Sunday, 22 September 2019

ताज महल

#ताज_महल
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" देखो जान ये प्यार की निशानी ..संगमरमर पर झूमती प्यार की फुहार .... ये सिर्फ ताजमहल नही......."

" छोड़िये साहब देखियेगा  ताजमहल तो मैं बनाऊंगा .... फिर देखेगी दुनिया ....."

आस- पास खड़े लोग जिनमें कुछ ठहाका लगाने लगे तो कुछ उस लड़के की बात सुनकर मुस्कुराहने लगे ... फिर उसे अनदेखा कर आगे बढ़ गए ... लेकिन मैं पता नही क्यों आगे नही बढ़ पाया .....

मैं ऋषभ नरेश अग्रवाल ...सस्ते गल्ले की दुकान से अपनी जिंदगी को शुरू किया और बेहद सस्ते मैं फिर जिंदगी काटता रहा .... हांलकि सरिता से विवाह ने अवश्य मेरी सूनी और बोझिल जिंदगी में कुछ रंग भरे लेकिन मेरी जिंदगी इंद्रधनुष तब बनी जब उसने मुझे एक प्यारे बेटे मुकेश का उपहार दिया......

माता -रानी के आशीर्वाद से शादी के पूरे चार साल बाद दो जुड़वा बेटे मानो जैसे कोई रत्न  प्राप्त हुए .....लेकिन एक सन्तान ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया ..  मेरे अंदर उस बच्चे का मुँह देखने तक कि शक्ति शेष नही थी बल्कि मैंने तो अपने जिंदा पुत्र को गले लगाकर आँखे बन्द कर ली बस।

मुकेश मात्र मेरा पुत्र नही था बल्कि मेरे सूनेपन का साथी भी था ... वो मेरी बंजर जिंदगी में दूब का वो पहला तृण था जिसने मुझे विश्वास से लहलहा दिया...

जिंदगी सस्ते गल्ले से अब महँगी होने लगी थी अब दुकान का शटर बेमियादी होकर गिरने लगा ...मैं अधिक से अधिक समय मुकेश के साथ बिताता और सरिता मुझे देख बस आँसू बहाती ....

सरिता मात्र मेरी पत्नी नही अपितु वो देवी थी जिसके मन में सृष्टि के प्रत्येक व्यथित प्राणियों के लिए घोर श्रद्धा एवं दया थी ... वो जब घर की देवी बनकर मेरे घर मे प्रतिस्थापित हुई तो कोई भी  भूखा कभी मेरे द्वार से भूखे पेट वापस न लौटा ..कोई भी मंगता कभी खाली हाथ न लौटा ...सड़क पर चलते हुए किसी का भी दर्द उसको न मात्र विचलित करता अपितु उसकी आंख में अश्रु भी  ले आता ... वो औरत त्याग की मूरत के साथ -साथ दान में साक्षात महाराज हर्ष की प्रतिद्वन्दी बन गई थी ...  उस देवी ने मात्र मुकेश को नही पाला ...स्त्री के रूप में उस देवी ने मुझे भी पति उपरांत पुत्र सरीखा स्नेह भी दिया और देती क्यों नही ...वो जानती थी कि मैंने बचपन में ही अपने माता-पिता को एक सड़क हादसे में खो दिया था ...

मुकेश जब 16 वर्ष का हुआ तो मुझे लगने लगा कि जिंदगी उम्र लेकर उम्र सौंपती हैं ।सजीला,  चमकदार , विश्वास और ऊर्जा से युक्त मेरा बच्चा कभी भी न नाकारात्मक सोचता और न कभी नाकारात्मक बाते करता ...

उसके प्रत्येक शब्द से मात्र सकारात्मकता और विश्वास ही झलकता ...लेकिन उसके विश्वास ने न जाने कब मुझे एक अति विश्वास के पटल पर लाकर खड़ा कर दिया .....मुकेश पर इस प्रकार का अटल और अखण्ड विश्वास कि उसने उस दिन कक्षा बारहवीं के रिजल्ट आउट होते ही कहा -

" देखना पापा ओनली डिस्ट्रिक्ट नही स्टेट टॉपर बनूँगा "

और उसकी जिह्वा पर जैसे उस समय साक्षात सरस्वती उपविष्ट हो गयीं हों .... मेरा बच्चा सूबे में टॉप करके मेरे चरणों को स्पर्श करने के उपरांत बोला -

" पापा अब मुझे बाइक चाहिए "

ऐसा कभी हुआ ही नही कि मेरे बच्चे ने कभी कोई फिजूल और जबरन डिमांड को अपनी जिद बनाया हो .... सरिता के संस्कार उसे हमेशा उसी प्रकार पोषित करते रहे जैसे  भानु की किरण अपने दर्पण यानि सूर्यमुखी पुष्प को ....

