Friday, 13 September 2019

जुम्मे की रात

#जुम्मे_की_रात_थी
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" अरे जुम्मे की रात है .....
अरे जुम्मे की बात है ....
अल्लाह बचाये मुझे
तेरे वार से ........."

" सलीम भाई आओ यार ... अबे वहाँ क्याया मचल रिये हो ... अब्बे डी .जे पे आओ ....."

मन तो तबियत से कर रहा था ... पाँव के पोरे भी थिरकन दे रहे थे ... बदन में खून भी घोड़ा पछाड़ मार रहा था ... मगर बड़े भाईसाहब ने मना किया है कि -

" सलीम अगर मुहल्ले के लौंडों संग देख लूँगा तो समझ ले हुक्का- पानी और ख़र्चा सब बन्द "

भाईसाहब ठीक कहते हैं .. क्यूँकि वो मुझसे बेहद प्यार करते हैं ... ये मुहल्ले के लौंडे मुँह के सामने मुझे सलमान खान बोलते हैं ... और जब , जेब पूरी लूट लेते हैं तो  पीठ पीछे फिर बुढ्ढा बोलकर हँसते हैं मुझपर ....40 साल में कौन बुढ्ढा हो जाता है बे ...जबकि सलमान भाई 50 पार करके अभी भी लौंडे कहलाते है ....तभी...

" लियो बे .. घण्टा न आएगा अपना सलीम भाई ... बेटा तुम लोग तो कहते थे कि सलमान के लिये जान भी दे देगा सलीम भाई .. थू है साला ऐसे फैन पर "

कसम खुदा की बात अब सलमान भाई पर आ गई ...और मेरी उनसे मुहब्बत पर ... इसलिए भाईसाहब की बात से मुकर कर डी. जे पर चला गया ... कसम अल्लाह की सलमान  भाई का जबर फैन हूँ... उनकी हिट की तो सबने चुस्की ली ..लेकिन भाई की थकी से थकी फ़िल्म मैंने अकेले पूरे खाली कुर्सियों का टिकट लेकर झेली है ....और फिर ...नाचते -नाचते पता ही नही चला कि कब भाईसाहब सामने आकर खड़े हो गये ....

एक करारा तमाचा उन्होंने मेरे गाल पर रसीद किया और बोले ~

" जलील तू न सुधरेगा ...एक रुपये की कमाई नही करता .. न नमाज .. रोजे ..दुरूद का और जब देखो इन नालायकों के साथ बच्चा बना रहता है .... अबे सलमान का पेशाब नही है तू समझा ... ये तेरा मजाक उड़ाते हैं .. मजे लेते हैं तुझसे ... घर मत आइयो अब समझा यहीं रहना इनके साथ ... कमजर्फ "

न कुछ न लिया दिल में .. लेकिन वो पेशाब वाली बात पिंच कर गई भाईसाहब की ... कुछ और कह देते ...खैर रात उसी  डी.जे फ्लोर पर गुजारने की सोची  जिसमें अभी जुम्मे की रात चल रिया था .....

किसी छिछोरे ने नही कहा कि सलीम भाई मेरे घर चलो ... न किसी ने पूछा कि भाई खाना खाया की नही ...?

गुमशुम गुजरती रात में जब जिस्म में ठंडक लगने लगी तो देखा किसी ने कम्बल ओढ़ाया ... तुरंत देखा तो पाया कोई साहब आंखों में आँसू लेकर बस मुझे एकटक देखे जा रहे थे ...मैं बोला~

" शुक्रिया भाईजान ... यहाँ के तो नी दिख रिये हो ... डंडापुर से हो क्या...?

