Thursday, 25 April 2019

8 PM

#8_पी_एम
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" छोड़ यार ! हम साले आम आदमी होते ही कीड़े हैं...ले पैग मार ...अबे क्या देखता है भाई ..कच्ची नही है भाई ...8 पी.एम है "

इतनी पिला दी रघु ने कि सुबह 5 का अलार्म बजता रहा फिर भी मेरी आँख नही खुली ..... 10 बज चुके हैं सुबह के ...लेकिन सर दर्द के मारे फटा जा रहा है ....लोग कहते हैं कि शराब की खुमारी का तोड़ शराब ...लेकिन ऐसा शराबी नही हूँ मैं.. कि सुबह से ही पीना शुरू कर दूँ ...मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कल शराब को हाथ लगाया ....और आज खुद पर शर्म आ रही है .....

कि बीवी की चिता फूँक कर कोई शराब पीता है क्या ...और वो बीवी जिससे पूरे 10 साल लम्बी मुहब्बत के बाद मैंने शादी की .....

वैसे तो लमसम सब कल ही खत्म हो चुका है मेरा ...माँ मुझे पैदा करते ही स्वर्ग सिधार गई थी...और बाबा गाँव में रहते हैं....

सरपंच थे बाबा लेकिन ..मीना से शादी करते ही ...बाबा फिर कुछ भी नही रहे ...मीना छोटी जाति से थी ...मैं इस जात-पात को नही मानता  लेकिन ..मेरे मानने से क्या होता है ...पूरा देश इस धर्म-मजहब ..जात-पात वगैरह के इंजन से ही चलता है ....

मैं क्या जानूँ देश -परदेश ...लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ कि बाबा फिर पूरे गाँव में कभी अपनी मूँछ और छाती ऊंची न कर पाये .... त्याग दिया बाबा ने मुझे ....उन्हें ये गम नही कि सरपंची हाथ से गई उन्हें ये जिंदगी भर का अफ़सोस रहा कि मैंने उनसे झूठ बोला -

हाँ,, मैंने अपनी जिंदगी में कभी झूठ नही बोला .. लेकिन एक बार बाबा से बोला था कि जब उन्होंने पूछा था ...

" क्यूँ आनन्द ..ये रौशन लाल की बेटी से क्या कोई प्रेम -सम्बन्ध है तुम्हारा ...?"

" न.. बाबा ..न ... बस पुस्तकें माँगने आई थी ..और गाँव वालों ने बात पकड़ के मचान बना दिया ..."

" स्वयं से अधिक विश्वास रखते हैं तुमपर आनन्द ...और जानते हैं कि तुम कभी झूठ नही बोल सकते ..."

कौन से युग में जी रहे थे बाबा ... बाबा को कैसे कहूँ कि ये त्रेता युग नही ...और अगर होता भी तो क्या ...क्यूँकि उस युग में भी सच सिर्फ " राम "ही बोलते थे ...या कोई भले साधू-सन्त !

बाबा राम  हैं मेरे ...लेकिन उन्होंने समझना था कि इस दुनिया में अब सच का कोई मोल नही जबकि सच ये है कि ...जो जितना झूठा वो साला उतना ऊँचा ....

बी .कॉम किया था शहर से ...लेकिन गाँव को कभी नही भूला मीना की याद हमेशा कलेजे में ज़िंदा रही ..होली के अगले दिन ही उसे भगा कर शहर ले आया ...और यहीं के एक मन्दिर में उससे विवाह रचाया ...बाबा को बहुत फोन किया ..चिट्ठी लिखी लेकिन  कभी उन्होंने जवाब नही दिया ...

सिर्फ एक बार बोले कि -

" तुम मेरे रक्त का अंश नही हो सकते आनन्द क्यूँकि मेरा रक्त दरिद्र हो सकता है झूठा तो कदापि नही "

निकाल दी गाँव की यादें मन से ...लेकिन बाबा की याद कभी न निकली ...दीवार पर बाबा की तस्वीर में मुझे मेरा भगवान नजर आता है ....

मीना भी रोज ईश्वर को हाथ जोड़ने से पूर्व बाबा को नमन करती थी ...एक प्राइवेट कम्पनी में अकॉउंटेंट की नौकरी कर ली ...जिंदगी आराम से गुजर रही थी ..हाँलाकि सैलेरी अधिक नही थी लेकिन दाल- रोटी हँसी -ख़ुशी चल जाती थी ...

सोचते -सोचते ध्यान बंटा ...मैनें खिड़की से नीचे झाँककर देखा ...एक नेता जय जयकार के रेले के साथ चुनावी रैली लिए आगे बढ़ रहा था ....

मैंने मुट्ठियाँ भींच ली ...और सीधे सीढ़ियों से नीचे उतरा ...रास्ता बनाया और नेता की गाड़ी में चढ़कर उसके गाल पर एक करारा थप्पड़ जड़ा ....

एक मिनट की चुप्पी के बाद ...सिर्फ एक थप्पड़ के बदले ..मुझे अनगिनत जूते ..लात ..और घूँसे मिले ...और बेहोशी के बाद आँख खुली ..सरकारी अस्पताल में ....जहाँ एक टी.वी मद्धम आवाज में चल रहा था ...
मेरे थप्पड़ को नेता ने विपक्ष की साजिश करार दिया ..उसने मुझे किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता भी बता दिया ...फिर अचानक मीडिया के माइक मेरे मुँह के आगे नाचने लगे ....

मैं उनसे कहता रहा कि हटाओं इन सब को ..मेरे बाबा कहीं इस हालत में मुझे टी .वी में न देख लें ...लेकिन उनको टी.आर.पी और नम्बर बढ़ाने थे ....तभी उन्हें एक फटकार लगाई डॉक्टर सलीम ने ....

" शर्म आनी चाहिये आपको ...पेसेंट के जबड़े पूरी तरह से टूट चुके हैं ...फिर भी आप लोग ये ...छी ..बाहर निकलिये  सब "

झूठ बोला था डॉक्टर साहब ने लेकिन शायद मेरी मजबूरी को समझते हुए ....उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरा और बोले -

" आखिर क्यूँ किया तुमने ये ...?"