मैंने तत्काल तिजोरी खोली और सीधा मुकेश का हाथ पकड़ कर उसे बाजार ले गया .... मुकेश मेरे साथ गुजरता और पूरा शहर मुझे बधाइयाँ देने हेतु उमड़ पड़ता ....

अपने  बेटे पर गर्व करना हर पिता का स्वप्न होता है और मैं उसी स्वप्न की वास्तविकता का साक्षी था ...मैंने अपने पुत्र को मूक रूप से आँखों में अश्रु  भर धन्यवाद दिया तभी मुकेश बोला -

" पापा आप जल्दी कर रहें हैं ... मुझे बाइक अभी नही चाहिए बल्कि जब कॉलेज जाने लगूं तब "

मुकेश ने ये बात चार आदमियों के सामने कही थी तो मैं भी चार आदमीयों को देख इतरा कर अपने बच्चे से बोला -

" बेटा ! बस तुम अब अँगुली रखो ... अभी के अभी ....."

बाइक नही बल्कि काल खरीदा उस दिन मैंने अपने बच्चे के लिए अगले ही दिन बाइक सीखते हुए मेरे मेधावी , चरित्रवान और निराले बच्चे को एक ट्रक कुचल गया .... और कुचल गया मेरी जिंदगी के वो सारे अरमान जो मेरे बच्चे में बसते थे ... सरिता सिर्फ तीन दिन ही सह पाई बच्चे का वियोग और चौथे दिन एक और अर्थी मेरे कांधों का बोझ बनी ....

ताजमहल देखने नही आया बल्कि यहां से गुजर रहा था तो याद आया कि मेरा बच्चा कहता था -

" पापा जब भी ताजमहल देखने जाऊँगा तो उसके किनारे दो पत्थर की कंकड़ियाँ रखूँगा "

" क्यों बेटा ..?"

" वो इसलिए पिताजी कि मुझे भी फील हो कि मैंने भी ताजमहल को बनाने में योगदान दिया "

उस समय ठहाका लगाया था मैंने और आज दो कंकड़ियाँ दोनों मुट्ठी में लेकर पहले मुस्कुराया फिर आँख से आँसू गिरने लगे थे .... घर से प्रण करके निकला था कि अब जीवित नही रहना  बल्कि अब सीधे यमुना में समाधि लेकर सरिता और मुकेश से जा मिलूँगा ।

लेकिन तभी नजर उस लड़के पर पड़ी जो अभी ताजमहल से भी भव्य ताजमहल बनाने की बात बोल रहा था -

" ए ..ए ... अरे सुनो बेटा ... अरे हाँ तुम ....क्या नाम है तुम्हारा?"

" साहब सभी छुटकू गाइड  बोलते हैं  ...."

बेटा उम्र तो तुम्हारी स्कूल पढ़ने वाली लगती है और फिर ये गाइड का काम ...?"

" साहब बाप गाइड था मेरा अभी 14 दिन पहले खलास हुआ है तो पेट वास्ते बाप का कैमरा और जुबान पकड़ ली "

इस लड़के की जुबान जरूर अक्खड़ और बदमिजाज थी लेकिन उसके चेहरे का तेज और उसका विश्वास मेरे बच्चे सरीखा था ...

" कहाँ रहते हो बेटा ....?"

" यहीं ताज  के पीछे वाली बस्ती में साहब ... अच्छा साहब धंधा कर लूँ ......तभी तो इस ताज से बेहतर ताज बनवाऊँगा न "

क्षण भर की हैरानी हुई मुझे और फिर न जाने क्यूँ मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई .....बच्चा ही था वो तो भला बच्चे जैसे बात क्यूँ न करे ..?

दिन में दाखिल हुआ और शाम लग गई उसे देखते -देखते .... आम बात हो सकती है ये ताजमहल के इर्द -गिर्द लेकिन ताज नही मैं तो छुटकू गाइड में खोया हुआ था ...

थकान उसकी देह को पीढ़ा दे अथवा पछाड़ दे ऐसा तो मैंने कुछ नही देखा लेकिन जब घास पर बैठ कर वो दिनभर की कमाई गिनने में व्यस्त था तो रहा न गया और उसके पास जाकर बोला-

" बेटा कुछ भोजन भी किया कि नही ? "

" क्या भोजन ..?"

