Thursday, 12 September 2019

बेटी

#I_Want_बेटी
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" देखना कान्हा घर किलकारी लेगा बहू "

तभी विनोद एकाएक बीच में बोल पड़े ~

" लेकिन माँ मुझे बेटी चाहिए ...आपकी या अपनी बड़ी दीदी की तरह नही ..  लक्ष्मी या पार्वती की तरह नही .. देवी दुर्गा या माँ सीता की तरह नही ....मुझे बेटी चाहिए तो सिर्फ अपनी जीवन संगिनी पायल की तरह "

विनोद जज्बातों में जो बोल गए .. उसने जरूर मेरे मन को जीत लिया ... लेकिन घर का प्रत्येक सदस्य ये सोचने लगा कि विनोद मुझसे दबते हैं या फिर मैंने विनोद पर अवश्य कोई काला जादू कर दिया है ......

भला एक गाढ़े परम्परागत समाज में पहले तो मुखर होकर पत्नी की प्रशंसा उसके पश्चात लड़की होने का दम भरना ... ये कितना भयावह होता है विनोद क्या समझें ... भोले हैं और अनन्य प्रेम करते हैं मुझसे ....

वो तो बागान में चले गए ये बोल कर ..लेकिन अब सब कुछ मुझे झेलना बाकि है ... उस दिन घर के किसी सदस्य ने मुझसे सीधे मुँह बात नही की ... यहाँ तक बाबूजी जो बेटी ..बेटी कहते हुए नही थकते उनको भी माँ और दीदी ने इतना भर दिया कि उन्होंने उस दिन मेरे हाथ छुआ भोजन ही नही किया ....

बहुत शौक था मुझसे सजने का .. श्रृंगार मेरी सबसे भली सखी थी ...लेकिन आज जब दर्पण में स्वयं के अस्तित्व को निहारती हूँ तो लगता ही नही कि कभी मैं वो आफत रही हूँ जिसपर पूरे डिग्री कॉलेज के लड़के जान सेंकते थे ....

इन सब के बीच मुझे अनुभव वर्मा पसन्द थे ... अनुभव  जिन्होंने कभी मुझे आँख उठाकर नही देखा .. न ही कभी ये एहसास होने दिया कि मेरी सुंदरता एवं मादकता निरंकुश है ....

सैकड़ो सजीले और धनाढय युवाओं के मध्य ... एक चालीस साल के व्यक्ति मेरे आकर्षण का जबदस्त केंद्र बन गए ....इतना कि इतिहास विषय से खास लगाव न होने पर भी मैं उनका लेक्चर बिना कुछ समझे सुनने लगी या उन्हें एकटक होकर देखने लगी .....

वो दिन अब भी देह में सरगोशी करने लगता है जब पहली बार वो मेरे करीब आये और बोले -

" थैंक्स पायल तुम्हारी वजह से मेरी बोरिंग क्लास सबसे अधिक स्टूडेंट्स अट्रेक्ट करने लगी है "

उस समय तो मैं मात्र उनके हिलते होंठों और आंखों के मध्य उलझी थी लेकिन रात को मम्मी-पापा संग डिनर करते हुए जब मुझे इसका मतलब समझ मे आया तो मेरी हँसी रुकने से नही रुकती थी ....

मैं प्रेम में थी बिना ये जाने -समझे कि जिस रिश्ते को मैं जीना चाहती हूँ उसकी कोई जमीन ही नही ....

और ये जमीन तब बुरी तरह पैरों तले सरक गई जब ... मेरे लिए प्रीतमगढ़ के पूर्व जमींदार घराने  से रिश्ता आया .... वो भी उनके सबसे छोटे बेटे विनोद का .... ये पहले तो इसलिये अस्वाभाविक था क्यूँकि कहाँ हम और कहाँ वो लोग .... परन्तु दर्द ने हृदय को तब द्रवीभूत कर दिया कि जब पता चला ये रिश्ता अनुभव वर्मा ने मेरे लिए सजेस्ट किया था ....