" इसलिए डॉक्टर साहब कि इन नेताओं की भीड़ ..चुनावी रैलियों ने मेरी बीवी और बच्चे को मुझसे छीन लिया ... किसने हक दिया इनको की अपने स्वार्थ और सत्ता के लिए ये आम आदमी की जिंदगी को नर्क बना दे ..मेरी गर्भवती बीवी उस दिन एम्बुलैंस में थी डॉक्टर साहब...वो एम्बुलैंस जो किसी नेता की चुनावी रैली में फँसी हुई थी ...एड़िया रगड़ रही थी वो और हाथ जोड़ रहा था मैं इनसे ...कि मेरी बीवी मेरा बच्चा मर जायेगा ...लेकिन किसी ने मेरी एक न सुनी ....मेरी बीवी और मेरा बच्चा न रहा और......."

डॉक्टर साहब ने दिलाशा दिया ...और वो चले गए ..लेकिन फिर बगल में लेटा एक पेसेंट हँसा और बोला -

" अबे नामर्द है तू ... तुझसे रत्ती भर भी हमदर्दी नही मुझे ... तू क्या सोचता है एक थप्पड़ मार कर तूने अपनी बीवी और बच्चे का बदला ले लिया ...सोच न जाने कितने इंसान आये दिन इस राजनीति की भेंट चढ़ते हैं ..न जाने कितनी सुहागनें विधवा होती हैं ..न जाने कितने बच्चे अनाथ होते हैं और कितने तेरी तरह रंडवे ..."

" कौन हो तुम "

" अनिल दास गुप्ता ...6 या 7 दिन में मर जाऊँगा कैंसर की आखरी स्टेज पर मौत से लड़ रहा हूँ ..तेरी तरह आंसू नही बहा रहा ...अगर तुझे वाकई अपने बीवी और बच्चों की जिंदगी का बदला लेना है तो बदल दे ये निजाम ...बदल ले ये राजनीति का ये नंगा नाच ..बदल दे ये दस्तूर कि नेता रैलियों ,,हंगामे ..झूठ और भाषणों से नही बल्कि अपने काम से उस सिंहासन पर बैठेगा जहाँ उसकी ......"

और वो व्यक्ति खाँसने लगा ..उसके मुँह से लगातार ब्लड गिरने लगा ...लेकिन मेरे ब्लड में न जाने क्यूँ एक उबाल आ गया .... हाँलाकि उसका एक -एक लफ्ज सच्चा और पवित्र था लेकिन जब उसने "झूठ" शब्द कहा तो लगा कि बीवी ..बच्चों का ही नही बाबा का कर्ज भी उतारना है मुझे .....

ठीक होते ही मैंने ...हर गली ..हर मुहल्ले पर जाकर चिल्ला -चिल्ला कर उस व्यक्ति के नजरिये को अपनी जुबान दी ...मैंने बताया कि नेता का मतलब मालिक या रसूख नही होता ...बताया सड़के और जुबान साफ़ चाहिये ..सिर्फ विकास और पूरा आकाश चाहिये .........

आज पूरा एक दशक  लग गया अपने देश की जनता को समझाने में ...आज सड़के खुली हैं ..आज सिर्फ काम के नाम पर जनता वोट देती है ...आज किसी नेता की मजाल नही कि वो झूठ बोल सके ...कोई भड़काऊ बात बोल सके ..कोई जात-पात या धर्म-मजहब के नाम पर देश की जनता को बाँट सके ....बाबा आज मुझपर फक्र करते है...और आज ही गॉंव से मुझसे मिलने आने वाले हैं ....मुझसे कोई भी कभी भी मिल सकता है ..देश की जनता के पैसे का सदुपयोग कुछ इस तरह से हुआ कि देश की हर गली , हर गाँव में कैमरे और वीडियो स्क्रीन लगी है ...जनता हर रोज मुझसे मुखातिब होती है बल्कि हमेशा मुझसे जुड़ी रहती है ...क्यूँकि मेरे ऑफिस  में भी एक ऑडियो-वीडियो कैमरा लगा है ...जिससे जनता जान सके कि उनका " प्रधानमन्त्री " क्या करता है ..किससे मिलता है ...और क्या बाते करता है ..बस देश की सुरक्षा से सम्बंधित कुछ बातें गोपनीय रखी जाती है .....तभी इंटरकॉम बजता है

" सर आपके पिताजी आ चुके हैं ...."

बाबा अंदर आये और मुझे देश की कमान संभालते हुए देख कर आँखों से आँसू छलका कर जैसे ही कुछ बोलते ...तभी इंटरकॉम फिर बजता है -

" सर आपके मित्र श्री रघुनाथ आपसे मिलने आयें हैं ...सर तलाशी ?.."

" रहने दो उन्हें अंदर भेजो "

दरवाजा खुला ...और रघु मुझे देखते ही मेरे गले लग गया और बोला -

" देखा भाई ..अपुन बोलता था न कि एक दिन तू कुछ बड़ा करेगा ... चल भाई आज फिर एक पार्टी बनती है ..... ये देख क्या लाया हूँ ....अबे भाई कच्ची नही है 8 पी.एम है ..8 पी .एम "

जनता स्क्रीन पर पी .एम ऑफिस में 8 पी.एम  देख रही थी .. पिताजी मुझे और मैं दाँत पीसकर रघु को .............

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

Wednesday, 24 April 2019

मुरली सिन्हा

#मुल्ली
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" हा हा हा ...अबे का जेंडर और धर्म दोनों चेंज करवा लिए ....?"

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" तीनों चेंज कर दो भईया वो क्या है ...जरा कान इध..र कीजियेगा .... " वो क्या है ..लेडीज वाली  र..ख दी आपने "

सेल्समैन मुस्कुराया और बोला -

" बुरा मत मानना भाई जी ....कुँवारे हो या रंडवे ..?"