" मतलब खाना - पीना ... कुछ भूख लगी है कि नही ...?'

" साहब मशीन थोड़ा ही हूँ ...लगी है बड़ी जोर की लगी है लेकिन पहले घर जाऊँगा ... फिर हाथ -पैर धोकर अपनी अम्मी को अपनी कमाई सौपूँगा  ... फिर अम्मी के हाथों से खाऊँगा न साहब  "

ठिठक गया मैं .....और बोला -

" क्यों बेटा अब भी माताजी ही खिलाती है तुम्हे ? "

दिन भर की चिलचिलाती धूप में चहकता वो बच्चा शाम की पलछिन से सजा वो बच्चा ... अब ऐसा उदास हुआ जैसे शकुंतला का पुत्र भरत पिता अर्थात दुष्यंत के स्मरण मात्र से ही अधर चबाकर नयन बिम्ब अस्थिर कर लेता था ...मैं पुनः बोला -

" लेकिन बेटा फिर इसका अर्थ हुआ कि अभी तो काफी समय है ... आओ   मैं भी भूख से व्यथित हूँ चलो साथ भोज... मतलब खाना खाते हैं "

" नही साहब ... थेँकु ... अम्मी इंतजार कर रही होगी अब चलता हूँ "

और वो तेज कदमों से चलने लगा ... और मैं ठिठका हुआ बस उसे जाता हुआ देखता रहा ... तभी जाते हुए उसकी जेब से कुछ गिरा और मैं तेजी से उसकी ओर लपका ... दो पचास के बंधे नोट थे वो .... मैं आवाज देता रहा लेकिन सड़क के शोर-शराबे में उसे कुछ न सुनाई दिया.... तो तेज कदमों से उसका पीछा करने लगा .....

ये सब भला मैं क्यों कर रहा हूँ ..किसलिए ..? तो आवाज हृदय से आई ... कि मुकेश जैसे मुझे पुनः मिल गया है ....एक सघन मुस्लिम बस्ती में प्रवेश किया उसने ... और वो आंख से ओझिल सा हो गया ....अब सकपकाने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता नही था तो मैंने एक राह चलते से पूछा -

" अरे भाईसाहब ये छुटकू गाइड कहाँ रहता है ...?"

" जी भाईजान ऐसा तो कोई न रहे यहाँ ..."

" न ..न .. भाईसाहब वो जो ताजमहल में गाइड का काम करता है ... अरे वो जो अभी यहीं से गुजरा जिसके हाथ में कैमरा था ...?"

" माफ कीजियेगा भाईजान इधर से तो कोई नही गुजरा ... खैर आप आगे पूछ लें "

जब प्रत्येक से पूछ - पूछ कर हार गया ... तो लगा सम्भवतः उसने दूसरा रास्ता ले लिया होगा और मैं  भ्रमवश यहाँ चला आया .....लौट ही रह था कि तभी एक घर के अंदर खिड़की से  नजर गई ... मैं आगे बढ़ गया और फिर यकायक तेजी से पीछे लौटा .....सामने की दीवार पर छुटकू गाइड की तस्वीर लटकी हुई थी .....

मैंने  तुरन्त उस घर के अंदर प्रवेश लिया ... घर में दो बच्चियां थी उम्र यही कोई 15 , और 11 साल  ...

" कौ..कौ... कौन हैं आप ...?"

अपनी गलती पर सिर्फ शर्मिंदा हुआ जा सकता था उसे सुधारने का न समय शेष था और न ही दशा ...तो हड़बड़ाकर बोला -

" बहन हाथ जोड़ कर आपसे क्षमा माँगता हूँ ......"

और मैंने एक साँस में उन्हें सारी कहानी सुना दी और उन्होंने अपना सर पकड़ लिया और फिर फूट-फूट कर रोने लगी ....और फिर बोली -

" 14 दिन हुए हैं मेरे शौहर और मेरे इस बच्चे को मरे हुए ..."

जोर का करंट लगा मुझे और अधर फड़फड़ाते हुए बोले -

" क्याया कह रहीं हैं आप ...?"

" जी भाईजान जी ! अगले चौक पर एक ट्रक उस समय मेरे शौहर और बच्चे को कुचल गया जब मेरा बच्चा अपने अब्बू को हस्पताल ले जा रहा था ..... उन्हें टी. वी हो गई थी .... और आखरी दौर की टी.वी ..... "

वो औरत फूट-फूट कर रोने लगी और उसके साथ उनकी बच्चियां भी लेकिन मेरी अक्ल अब भी इन समस्त भावों और घटनाओं का संवहरण नही कर पा रही थी ....; आखिर वो सब क्या था जिसे मैं दिन से जी रहा था ..वो बच्चा जो ताजमहल बनाने की बात बोल रहा था .. क्या था वो सब कुछ ...? क्या आत्मा होती है क्या मर कर भी लोग वापस आ सकतें हैं ..?

" हैरान न होइए भाईजान... बड़ा खुद्दार , दिलेर और मेहनतकश था मेरा बच्चा ... इतना प्यारा इतना सजीला और इतनी बातें करने वाला कि उसके दम से ही मेरे घर रौनक ठहरती थी ...जानते हो ताजमहल बनवाना चाहता था मेरे लिए .."

मैंने अचम्भित होकर उन्हें देखा और मुँह से निकल पड़ा -

" मतलब...?"

" कुछ नही भाईजान .. जिंदगी फांको और गरीबी में गुजरी  हमारी ...बच्चा पढ़ने में बहुत तेज था मेरा लेकिन गुरबत ने और बाप की बीमारी ने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी ....इसके अब्बू ताजमहल में गाइड काम करते थे ये भी उनके साथ चला जाता ... अपने अब्बू के मुंह से कभी सुना होगा कि एक इंसान ने अपनी मुहब्बत का सबूत ताजमहल बनवाकर दिया तो धुन लग गई इसे भी कि ये भी अपनी अम्मी के लिए ताजमहल से भी खूबसूरत ईमारत बनवायेगा   और अपनी अम्मी से अपनी  बेइंतहा मुहब्बत का सुबूत पूरी दुनिया को देगा ... बच्चा था साहब और उसकी सोच भी तो वही होगी न ........"

" क्या नाम था उसका .....?"

" मुकेश !"

"  क्याया ....?"
मैं एक पल में जमीन से ढहने लगा ...

" हाँ साहब अब जब वो नही तो सच ये है कि जो औरत उस वक्त मेरे साथ अस्पताल में दाखिल थी जो मेरी ही तरह पेट से थी उसने जहाँ जुड़वा बच्चों को पैदा किया वहीं मैंने एक मरे बेटे को .... मेरी आँख के आँसू और मेरे शौहर की आहों ने उस नेक खातून को इतना झंझोड़ दिया कि उसने अपनी एक औलाद हमारी गोद ने डाल दी ..... और मैं देखती रही कि कैसे उसने सीने में पत्थर रखकर मेरे मुर्दा बच्चे को अपने साथ लिटा लिया .... उसके शौहर का चेहरा और उसकी मायूसी आज भी नही भूलती ... बस उसने इतना माँगा था कि मेरे बच्चे का नाम मुकेश रखना "

सरिता तो देवी थी ही ...मुकेश मेरा बेटा साक्षात भगवान गणेश सरीखा था ही लेकिन मेरी ये दूसरी औलाद जो बिना हमारी परवरिश के हम सब से आगे निकल गई और मरने के बाद भी एक परिवार के जीने , उसकी रोटी और उनके सपनों की जिम्मेदारी को अपना कर्तव्य मान बैठा मैं इसकी तुलना किस ईश , किस प्रवर्तक से करूँ ....सिर्फ दो पचास के नोट देने मुझे ये आत्मा यहाँ खींच कर लाई थी या फिर ये जताने कि पिताजी जीवन बड़े नेम ..बड़े सद्कर्मों से प्राप्त होता है इस जीवन को हार , दुःख अथवा अन्य  असफलताओं से समाप्त करने में वीरता नही अपितु दूसरे के लिए जीकर उसके आँसू पोंछ कर इसे व्यय कर देना ही सच्ची वीरता और सच्ची मनुष्यता है ...

झूठ बोल रही थी वो औरत जो कहती थी कि उस बच्चे के पिता का चेहरा आज भी नही भूलता मैं उसके सामने गई तो खड़ा था ... लेकिन मेरी संतान मेरा रक्त मुझे पहचान गया .... अब जीवन इन जैसे परिवारों की सेवा और जिम्मेदारियों के नाम कर दिया ...लेकिन आज भी गर्व होता है अपनी पत्नी और उसकी कोख पर कि उसने सन्तान नही अपितु इंसानों को जन्म दिया वो इंसान फिर जिनकी मानवता और मानवता से प्रेम के चलते उनके आगे ताजमहल जैसे करोड़ो प्रेम के स्मारक भी सर झुकाते हैं ........

नवाजिश

By~
Junaid Royal Pathan

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