकिन शकीना डर से काँपने लगी ....उसकी इस मनोदशा को समझा एक साधू ने ....और गरज कर बोला -

" ये राम की भूमि है और यदि राम का व्यक्तित्व आत्मसात नही कर सकते तो उसे कलंकित न करो ...अरे ! परभार्या पर कुदृष्टि डालने की हिम्मत तो रावण ने भी न कि तुम दुष्टों को यदि मेरे श्राप से बचना है तो स्त्री का सम्मान करो ! "

बस में एकाएक शांति स्थापित हो गई ...और जब बस फिर रुकी तो वो यात्री और साधू उतरने लगे ....तभी शकीना ने चिल्लाकर उस साधू से कहा -

" शुक्रिया बाबा ! आज आप न होते तो ..... ये मेरा बेटा मुनीर है इसके सर पर हाथ रखकर इसे दुवाएँ दे दीजिये -

साधू मुस्कुराहकर बोले -
" बेटा मैंने कुछ नही किया बल्कि जो किया राम ने किया या मुझसे करवाया और उस बच्चे के सर पर हाथ फेरकर आगे बढ़ गए "

फिर एक हल्ला बस में चढ़ा ...जो राम -मन्दिर का जूनून पाले हुए था ...शकीना को हिजाब में देखते ही उनमें से एक युवक बोला -

" मन्दिर वहीं बनाएंगे ..बाबर को नीचा दिखायेंगे ...हम राम राज्य से प्रजा का अभिषेक करते जायँगें "

उस युवक ने ठसका दिया तो दो अन्य युवक भी शकीना को चिढ़ाने के लहजे में यही जुमला दुबारा बोले ......

तभी उसी उत्तेजक दल का सरगना ऊंचे स्वर में बोला -

" ये क्या कर रहे हो ...हमारा ध्येय राम मन्दिर है न कि किसी इंसान को उकसाना या सताना ..."

तभी मुनीर ने अपनी उम्र के मुताबिक़ अपनी अम्मी से सवाल किया -

" अम्मी ये बाबल तौन था ?"

वही सरगना घुटने में बैठा और बोला-

" बेटा बाबर मेरे और तुम्हारे जैसा नही था ...हम हिन्दुस्तानी है..और वो हिन्दुस्तानी नही था !"

कुछ भड़के युवक होंठ चबा कर अपने सरगना को कोसते रहे क्यूँकि वो बाबर और मुसलमानों को एक डोर से जोड़ कर कुछ और बोलना चाहते थे ...."

" शुक्रिया भाई ...आपने बड़ा मान रखा मेरा और मेरे बच्चे का "

" मैंने नही ये जो कुछ मुझसे करवाया है राम ने करवाया है ....जय श्री राम "

सफर बीच में पहुँच चुका था ..और अयोध्या कोशों पीछे छूट गई थी ...

तभी साम्प्रदायिक उन्माद की एक लहर दौड़ी ...पुलिस की गाड़ी ने बस को रोका ...और वापस लौटने का इशारा किया .....

तभी एक भीड़ का छोटा उन्मादी टुकड़ा बस के करीब आता दिखाई दिया ....पुलिस वालों ने बस को घुमाने को कहा ...और वो खुद भी घूम कर फरार हो गये -

" भैय्या जी बस घुमाइए ...अरे ड्राईवर साहब बस घुमाइए ...मैंने कहा !"

" अरे ! पण्डित जी बैठे रहिये ...अपने ही आदमी है ...राम सेवकों का जत्था है ...क्या जय श्री राम की आवाजें नही सुन रहें आप .."

"लेकिन क्या तुम उनके हाथों में बन्दूक , जलती मशालें और धारधार हथियार नही देख रहे ....और नही देख रहे हो क्या इस बस में बैठी इस मुसलमान औरत और उसके मासूम बच्चे को ...बस घुमाइए ...सुन रहें हैं आप !