" ते..रा बहनोई हूँ ..... अबे  बदल कर हमा..रे नाप के जांघिये दो ! "

उसकी जुबान तो बन्द हो गई ...लेकिन ये जुबान भी बड़ी कमीनी चीज है ..सब ने इसे इज्जत दिलाते ..जिल्लत दिलाते तो सुना होगा ...लेकिन मैंने इसे एक इंसान को पल -पल मारते देखा है ....

बीवी का असली नाम मीरा है मेरी ..लेकिन उसे एक लम्बे वक्त तलक   मीरा नही कह पाया..बल्कि अकेले में जान और सबके सामने पिंकी जो उसके घर का नाम है वही बोलता था ,,

मीरा ...जिसने कृष्ण के लिए सिर्फ एक बार जहर का प्याला पीया ..लेकिन मेरी पत्नी ने शादी के बाद कई दिनों तलक जहर का कनिस्तर पीया है ......

माता-पिता का इकलौता बेटा ...पिता हार्ट अटैक से निपट लिए और माँ कुछ निपटाने के लायक न रही ..दमा  है उनको और वो भी इंजेक्शन से कण्ट्रोल होने वाला ....

आत्मविश्वास क्या होता है ..मुझे मेरी बीवी ने बताया ..वरना बीवी से पहले पूरे 32 साल इसके बिना काट दिए ....

मन लगता था  पढाई में मेरा , बहुत पसंद आती थी किताबें मुझे ...रंगीन सफों वाली ...कोयल, बुलबुल ..शेर ...तितली परी वाली ...लेकिन इनसे वैसा जाती रिश्ता नही जुड़ा जैसा एक आम बच्चे का इनसे गहरा नाता होता है ....

एम. ए हिंदी साहित्य से हूँ ..लेकिन पूरी एजुकेशन प्राइवेट ....

प्राइवेट कम्पनी में ही जॉब करता हूँ अब ...लेकिन कभी जब गुजरा वक्त याद आता है तो जहाँ समाज से नफरत गहरी होती जाती है वहीँ अपनी बीवी से मुहब्बत गहरी  और गहरी होती जाती है .....

बीवी यानी मीरा .. माँ को हस्पताल लेकर गया था ...और देखा एक आदमी खून से लथपथ एम्बुलैंस से उतारा गया ...सड़क दुर्घटना में जबरदस्त चोटें आई थी उसको ...मुझे नही लगता था वो बचेगा ...... उसे बी निगेटिव खून की जरूरत थी ...और अस्पताल के ब्लड बैंक में खून नही था ... स्टाफ ने एक जनरल एनॉउन्स भी किया लेकिन ...कोई भी खूनदार आगे न आया ...

मेरी नसों में भी बी निगेटिव दौड़ता है ... और मैंने खून देकर उस शख्स की जान बचा ली ...लेकिन जब खून दे रहा था तो एक मासूम  सी लड़की ...जो जवान थी ...मुझे एकटक घूर कर देख रही थी और रो भी रही थी .....

" आपने पापा को खून दिया ..थैंक्स सर ..."

" मैंने आज तक किसी को कुछ नही दिया बल्कि जो मुझे दिया समाज ने दिया ...भूल जाइये मैंने किसी पर कुछ एहसान किया "

वो लड़की मुझे घूरती रही और बड़ी हैरत से ...फिर वो मुझसे टकराई एक ट्रैफिक की भीड़ में ...

" हैलो सर ..याद आया ...पिंकी ...वो उस दिन आपने पापा को खून..."

" ओ हाँ ..कैसी हैं आप ?"

ट्रैफिक हवलदार ...सीटी बजाता रहा लेकिन हम एक दूसरे को ही देखते रहे ...ट्रैफिक तो जैम हो गया ...लेकिन हमारे दिल में मुहब्बत ओवर फ्लो में बाहर कूदने लगी ....

चालान हुआ और फटकार मिली ...लेकिन अब पिंकी मुझसे हर रोज मिलने लगी ...और मुलाकातों ने एक रिश्ते की शक्ल इख्तियार कर ली ....

कुछ भी नही छिपा था ..मीरा से ..और सब कुछ जानने के बाद भी मीरा ने किसी की परवाह नही की ....

शादी को दो ही दिन बीते थे ...और मीरा को लेकर उसके मायके जा रहा था कि तभी मेरा फोन बजा -

" हैलो सर ..मुबारक हो आपने जीते हैं पूरे ..दो लाख रूपये ...कृपया अपना नाम और नम्बर कन्फर्म कराइये ..."

" हें ..हें ..हें ..जी मेरा नाम है " मुल्ली सिन्हा ""

" क्या ...?"

" जी .. मुल्ली ...मुल्ली सिन्हा "

" हा हा हा ..अबे क्या जेंडर और धर्म दोनों चेंज करवा लिए ...सॉरी ये ऑफ़र छक्कों के लिए नही है ...."

ठहाका फिर गूँजा ..लेकिन इस बार वो अकेला नही था ...ठहाकों की एक पूरी जमात मुझे न सिर्फ सुनाई दी बल्कि दिखाई भी दी ...

ये शरारत मेरे मुहल्ले के उन लड़कों की थी ..जिन्होंने मुझे कभी ..इंसान होने का बोध नही होने दिया ...स्कूल से लेकर जिंदगी के उस हर एक एहम कदम पर इन्होंने मेरा मजाक उड़ाया जब मुझे थोड़ी सी भी ख़ुशी मिली ...इनकी ही वजह से मैंने स्कूल छोड़ा ..कॉलेज छोड़ा ...और शायद अब ये मुहल्ला भी छोड़ना पड़े

गड़ रहा था मैं जमीन पर और दिन तो जहर का घूँट पीकर सब अनदेखा कर आगे बढ़ जाता था ..लेकिन  ...नई -नवेली ब्याहता के साथ .....

उस दिन मीरा ने मायके जाने को मना कर दिया ...और वापस घर पहुँचकर

" क्या हुआ पिंकी ..."

