Monday, 9 September 2019

श्राप

#श्राप
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" बेटी ! कुछ लाज के कपड़े पहना करो ... हमारे जमाने में तो...."

" यू ओल्डी! हाऊ डेयर यू ...अपना जमाना और अपनी नेरो सोच रखो अपने बीमार घुटनों में ... अभी दादी बोल रही हूँ ..अब से अगर मेरे और मेरी पर्सनल लाइफ में इंटरफेयर किया तो समझ लेना फिर ..... "

समझ तो मैं भी गया ... मैं कांता प्रसाद उम्र 48 साल ... सोचा एक  थप्पड़ अपनी बेटी के गाल पर जड़ दूं और कहूँ कि अभी के अभी माँ से माफी मांग लेकिन अब देर हो चुकी है .....

बेटी एक्स्ट्रा एडवांस हो चुकी है ... भय है कि कहीं अपनी तरफ मेरा  उठता हाथ पकड़ के न बोल दे कि -

" पापा डोमेस्टिक वायलेंस के थ्रू आपकी  एफ . आई .आर कर सकती हूँ ...."

लेकिन इस समय बेटी की नही माँ की चिंता हो रही थी ... बहुत भावुक और धार्मिक है ... पिता जी गाँव के मंदिर में एक महंत थे .. सम्मान और बेहद रसूख भी था उनका ..  मैं उनका इकलौता बेटा हूँ ... माँ पिताजी के देहांत के बाद गाँव में ही रही कुछ तीन महीने पहले जब उनके घुटने गठिया पूरी तरह खा चुका है तब उन्हें अपने  शहर ले आया ...

मैं जानता हूँ यहां इनका कदापि मन नही लगता ... बड़े नेम -व्रत वाली औरत है माँ ... आज भी पराये हाथ का बना भोजन करना उसे गंवारा नही  .....खुद ही जैसे -तैसे भोजन बना लेती है अपना ...

माँ है .. वो माँ .. जिसकी आज की ये दशा मुझे विचलित कर देती है ... क्यूँकी अब मैं भी एक बाप हूँ .. वरना जब कमसिन था , युवा था तो इन्ही मात-पिता की मैंने न कोई इज्जत की और न कोई देखभाल ....

डरता हूँ क्यूँकि लकड़ी जल के पीछे को आती है ... लेकिन अब मेरे हाथ मे कुछ भी नही रहा .. यहाँ तक घर का संचालन भी मेरी पत्नी अनीता करती है ...

ये वो ही अनीता है .. जिससे मैंने प्यार किया ... ये वो ही अनीता है जिसने पहली बार मेरे अंदर ये जहर भरा कि गाँव और गाँव की सोच किसी शौच से कम नही ....और ये भगवान और संस्कृति अनपढ़ों का टाइम पास है... फ़ॉर अस वेस्ट ऑफ टाइम "

अनीता जिसके रूप के पाश में बंधकर फिर मैं तभी गाँव लौटा जब पिता की देह मुखाग्नि का इंतजार कर रही थी ...

जिस कॉलेज में ..मैं पढ़ता था वहीं अनीता भी पढ़ती थी ... मिस्टर देशराज की पुत्री  अनीता ..मिस्टर देशराज उसी कॉलेज में हमें मनोविज्ञान पढ़ाते थे ... या यूँ कहूँ वो मनोविज्ञान का सहारा लेकर हमारा माइंड वाश करते थे ...  धर्म-मजहब , संस्कृति को ठिगना और साक्षात तुच्छ बताने हेतु वो किसी भी हद तक चले जाने में गुरेज नही करते थे .....

मेरे क्लास के कई मुस्लिम लड़के भी उनसे प्रभावित थे ... मैं मानता हूँ धर्म -मजहब की एक्स्ट्रा डोज समाज मे अस्थिरता उतपन्न करती है ... लेकिन ये भी सच है कि इसी धर्म -मजहब ने हमें अमानवीय और असामाजिक होने से भी अब तक बचाये रखा है ......

धर्म का त्याग न करके भी मैंने अपने धर्म और संस्कृति की चिता तब जलाई जब पहली बार अनीता एक प्रोफेसर के तौर पर नही एक पिता के तौर पर  मुझे अपने पिता से मिलाने अपने घर ले गई ....

मिस्टर देशराज उस समय ड्रिंक कर रहे थे ... और अपने विद्यार्थी को भी जाम परोसने में उन्होंने तनिक संकोच नही किया .. बल्कि प्रोत्साहित किया कि यही वो जाम है जो हमें प्रगतिशील बनाता है.....

उन्हें कोई आपत्ति नही थी कि उनकी पुत्री मुझसे प्रेम करती है ...कोई शिकवा नही कि उनकी और मेरी पुत्री की जात मैच नही करती थी बल्कि वो ठहाका लगाकर बोल पड़े ....

