#गुरु_घण्टाल
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" जे मज्जे लिए तो गुरु ने लिए ...न ताड़ न तोड़ा ...फोड़ा कच्चा फोड़ा ..."
" जे कसम अम्मा की ! कल्कि ऐसे ही सुवरों का गला रेतने आयेंगे अब "
" अबे गुरु घण्टाल अबे विद्यालय की तो छोड़ देता ........"
आम बात है ... अब ये सब ... रोज सुनता हूँ तो हैबिट सी बन गई है ... पहले बुरा लगता था ..न..न मतलब बुरा नही दर्द होता था ...कमरा बन्द कर सिसकियों में रोता था ... कई बार तो ऐसा भी हुआ कि सोचा खुद की जान ही ले लूँ .....
बचपन में जब मेरे हिंदी अध्यापक दशरथ प्रसाद शर्मा जी ...गुरु की महिमा के गुणगान करके बोलते थे कि गुरु संसार रूपी अँधरे में एक विद्यार्थी के लिए उसके पग का दीप है तभी से मुझे लगने लग गया था कि गुरु कोई आसमानी व्यक्तित्व होता है ...और उसकी निंदा करना ..अपमान करना ...अवहेलना करना ..उपेक्षा या असम्मान साक्षात वो पाप है जिसे गंगा मैय्या भी धोने में असमर्थ है ....
गुरु ब्रह्मा ..गुरु विष्णु ...गुरु देवो ...ने तो ये तक जता दिया कि गुरु भगवान से भी ताकतवर और चमत्कारी है ...लेकिन बाल मन फिर इस चक्रव्यूह को नही भेद पाता कि आखिर गुरु इतना ही तगड़ा ..साबुत और सुप्रीम पावर है तो उसका इस पृथ्वी में कोई मंदिर और दरगाह आदि क्यूँ नही दिखाई देती .....?
गुरु की इस तेज चक्कर रौंदती कट्टरपंथी ने मुझे हमेशा आकर्षित किया ...मतलब कभी -कभी तो लगने लगा कि गुरु क्या वास्तव में मनुष्य होता है ..?
क्यूँकि जिस बेरहमी से मेरे गुरु मुझे पीटते थे मुझे सन्देह होता था कि कहीं गुरु कोई मशीनी जीव तो नही जिसके अंदर हृदय नही होता .... लेकिन फिर विश्वास बना रहता कि गुरु कम से मेरी माताजी के बाद इस समूल पृथ्वी का एक शानदार जीव है ...क्यूँकि
मेनका अवस्थी रंजन कला की शिक्षिका थी मेरी ... वास्तव में अपने नाम के अनुरूप देवी थी वो ...उन्होंने मुझे भरकस समझाने का प्रयास किया कि वो अपने छात्रों को भारत की अंधी बेरोजगार भीड़ का अंग बनने नहो देगी और जो विषय रोजगार नही दे सकता उसे पढ़ाकर वो पाप की भागी नही बनेंगी ...
उनका पूरा वादन मुझे न मात्र आनन्द देता अपितु ये समझाने का सार्थक प्रयास करता कि जीवन मे गप्पे मारना और सब्जी -तरकारी का पता लगाना भी एक कला है जिसका सरकार भरपूर मेहनताना देती है .....
उस स्त्री ने कभी क्रोध न किया क्यूँकि क्रोध उसके स्वार्थ के चढ़ावे को कम कर सकता था ...
श्री धीरेंद्र लाल अंग्रेजी के मास्साहब थे जो इस हेतु खिन्न रहते थे कि वो आंग्ल भाषा के टीचर हैं और उन्हें मास्साहब के रुतबे से नवाजा जाता है जबकि वो " सर "कहलवाने के इकलौते असली हकदार थे विद्यालय में ...
समाजिक विषय की उस्तादी सुल्ताना सैय्यद जी हमारी कक्षा के भारत को कभी अंग्रेजों से आजाद नही करवा पाईं क्यूँकि उनके साल भर की मेहनत 12 अध्यायों में से सिर्फ 6 अध्यायों तक ही सिमट कर दम तोड़ देती ...और हमारी पुस्तक में भारत आजाद अध्याय आठ में होता था ।।
संस्कृत में मेरी कृत्रिम रोचकता बढ़ने लगी ..क्यूँकि शास्त्री जी सदैव संस्कृत के वादन में पुस्तक छोड़ सत्संग शुरू कर देते लेकिन उनके वादन के पश्चात मेरी आस्तिकता पर चोट करती श्री महिपाल सिंह की कक्षा जो कहती थी जीवन की शुरुवात उस जीव से हुई जिसको हम देख नही सकते वैसे ही जैसे वो उस छात्र को सीधी आँख से नही देख सकते थे जो उनसे विज्ञान के तार्किक और आंकिक सवाल पूछ बैठता ......
गुरुओं की इस दबंगगिरी और सामाजिक भूमिका में चौतरफा वाह वाही ने मेरे अंदर शिक्षक बनने का लालच उतपन्न किया ....लेकिन एक व्यक्ति जी सदा मेरे स्वप्न पर अंकुश लगाता था वो था प्रणव दास .....