" कुछ नही ... मुझे अफ़सोस  है कि मैं एक कायर और बुजदिल की बीवी हूँ "

" पिंकी उन गुंडों के मुँह कौन लगेगा ..."

" मैं उनके मुँह लगने और उनसे झगड़ने को नही बोल रही हूँ ...बल्कि आपकी आत्मविश्वास विहीन जिंदगी पर मुझे आपके लिए ये शब्द सूझे "

" मतलब ..?"

" मतलब ये कि ...मैं जानती हूँ कि आप बचपन से" र " का उच्चारण नही कर पाते ..और उसकी जगह " ल "बोलतें हैं ....लेकिन क्या आपने कभी कोशिश की..कि आप अपनी कमजोरी पर आँसू बहाने से बेहतर उसको दूर करने में साहस दिखाये ..... ये समाज और दुनिया उसी की मदद और इज्जत करती है मिस्टर मुरली ...जो अपनी मदद खुद करे और अपनी इज्जत भी खुद करवाये ..."

उसके बाद पिंकी ने कमर पर साड़ी का पल्लू ठूंसा और बोली ...

" मेरा नाम लो !"

" मीला "

उस पल के बाद ...मीरा ने ठान लिया कि मेरी तोतली जुबान पर  चढ़ा " ल ".." र " बनकर फूटेगा ... उसने मुझे निर्देश दिए कि अब जो वो कहेगी मुझे वो ही करना होगा ...

मिरर स्पीच... " र" नाम सम्मिलित अनेकों नाम ...किसी की बात से विचलित नही होना ...ऑफिस जाते और घर आते वक्त  साइन बोर्ड और शॉप होर्डिंग पढ़ना ..और वो सब कुछ जिसमें " र" नजर आये ....आदि ..आदि

खैर फिर जादू हुआ ...अटक के ही सही पर " र" अब " ल" नही और मैं अब " मुल्ली " नही ...

उस दिन जब मीरा के साथ सिनेमा देखने जा रहा था तभी फोन फिर बजा -

" भईया आपके घर पर आग लग गई है ....आप जल्दी आ जाइए ..."

" जी आप कौन "

   आग की खबर देने वाला बोला -

" वो ..वो..आप कौन बोल रहें है "

" जी मुल्ली ....मुल्ली सिन्हा "

फिर ठहाके सुनाई दिए ...और मीरा ने अपने माथे पर हाथ रख लिया ...लेकिन फिर मैंने फोन को पुनः कान पर लगाया और बोला -

" भईया मैं मुल्ली ..मुल्ली सिन्हा बोल रहा हूँ...शायद आपने फोन " मुर..ली सिन्हा " को लगाया होगा ..."

फोन डिस्कनेक्ट ..लाफिंग क्लोज  ....एन्ड

" चलो मीर..आ  ...हम लेट हो रहे हैं "

और इस बार ठहाका फिर सुनाई दिया लेकिन वो ठहाका जनानी का था ...मीरा बहुत खूबसूरत हँसती है ...पता है लेकिन इतना खुबसूरत ...खैर अब न कोई फोन आता है न कोई फिकरा ....

कभी -कभी मीरा को छेड़ने के लिए ' मीरा ' को ' मीला 'बोल देता हूँ ताकि मेरी जिंदगी हँसे और मैं उसे हँसता देख जीता रहूँ बस जीता रहूँ ....

लेकिन आज आत्मविश्वास का मतलब भी समझ में आ गया ...ये उस शक्ति और ऊर्जा का वो चरम पर्याय है जो नामुमकिन कार्यों को भी पूर्ण करवा देने का एकमात्र शस्त्र एकमात्र उपाय और एकमात्र रास्ता है ....

" मैं मुरली सिन्हा अपील करता हूँ उन लोगों से जो किसी भी प्रकार के व्यसन ..व्याधियों ..असन्तुलन .असमंजस, पराजय और परीक्षाओं के आगे अपने सबसे कारगर अस्त्र और मित्र की उपेक्षा कर उसको जंग खाने दे रहें हैं...  मैं कहता हूँ एक बार खुद पर पुनः नये सिरे से विश्वास करें ताकि आपका आत्मविश्वास धीरे -धीरे आपके मार्ग की बाधाओं को उसी प्रकार खाये जैसे चिता देह को और कब्र शरीर को खाती है ...."

" आया मीर..आ.... "