माना मॉडर्न लड़की हूँ लेकिन मना करने की कोई भी सतही वजह नही थी मेरे पास क्यूँकि पापा के रिटायरमेंट को अब सिर्फ 5 साल बचे थे ... और उनके सर अभी मेरे बाद दो बेटियों का विवाह अतिरिक्त बोझ था ....

विनोद के संग जब फेरे ले रही थी तब अनुभव मेरे ऊपर पुष्प वर्षा कर रहे थे ... जो मेरी देह में उस क्षण किसी अंगारे गिरने की अनुभूति करा रहे थे ......

क्या सुहागरात होती ..सुहाग की उस रात मुझे पता चल गया कि अधूरापन कितना अधिक पीड़ा देता है या पूर्ण हो जाने का अनुभव इस संसार का सबसे दीर्घतम सुख क्यूँ हैं ......

सुहाग रात की अगली सुबह से एहसास हुआ कि मेरे जीवन   की ये सुबह मेरी अब तक कि गुजर चुकी समस्त प्रभातों में अलग क्यों हैं .....

पल्लू ज्ञात नही लेकिन इतना भान तो अवश्य था कि मैंने जीवन के किन्ही भी दिनों में कभी दुप्पट्टा ही नही पहना ... दिल्ली के एक मॉडर्न जीवन से सीधे डिमोशन पल्लू .. साड़ी और कभी घूंघट  में होना ये मेरी प्रतिभा और व्यक्तित्व के साथ कदापि न्याय नही था .....

वो भी तब जब ससुर के संग तमाम जेठ ... सिर्फ एक धोती डाले घर मे नंग -धड़ंग घूमते हों ।।।

आवाज उठानी चाही लेकिन पापा कि तस्वीर सदैव आंख में झिलमिलाने लगती ... मुझे विदा करते क्षण उनके आखरी बोल मुझे किसी भी चिंगारी को विप्लव का रूप देने से रोकते ....उन्होंने कहा था ~

" जो तूने माँगा दिया .. जो तूने चाहा करने दिया ... एक लड़की के जीवन में मैंने तुझे वो सब कुछ दिया जो मेरी हद में भी नही था ... एक बेटी ... के रूप में आज तुझसे सिर्फ ससुराल की गरिमा और उनका सम्मान माँगता हूँ "

कैसा सम्मान .. कैसा पति .. कैसी शादी ... जीवन को ये प्रहसन मेरे साथ ही करना शेष था ... मेरा सब कुछ लुट चुका था परन्तु जो अब भी मुझमें बाकि था काश वो ही नही रहता तो जी लेती .....स्वाभिमान!

विनोद से कभी प्रेम नही कर पाई ... जबकि पूरे परिवार में एक वही व्यक्ति थे जिनका मैं हृदय से सम्मान करती थी ....एक वो ही थे जिनकी बातों में मेरी अपूर्व सहमति थी ... वो व्यक्ति जिन्होंने अब तक मेरे भीतर की बाढ़ को रोके रखा था ....

शादी के दो माह गुजरते ही ... सास की सासगिरी समझ मे आने लगी ..... हर क्षण मुझे ये अनुभूति कराई गई कि मैं जैसे  बेटा पैदा करने हेतु इस घर मे बहुत सारे व्यय के उपरांत लाई गई हूँ .... 

एक बात गम्भीर रूप से पता चली कि ~

" स्त्री ही इस संसार मे स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु होती है "

एक रात विनोद  मेरे पास आये और बोले ~

" मैंने अपने वादे के अनुसार सारा बंदोबस्त कर दिया है ...तुम तैयार हो जाओ बस..."