लेकिन देर हो चुकी थी ....तभी मासूम मुनीर बोला
" अम्मी डर लद लहा है ...ये लोद इतना तिल्ला त्यूँ लहें है ..अम्मी ...इनसे तहो सब दाओ यहाँ से "

शकीना के कुछ कहने से पहले ही पण्डित जी बोल पड़े ..

" माफ़ करना बेटी ...मेरी बेटी भी तुम्हारी उम्र की है ...ये हिजाब उतार दो...बच्चे की जान भी तुमसे जुड़ी है ....

" शुक्रिया पण्डित जी ! लेकिन मैं हिजाब नही उतार सकती ...जियादह क्या होगा मार देंगे ...बस अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चे को अयोध्या वापस ले जाना ...मेरे मुँह बोले भाई सुंदरलाल हैं वहाँ ...इसको उनको सौंप देना ..

पण्डित जी सजल नेत्रों से बच्चे को देखकर कुछ बोलते इससे पहले ही भीड़ बस के करीब आ गई ..

मारो . ...काटो ..ढूँढों की रट लगाते हुए वो जैसे ही बस में चढे ....पंडित जी बिजली की गति से खड़े हुए और अपने राम नाम के पीताम्बर  दुशाले से बच्चे और शकीना को ढाँक लिया ....

भीड़ ने पूरी बस खँगाली और जब वो ख़ाली हाथ उतरने लगी ... तब एक उन्मादी वापस पलटा और पण्डित जी से बोला-

" ये लोग कौन है ...?

" मेरी बेटी और मेरा नाती हैं ये ....स्वास्थ्य ठीक नही है इसलिए दिल्ली ले जा रहा हूँ "

जब उन्मादी लौट गए तब आँखों में सैलाब भरकर शकीना बोली ....

" अगर आप न होते तो ...."

उसके जुमला पूरा करने से पहले ही पंडित जी बोले ..

" मैंने कुछ भी तो नही किया जो करवाया वो सब मेरे राम ने करवाया ....बेटी ! बस विनती है कि वापस अयोध्या लौट चलो क्यूँकि राम जी भी यही चाहते हैं   ...

शकीना कुछ न बोल पाई और बस वापस अयोध्या मुड़ गई ...जैसे -जैसे अयोध्या निकट आ रहा रहा था ,, वैसे -वैसे मुनीर पुलकित और आनंदित होता जा रहा था बिलकुल वैसे ही जैसे अयोध्या लौटने पर " श्रीराम " गौरवान्वित और हर्षित हो रहे थे .....नवाज़िश
#जुनैद.........

Friday, 23 November 2018

तुझे_फिर_अवतार_लेना_होगा

#तुझे_फिर_अवतार_लेना_होगा
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हावड़ा के ब्रिज पर खड़ा वो... हुगली को अपने आँसू देता रहा ,,,,और अंत में वो हुगली में समा गया ,,,मैं दूर से आवाज देता रह गया ...मेरी चीख ब्रिज पर दौड़ती गाड़ियाँ चबा गई ...दो चार पैदल -चलते वहाँ जमा भी हो गए ...उनको यकीन था कि डूबा एक बार ऊपर जुरूर आयेगा ...लेकिन उससे  हुगली की मुहब्बत देखते ही बनती थी ...हुगली ने उसका एक बाल भी फिर दुबारा दिखने न दिया ......

मैंने कूदते देखा था उसको  ,, जब वो नीचे गिर रहा था तो एक कागज का टुकड़ा उसकी जेब से निकल कर हवा में बह गया ....और वो ही टुकड़ा अब मेरे कदमों में गिरा था ...

मैंने उस टुकड़े को उठाया ..और घूर कर देखा ....उस टुकड़े में  उसकी आत्महत्या की कोई कहानी मुझे नजर न आई ...लेकिन कुछ तो था जो मुझे उस टुकड़े से समझ में आया .....

उसमें पेन्सिल से लक्ष्मी लिखा था ...लक्ष्मी कौन थी ...? उस इंसान की मेहबूबा, पत्नी , बहन या माँ ..?