मीर..आ बुला रही है शुभ रात्रि ..फिर मिलते हैं

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

Monday, 22 April 2019

#वतनपरस्त_पतंगबाज ~~~~~~~~~~~~~ " सलीमा देखियो... ये तुम्हारा ही लौंडा है न ?" लौंडेपन से खतरनाक पतंगबाज रहा हूँ ..मतलब जिस छत पर माल खड़ा दिखे ..गोता उधर ही टेकता हूँ.... पतंग तिरंगा ..सद्दी नागिन मार ..और नेवला छाप सूता हुआ माँझा .. मुहल्ले की ऐसी कोई लौंडिया नही जिसका बाप मेरे घर आकर मेरे बाप की लोई न उतार गया हो ...अंदर खाने तो ये भी उधम कूटता हूँ कि मुहल्ले की कंटाप लुगाइयों पर भी एक झाँप की नजर ढीली छोड़ी है मैंने .... बस प्यार न हुआ मुझे ...घंटा होता भी कैसे ..जैसे ही सोचता हूँ ..फँसी से ख़ुशी -ख़ुशी प्यार कर लूँ ...उसी बकत दूसरी उससे हाई जम्पर माल दिख जाती है और प्यार ट्रान्सफर हो जाता है ,,,,, ट्रान्सफर से याद आया मेरे अब्बा का बाई पास हो गया है बोले तो दिल का ...इसलिए अब हुक्का और गुस्सा भी कम फूँकते हैं .... धंधा सीधा टिका है अपना फंदे में .. मतलब दो बड़े भाई और राइज मिल के तीन हिस्से ...वो खर्चा दे देते हैं और मैं क्या सिंदबाद का बहनोई हूँ जो फोकट के खर्चे के बाद राइज मिल में अपना लंगर डालूँ ... पूरा दिन सिटियाबाजी ..औरतबाजी ..लौंडियाबाजी और पतंगबाजी के नाम ...कभी -कभी स्मार्ट फोन में नंगी औरतें भी देख लेता हूँ .. देखने से याद आया मेरा बाप मेरी शक्ल देखना पसंद नही करता ..उसके पास दो पिचहत्तर की गाली हैं मेरे लिए ...हारमखोर और सिर्फ हरामखोर .... मैं सोचता हूँ ..अगले अटैक तक झेल लो...क्यूँकि अगला वाला सीधे एक खींच में अब्बा की पतंग काट देगा .... मेरे बाप ने आखरी बार मेरे ऊपर फक्र कब किया था ..पता नही ...लेकिन अम्मी तो अक्सर कहती है कि वो मुझ पर फक्र करती है ...जानता हूँ वो झूठ बोलती है ..मेरा दिल रखती है लेकिन चलो कोई तो है जिसकी वजह से घर लौटने का दिल करता है .. मेरा बाप मुझे कभी अपनी औलाद कह कर नही पुकारता ..बल्कि कहता है सलीमा का लौंडा ...सलीमा मेरी अम्मी का नाम है ...। जैसे ही रात को खाने में हाथ डालता हूँ ..बाप , साँप की तरह डंक मारने लगता है ....अम्मी अक्सर समझाती है कि काम में दिल लगा अपने भाइयों के साथ वरना भाइयों की शादी के बाद ये तेरा खर्चा -पानी भी बन्द हो जाएगा ...और रो देती है ....बस यही चीज हैं जहाँ मेरा मन भारी होने लगता है ...नही तो रोज मुहल्ले की और हर घड़ी बाप की सुनने के बाद भी मेरा बाल टेढ़ा नही होता ..... हुआ वही जो अम्मी ने कहा था ...भाइयों की शादी हो गई ...और 15 दिनों में ही लंगोट के कच्चे खसम ...लुगाईयों की सलवार का नाड़ा बन गए .... खर्चा बन्द करने से पहले बोले ..काम में हाथ बंटा नही तो एक ढेला भी नही देंगे अब .... सोचा माँ की बकूँ लेकिन अम्मी से बेशुमार मुहब्बत के चलते बाप की बकी साले बेशर्मों को .... और बोल दिया ..कि अब तुमसे खर्चा मांगें मेरा लोटा -लस्सन .... तड़ी में तो बोल दिया लेकिन फिर फट गई कि खर्चा आयेगा कहाँ से फिर ... कमला पसन्द की पन्द्रह पुड़ी ..दो डब्बे सिगरेट .. और चाय पानी ..सूतम -सूत अलग !!!!! अम्मी से खर्चा माँगना जेबा नही दिया ...ये उम्र तो उसको देने की है .... दोस्त यार भी कटने लगे ..और कर्जदार सर पर चढ़ने लगे .... जब हालत बिलकुल मजनू के फ़टे निक्कर सी होने लगी ...तो सोचा शहर छोड़ दूँ ...वगरना जिसने मेरी रईशी की अय्याशी देख अपनी सुलगाई वो आज मेरी हालत देखेगा तो मेरी जला देगा ,,, दिल्ली, दिलवालों की.. सुना यहाँ काम और हराम दोनों की पूछ है .... हफ्ता तो गले की बारीक गोल्डन चैन से निपटा लिया लेकिन अब कुछ करना था वरना सुना तो ये भी है कि दिल्ली बड़े-बड़े रुस्तम भी निगल गई .... जिंदगी में खुदा को कभी याद नही किया ...क्यूँकि मुसीबत या तंगी कभी छू कर नही गुजरी ...लेकिन आज खुदा कस कर याद आया ...जब भूखी पेट की आँतें मेरा पेट ही खाने लगी .... तभी एक शादी के पंडाल पर नजर गिरी ...और तय हुआ कि प्लेट साफ़ करने के एवज में खाना और ऊपर से पाँच सौ रूपये नकद .... आज एक -एक प्लेट की चिकनाई उतारते वक्त पता चला कि जिस पैसे को मैं यूँ ही फूँक देता था उसे कमाना कितना मुश्किल है ....खैर काम खत्म होते ही जब मुझे मेरी जिंदगी की पहली मेहनत की कमाई मिली ..मेरी आँख में आँसू आ गए ...और अम्मी तेज याद आई ..सोचा दौड़ के उसके पास जाऊँ और कहूँ उससे कि ले अम्मी मेरी मेहनत का पहला तोहफा ...लेकिन ये तो घर का एक तरफ का किराया भी नही था ... रात आसमान के मीठे सितारे चुगते हुए कट गई ...