" लेकिन जाऊँगी कहाँ विनोद बाबू ...? पापा इस सदमे को नही सह पायेंगे ...और उन्हें सच बताकर स्वयं को धिक्कारते हुए में नही देख सकती ...बल्कि अब तो आप का सम्मान भी मुझ पर ऋण सा हो गया है विनोद बाबू "

विनोद को मैंने आज पहली बार झुंझलाते हुए देखा ...फिर वो तपाक से बोल पड़े ~

" तो क्या चाहती हो तुम ... इस नर्क भरी जिंदगी में रहना ....नही करना चाहता था विवाह ... अनेक बार माँ से कहा भी ... पर पिताजी और भाइयों के रौब ने कभी मेरे अंदर वो हिम्मत न पैदा होने दी ... कि मैं उनके सामने सच बोल सकूँ ...तुम्हे भी सच बताने में मैंने दो माह लगा दिए ... पायल ..पागल मत बनो चली जाओ यहाँ से मैंने तुम्हारे एकाउंट में इतना पैसा डाल दिया है कि तुम चाहो तो जिंदगी भर कोठी बनाकर ठाठ से रह सको ... वरना ये लोग तुम्हे तिल -तिल करके मार देंगे उठो ...."

उठ गई मैं ... विनोद सही कह रहे थे ...वास्तव में मेरा जीवन नर्क हो चुका था ...लेकिन विनोद की आंख के आँसू बता रहे थे कि वो मेरे जाते ही पुनः इस घर में एक अनावश्यक कूड़ा पुनः बन जायेंगे ...उनका सबसे बड़ा सहारा अब मैं ही थी इस घर मे या फिर ताकत भी ....लेकिन मेरा सहारा कौन था ये मुझे दूर -दूर तलक दिखाई नही दे रहा था ....

तैयार हुई और चुपके से विनोद ने पीछे वाले रास्ते से मुझे नीचे उतारा .... रात काफी पक चुकी थी कि तभी ~

" चलो बैठो गाड़ी में ...."

मैं बैठ गई और विनोद गाड़ी चलाने लगे .... कुछ ही दूर निकल थे कि तभी विनोद ने गाड़ी पेट्रोल पंप के आगे लगा दी .....और नीचे उतरकर तेल भराने लगे .... कि तभी मेरे घुटने से कार का  बोनेट पॉकेट खुल गया .... और उसमें से एक कागज गिरा मैंने उसको उठाया ... और जैसे ही पुनः पॉकेट में डालना चाहा ... मेरी नजर उस कागज में अपना नाम (पायल) देखकर रुक गई ...

वो मेरी रिपोर्ट थी जिसमें लिखा था कि मैं कभी माँ नही बन सकती ....मैं देखकर चकरा गई ... तभी विनोद ने कार का दरवाजा खोला  मैंने फटाफट वो कागज मोड़ कर अपने दुप्पटे के नीचे छिपा लिया ......

कुछ देर  एक सुनसान स्थान पर मैंने विनोद से गाड़ी रोकने को कहा ..

" विनोद बाबू .. क्या आपका कोई   इलाज नही ... मतलब कोई तो रास्ता होगा जिससे आप पिता बन जायें ...?"

विनोद सकपका कर बोले ~

" नही पायल ... हर दिशा के हर बड़े डॉक्टर से मिल चुका हूँ ... सबका यही कहना है कि तुम बाप नही सकते ... सारी रिपोर्ट नेगेटिव हैं "

मैं आँख में सुबक का एक कतरा भरकर बोली ~

" मतलब ... इसलिए आप मुझे छोड़ रहें हैं .... कि आप पिता नही बन सकते ...?"

विनोद आँख में आँसू ले ही आये और गला भरकर बोल पड़े ~

" नही ... नही ... पायल जीवन हो तुम मेरा ... तुम्हारे बिना जीना अब मेरे लिए एक श्राप होगा ... परन्तु जिस घर में .... मैं रहता हूँ .. उन्हें संतान और वो भी पुत्र इसके अतिरिक्त तुमसे उन्हें और कुछ नही चाहिए होगा ... जब उन्हें पता चलेगा मैं सन्तान उतपन्न करने में असमर्थ हूँ ... तो वो तुम्हारा व्यक्तित्व उसी दिन से शून्य मान लेंगे ... और उसके पश्चात वो तुम्हारी उपस्थिति मात्र को भी नही स्वीकार करेंगे ... नर्क बना देंगे तुम्हारा जीवन ... समझी तुम "