" मिसेज देशराज .. मीन्स .. मदर ऑफ माय डॉटर भी डिफरेंट कास्ट के हैं और वी आर हैप्पी ... अब तक "

बहकी हुई मिसेज देशराज जब ऊपर से सीढ़ियों से नीचे आई ... मेरी नीयत उनपर उसी पल बेईमान हो उठी ... अत्यंत कामुक  थी वो स्त्री .. जिन्हें उन्हें तंग और छोटे कपड़े वासना की देवी बना रहे थे .... उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और सीधे मेरे गाल चूम लिए ....

आज विश्वास करना स्वयं मेरे लिए भी कठिन है कि मैं उस रात जब तलक अनीता के घर रहा तब तलक मेरी दृष्टि मिसेज देशराज के बदन से कहीं और नही फिसली ....जबकि प्रगतिशील मिस्टर देशराज बार -बार मुझे देखकर मन्द -मन्द मुस्कुराह रहे थे और मिसेज देशराज जैसे आंखों से मेरी इस जुर्रत पर मन ही मन मुझे प्रोग्रेसिव सर्टिफिकेट दे रहीं थी ....

अब शाम और सुबह मिस्टर देशराज के घर से शुरू होती और वहीं खत्म भी .... शादी से पहले ही मेरे और अनीता के बीच अनेकों बार शारीरिक संबंध बन चुके थे ....

मैं अपने और मिसेज देशराज के मध्य क्लोज सम्बंधों को  जाहिर करने का कभी साहस नही कर सकता .... लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि उस औरत की वासना हमारे पावन संबंधों की बलि कब की ले चुकी थी ....और ताज्जुब है कि अनीता को खटका होने के उपरांत भी वो उसको माँ कहती थी
...

जबकि माँ तो वो थी जो मेरे पिता के भी कमरे में दाखिल होते ही सर पर इस डर से पल्लू खींच लेती थी कि कहीं पिता के साथ कोई अन्य व्यक्ति तो घर मे दाखिल नही  हुआ है ....

ऐसा नही मेरे स्वर्गीय पिता संकीर्ण सोच के थे और माँ को ऐसा करने हेतु बाध्य करते थे मैंने एक बार पिताजी को माँ से कहते सुना भी था कि -

" अनुपमा इस गाँव मे पर्दे का रिवाज नही फिर क्योंकर पल्लू सर पर चढ़ा के रखती हो ..?"

माँ ने जो जवाब दिया उसे आज तलक भूल ही नही पाया -

" पेट से हूँ पंडित जी ... पता नही पेट में कौन है ... परन्तु यदि लड़की है तो निःसंदेह लाज , शर्म और मर्यादा क्या होती है सीखाने की आवश्यकता नही पड़ेगी ... माँ का आचरण उसे सब कुछ सीखा देगा "

पिताजी इतने प्रफुल्लित हुए कि उन्होंने माँ को अंक भर लिया और हौले से कान के पास बोले कि यदि पुत्र हुआ तब -

" तब क्या मेरा गर्भ कोई प्रयोगशाला की परखनली थोड़ा ही है ...चिंता न करें मेरा गर्भ और आपका रक्त बेटे के लिए भी मर्यादाओं की पाठशाला सिद्ध होगा और बेटी के लिए भी "

आंख से आँसू का फुव्वारा छूट जाता है जब माँ के इस विश्वास की बलि चढ़ाते क्षण मैंने कदापि उनके संकल्प और विश्वास का स्मरण नही किया गया....

और आज जब प्रगतिवाद की अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अपने संस्कारों को पीछे छोड़ कर मुँह के बल नीचे गिर पड़ा हूँ.. तब जिसका सहारा मुझे खड़े होने को चाहिए था उसी सहारे ..उसी  माँ के पैर बेजान हो चुके हैं .....

बेटी कामाक्षी जो अपना नाम किसी भी बाहरी व्यकित को " केटी " बताती है अब सिगरेट और वोडका भी पीने लगी है ... जो वासना मेरे हृदय में मिसेज देशराज को देखकर हिलोरे मारती थी वही नजर घर के नौकर -चाकर  ,ड्राईवर और समाज अब मेरी बेटी पर रखता है .....

मुझे नही पता आगे क्या होगा परन्तु इतना ज्ञात हैं कि जो होगा वो पुनः एक पीढ़ी की जड़ खोदने हेतु पर्याप्त होगा .....

माँ अपने साथ गाँव से एक छोटा सा मन्दिर लेकर आई है ... और वो भी मेरी वेस्टर्न बीवी की आँख में अखरता है .... देशराज आफ्टर रिटायरमेंट अब्रॉड में शिफ्ट हो गए लेकिन मैं कहाँ जाऊँ अब कोई दूसरा मार्ग दिखाई नही देता ....