और सुबह मैंने फिर काम की तलाश शुरू की ...न चाहते हुए भी एक बदलाव मेरे अंदर करवट ले रहा था .... मैं एक बंगले में पहुँचा किसी आर्मी रिटायर्ड का बंगला था सुना उसे एक ड्राईवर की जरूरत थी ...गेट कीपर ने अंदर फोन कर कुछ बात की और फिर मैं अंदर गया ... घर का बड़ा सा दरवाजा खुला था ..और मैंने अंदर कदम रखा ..पूरा घर जैसे किस्से -कहानियों का जंतर लग रहा था ...तभी ऊपर से एक कड़ी आवाज आई .... " नही मेजर ऐसा नही हो सकता आई एम् कमिंग " वो कर्रे बुजुर्ग सीढ़ियों से नीचे उतरे और मुझे देखा ...मैंने उनकी शक्ल पर रौब देख एक साँस में दुम अंदर डाल सारा माजरा बयाँ किया ....फिर वो कड़ककर बोले - " बाद में आना अभी मैं अपने बेटे की डेथ बॉडी लेने काश्मीर जा रहा हूँ " लोटा -लस्सन मुझे उसके बेटे से क्या लेना ...तभी वो बोले ..आज कोहरे की वजह से प्लैन और ट्रेन नही चल रहे ...ड्राइव कर सकते हो कश्मीर तक .... कश्मीर ..बोले तो ..जमीन में जन्नत ..बोले तो लाल चिनारों गालों वाली लौंडियाएँ .... " बिलकुल सर ..." खैर ड्राइव की ..और बुड्ढे की शक्ल देखकर एक भी हो -हल्ला वाला गाना न रौंद पाया .... " सॉरी सर ! लेकिन आपके अपने बेटे मर गये है और आपके चेहरे पर एक भी सिकन नही ..?" " यू.. ...जो देश के लिए जान देता है ..वो शहीद कहलाता है ...और जिसका बेटा शहीद होता है वो उसकी शहादत पर फक्र करता है ..न कि आँसू बहाता है ' मुझे लगा बॉर्डर फ़िल्म का ऑडियो सुन रहा हूँ ...खैर काश्मीर पहुँचे ...और वाकई में कर्नल का बेटा शहीद हो चुका था ...उस छोटी सी सैनिक छावनी में कर्नल अपने बेटे की लाश को निहार रहा था तभी एक एक मोर्टार छावनी में गिरा ...और एक जख्मी जवान भागते हुए करीब आया ... " सर ..सर ..वो ..पाकिस्तानी दहशतगर्द ...हमारी प्लाटून की कॉनवोइ में हमला करने आगे बढ़ रहें है ... सर सारे सेटेलाइट फोन ..मोबाईल फोन और वायरलैस फोन उन्होंने जैम कर दिये हैं ..सर उनके पास एक पूरा मिनी ट्रक आर .डी एक्स है ." और उस जवान ने जान दे दी .....पहाड़ी के दूसरी जानिब श्रीनगर शहर था .. सेना और शहरी दोनों की जान खतरे में थी ..छावनी में अफरा-तफरी मच गई ...कुछ जवान दौड़े भी लेकिन बीच पहाड़ी के उस तरफ पहुँचने में उनके कदम हार जाते ....अब एक ही तरीका था ...और वो था हवाई मार्गे लेकिन छावनी में न कोई हेलीकॉप्टर था ...न कोई मिनी जेट ....जब सब मायूस होकर बैठ गए तो मैंने दौड़कर ...छावनी को खंगाला ..... मुझे वो मिल चुका था जिसकी मुझे तलाश थी ..मैंने कोई 10 मिनट लिए और साहब से बोला - " साहब आप बस इसमें वो लिख दीजिये जिससे जवानों को पता चल जाए कि उनके पीछे मौत दौड़ रही है ..." " क्या बकवाश कर रहे हो ..ये पन्नी की पतंग ?" " साहब यकीन करो ...अपने मुहल्ले का नामी पतंगबाज हूँ ..हवा चाहे कोई भी जिद बना ले ...लेकिन आसमान में पतंग मेरी मर्जी से उड़ती और डूबती है " न उम्मीद थे सब इसलिए इसे एक बचकानी उम्मीद मान कर मेजर ने एक खत उस पतंग संग बाँध दिया और अब बारी मेरी थी ...मोम का भारी धागा और स्टेपलर की पिनों से जुड़ीं ये पतंग अब कई जानें बचाने निकलने वाली थी .... पहली बार किसी काम को अंजाम देने से पहले बिस्मिलाह पढ़ा और जैसे ही पतंग ने जमीन से उठना शुरू किया ...पूरी छावनी में हर -हर महादेव ,, जय माता दी की आवाजें गूँजने लगी ...मोम का खींचा धागा मेरे हाथ छीलने लगा लेकिन मेरी नजर पतंग और उसकी पिनों पर टिकी थी ...जैसे ही मुझे जवानों की कॉंनवोई नजर आई ....वैसे ही मैंने पतंग को गोता दिया और वो जाकर चिपकी सबसे आगे चलती गाड़ी के शीशे पर .....और फिर दहशत का ट्रक उन्हीं दहशतगर्दो की कब्र का अंगार बन गया .... खूब उछाला मुझे ..हवा में ..जवानों ने और फिर रातों -रात में अपने मुल्क का एक स्टार ..एक देशभक्त बनकर आवाम की नजरों में चढ़ गया .... आँखों में बेहिसाब आँसू थे कि आज मैंने वो कर दिखाया जो मैं ख्वाब में भी नही सोच सकता था ...घर में फोन लगाया ...अम्मी ने फोन उठाया ...लेकिन तभी उन्हें अब्बू ने आवाज दी - " सलीमा देखो ये तुम्हारा ही लौंडा है न ..?" " हाँ ये हमारा ही बेटा है जिसने आज पूरे मुल्क में हमारा सर फक्र से उठा दिया ..." " हाँ सलीमा हम नसीब वाले हैं कि ये वतनपरस्त पतंगबाज हमारा ही बेटा है " अब क्या ... जिंदगी को मराहिल मिल गया ..और मुझे मुल्क के जेवरों की जान बचाने के एवज में फौज में नौकरी .... अब जिंदगी पहले जैसे नही रही लेकिन कुछ तो है जो अब भी पहले का बाकि है मुझमें और वो है .... " पतंगबाजी " नवाज़िश Junaid Royal Pathan