मैं कड़े स्वर में बोली ~

" आपसे कुछ भी न कहेंगे ...? "

" ये तुम्हारा दिल्ली वाला भारत नही पायल ये भारत का  वो असली चेहरा है जिसे मेट्रो शहर से बैठकर नही देखा जा सकता ... पुत्र आज भी इन भीहड़ .. ग्रामीण अंचलों .. कस्बों और नगरों में कुल कलंक होकर भी कुल का दीपक माना जाता है ... मेरा क्या इस बात को दबाकर ये उछाला जाएगा कि तुम सन्तान पैदा करने में असमर्थ हो ....और फिर जो होगा उसके स्मरण मात्र से ही मैं विचलित हूँ ... बहुत पहचान है बाबा और  भाइयों की ... तुम और तुम्हारे पिता इनका कुछ नही बिगाड़ पाओगे ,"

" परन्तु मुझे खोज न लेंगे ये ...?"

" नही ... खोजेंगे .. जब उन्हें ये पता चलेगा कि उनका पुत्र ... संतान पैदा करने के लायक नही ... मैं जाकर बोल दूँगा कि तुम ये राज सबको बताने की धमकी दे रहीं थी इसलिए रात के अँधेरे में काली नहर में तुम्हें मार के बहा दिया .....ये मारने -मरने को अब भी मर्दानगी का विषय समझते हैं तो न मात्र मेरी प्रशंसा होगी बल्कि इस बात के उछलने का खतरा भी जाता रहेगा ... और रही तुम्हारे पिताजी की बात तो मैं उनको चुपके से सब कुछ समझा दूँगा और वे शीघ्र ही तुमसे मिलने तुम्हारे पास आयेंगे "

बस विनोद का चेहरा देखते रही ... और देखते रही कि एक पारिवारिक कायर बेटा कितना बहादुर और प्रेम समाहित करने वाला पति है ....  मेरे प्रेम में इस कदर रीझ कर वो उस अनन्त प्रेम को स्पर्श कर चुका है जिसकी कल्पना भी साधारण मनुष्य नही कर सकता ... अनुभव वर्मा हेतु आज मेरे हॄदय से श्रद्धा निकल रही  थी  कि उन्होंने मेरे लिए उस व्यक्ति का चयन किया जिसके बिना यदि मेरा जीवन आगे यूँ ही चलता रहता तो निःसंदेह एक दिन मुझे किसी की हमदर्दी भी प्राप्त नही होती ....लेकिन आज तो प्रेम का वो क्षीर सागर मुझे प्राप्त हुआ है जो वैतरणी से भी अधिक अनूठा और पावन है .....

तत्काल विनोद के पैरों पर गिर गई और बोली ~

" कैसे ... कैसे .. बोलो कैसे और क्यों मेरा चयन किया विनोद बाबू बोलिये .... क्या आपको लगता है मैं नीच आपके लायक थी क्या आपको लगता है संसार की कोई भी स्त्री आपके लायक है ... ? कहीं छोड़ के नही जाऊँगी आपको ... भला मीरा ने भी कभी कान्हा को त्यागा है क्या ..जोगन और दासी बनकर रहूँगी आपकी और आप यूँ ही ठुकरा देंगे तो जीवन समाप्त करने में कदापि न हिचकूँगी अब ... नही जाऊंगी आप को छोड़कर "

और फूट -फूट कर रोने लगी ....मेरे हाथ में वो रिपोर्ट भी विनोद ने देख ली ।।।।।

कुछ देर सब शांत रहा फिर विनोद साहस से बोल पड़े ....

" ठीक है पायल .. मैंने फैसला कर लिया है .... अब उस घर मे हम भी रहेंगे औए हमारी बेटी भी "

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया ...और अनायास ही बोल फूट पड़े ...

" पर कैसे मुमकिन है ये जबकि इसमें इसमें आई वी एफ भी पॉसिबल नही ऐसा लिखा है ...."

