Saturday, 28 September 2019

Maseeha

★ #मसीहा ★
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" डॉक्टर साहब बस एक बार बच्ची को देख लेती तो  ...?"

" देखिए... मिस्टर हम पेशेंट को सिर्फ राउंड के टाइम पर देखते हैं ... और कोई इमरजेंसी होती है तब .....?"

" पेशेंट से मतलब ... जीती जागती मासूम बच्ची है वो ... दर्द से तड़प रही है वो ..... "

थोड़ा मैं भी तड़पा लेकिन फिर अनदेखा कर सफाई में लग गया ... अब्दुल मलिक नाम है मेरा ... जो मेरी वर्दी में छाती के बिल्ले पर भी छपा है ..पिछले 34 साल से इस अस्पताल में पोछा मार रहा हूँ ..और कई जीते -मरतों को देख चुका हूँ.... लेकिन ये बच्ची वाकई में दर्द में थी .... कोई गाड़ी ठोक गई रस्ते में... बस फिर क्या.. वही  कि खून चढ़ा ..नब्ज देखी गई ..एक दो इंजेक्शन बच्ची के जिस्म में घोंप दिए और फिर कारोबार ....

इसका बाप पूरे 25 मिनट से इधर-उधर पागलों की तरह घूम रहा है ... कि किसी तरह बच्ची का दर्द कम हो जाये .... लेकिन हर कोई बस टाल दे रहा है ....तभी मैंने उसे नर्स रूम में जाते देखा ... मैं पीछे गया ....

" नर्स वो मेरी बच्ची ...?"

" क्या हुआ ... दिखता नही ब्रेक फास्ट कर रहें हैं अभी ... हुआ क्या बच्ची को ...?"

" वो .. वो .. वो .. दर्द से तड़प रही है वहां ..."

" अरे ! अभी रिलीफ मिल जायेगा न .... अरे सुमन तूने वो पेन किलर इंजेक्शन दे दिया था न ...?"

" ओह्ह यार शिट भूल गई ... चलो मेरे साथ ....और बार-बार यहाँ मत आना अब ओके "

ये इन कमबख्तों का रोज का काम है .... नर्स का मतलब नही जानता लेकिन कोई इनसे सिस्टर भी कहता है .... सिस्टर यानि बहन ..बहन यानि औरत ....और औरत यानि शिद्दत से जज्बातों को समझने और महसूस करने वाली एकलौती इंसान ।।।

लेकिन आखिर ये 11 नर्स औरत होने के बावजूद इंसान क्यों नही बन पाई....? खैर अल्लाह ही जाने ....उस लड़की को नींद आ गई ... और उसके बाप और मुझे सुकून की सांस वापस आ गई ...तभी

" अबे ओये ... हाँ तू .. क्यों बे सफाई छोड़ यहाँ क्या कर रहा है ...?"

हस्पताल के नये मैनेजर साहब सामने खड़े थे-

" साहब वो सफाई तो निपटा दी ...लेकिन साहब इतनी बदतमीजी से आज तलक इस हस्पताल के किसी मालिक या मुलाजिम ने हमसे बात नही की ....आखिर उम्र में , मैं बेशक आपके वालिद  की उम्र का हूँ "

मैनेजर साहब पास आये और सीधे मेरा कॉलर पकड़ा-

" दो कौड़ी के सफाई -डंडे वाले ...तू इतना जो बोल गया ये इसलिये की तुझे आज तक किसी ने तेरी औकात नही दिखाई ..लेकिन समझ ले अब दूसरी बार मुझे तू काम के बदले हरामखोरी  करता दिखाई दिया तो वो दिन तेरा इस हॉस्पिटल में आखरी दिन होगा समझा ...... और ..और ये घूरता किसे है बे ..आँख नीची रख और चल काम पर लग जा "

उस दिन फर्श कच्ची दवाई से नही मैंने अपनी आँखों के आँसुओं से साफ किया .... तभी मेरे काँधे पर हाथ दिया उसी बच्ची के बाप ने
..