#वतनपरस्त_पतंगबाज
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" सलीमा देखियो... ये तुम्हारा ही लौंडा है न ?"

लौंडेपन से खतरनाक पतंगबाज रहा हूँ ..मतलब जिस छत पर माल खड़ा दिखे ..गोता उधर ही टेकता हूँ....

पतंग तिरंगा ..सद्दी नागिन मार ..और नेवला छाप सूता हुआ माँझा ..

मुहल्ले की ऐसी कोई लौंडिया नही जिसका बाप मेरे घर आकर मेरे बाप की लोई न उतार गया हो ...अंदर खाने तो ये भी उधम कूटता हूँ कि मुहल्ले की कंटाप लुगाइयों पर भी एक झाँप की नजर ढीली छोड़ी है मैंने ....

बस प्यार न हुआ मुझे ...घंटा होता भी कैसे ..जैसे ही सोचता हूँ ..फँसी से ख़ुशी -ख़ुशी प्यार कर लूँ ...उसी बकत दूसरी उससे हाई जम्पर माल दिख जाती है और प्यार ट्रान्सफर हो जाता है ,,,,,

ट्रान्सफर से याद आया मेरे अब्बा का बाई पास हो गया है बोले तो दिल का ...इसलिए अब हुक्का और गुस्सा भी कम फूँकते हैं ....

धंधा सीधा टिका है अपना फंदे में .. मतलब दो बड़े भाई और राइज मिल के तीन हिस्से ...वो खर्चा दे देते हैं और मैं क्या सिंदबाद का बहनोई हूँ जो फोकट के खर्चे के बाद राइज मिल में अपना लंगर डालूँ ...

पूरा दिन सिटियाबाजी ..औरतबाजी ..लौंडियाबाजी और पतंगबाजी के नाम ...कभी -कभी स्मार्ट फोन में नंगी औरतें भी देख लेता हूँ ..

देखने से याद आया मेरा बाप मेरी शक्ल देखना पसंद नही करता ..उसके पास दो पिचहत्तर की गाली हैं मेरे लिए ...हारमखोर और सिर्फ हरामखोर ....

मैं सोचता हूँ ..अगले अटैक तक झेल लो...क्यूँकि अगला वाला सीधे एक खींच में अब्बा की पतंग काट देगा ....

मेरे  बाप ने आखरी बार मेरे ऊपर फक्र कब किया था ..पता नही ...लेकिन अम्मी तो अक्सर कहती है कि वो मुझ पर फक्र करती है ...जानता हूँ वो झूठ बोलती है ..मेरा दिल रखती है लेकिन चलो कोई तो है जिसकी वजह से घर लौटने का दिल करता है ..

मेरा बाप मुझे कभी अपनी औलाद कह कर नही पुकारता ..बल्कि कहता है सलीमा का लौंडा ...सलीमा मेरी अम्मी का नाम है ...।

जैसे ही रात को खाने में हाथ डालता हूँ ..बाप , साँप की तरह डंक मारने लगता है ....अम्मी अक्सर समझाती है कि काम में दिल लगा अपने भाइयों के साथ वरना भाइयों की शादी के बाद ये तेरा खर्चा -पानी भी बन्द हो जाएगा ...और रो देती है ....बस यही चीज हैं जहाँ मेरा मन भारी होने लगता है ...नही तो रोज मुहल्ले की और हर घड़ी बाप की सुनने के बाद भी मेरा बाल टेढ़ा नही होता .....

हुआ वही जो अम्मी ने कहा था ...भाइयों की शादी हो गई ...और 15 दिनों में ही लंगोट के कच्चे खसम ...लुगाईयों की सलवार का नाड़ा बन गए ....

खर्चा बन्द करने से पहले बोले ..काम में हाथ बंटा नही तो एक ढेला भी नही देंगे अब ....

सोचा माँ की बकूँ लेकिन अम्मी से बेशुमार मुहब्बत के चलते  बाप की बकी साले बेशर्मों को .... और बोल दिया ..कि अब तुमसे खर्चा मांगें मेरा लोटा -लस्सन ....

तड़ी में तो बोल दिया लेकिन फिर फट गई कि खर्चा आयेगा कहाँ से फिर ... कमला पसन्द की पन्द्रह पुड़ी ..दो डब्बे सिगरेट .. और चाय पानी ..सूतम -सूत अलग !!!!!

अम्मी से खर्चा माँगना जेबा नही दिया ...ये उम्र तो उसको देने की है .... दोस्त यार भी कटने लगे ..और कर्जदार सर पर चढ़ने लगे ....

जब हालत बिलकुल मजनू के फ़टे निक्कर सी होने लगी ...तो सोचा शहर छोड़ दूँ ...वगरना जिसने मेरी रईशी की अय्याशी देख अपनी सुलगाई   वो आज मेरी हालत  देखेगा तो मेरी जला देगा ,,,

दिल्ली, दिलवालों की.. सुना यहाँ काम और हराम दोनों की पूछ है ....

हफ्ता तो गले की बारीक गोल्डन चैन से निपटा लिया लेकिन अब कुछ करना था वरना सुना तो ये भी है कि दिल्ली बड़े-बड़े रुस्तम भी निगल गई ....

जिंदगी में खुदा को कभी याद नही किया ...क्यूँकि मुसीबत या तंगी कभी छू कर नही गुजरी ...लेकिन आज खुदा कस कर याद आया ...जब भूखी पेट की आँतें मेरा पेट ही खाने लगी .... तभी एक शादी के पंडाल पर नजर गिरी ...और तय हुआ कि प्लेट साफ़ करने के एवज में खाना और ऊपर से पाँच सौ रूपये नकद ....

आज एक -एक प्लेट की चिकनाई उतारते वक्त पता  चला कि जिस पैसे को मैं यूँ ही फूँक देता था उसे कमाना कितना मुश्किल है ....खैर काम खत्म होते ही जब मुझे मेरी जिंदगी की पहली मेहनत की कमाई मिली ..मेरी आँख में आँसू आ गए ...और अम्मी तेज याद आई ..सोचा दौड़ के उसके पास जाऊँ और कहूँ उससे कि ले अम्मी मेरी मेहनत का पहला तोहफा ...लेकिन ये तो घर का एक तरफ का किराया भी नही था ...

रात आसमान के मीठे सितारे चुगते हुए कट गई ...और सुबह मैंने फिर काम की तलाश शुरू की ...न चाहते हुए भी एक बदलाव मेरे अंदर करवट ले रहा था ....

मैं एक बंगले में पहुँचा किसी आर्मी रिटायर्ड का बंगला था सुना उसे एक ड्राईवर की जरूरत थी ...गेट कीपर ने अंदर फोन कर कुछ बात की और फिर मैं अंदर गया ...