जादू हुआ वो लुगाई रोना छोड़कर बोल पड़े -

" सलीम मैं अहाते वाली झांप पर मिलूँगा ... जब भी मिलना हो आ जाना ... "

तुरन्त बोल पड़ा -

" शौकीन हो क्या ... अल्लाह तौबा वो वाला नही हूँ भाईजान "

" मैं जानता हूँ तुम वो नही जो सब होते हैं .... जब भी सब से हारो ... जीत की राह पकड़ लेना "

इतना कहकर भाईजान लड़ी हो लिये ... सुबह भाभी का दिल पिघल गया तो भतीजे को भिजवाकर अपनी कसम देकर घर बुला लिया ... जाना नही चाह रिया था लेकिन भूख ने शर्म को बड़ी बेशर्मी से मार दिया ....

खैर कुछ देर में सब पटरी पर लौट गया ...भाईसाहब भी उपदेश सुनाकर माफ़ कर दिए ... पहले जम के नाश्ता लूटा ..फिर नहाया- धोया और सोचा जरा बालों का लुक राधे भैय्या से वांटेड वाला करवा के आऊँ कि तभी --

" अबे अब कहाँ जा रिया है सलीम ..?. सुन बे शहर जा रिया हूँ माल का ओडर देने शाम को लौटूँगा जरा दुकान सम्हालियो ..लेकिन याद रख न मक्खी दिखे दुकान में न मुहल्ले के लौंडे "

सीन तेरे नाम का लग रिया था ..भाई चाहता है राधे सुधर जाए और राधे .....

" अबे कहाँ खो गया ...जा दुकान का ताला खोल ..."

ताला भी खोला और भगोने भी गद्दी में गड़ा दिए ... तभी कमल और नईम आते दिखाई दिए ...

" क्याया सलीम भाई ... कल महफ़िल लूट ली  ..भगवान कसम क्या नाचे हो यार ..मतलब सलमान भाई देख लेते तो अपनी नई वाली में लीड रोल दे देते भाई ... जरा एक डब्बा सिगरेट तो दियो ..."

" तुम्हारी माँ का ...निकलो भूतनियों के .. अब न फसऊंगा तुम्हारे जाल में ... निकल यहाँ से चल  और वो चॉकलेट रख नीचे ...."।।।।। तभी

" ओये तेरी अबे देख तो अब्बे इधर देख कमल क्या चीज है ... अबे कौन है ...?"

वाकई में वो चीज ही थी ... बिल्कुल  सलमान भाई की एक थकी पिटी फ़िल्म की हीरोइन .. नाम याद नही आ रहा .... तभी वो आफत करीब आई और बोली -

" एक्सक्यूज मी ! यहाँ कोई सलीम मतलब सलमान के फैन रहते हैं कहाँ मिलेंगे ? "

मैं मुँह फाड़ के देख रहा था कि तभी नईम बोल पड़ा ....

" ये.. ये.. ये हैं तो ... यही हैं सलीम भाई "

हसीना कातर अंदाज में बोली -

" ओह्ह राधे लुक .. तो मिस्टर सलीम ..मुंबई से आई हूँ ... वो क्या है सलमान भाई को पता चला गया है कि आप उनके सबस बड़े फैन हैं तो आपसे मिलना चाहते हैं ...."

सपना .. खुली आंख से .. या अल्लाह ... मैं कुछ बोल ही नही पाया कि तभी भाभी सीढ़ियों से नीचे उतर गई ... बहुत मासूम हैं तो रो पड़ी ...और बोली -

" ले सलीम सुन ली अल्लाह ने तेरी .. तेरी दीवानवी रंग ले आई ... बहन आओ ऊपर आइए .. हमारे गरीब खाने में ।..."

वो ऊपर चढ़ी और मैंने शटर नीचे किया ...और बोला -

" बुझी कुप्पी की औलादों दफा हो लियो बे ... देख लिया भाई को किसने याद किया है "

चाय बिस्कुट और तगड़ा नाश्ता हड़पकर मोहतरमा बोली ...

" तो सलीम भाई का सामान पैक करवा दीजिये अब कुछ दिन इन्हें मुंबई ही रहना होगा ... दरअसल हमारी गाड़ी खराब हो गई इसलिए यहां पैदल आना पड़ा "

झटके में समान तैयार ... और भाभी ने मेरे हाथ मे कुछ 5 हजार रुपये रख दिये ...