" मलिक साहब... यकीन करें अपने खुदा पर जो यहां हुआ वो फिर कभी दुबारा नही होगा ... आँसू पोंछ दे "

मुझे पता था ... ये सिर्फ एक मरहम है ... जब फिर भी आंख से आँसू न रुके तो उस आदमी ने मुझे गले लगा लिया.... बड़ा सुकून था उसके सीने में ... आज से पहले इतनी इज्जत इस हस्पताल में न मेरे नाम को कभी मिली न मेरे वुजूद को ...

मैं शांत हुआ तो वो आगे बढ़ गया ... और सब कुछ भूलकर मैं काम पर लग गया ...क्यूँकि दो बेटियों का ब्याह अभी और मेरे सर पर है .....

सफाई के बाद लंच टाइम में मैंने हाथ-मुँह धोया और जैसे ही एक किनारे में टिफिन खोला और आलू की कतलियों को रोटी पर रखा तभी -

" यार तुम बड़े उँगली बाज इंसान हो .... तुम्हारा बाप है क्या वो ..?"

उस बच्ची का बाप किसी डॉक्टर से उलझा हुआ था ....मैं सीधे रोटी छोड़ मंजर के करीब पहुँचा तो ....

" बाप नही है मेरा ... लेकिन सर मेरे और आपके बाप की उम्र का है .... शायद उसकी ऑक्सीजन सिलेंडर खाली हो चुकी है ... वो मर जायेगा ... एक बार दिखवा तो लें "

डॉक्टर झुंझलाकर बोला -

" तुम  लोवर क्लास की यही प्रॉब्लम है ..इमोशनल फूल होते हो ...समझ तो कुछ आता नही ..अरे ऐसा कुछ होता तो हमको पता नही चलता क्या "

कुछ देर में खबर आई कि वो बूढ़ा न रहा ...ये बूढ़ा जो यहां सीनियर सिटीजन कोटे से था ...पहले फ़ौज में था ... आधी सरकारी सब्सिडी पर ...इसका कोई अपना इसे यहां छोड़ गया ..फिर वो वापस नही आया शायद उसे इस बूढ़े बोझ को कूड़ा समझ कर कहीं उड़ेलना  था ..वो इंसान जिसने सरहद पर हमारे मुल्क का बोझ कभी सम्हाला था वो मचल रहा था सांसों के न लौटने के बोझ से .. इससे हस्पताल को कोई खास मुनाफा नही था ... कोई सोचे ये अपनी मौत मरा ..  लेकिन मैंने यहां ऐसे ही कई कत्ल होते देखे है.......

कुछ देर बाद फिर वही आदमी सवाल पूछता  नजर आया और वो था हस्पताल  का मेडिकल स्टोर ...

" ये क्या है सर .. इसमें ओरिजनल रेट और एक्सपायरी डेट दोनों क्यों कटे हुए हैं ...?"

" पीछे हो लियो बे ... दिखता नही भीड़ लगी है यहां .. बाद में बताएंगे क्या कटा है और क्या नही "

" मतलब आप लोग यहां सिर्फ दवाइयों का अंडा बाजार लगाये हुए हैं .... सिर्फ अपने फायदे के लिए दूसरे की जिंदगी से खेल रहे हैं
...?"

" सिक्योरटी..... अबे ले जाइयो बे इस फ्रीडम फाइटर को और मैनेजर साहब से मिला दियो  "

बहादुर सिंह जब उस आदमी को जबरदस्ती खींच रहे थे तब मैंने  बीच में आकर उस आदमी को समझाया और किनारे ले जाकर बोला -

" बेटा क्यों ..क्यों खाली भिड़ रहे हो इनसे ... इस हस्पताल के मालिक की पहुँच बहुत ऊपर तलक है .... बेटा जाओ अपनी बेटी को देखो खुदा के लिए मेरी बात को मान जाओ "

वो आदमी आगे बढ़ता हुआ . . फिर पीछे पलटकर बोला -

" मलिक साहब इनकी पहुँच कितने ऊपर तक हो लेकिन भगवान तलक नही हो सकती ... लंका दहन का समय आ गया है मलिक साहब ..   "

जज्बातों की आग में जलता वो जाने लगा तभी . . एक तमाचा मेरे  बूढ़े गाल में पड़ा .....