मौके पर एक सस्ती , कम जगी और इंट्रस्टलैस पुलिस टीम पहुँची...मुआयना ऊपर से ही हुआ ...वहीं पर अदालत लगी .. साहेब बहादुर ने कहा दिमागी विक्षिप्त होगा कोई ..केस तत्काल आत्महत्या का बना , एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता सिकड़ा , भ्याज लौंडा बोला कि गोताखोर तो बुलवाइए ...

साहेब धार्मिक थे...तत्काल हुगली में मुँह का गुटखा थूक कर बोले ...मैया हुगली की ग़हराई  त्रेता , द्वापर न समझ पाया इस कलजुग में हम का खपेंगे ...अब सीधे सुंदर वन डेल्टा लगेगी लाश .....

धर्म का बड़ी चालाकी से प्रयोग कर साहेब फन्ने अपने फर्ज और कर्तव्य की चिता जलाकर फरार हो गए ।

लेकिन मैं वहीं था , क्यूँकि मेरे पास कुछ काम भी तो नही था ...उसी टुकड़े को फिर दुबारा घूरा ... तो पाया लक्ष्मी के नीचे कीरत नगर लिखा था .... तुरन्त बस को हाथ दिया ...और कीरत नगर मूव किया ।

कीरत नगर बंगाल की एक अदनी  मलिन बस्ती जहाँ इंसान के साथ उसका पसीना भी गरीब होकर मरता है ...पूरी बस्ती में चारों तरफ गरीबी की कर्री बू बिखरी पड़ी थी ...और बिखरे पड़े थे कल के  गरीबी के वाहक मासूम बच्चे ...मैंने एक बू मारते बच्चे को पकड़ा और पूछा -

" क्यूँ बे ये लक्ष्मी कहाँ मिलेगी ? "

वो मेरी पैंट -शर्ट की इस्त्री , शर्ट के अंदर से आती परफ्यूम की खुशबू ..और मेरी जुबान से महकती सुबह के नाश्ते के दही -पराठे की महक से लार गिरा बैठा ....शायद दो -एक दिन का भूखा था वो ,, जिसने महज मेरे कपड़े और रंगत से मेरे अमीर होने.. यानि खूब सारे पकवान खाने वाले की एक छवि अपने दिमाग में उकेर ली और अपनी भूख को ज़िंदा करके मेरे कदमों में वार दिया .... मैंने उसे तत्काल ऐसे छोड़ा जैसे हथेली से अंगार....

उसका हुलिया  आजाद भारत का नही था .. क्यूँकि आजाद भारत में भूख या गरीबी नही होगी ऐसा मैंने किताबों में पड़ा था .....कुछ आगे बढ़ा तो एक औरत को झेरे से पानी भरते देखा -

" इस पानी का क्या करोगी ..ये तो बहुत गन्दा और बदबूदार है ! "

" साहब ! जियादह क्या होगा मर जाऊँगी न ...तो अभी कौन सी जिन्दा हूँ "

कदम फिर बढ़े तो एक मरगिल्ले ,पसली के ऊपर गोश्तगुम बीड़ी चूसते लगभग 30 की उम्र के बूढ़े से पूछा -

" क्यूँ भाई ये लक्ष्मी कौन है यहाँ ..?"

बड़ी हैरत पहनी उसने आँखों में ..खाँसा ,, झुनझुनाया ..फिर बोला -

" हर घर में लक्ष्मी है साहब ..हम कीरतवासी अपनी हर बच्ची का नाम लक्ष्मी ही रखते है जियादह... क्यूँकि इसी की जुरूरत है हमें ...लेकिन लक्ष्मी कभी इधर प्रवेश ही नही करती ..हम गन्दे हैं न ...गरीब और बेइज्जत हैं न ...मजूर , भिखमंगे हैं न इसलिए "