" हा हा हा हा .. मैडम ये क्या रख रही हो ... सलमान के कुत्ते मायजान के बिस्किट का एक दिन का ख़र्चा है ये .... आपने सुना होगा सलमान जिससे प्यार करते हैं उसे फिर सीधे कार और बंगला देते हैं ...लेकिन कम से कम इतना तो सलीम भाई को दो कि वो सलमान भाई के लिए कोई अच्छा सा गिफ्ट खरीद सकें "

भाभी शर्मिदा हुई तो मैं बोल पड़ा ...

" भाभी .. मैडम सही बोल रहीं है लाख सवा लाख तो चाहिए होंगे"

" लेकिन इतना पैसा मैं कहाँ से लाऊँ ...?"

मोहतरमा बीच में बोल उठी -

" बहन सलमान वो इंसान हैं जो एक के बदले लाख देता है ... देखना पहली मुलाकात में ही कोई दस बीस लाख इनके हाथ में नही रख दिये तो कहना फिर ..."

भाभी सकपका गई लेकिन फिर उठी और खटिया के नीचे से एक से एक संदूक निकाला ...और एक गठरी से कुछ जेवहरात निकाल के उस लड़की के हाथ मे रखे ....

" बहन यही है मेरे पास इस वक्त सलीम के भाईसाहब शहर गए हुये हैं ...नही तो वो जरूर अपने भाई को भरकर विदा करते ... आप इन्हें कहीं भी गिरवी रखवा कर पैसे ले लीजियेगा बाद में सलीम तुम सलमान से  पैसा मिलते ही इन्हें  छुड़वा देना ...मेरी अम्मी की यही एक आखरी अमानत है जो मैंने तुम्हारी भतीजी इकरा के लिए रख छोड़ी है ..."

धूमधाम से विदा हुआ बस अड्डे तक ..क्यूँकि मोहतरमा की गाड़ी खराब हो गई थी और फोन में उधर से भाई बोल रहा था कि तुम डंडापुर पहुँचों हम वहीं गाड़ी लगाते हैं .... लौंडो ने मुहर्रम के ढोल और ताशे फोड़ दिए ... गणेश उत्सव कमेटी ने तो नगाड़ा लगा दिया ... कोई  सर पर गुलाल छिड़कता तो कोई हाथ चूमने आ जाता ...उस दिन सेल्फी खिंचवाने वाले भी जैसे टूट पड़े ... पीछे पलटकर देखा मेरी तो पाया मेरी भाभी की आँख अब भी मचल रही है ...

बहुत से अरमान दिल से आंखों में उतारकर बस की सीट पर न जाने कब मुझे झपकी लग गई और उसके बाद -

" ओये भैय्ये डंडापुर आ गया ... उठ .. अबे उठ न "

उठ गया लेकिन मेरा जनाजा ... न बगल में वो मोहतरमा थी न मेरा बैग और न वो जवाहरात जो भाभी की अमानत ही नही उनकी इज्जत भी थे ...

कोतवाली में रिपोर्ट की तो उन्होंने पल्ले के और पांच हजार झाड़ लिए की केस जल्दी निपटाने का बयाना है ये बोलकर....कैसे घर लौटता किस मुँह से घर लौटता...क्या कहता कि मुझे लूट लिया गया है ...

तो याद करता हूँ कि मुझे कब किसने नही लूटा ... याद आता है कि बचपन से लेकर आज तक मेरे इसी भोलेपन का सबने फायदा उठाया .. याद आई अम्मी जो आखरी वक्त में मेरा हाथ भाई के हाथ मे देकर बोली थी -

" नदीम बहुत मासूम है ये ... सिर्फ जिस्म से फैल गया है अक्ल से अब भी बच्चा है ये ... इसका ख्याल रखना बेटा ..."