शराब और नशा भी अब बेअसर हो चुका है ... किसी एकांत में जब फूट-फूट कर रोता हूँ तो पिताजी आंखों में झिलमिलाने लगते हैं जो कहते थे कि-

" प्रगति जब भी बेलगाम और मुँहजोर हो जाये संस्कार के कुछ छींटों से मुँह के बल गिर पड़ती है  "

कभी गिर पड़ता हूँ अब माँ कर चरणों में ... और माँ के सामने सदा खुद को  हँसते-मुस्कुराहते पेश करता हूँ  लेकिन माँ है ..गर्भ से जानती है कि मेरे सुख और दुःख में..मेरे शरीर की हरकत क्या होती है ....वो बोलीं ~

" बेटा मायूस न हो ... चल गाँव चलते हैं .. तेरे बाबूजी अब भी इतना छोड़ गयें हैं कि तेरी पीढियां भी मुँह झूठा करके छोड़ सकती हैं ...चल बेटा गाँव चल न तुझे इस नर्क में जलते हुए देख सकती हूँ न स्वयं के आत्मसम्मान को "

मन किया तुरन्त उठ कर आँसू पोंछ कर माँ को हाथों में उठाकर गाँव को दौड़ भर दूँ -....तभी

" वाह बुढ़िया वाह ...क्या पट्टी पड़ा रही है अपने बेटे को ...क्या जहर भर रही है इनके अंदर ... लेकिन जा ले जाती है तो ले जा ... वैसे भी ये आदमी हमेशा जिम्मेदारी से मुँह छिपाता हुआ ही आया है ...कल मेरे लिए तुम्हे छोड़ा आज तेरे लिए मुझे भी छोड़ सकता है "

मैंने मुट्ठी भींच ली कि तभी माँ बोली -

" वाचाल ..नीच ...किससे ऊँची आवाज में बोल रही है पंडित रमा प्रसाद शास्त्री की पत्नी से ... श्राप   है मेरा जिस जिह्वा से तूने मेरा और मेरे बेटे का सदा अपमान किया वो जिह्वा ध्वनि के अतिरिक्त कोई वर्ण संयोजन न कर पायेगी कभी  ...ये जल साक्षी है कि तेरे  और मेरे संस्कारों का ..... "

माँ की मुट्ठी का जल जब अनीता के बदन पर गिरा ...आनीता ठहाका लगाकर जोर से हँसी इतने में मेरी बेटी भी कॉलेज से लौट चुकी थी ...माँ -बेटी पुनः एक दूसरे की आंख में आंख डालती हैं और फिर अविराम हँसती जाती....

" देखा केटी श्राप दे रही है ...वही जो स्टूयपिट धार्मिक एपिसोड्स में लम्बे बाल वाला .. साधु देता है ...हा हा हा ..."

" ममा ... शराब बोलती होगी प्रोननसियेशन नही कर पाई ढंग से .....  इन्ही लोगों की वजह से इंडिया आज तक डेवलप नही हो पाया ....फूल .....हा हा हा ..."

भर गया था मैं ..और सीधे भींची मुट्ठी को पता नही क्यूँ एक जबड़े से टकराने का साहस अर्जित हो गया .... लेकिन मेरा माँ की पलंग से उठना था और अनीता का लड़खड़ाकर जमीन में गिरना .... उसे सीवियर पैरालाइसिस अटैक पड़ा  .... वो छटपटाने लगी ... मैं उसकी तरह तेजी से दौड़ा ... और सीधे ड्राईवर को बुलाकर उसे हॉस्पिटल ले गया .... पता चला कि उसके शरीर का आधा हिस्सा बेजान हो चुका है .... और जुबान पूरी तरह ऐंठ चुकी है ...... डॉक्टर का कहना था कि ये लिमिट्स से ज्यादा एल्कोहल और निकोटिन लेने की वजह से हुआ है लेकिन मुझे पता था कि असल वजह क्या है .....

आज अनीता हांलाकि काफी हद तक रिकवर कर चुकी है लेकिन उसकी रिकवरी में डॉक्टर या मेडिशन का कोई हाथ नही ..माँ के घरेलू टोटके और ज्ञान उसे पुनः वापिस ले आये ....लेकिन उसकी जुबान से मात्र आज भी ध्वनि ही श्रावित होती है कोई शब्द सुनना जैसे सदियों का इंतेजार है .....

इस प्रत्यक्ष घटना ने कामाक्षी के जीवन को भी बुरी तरह प्रभावित किया ... पता नही कैसे वो अब उस सीधी राह पर चलने लगी है जिसपर उसकी दादी का पूर्ण नियंत्रण हैं .....

आज जीवन में सब संतुलित है ... लेकिन पुनः मुझे नवजीवन देने वाली मेरी माँ मुझे छोड़ चली है ... मुझे आज उम्र के इस पड़ाव में भी इस प्रश्न का जवाब नही बन पाता कि एक माँ का श्राप क्या इतना प्रभावी होता है ... ? क्या ये सच है कि  माँ के चन्द शब्द एक देह को अपंग कर सकते हैं ...? क्या ये सच है कि भगवान की तरह माँ भी विज्ञान हेतु एक पहेली है ....? और क्या  बाबूजी ठीक कहते थे कि -

"" प्रगति जब भी बेलगाम और मुँहजोर हो जाये तो संस्कार के मात्र कुछ छींटों से मुँह के बल गिर पड़ती है "

सब कुछ असम्भव  जैसा प्रतीत होता है लेकिन  तभी बेटी कामाक्षी की आवाज कान से टकराती है  ~

" पापा आइये आरती का समय हो रहा है ......"

नवाज़िश

BY~
Junaid Royal Pathan

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