घर का बड़ा सा दरवाजा खुला था ..और मैंने अंदर कदम रखा ..पूरा घर जैसे किस्से -कहानियों का जंतर लग रहा था ...तभी ऊपर से एक कड़ी आवाज आई ....

" नही मेजर ऐसा नही हो सकता आई एम् कमिंग "

वो कर्रे बुजुर्ग सीढ़ियों से नीचे उतरे और मुझे देखा ...मैंने उनकी शक्ल पर रौब देख एक साँस में दुम अंदर डाल सारा माजरा बयाँ किया ....फिर वो कड़ककर बोले -

" बाद में आना अभी मैं अपने बेटे की डेथ बॉडी लेने काश्मीर जा रहा हूँ "

लोटा -लस्सन मुझे उसके बेटे से क्या लेना ...तभी वो बोले ..आज कोहरे की वजह से प्लैन और ट्रेन नही चल रहे ...ड्राइव कर सकते हो कश्मीर तक ....

कश्मीर ..बोले तो ..जमीन में जन्नत ..बोले तो लाल चिनारों गालों वाली लौंडियाएँ ....

" बिलकुल सर ..."

खैर ड्राइव की ..और बुड्ढे की शक्ल देखकर एक भी हो -हल्ला वाला गाना न रौंद पाया ....

" सॉरी सर ! लेकिन आपके अपने बेटे मर गये है और आपके चेहरे पर एक भी सिकन नही ..?"

" यू.. ...जो देश के लिए जान देता है ..वो शहीद कहलाता है ...और जिसका बेटा शहीद होता है वो उसकी शहादत पर फक्र करता है ..न कि आँसू बहाता है '

मुझे लगा बॉर्डर फ़िल्म का ऑडियो सुन रहा हूँ ...खैर काश्मीर पहुँचे ...और वाकई में कर्नल का बेटा शहीद हो चुका था ...उस छोटी सी सैनिक छावनी में कर्नल अपने बेटे की लाश को निहार रहा था तभी एक एक मोर्टार छावनी में गिरा ...और एक जख्मी जवान भागते हुए करीब आया ...

" सर ..सर ..वो ..पाकिस्तानी दहशतगर्द ...हमारी प्लाटून की कॉनवोइ में हमला करने आगे बढ़ रहें है ...  सर सारे सेटेलाइट फोन ..मोबाईल फोन और वायरलैस फोन उन्होंने जैम कर दिये हैं ..सर उनके पास एक पूरा मिनी ट्रक आर .डी एक्स है ."

और उस जवान ने जान दे दी .....पहाड़ी के दूसरी जानिब श्रीनगर शहर था .. सेना और शहरी दोनों की जान खतरे में थी ..छावनी में अफरा-तफरी मच गई ...कुछ जवान दौड़े भी लेकिन बीच पहाड़ी के उस तरफ पहुँचने में उनके कदम हार जाते ....अब एक ही तरीका था ...और वो था हवाई मार्गे लेकिन छावनी में न कोई हेलीकॉप्टर था ...न कोई मिनी जेट ....जब सब मायूस होकर बैठ गए तो मैंने दौड़कर ...छावनी को खंगाला ..... मुझे वो मिल चुका था जिसकी मुझे तलाश थी ..मैंने कोई 10 मिनट लिए और साहब से बोला -

" साहब आप बस इसमें वो लिख दीजिये जिससे जवानों को पता चल जाए कि उनके पीछे मौत दौड़ रही है ..."

"  क्या बकवाश कर रहे हो ..ये पन्नी की पतंग ?"

" साहब यकीन करो ...अपने मुहल्ले का नामी पतंगबाज हूँ ..हवा चाहे कोई भी जिद बना ले ...लेकिन आसमान में पतंग मेरी मर्जी से उड़ती और डूबती है "

न उम्मीद थे सब इसलिए इसे एक बचकानी  उम्मीद मान कर मेजर ने एक  खत उस पतंग संग बाँध दिया और अब बारी मेरी थी ...मोम का भारी धागा और स्टेपलर की पिनों से जुड़ीं ये पतंग अब कई जानें बचाने निकलने वाली थी ....

पहली बार किसी काम को अंजाम देने से पहले बिस्मिलाह पढ़ा और जैसे ही पतंग ने जमीन से उठना शुरू किया ...पूरी छावनी में हर -हर महादेव ,, जय माता दी की आवाजें गूँजने लगी ...मोम का खींचा धागा मेरे हाथ छीलने लगा लेकिन मेरी नजर पतंग और उसकी पिनों पर टिकी थी ...जैसे ही मुझे जवानों की कॉंनवोई नजर आई ....वैसे ही मैंने पतंग को गोता दिया और वो जाकर चिपकी सबसे आगे चलती गाड़ी के शीशे पर .....और फिर दहशत का ट्रक उन्हीं दहशतगर्दो  की कब्र का अंगार बन गया ....

खूब उछाला मुझे ..हवा में ..जवानों ने और फिर रातों -रात में अपने मुल्क का एक स्टार ..एक देशभक्त बनकर आवाम की नजरों में चढ़ गया ....

आँखों में बेहिसाब आँसू थे कि आज मैंने वो कर दिखाया जो मैं ख्वाब में भी नही सोच सकता था ...घर में फोन लगाया ...अम्मी ने फोन उठाया ...लेकिन तभी उन्हें अब्बू ने आवाज दी -

" सलीमा देखो ये तुम्हारा ही लौंडा है न ..?"

" हाँ ये हमारा ही बेटा है जिसने आज पूरे मुल्क में हमारा सर फक्र से उठा दिया ..."

" हाँ सलीमा हम नसीब वाले हैं कि ये वतनपरस्त पतंगबाज हमारा ही बेटा है "

अब क्या ... जिंदगी को मराहिल मिल गया ..और मुझे मुल्क के जेवरों की जान बचाने के एवज में फौज में नौकरी .... अब जिंदगी पहले जैसे नही रही लेकिन कुछ तो है जो अब भी पहले का बाकि है मुझमें और वो है ....

" पतंगबाजी "

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan