" कलवा के अब्बा...ओ जी ! सुन रहे हो ...कलवा के अब्बा ...
"अरे ! बेगम पाखाने ( शौचालय) में है ...क्या हुआ ...क्यूँ चीख री हो ..क्या तुम्हारे अब्बा का इंतकाल (निधन) हो गया .. ...?
" अरे इंतकाल हो मेरे शौहर का ...आप बाहर निकलो ...देखो ये बन्ने खाँ का पिद्दा सा पोता हमारी दीवार पे मूत्त्त्त्त्.... ...पेशाब कर गया है ....
" आ रिया हूँ ..आ ही गिया ..रोके रहियो ..कसम तुम्हारी बेगम पूरे खानदान की नसबन्दी न करवा दी तो कहना फिर दो बाप का मुझे ...
नाड़े का एक सिरा मुँह पे एक सिरे को हाथ में लेकर बाहर निकले हाजी नौशे खाँ ....
"हाय अल्लाह नाड़ा तो बाँध लो जी ...!
" अब नाड़े पर तबी गाँठ गेरेँगे जब बन्ने की दीवार अपने पेशाब से डूबों देंगे !
" लिहाज करो ...आप कब से खड़े होकर पेशाब करने लगे जी ...जानते भी हो खड़े होकर पेशाब करने पर कितना गुनाह है ..और ऊपर से आप हाजी और पंचवक्ता नमाजी !
" बक तो ठीक री हो बेगम ...लेकिन अल्लाह का शुक्र है जो नालायक औलादें तुमने पैदा कि ..जो हराम खोर न नमाज पढ़े न काम करें.. कम से कम आज काम आ जायेंगी .....
" भोलू..अबे ओ भूलवा..!
"जी अब्बू "
" अबे जाइयो और कमबख्त बन्ने खाँ की दीवार पे मूत्त्त्त्... पेशाब कर आइयो ...उसका पोता हमारी दीवार पर मू...पेशाब कर गया है ....
" अब्बा वो क्या है कर तो इतना देते की पूरा घर डूब के मर जाये ..लेकिन वो जी अभी लगी नी है ...
" जलील .कमबख्त इस काम का भी नही है तू ...!
" कलवा को बुलाइयो ..
" अब्बू भाईजान के फोड़ा हुआ ऊँहा तो जी वो न कर पायेंगे "
" तो मैं जाती हूँ जी ...."
" अबे बेगम कुछ शरम वरम् है क्या अभी हम जिन्दा है बन्दोबश्त करवाते है ...'
फिर हाजी खान ने घर के खादिम (सर्वेंट) को आवाज लगाई ...
" जाओ मुंशी वहाँ मू...पेशाब करो और यहाँ दिल में जगह पाओ .."
" हजूर खान साहब कर तो देंगे लेकिन वो क्या है जी दो महीने की पगार न मिली है अबी तलक"
" नमकहराम ...जाओ बेगम इसे दो महीने की पगार दो ..."
बेगम सिंगल वापस आती है ...
हें ..हें.. हें मुंशी कहाँ है बेगम ..?
" जी वो मुआ ..पगार पकड़ उड़ लिया .."
" इसकी आल को खायें कबर के कीड़ें
जाओ भूलवा पूरी बस्ती में डुगडुगी पिटवाओ कि जो हमारी ओर से बन्ने की दीवार तर कर देगा पूरे 5 पाँच हजार पायेगा...
आफ्टर डुगडुगी 3 मूतिया मर्द बरामद हुए ..
" हें तीन ...चलो कोई बात नही सब को 5 -5 हजार देंगे ..बारी -बारी मू.. पेशाब कर आओ !
पहला बोला-
" जी वो क्या है हाजी जी मैं धार लगा तो दूँगा लेकिन 5 हजार के साथ एक कमरा भी दोगे किराये मैं 3 महीने के लिए ..वो क्या है बाहरवाली रखनी है ...
" नीच ..अय्याश दफा हो ले ...चल बे तू जा .."
" हे हे हे हाजी जी बस इतनी सी इल्तिजा कि 5 हजार के साथ अपनी छोटी लौंडिया भी ब्याह दो मेरे साथ तो ..वो क्या है 4 बच्चे है मेरे और परसों की रंडवा हुआ हूँ "
" बन्दूक लाओ बेगम ...."
तभी तीसरा आगे आया -
" देखिये हाजी जी मुझे न कमरा चाहिये न लौंडिया वो जी सिर्फ रोजगार की तलाश है गर रोज धार लगाने की नौकरी दो तो नाड़ा खोलूँ फिर ....
" दफा हो जाओ बे सब ...लुटेरों ...
बेगम अब आन पर आ पड़ी है ...या तो हम जाते है या फिर अब आप ही जाओ ...हम मुँह फिरवा देंगे सबका ....
अब वो महज बेगम नही रही ..उसका चेहरा गुरुब ए आफ़ताब की लाली से रंग गया ..उसकी नाड़ियाँ फूलने लगी ..वो शौहर की अजमत की गाजी बन गई थी ..उसके चेहरे पर पूरे कुनबे के लिए फिदायीन वाला जोश भर गया ..उसने घर के हर एक सदस्य को आँखों में सैलाब लेकर घूरा . उसने सर अर्श की जानिब किया ..वो शहादत का जज्बा लिए आगे बढ़ी ...हर कदम पर उसकी जिन्दाबादी के नारे लगने लगे ....वो जैसे ही दीवार के करीब पहुँची ....और जैसे ही उसने अपनी इज्जत को सरकाने के लिए हाथ बढ़ाये ..... तभी उससे पहले ही दीवार किसी ने अपने पेशाब से गीली कर दी !
" हाजी नौशे खाँ चिल्ला के बोले रुक जाओ बेगम ..रुक जाओ...हमनें बदला ले लिया ...हमारा कुत्ता मोती बन्ने की दीवार पर मूत्त्त्...पेशाब कर आया ...कुछ भी हो आखिर है तो वो भी हमारे की कुनबे का आदमी "
उसके बाद मोती ..मोती नही रहा उसे राय बहादुर की उपाधि दी गई ..और जिस इस्लाम की बुनियाद में बदला जैसा कोई लफ्ज नही था जिस इस्लाम में गुस्से को हराम कहा जाता है ..जिस इस्लाम में किसी को बेवजह नुकसान पहुंचाना एक गुनाह है उस इस्लाम को आज ...बदले का बस अड्डा बनाने वाले हाजी नौशे खाँ को एक मासूम बच्चे के पेशाब के बदले कुत्ते का मूत मुबारक हो ....नवाजिश
#जुनैद...........
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