अम्मी की आखरी हिचकी और  भाभी की आँख से टपकते आँसू धिक्कार रहे थे मुझे ...एक नकली जिंदगी एक  फिल्मी हीरो ने मुझसे मेरी असलियत छीन ली ...काश मेरा हाल मेरे मुल्क का वो बच्चा-बच्चा देख लेता जो आज फिल्मी पर्दे की इस चकाचौन्ध में अपना भविष्य अपनी तालीम सब फनाह कर देता है ... वो बच्चियां देख लेती जिनको ये फिल्मी जिंदगी इस्तेमाल होने  वाला गुसलखाने  का साबुन बना देती है ...लेकिन मैं किसको देखूँ और कौन मुझे .... इसी कसमकश में बहते दरिया में कूदना मुनासिब लगा ... लेकिन तभी एक भिखारी ने हाथ खींच लिया ...

वो मुझे धिक्कारता रहा लेकिन मेरी आँखों के सामने उसके जिस्म पर लिपटा कम्बल चमकने लगा और याद आया वो मंजर जब किसी ने कुछ यूँ कहा था कि -

" जब भी सबसे हारो जीत की राह पकड़ लेना "

मैंने तुरन्त उस भिखारी से भीख मांगकर अहाते वाली झांप के लिए गाड़ी पकड़ी ... और जैसे ही मैं झांप के करीब पहुँचा ....

" आओ सलीम ... अच्छे वक्त पर आये हो ....खाना खाने ही वाला था "

मेरी आँख से आँसू की बौछार छूट गई ...

" सलीम ये आँसू अगर तुम्हें वो दिला सकतें हैं जिसकी वजह से तुम यहाँ हो तो जी भर के रो लो लेकिन अगर ये मिट्टी का एक ढेला भी तुमको न सौंपे तो रोक दो इन्हें और बताओ क्या बात है ..?"

एक सांस में कभी सुबकते कभी उखड़ते मैंने सब कुछ उन्हें बता दिया ....

एक थाली मेरी तरफ करके वो खाना खाते रहे एकपल उनका हाथ नही रुका .....खाना खाकर हाथ पोंछकर वो बोले ~

" सलीम ! मैं तुम्हें तुम्हारा सबकुछ वापस करवा सकता हूँ  ...लेकीन हरगिज नही लौटाऊँगा ...."

मेरे मुँह से अचानक छूट पड़ा

" लेकिन क्यों ..?"

वो  फिर सिगरेट होंठो पर लगाकर फिर उसे जलाकर बोले -

" इसलिए कि तुम वो इंसान हो .. जो सिर्फ इसलिये पैदा होते हैं कि कुल को फूँक सकें .. पीढ़ियों का नाश कर सकें ... अपने आश्रयदाताओं को भिखमंगा करके उन्हें सड़कों पर ले आयें ..तुम वो नाकारे इंसान हो जो न किसी के आँसू से पिघलते हैं ..न किसी की भावनाओं की अनुभूति करते हैं .... तुम जैसा इंसान सिर्फ परिवार पर ही नही अपितु उस समाज उस देश पर भी बोझ होता है जो देश   नाजुक दौर से गुजरते वक्त अपने नागरिकों में एक वास्तविक नायक तलाशता है ... तुम वो कायर और निर्लज हो जिसने अपनी माँ के समान दुलार करने वाली भाभी को कभी कान की एक बाली  अपनी कमाई से लाकर नही दी ... अपने भतीजे और भतीजी के सर पर हाथ फेर उन्हें कभी अपनेपन का एहसास नही होने दिया ... तुमसे बाप की तरह प्यार करने वाला तुम्हारा भाई उसे तुमने कभी ये न लगने दिया कि वो अकेले नही तुम उनके साथ हो उनकी ताकत बनकर ...... तुम एक फिल्मी हीरो की छाप और नशे में इतना भूल गए कि जिंदगी में तुम्हारे असली हीरो तुम्हारे अपने हैं ..... आज मैं तुम्हे  सब कुछ  लौटा दूं ... लेकिन मुझे डर है कि कल फिर तुम परछाईयों का पीछा करते-करते मुझ तक न पहुँच जाओ ...."

