Sunday, 30 September 2018

बेटी

" मालिक इ तो बच्ची राही !"

" मादरजात हमें इल्म बाँच रहा है ...डॉक्टर है हम और जानते है कौनसी उम्र किस लायक है ...समझा ! "

" हजूर माई -बाप आप ही की ड्योढ़ी का नमक चाटकर..जिसम पाते है ..मैं तो हजूर की बड़ी अक्ल के पैर धोकर सिरफ़ अर्ज कर रहा था ..."

" हम कल शहर लौट रहें है चुन्नीदास ...और आज रात ...तुम समझ गए न !"

चुन्नीदास ने जाल बिछाया ..परिंदा जितना छोटा हो उतना ही लापरवाह होता है ...रात आखरी पहर तक पत्थर के नीचे एक मासूम कली पिसती रही ..और पौ-फटने से पहले उसकी लाश जंगल के बीचों-बीच फिंकवा दी गई ताकि एक आदमखोर का पाप दूसरा आदमखोर चबाकर पचा सके ।

अगले दिन सुबह जब डॉक्टर अपने फ़ार्म हाउस के दरवाजे से बाहिर निकल रहे थे -

" हजूर डॉक्टर साहब मैं मनकू हूँ .... जाते-जाते हमारी सूखी में प्राण फूँक दियो सरकार ...सुबह अधमरी जंगल से मिली है हजूर ..किसी ने पाप कर दिया उसके साथ ...जिन्नगी मौत से जूझ रही है सरकार ...बचा लो ..बचा लो ...बचा......

" शहर ले आना...पैरों से हटाओं इसे चुन्नीदास  (सकपकाते हुए )

तभी एक जनानी दौड़ते हुए बच्ची को पीठ पर ले आई और वहीं फर्श पर उसे बैठा कर उसका सर अपनी गोद पर रख दिया...
बच्ची ने बुझी आँखों से डॉक्टर की ओर देखा ...और बेजार डर से सहमते हुए ..अपनी अँगुली में खून जमा कर के डॉक्टर की ओर इशारा किया ....और प्राण दे दिए ...

बात टलने के मार्ग में निकल पड़ी..डॉक्टर ने नब्ज टटोली और चैन की एक गहरी सांस लेकर उसके पिता के काँधे में हाथ धर कर बोला ...अफ़सोस अब कुछ नही हो सकता ...

डॉक्टर ने गाड़ी का फाटक खोला और ड्राईवर से कहा तेज चलो ...माँ बिलखती रही ..मजमा छटता रहा ...लेकिन जबड़े भींच के उसका पिता डॉक्टर की धूल उड़ाती गाड़ी को देखता रहा .....क्यूँकि उसे आदमखोर की शिनाख्त हो चुकी थी ।

सिर्फ कुछ महीने बदले ...और शहर में डॉक्टर की बिटिया और बेटे ने इस बार का समर वेकेशन फ़ार्म हॉउस में बिताने की जिद पकड़ ली ।

दो दिन बाद डॉक्टर मय फैमली के फ़ार्म हॉउस पहुँचे .....फिर दो दिन गुजरे ...और बच्चों ने जंगल घूमने की जिद की ...डॉक्टर ने इस यात्रा को रद्द इसलिए कर दिया क्यूँकि उसे आज हल्का बुखार था ...धर्मपत्नी ने साथ रहने को कहा तो कुछ बात बनी ...बच्चे चुन्नीदास के साथ जंगल सफारी में निकल पड़े ....

जहाँ -जहाँ से ये आधुनिक बच्चे गुजरते पूरे इलाके में भीड़ सी लग जाती ...दिल के शोहदे ...हाप निक्कर में दूध सी बेदाग बच्ची की टाँगे देखकर मुँह से कलेजा उगल लेते ...और उसपर से उठती खुसबू ..और हार्मोन्स के कुछ बेमियादी भटकाव से 12 साला वो बच्ची 16 का होने का हैरतअंगेज भ्रम पैदा करती ..

चुन्नीदास खुद भी स्वयं की धोती को बार-बार सम्हालता और किसी न किसी बहाने उस बच्ची को सहला देता ...गाड़ी के टायर गड्ढों में जाते ही उसको जैसे पूरा मौका मिल जाता ..पूरे जिस्म को महसूस करने का ....

खैर गाड़ी बीच जंगल में रुक गई.....डॉक्टर के 14 साला लड़के ने कैनन कैमरा निकाला और कुछ आगे बढ़ कर नेचर फोटो शूट करने लगा ...

चुन्नीदास वहीं डॉक्टर की बेटी को जंगल ज्ञान पर अपना फूहड़ इल्म बाँटता रहा ....तभी चुन्नीदास के सर पर एक प्रहार हुआ ...और एक ड्राईवर के सर पर ....दो व्यक्ति मुँह ढाँके,.. डॉक्टर की बेटी का मुँह बन्द कर उसके हाथ पैर पकड़कर  उसे घने जंगल में खींच ले गए ...वो मासूम बच्ची अपने जिस्म ..अपने सीने पे कठोर हाथों की दर्दनाक सख्ती को बर्दाश्त नही कर पाई और उसकी आँखों से बादल फटने लगा ...एक व्यक्ति ने उसके निक्कर का बटन खोला ...तभी उस व्यक्ति के सर पर लकड़े का एक प्रहार हुआ ...दूसरा जैसे ही उठा उसके घुटने पर पुनः एक प्रहार हुआ और वो भी दर्द से वहीं बैठ गया ....

" चलो बिटिया जल्दी चलो !"

वो अंजान शख्स उस लड़की को लेकर वहां तक दौड़ा जहाँ जंगल खत्म होता था ...तभी एक गोली की आवाज सुनाई दी ...लड़की ने पीछे मुड़कर देखा ...व्यक्ति ने इशारा किया कि भागो.....इतने में चुन्नीदास ने होश में आकर ड्राईवर भिजवा कर डॉक्टर को बुलवा लिया था .....बच्ची सीधे डॉक्टर की कार के आगे आ लगी ...डॉक्टर ने ब्रेक लगाया ...सब इस घटना से सहमे हुए थे ....लेकिन बच्ची डरी होने के बावजूद सब कुछ बता गई ....डॉक्टर ने कार को आगे बढ़ा कर उस अनजान व्यक्ति के आगे कार रोकी ...उसमें शायद कुछ 10-11 साँसे बची थी .-

" तुम...तुम ...तुम तो मनकू हो न ...?

" जी हज़ूरअ मनकू ...सूखी का पिता मनकू ...आपने डॉक्टर होने के बावजूद ..एक बच्ची का बाप होने के बावजूद ..एक इंसान होने के बावजूद ...न भूखी नीयत में उम्र देखी ...न आह्ह्ह्ह न बढ़ती मौत में पेशा ....हम गरीब जरूर है हज़ूर लेकिन हम पैदा ही इसलिए होते है कि इंसानियत और भगवान को दुनिया में बनाये रखे ...हजूर बेटी गरीब की हो या अमीर दोनों में ही प्राण अऊर अभिलाषाएं होती है....

उसके प्राण निकल चुके थे चुन्नीदास और डॉक्टर के अलावा कोई उसकी बातों को न समझ सका ....डॉक्टर ने वहीं भीगी आँखों से एक संकल्प बुदबुदा कर किया ...लेकिन खुदा जाने उसकी उम्र भी न जाने कितनी रही हो क्यूँकि पैसे वाले का संकल्प पैसे ही की तरह बेवफा और बेगैरत होता है.....नवाजिश
#जुनैद...........

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