" बड़ी देर से अंदर कैमरे से देख रहा हूँ ..बार- बार इस चूतिये को तू ही भड़का रहा है .... अपना आज तक का हिसाब कर और दफा हो ले यहां से .....समझा"

गाल में तमाचे की झनझनाहट सीधी करते हुए मैं बोला -

"साहब खुदा कसम मैंने किसी को  कुछ नही कहा बल्कि मैं तो उसको समझा रहा था ... साहब अब उसके पास भी न फटकूँगा ....साहब बेटियों का रिश्ता ठहरा है कोई बेटा नही है मेरा साहब ...."

मेरे पूरा दरयाफ्त करने से पहले ही  मैनेजर साहब ने मेरा कॉलर पकड़ा और खींच कर मुझे दीवार से सटा दिया .... पूरा हस्पताल नामर्दों की तरह देखने लगा ...वो स्टाफ जिसका मैं भी एक हिस्सा था वो खामोश था ... वो स्टाफ जिसके  दुःख - दर्द के 34 साल मैने यहाँ सिर्फ देखे नही बल्कि महसूस किये वो स्टाफ पत्थर बन चुका था .... मैं साहब से दरयाफ्त करता जा रहा था लेकिन मेरे बेटे की उम्र का मैनेजर मुझे अब घसीट रहा था ...मैं जमीन पर गिर चुका था .. और उनके पैरों को घेर चुका था.. तभी फिर एक तमाचा पड़ा .......

लेकिन इस बार मेरे गाल में झनझनाहट नही बल्कि ये झनझनाहट हुई मैनेजर के गाल पर......

वो  बेटी का बाप वो आदमी गुस्से से कांप रहा था .....मैनेजर साहब गुस्से से मेरा कॉलर छोड़ उसके ऊपर झपटे कि फिर एक और तमाचा फिर उनके गाल पर पड़ा ....

वो सहलाते हुए चिल्ला कर बोले -

" सिक्योरटी ..सिक्योरटी ....लेकिन सिक्योरटी के पहुंचने से पहले ...पुलिस पहुँच गई ...मैं डर गया उस मासूम आदमी उसकी मासूम बेटी का अब क्या होगा ..?.उस आदमी ने मुझे जमीन से उठाया और.....

" जय हिन्द सर ...."

" अरेस्ट हिम....  "

पुलिस ने मैनेजर की पकड़ लिया और फिर  एक टीम और पहुँची जिसने हस्पताल के चप्पे - चप्पे को छानना शुरू कर दिया ... फिर अखबार .. टी. वी वाले .....