" वो सब मैं सम्हाल लूँगा .... बस तुम आज से गर्भवती हो और हमारे घर मे गर्भवती स्त्री का स्पर्श पति के अतिरिक्त पाप समझा जाता है ..."

विनोद बाबू ने जैसा कहा मैं करती गई आज मुझे नवां महीना लग चुका है ... और पेट में संतान है ये सबको दिखने लगी है ...जबकि मैं जानती हूँ कि इस नाटिका में मैंने वास्तविक सन्तान के सुख को भी झुठला दिया है ... और ऐसे जी रहीं हूँ जैसे वो नन्ही कली मेरी किसी भी थिरकन से न जाग जाये जिसे मैं छद्म ही सही परन्तु अपने गर्भ में महसूस कर रही हूँ ...मुझे विनोद पर पूरा भरोसा था कि वो अवश्य कोई न कोई मार्ग खोज लेंगे और आखिर मैं वो दिन आया जब विनोद बाबू मुझे हॉस्पिटल परिवार से ये कहकर ले गए कि नॉर्मल चेकअप है ..... और फिर फोन में अपने परिवार को सूचना दी कि वो एक स्वस्थ्य पुत्री के पिता बने हैं ....

एक दिन  बाद विनोद बाबू मुझे लेकर घर पहुंचे और परिवार की आँखे और देह सूचित कर रहे थे कि उनपर क्या गुजर रही है .... आज  बेटी दो  साल की हो गई है मेरी और इन दो सालों में मेरे पति का साहस और भूमिका भी परिवार में पहले से अधिक विध्वंसक और प्रभावी हुई है .... यहाँ तक कि वो अब किसी के आगे नही झुकते और न भय खाते हैं ..... उन्हें देखकर परिवार की अन्य स्त्रियों को भी धैर्य मिला है कि यदि उनकी भी पुत्री हुई तो वो न केवल स्वस्थ्य रहेगी अपितु अपना जीवन दोनों हाथों को फैलाकर जीयेगी.....

लेकिन मैं इतना जरूर कहूँगी कि उन महीनों जब मैंने तकिया अपने गर्भ में बांधा एकपल को भी मुझे असहजता नही हुई बल्कि ऐसा लगा मानो वास्तव में मैं गर्भ से हूँ... लेकिन आज भी जब विनोद से पूछती हूँ ये किसके गर्भ से उतपन्न संतान है तो वो चुप्पी खींच लेते हैं ...लेकिन एक दिन पता चला कि विनोद बाबू की सगी बहन जो ऐसे ही किसी राजघराने की बहू है जो उस क्षण गर्भ से थी जब मैं पेट पर तकिया बाँधे स्वयं को तोष देती थी ...याद है मुझे उस क्षण फोन आया था किसी का जब  विनोद झूठ बोलकर मुझे हॉस्पिटल ले गए थे ....उनकी बहन के पति ने कन्या का मुख देखकर ही उसे मृत घोषित कर दिया ... और विनोद बाबू उसे गोद मे उठाकर मेरी गोद मे लाकर डाल दिये ....

डॉक्टर सुमन लता जब मेरी बेटी को टीका लगा रहीं थी तो ये सब सच जो उनकी आंखों के आगे घटा ये भी मुझे बता रही थी अंत मे बच्चे की हिदायत के साथ उन्होंने मुझसे भी कुछ कहा वो बोलीं ~

" नास्तिक हूँ मैं लेकिन अगर ईश्वर होता है तो उससे यही मेरी प्रार्थना है कि इस संसार मे प्रत्येक बेटी को विनोद जैसा वर और पिता मिलना चाहिए ताकि अस्तित्व की इस लड़ाई में बेटी पैदा करने वाली बेटी जब  माँ बने तो न मात्र उसे स्वयं पर गर्व हो अपितु वो स्वयं को विजेता और भाग्य विधाता भी महसूस कर सके ..."

नवाजिश

By~
Junaid Royal Pathan

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