दिमाग सांय-सांय करने लगा ...तभी अपने जैसा एक कपड़ों से भद्र और महकाहुआ इंसान  आता दिखाई दिया .. मैं उसको कुछ बोलता इससे पहले ही वो एक मिट्टी के लिपे घर में घुसा ...मैंने कुछ देर उसके बाहर आने की प्रतीक्षा की ...उसे देर हुई तो मैं उस घर के आगे खड़ा हुआ परदा टाट का था ...तो मैंने खिड़की से झाँका ...एक मासूम 11-12 साल की लड़की को वो अपनी हवश का शिकार बना रहा था ...वो बच्ची दर्द से जमीन पर एड़िया रगड़ रही थी ,, मैं जैसे ही अंदर दाखिल होकर उस बच्ची को उस आदमखोर से बचाता ..इतने में मेरे कन्धे पर एक हाथ आ लगा ....

साहेब लक्ष्मी आज दूसरा बर्दाश्त न करेगी आप सामने वाले घर हो लो वहाँ भी एक लक्ष्मी है

" नीच.. बेगैरत .. रण्डी !
शर्म नही आती तुझे ... ऐसा बोलते हुए  ..मैं इतनी बड़ी बच्ची का बाप हूँ और तुम नीच यहाँ इन मासूम बच्चियों से धंधा करवा रही हो ! "

" ओये साहब ! साला नीच तुम लोग हो ...हम नही जाते तुमको शहर बुलाने ..तुम ही आते हो यहाँ ..सिर्फ अपने तन की प्यास बुझाने और तुझे इतना तरस आ रहा है तो ला दे दे मुझे दौलत और रोजगार ...दे ..दे रोटियाँ , कपड़े और इज्जत देख कल से ये काम न छोड़ दिया तो फिर थूक जाना मेरे मुँह पर "

लेकिन ये सब मैं कैसे दे सकता हूँ ये तो नेता देंगे या देंगे उनके अफसर जो इस देश को चलाते हैं ..जो इसी को देने के वायदे करते हैं....मन में बड़बड़ाकर आगे बढ़ा ...और इरादा कर लिया लक्ष्मी के इस जंगल में उस एक लक्ष्मी को ढूंढ़ना भूसे के ढेर में से सुई चुनने से जियादह मुश्किल है  ।

मायूस होकर पक्की सड़क की राह ली .... तभी एक घर से आवाज आई ...

" माँ ! बापू कब लौटेंगे ...माँ ! जोर की भूख लगी है ..माँ ! बापू कह रहे थे आज वो मुझे भगवान के नाम लिखना सिखायेंगे ...माँ ...माँ...बोलती क्यूँ नही...."

तभी वो बच्ची चीखी ....और मैंने पर्दा हटाकर अंदर झाँका ...उसकी बेहाल , बीमार , खस्ताहाल माँ ...एक सफेद झीनी साड़ी में जमीन पर कुछ चीथड़े बिछाकर लेटी नजर आई ...जो पेट से थी ...और दर्द और भूख से व्याकुल शायद बेहोश हो गई थी ....सामने से एक ताई दौड़कर अंदर आई उसने मुझे आँखे तैर कर देखा ..और बोली -

"साहब ! यहाँ धंधा नही होता ये कैलाश का घर है ये उसकी बीवी और ये उसकी बिटिया है ...पाँचवी पास है वो ...जूता फैक्ट्री में काम करता है ....नोट बदलवाने गया है साहब से बताओ तो पूरा हफ्ता काम करवाया और दे दिया हाथ में ख़राब नोट ....

तुरन्त जूता फैक्ट्री दौड़ा और मुंशी के गले को दाब लिया -

" क्यूँ बे हरामजादे ..पूरा हफ्ता गरीब का खून चूसता है और उसके एवज में देता है नम्बर जला नोट "

उसके आदमियों ने तबियत से कूटा मुझे ...लेकिन दर्द नही हुआ मुझे ...मैं तो बस कैलाश की बेबसी देख रहा था ...पत्नी पेट से ...उसपर कोशो भूखी ...फूल सी प्यारी बच्ची और उसके पेट में भी कुछ नही ....