और फिर वो आदमी  कैमरे के सामने बोला -

" मैं विवेक कुमार ... जिले का जिलाधिकारी ... जब सुबह अपने ऑफिस  पैदल ही जा रहा था .. तो मैंने देखा एक वाहन एक बच्ची को टक्कर मारकर फरार हो गया ... मर चुके मानवीय मूल्यों की भीड़ ने सिर्फ उस बच्ची के चारों ओर घेरा बनाया अनगिनत मोटरों से पटा ये शहर उस बच्ची को हॉस्पिटल छोड़ने के भय से थर्राने लगा ....मैं उस मासूम बच्ची जो शायद किसी गरीब या मज़दूर की बिटिया है लेकर हॉस्पिटल पहुँचा तो इन्होंने पूरे 25 मिनट मुझे नीचे काउंटर पर फंसाये  रखा फिर सारे बिल पेड  करने के बाद उसका अधूरा इलाज शुरू किया .... ये नर्सेज जिनकी अवश्य कोई बेटियाँ होंगी बेशक ये भी किसी बच्चे की माँ होंगी ...ये नर्स रूम में बैठकर ड्यूटी टाइम में  .. मोबाइल से सेल्फी ले रही थी ... व्हाट्सएप ,फेसबुक चला रही थी ... गप्पे लड़ा रही थी ...जब एक बच्ची यहां दर्द से तड़प रही थी ...... ये उसे पेन किलर इंजेक्शन देना भूल गयीं ... जानते-बूझते कि एक वृद्ध का ऑक्सीजन  सिलेंडर खाली हो चुका है इन्होंने उसे मरने दिया या मार दिया .... फर्जी दवाइयां..एक्सपायर डेट की दवाइयां यहाँ धड़ल्ले दूने दामों में खपाई जा रही हैं .... ये मैनेजर अपने पिता की उम्र के सफाई कर्मी व्यक्ति पर हाथ उठाता है ...बेशक ये हॉस्पिटल है लेकिन यहाँ मानवीय मूल्य समाप्त हो चुके हैं ... इंसान को यहाँ उसके नाम से नही  बल्कि पेशेंट कहकर संबोधित किया जाता है .. मेडिकल जैसे पवित्र पेशे को यहाँ काला कारोबार बना दिया गया है ... और इन सबकी वीडियो या सुबूत मेरे इस हिडन कैमरे में है जो मैं जल्दी ही कोर्ट में पेश करूँगा .... मैं विवेक कुमार अल्टीमेटम देता हूँ इस शहर इस जिले के समस्त ऐसे ही फर्जीवाड़ा करते हॉस्पिटल्स को कि मेडिकल जैसे इस पेशे को अगर काला बाजार और दलाली का अड्डा बनाया तो अगली दफा उनकी बारी है "

हर तरफ हर ओर से तालियों की बौछारें शुरू ही गई ... हॉस्पिटल की सीलिंग हुई ...और उसके मरीज दूसरे हस्पताल में शिफ्ट हुए जब एक -एक मरीज से हस्पताल खाली हो गया तो पाप का ये बड़ा और शानो शौकत वाला घर खण्डर दिखने लगा ...लेकिन मैं अब क्या करूँ डी.एम साहब मशरूफ थे ... लेकिन क्या साहब थे ... वो जो एक सफाई वाले को उसके नाम के साथ साहब कहकर पुकारते हैं जो एक गरीब की  बच्ची के लिए पाप की इस नगरी को खाक में मिलाते हैं ... जो रुतबे वाले ..बड़ी शान वाले होने के बावजूद फर्ज पर डटे हुए है.... एक सलाम  जब उनको  आँख में आंसू  भरकर सीधा तन के बनाया तभी साहब मेरी ओर पलटे और बदले में मुझे भी एक सलूट साहब ने पेश किया .....

मैं बूढ़ी जांघो से दौड़कर साहब के कदमों में जगह पाने दौड़ा लेकिन साहब ने मुझे उससे पहले ही बाँहों में भर लिया ......बहुत रोया ..बहुत दुवाएँ दी साहब को तभी साहब कान के पास हौले से बोले -

" मलिक साहब आप मेरे पिता के सामान हैं तो आपकी बेटियां मेरी बहनें हुई.... उनके ब्याह के लिए जो मुझसे बन पड़ेगा मैं करूँगा ... लेकिन अब आप घर मे आराम करेंगे ..... और यहाँ रहूँ चाहे कहीं भी आपके जीवन के गुजर के लिए मैं पैसा भेजता रहूँगा ....मना करके पराया न कीजियेगा .... "

साहब ने खरीद लिया ...और मैंने मान लिया कि वाकई पाप और गुनाह की पहुँच कितनी ऊपर तक हो लेकिन खुदा तक सिर्फ फर्ज और हक में अड़े लोग ही पहुँच बना सकते हैं ...........!!!!

और खुदा तक पहुंच बना चुका एक मसीहा मेरे सामने -सामने मुझसे विदा लेकर अपने फर्ज की राह पकड़ चुका था ........

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

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