गढ़ गया था मैं जमीन पर ... और उनका हाथ पकड़कर बोला ~

" नही भाईजान आपसे अब कुछ नही चाहिए.... क्यूँकि आप ने जो मुझे अभी दिया है वो कोई नही दे सकता ....मेहनत करूँगा .. मजदूरी करूँगा ... जिंदगी में असल हीरो बनकर ही अब अपने घर लौटूँगा ... भैया -भाभी के सारे सपने और अरमान पूरा करने के लिए न दिन देखूंगा न रात ....क्यूँकि मैं समझ गया हूँ कि जिंदगी पर्दे पर कुछ और हकीकत में कुछ और होती है .... चलता हूँ भाईजान "

कुछ आगे बढ़ा ही था कि पीछे से आवाज आई ~

" रुको सलीम .... बेटी निर्मला सलीम को उनका सामान और जेवहरात वापस कर दो "

जादू ही था कि वो लड़की जिसने मुझे लूटा था वो अचानक से सामने आई और उसने बाइज्जत नजर झुकाकर मेरा सामान मुझे सौंप दिया ....मैं हैरत से चौकन्ना होकर बोला ~

" ये सब क्या है भाईजान .. कौन है ये लड़की ...? आप कौन हो ...?"

सिगरेट को पैर से रगड़ कर बुझाते हुए -

" कल के नामी राइज मिल डायमंड का मालिक विश्वनाथ अवस्थी ... जिसे उसके इकलौते बेटे कुणाल अवस्थी  ने ऐसे ही एक फ़िल्मी हीरो का पिछलग्गू बनकर इस किराए के कमरे में लाकर खड़ा कर दिया ...  सब कुछ दांव पर लगाकर उसने न सिर्फ मुझसे मेरी बीवी छीन ली बल्कि फिर असफलता और  नशे ने मेरे बेटे की जिंदगी भी .... ये मेरी बेटी यहीं पास के कॉलेज में पढ़ती है और मुहल्ले के बच्चे पढ़ाती है और मैं दिन -भर कम्बल बेचकर उन लोगों को तलाशता हूँ जो मेरे बेटे की राह या तो पकड़ चुके हैं या पकड़ने को तैयार हो रहें हैं "

कदमों में गिर गया उनके ... और फूट-फूट कर रोने लगा ... उन्होंने बड़ी इज्जत से मुझे उठाया और बोले ~

" पैर अब बहुत दर्द करते हैं सलीम.. इसलिए सिर्फ तुम्हे ही खोज पाया जबकि हर पल ये फिल्मी पर्दा ढेर सारे कुणाल और सलीम को न सिर्फ ढूंढ रहा है बल्कि उनके लिए छुरी और फंदे भी तैयार कर रहा है .... "

खामोश हुआ और फिर उनका हाथ अपने हाथ मे लेकर बोला ~

" अब आप अकेले नही है भाईजान ..... "

मुहल्ले में लौटा तो लोगों ने खूब सवाल किए .. आतिशबाजी की..  भाभी को उनके जेवर सौंपे ... भाई के पैर पकड़कर बहुत रोया उनसे माफी माँगी अपने भतीजे और  भतीजी को गोद मे लेकर खूब सारी बातें की ... अगले दिन दुकान का ताला तड़के उठ कर खोला ....और भाईसाहब के दुकान पर आने पर  दिनभर उन नौजवानों और बच्चियों की तलाश शुरू कर दी जिनके संस्कार .. तरबियत .. और भविष्य को फिल्मी पर्दा धीरे-धीरे काट रहा है .........

लोग कहते हैं दिन का सूरज लोगों की जिंदगी बदलता है लेकिन कोई क्या जाने कि जुम्मे की एक रात ने मेरी जिंदगी ही बदल दी .... 

नवाज़िश

By ~
Junaid Royal Pathan

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