एक भले गुजरते ने ...काँधे पर हाथ धरा और बोला -

" लगता है कैलाश के लिए बलवा करे हो अंदर ..अरे भैया बहुत भला और सीधा है कैलाश ...लेकिन जियादह न जी पायेगा ...ये जूते का कुँआ उसे भी कैंसर जैसी अमीर बीमारी दे गया ..."

वो कहकर चला गया लेकिन मैं ..फिर डूब गया ..कैलाश पहले मुंशी से अड़ा होगा ...उसने नौकरी से निकलने की धमकी दी होगी ...उसने फिर वो नोट हर दिशा में चलाने की जी तोड़ कोशिश की होगी ...फिर हार-थक के घर गया होगा ...उसकी बेटी ने उस नोट को रोटी की शक्ल में देखा होगा और उस रोटी में अपना नाम लिख दिया होगा ...जब आज भी वो हर ओर से हार गया होगा ...बैंक , दुकानें वैसे भी गरीब को खरीदती है उनकी गरीबी नही ..तो अपनी लाचारी अपनी बिमारी और अपनी जिम्मेदारी से हारकर उसने हुगली में ..........

वो कागज का टुकड़ा वो दो हजार का नम्बर जला नोट अब भी मेरी हथेली में है ...और आँखों में है गरीब होने का नंगा सच ....लक्ष्मी का मैं भी उपासक हूँ ....लेकिन उस लक्ष्मी से मैं क्या कहूँगा ..?कैसे उसको तसल्ली और उसका बाप लौटाऊँगा ..?  मुझे इस धर्मसंकट से और इस समूल धरा को इस गरीबी नुमा गाली से उबारने के लिए फिर तुझे अवतार लेना होगा लक्ष्मी के स्वामी ....तुझे फिर अवतार लेना होगा ....नवाजिश
#जुनैद...

Thursday, 22 November 2018

#देवता_दलन ************

#देवता_दलन
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मैंने पहली बार जिंदगी में अंग्रेजी शराब देखी ,,, और देखे अंग्रेजी बोलते लोग....
मुझे थोड़ा सा बहकना होता है तो घर में गुड़ की भेल से ताड़ी बना लेता हूँ ,,,मेरे पहाड़ी इष्ट को भी यही ताड़ी चढ़ती है ,,,

मेरा और मेरी तरह हम सब पहाड़ियों का विश्वास है कि हमारे पहाड़ी देवता हमारी रक्षा करते हैं ...तभी बचपन से लेकर आज तक मैंने कभी इन पहाड़ो के पार नही देखा ....

यहाँ शिव भी हैं ...और पांडवों के जागृत पद चिन्ह भी ...हम माँ पार्वती को नंदादेवी भी बोलते हैं ...माँ का डोला जब भी उठाता हूँ उपवास रखता हूँ ...ताड़ी ..माँस , खपेड़ हाथ भी नही लगाता ... हम देवभूमि के वो बच्चे हैं जिन्हें हमारी भूमि हमारी माँ की तरह पालती है ,,,

और हमारी माँ नही चाहती कि हम पहाड़ी कभी बिगड़े इसलिए उसने न कभी शहर के लिए यहाँ जमीन बिछाई ...न हमारे पैरों में वो जान दी कि हम कभी पर्वत लांघे .....खुश थे हम ,, जीते-मरते हुए भी दमकते थे ...अपना खान-पान अपनी संस्कृति पर हमें गर्व था ...

फिर एक दिन मैं बकरियाँ चरा रहा था ...कि तभी एक विस्फोट हुआ ...हमारा इष्ट ..हमारा देवता वो पहाड़ मोम की तरह गलने लगा ...और पहली बार उसके पिघलते ही मुझे दूसरी दुनिया और उस दुनिया के लोग दिखाई दिए ...

वो हँस रहे थे ...और हम भरभरा कर अपने देवता के मरने का शोक आँखों में लिए उसी नदी की तरह बहने लगे जिसके वेग को मेरे पहाड़ज्यू ने रोका था .. वैसे ही जैसे माँ गंगा का वेग शिव की जटाओं ने ....

सुना ये लोग ऐसे ही हमारे और देवताओं का भी वध करेंगे ...देवता भी कभी मरता है यही सवाल मैंने अपने पिताजी से किया ...और वो बोले ...देवता मरा नही अपितु हमसे रुष्ट होकर स्वर्ग चला गया ...

दरअसल वो शहरी लोग हमारी देवी , हमारी माँ इस बहती नदी की प्रकृति बदलने आये हैं ...वो इसपर कोई बाँध बनायेंगे ...ताकि शहरों में उजाला और ऊर्जा रह सके ....

लेकिन हमारा क्या ...हम तो नंगे हो गए साहब ...शहर से आती वायु एवं सोच से हम अपवित्र हो गए साहब....

पिताजी बोले ...शायद यही नियति है ....वरना हमारे देवता अवश्य इन्हें दंड देते .....

बात ठीक थी ...पूरे के पूरे हम जैसे कई गाँव जहाँ एक ओर इस बदलाव से भयाकुल थे वहीं कई घर इस बाँध से  रोजगार की मजूरी पर पलने लगे ...

मैंने हुड़का ( पहाड़ी वाद्ययंत्र ) पीट-पीट कर अपने लोगों को समझाया कि मत बहो इनके रोजगार और झाँसे में जिस दिन ये बाँध बन गया ...उस दिन के बाद ये हमें ऐसे भूल जायँगे जैसे हमारा देवता हमें भूल गया ....

समझाया मैंने उनको कि हमारी गैया -भैंस कहाँ चरेंगी ..कौन बचाएगा हमें जब इन धमाकों से खोखले मिट्टी -गारे के ये कृत्रिम पहाड़ दरकेंगे ..कौन रोकेगा फिर हमें जंगली जानवरों का निवाला बनने से ...कौन रोकेगा जब हम बहेंगे साथ इसके ......

लेकिन सब ने मुझे नकार और नजरअंदाज कर दिया ....लेकिन एक नीरू ही थी जिसको मुझपर विश्वास था ...क्यूँकि मैं उससे हृदय से प्रेम करता था , माँ नंदा की कसम ,, मेरा प्रेम उसके प्रति मेरा समर्पण भी है ...और जब उसने कहा -

" मोहना समझती हूँ तुम्हे ...लेकिन बहाव के साथ तैरकर ही प्राण और सम्मान बचता है ..सारा गाँव शहर और शहर वालों के साथ खड़ा है ...जाओ तुम भी उनको सहयोग करो ...तुम्हे मेरी सौ (कसम) !

नीरू तन और मन दोनों से बहुत सुंदर है ...16 पूरे नही हुए लेकिन बात इतनी गहरी और गठ्ठी करती है जैसे पहाड़ देवता गलने से पहले सारा ज्ञान उसको सौंप गए ....

नीरू भी मेरे साथ सुबह-शाम बाँध पर ही मजूरी करने लगी ... लेकिन बाँध जहाँ मेरे देवता लील गया वहीँ मेरा प्रेम भी हड़पने लगा ...

मैंने एक दिन नीरू को शहरी इंजीनियर की शहरी बातों में लिपटा देखा ..वो बाँध से भी बड़े सपने नीरू को दिखा रहा था ....मैंने कलाई दाब ली नीरू ली ...और उसे कड़ा पाषाण बनकर समझाया कि ये सब स्वांग है नीरू ...ये मात्र तुम्हारे तन का उपभोग करना चाहता है ...लेकिन नीरू नामक  कोमल कच्चा पत्ता अब प्रेम बहाव को समर्पित था ,,, नीरू ने पहली बार मुझे रागनी से चण्डी बनकर देखा और मैं समझ गया उसके मन में मेरे लिए सिर्फ वात्सल्य और सम्मान था प्रेम तो हरगिज नही ।।।।।

शाम ढ़ले नीरू को इकलौती पहाड़ी से नीचे शहरी इंजीनियर के कैम्प की ओर उतरते देखा ..और मैं समझ गया कि नीरू इस शहरी प्रेम के पाषाण को आज ग्राम का निर्मल जल समर्पित कर देने हेतु चल पड़ी है .....

जब देर तलक नीरू नही लौटी तो मैं भी पहाड़ी उतरा ..लेकिन तब तक नीरू देह पर विश्वास का जुआ खेल चुकी थी .....

मेरे लिए मेरा सर्वस्व आज समाप्त हो चुका था ,,, पहाड़ देवता क्या रूठे मेरा भाग्य और विधेय रूठ गया ...मासूम , भोली नीरू उस कच्ची उम्र में शहर की भड़कीली कहानियों और स्वप्नों में अपने गाँव का कौमार्य लुटा चुकी थी ...

कहते हैं कि धर्मराज ने मय भ्राताओं और भार्या के इसी गुफा में  शरण ली थी , ताकि कौरवों की नयन ज्योत उन्हें न ढूंढ पाये ....आज मैं उसी गुफा में विलीन होना चाहता हूँ ताकि अब शहर मेरा और कुछ न लूटे .....

एक धमाका और हुआ और मेरा इकलौता देवता भी धरती पर भर- भर करके बिछ गया ...उस दिन मेरे अश्रु अन्य देवताओं की मृत्यु की अपेक्षा अपने इस देवता की मृत्यु पर अधिक गिरे क्यूँकि यही इकलौता देवता था ....जो मेरे परिवार को पालता था ...इसी पर नाली दार खेत थे हमारे ..सरसों , लाई , पालक , मेथी , मक्का , गेंहूँ , चावल.. चारा यही हमको देता था ...इसपर ही मेरे बैल कुलेल करते थे ..बकरियाँ ममियाती थी ..गैया -भैंस जुगाली करते थे ...वो पानी का सोता ( भूमिगत जल का सतही मुहाना )भी भूमि में ही विलीन हो गया है .. और साथ ही साथ इसमें वो पीपल का पेड़ भी था जिसमें हमारे कुल का एक छोटा सा मन्दिर भी था ....और वो बुराँश का पेड़ भी जिसपर मैंने अपना और नीरू का नाम लिखा था ......

आज बाँध बन गया है ...बहुत सारी गाड़िया , हेलीकॉप्टर , नेता , सन्तरी , मंत्री पहुँचने लगे हैं ....शहर के लिये बिजली भी निकल चुकी है ... लेकिन हमारे घरों में अब भी मिट्टी के दीये और कुप्पी ही जल रही है ....

धीरे -धीरे सब कुछ लौटने लगा है ....अब बाँध पर चहल-पहल नही है....लोग फिर बेरोजगार हो चुके हैं... क्यूँकि अब न खेत बचे हैं ,,न मवेशी ....पहाड़ी लोग भी रोटी की मजबूरी के कारण.. लौटती शहरी गाड़ियों के पीछे अपने बचपन , अपने संस्कारों और अपने देवताओं को पीठ दिखाकर शहरी होने निकल पड़े हैं ....गांव के गांव पलायन से सूने हो गयें हैं ..... अब या तो मैं हूँ या मेरा निर्जन मन या फिर घर के आंगन में पंजों के बल उचक-उचक कर एक आस एक उम्मीद से शहर से आते रास्ते पर टकटकी लगाये दो और जानें .....एक नीरू और एक उसके पेट में पलता उसका गर्भ .....

" माँ नंदा ...ये देखकर निश्चय ही अश्रु नही रोक पाई ...और झमाझम वर्षा होने लगी ...जो शहर से आते और शहर को जाते हर पदचिन्हों को धोने और मिटाने लगी .....नवाज़िश
#जुनैद............