प्रणव दास पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे ....सटीक मायनों में वो ही व्यक्ति पूरे विद्यालय में शिक्षक नही था ... उसने इस पद की गरिमा में न मात्र धब्बा लगाया बल्कि इसके बाहुबल को कम करने का प्रयास भी किया इसी निमित्त वो शिक्षक झुंड में कभी सरवाइव नही कर पाये ....
जीतोड़ मेहनती ...वो इंसान कभी मुझे स्टाफ रूम में शिक्षक संवाद करता नजर नही आया ... न ही उसमें मुझे कभी एक शिक्षक नजर आया ...... क्यूँकि शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य एक गहरी खाई की परंपरा को न मात्र उसने भरा बल्कि उस परम्परा का भी घोर अपमान किया जिसमें ये मनवाया गया कि शिक्षक और विद्यार्थी में नक्षत्रों की दूरी का अंतर स्थापित होता है ....
उनको मैंने कभी उस कुर्सी पर बैठा नही देखा जिसपर बैठकर अन्य शिक्षक मुझे किसी चक्रवर्ती सम्राट की भाँति लगते थे ...जो मात्र आदेश देते और कद्दू, टिंडे,पालक ..दूध.. दही आदि का चढ़ावा भी समय -समय पर भोग की भाँति ग्रहण करते ....
प्रणव दास जमीन पर फैली फटीली दरी पर कुंडली मारे हम बच्चों में कब शामिल हो जाते हमको पता ही नही चलता ....
शिक्षक के पद को इतना कायर बना देने वाले वो इंसान कभी -कभी किसी विद्यार्थी की दयनीय दशा पर आँसू भी बहा देते .... वो मात्र न कोर्स पूरा करते अपितु विद्यालय उपरांत बच्चों को अतिरिक्त समय भी देते ताकि उनका विद्यार्थी कभी गणित के फेर में न फँसे ....
विद्यालय का परम भट्टारक माहौल उस इकलौते शिक्षक ने खराब कर दिया था ...लेकिन एक सड़क दुर्घटना में जब वो न रहे तो पता नही क्यूँ उस दिन हर विद्यार्थी की आँख में आँसू थे ....
जल्दी ही विद्यालय को एक गणित का शिक्षक फिर प्राप्त हुआ और विद्यालय और गुरु परम्परा की शान फिर जगमगाने लगी .......और बच्चे पुनः जमीनी भगवानों से दूर हो गये ...
प्रणव दास को मरे 10 साल हो गये थे लेकिन वो जिंदा थे इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मैं शिक्षक बना ...... शिक्षक योनि प्राप्त करते ही मैन जीतोड़ कोशिश की ...कि मैं स्टाफ रूम की हँसी- ठिठल्ली मैं अपना एक गम्भीर स्थान सुनियोजित कर सकूँ लेकिन हमेशा प्रणव दास पता नही क्यूँ मेरे मार्ग को रोक लेते .....
आत्मग्लानि होती थी स्वयं पर कि क्योंकर मैं शिक्षक नही बन पा रहा हूँ ...क्यूँ विद्यार्थी मेरा रोजगार नही अपितु मेरी कमजोरी बन गये हैं ....
जब स्वयं से लड़कर हार गया तो प्रणव दास को अपने व्यक्तित्व में जिंदा कर लिया ....
दिन भर बच्चों के बीच ...उनकी तरह बच्चा बनकर रहना ...उनको पढ़ाना.. उनको पढ़ना ही अब जिंदगी थी ..... इसी क्रम में बीवी सदैव उलाहना देती कि ...जब हिंदी के मास्साहब घर बैठे बच्चे घोंट कर लक्ष्मी छाप सकतें हैं तो आप तो वैलिड हैं और प्रामाणिक भी क्यूँकी आप तो अंकों वाले विषय से संबंधित हैं ।।।।
तनख्वाह का एक मोटा हिस्सा जब बच्चों के जूते ...बनियान ..बस्तों पर व्यय होने लगा तो बीवी सदैव के लिए छोड़ चली .....
अपने प्रति रचित कुंठा को सूँघ न पाने का सम्मान मुझे तब प्राप्त हुआ जब विद्यालय के लगभग प्रत्येक शिक्षक मुझे "चूतिया" कहने लगे .....
दिन बच्चों के संग कट जाता लेकिन शाम को अपनी मासूम बेटी की याद दिल का डिस्ट्रिक्ट हिला देती ....कभी आँख से आँसू निकल जाते तो कभी दीवार पर लगी उस तस्वीर पर क्रोध गिरने लगता जिसमें प्रणव दास आशा की किरण आंखों से मुझे सप्लाई कर रहे थे ....
प्रिया कक्षा 6 की छात्रा में मुखे अपनी बेटी ज्योति दिखाई देती थी ....एक दिन मर्यादा और बाँध तोड़कर न जाने क्यूँ उसे अंक भर लिया ....न जाने क्यूँ उसे छोड़ने का मन नही किया ...पता ही नही कब चारों ओर बच्चों और शिक्षकों का मेला लग गया ....
स्नेह और वात्सल्य का मद टूटा तो अपनी गलती पर जमीन गढ़ गया .....इसके बाद फिर कुछ सामान्य नही रहा ....गणित के शिक्षक से मैं कलयुगी शिक्षक के पद पर प्रमोट हुआ ...और फिर भगवान रूपी गुरु से " गुरु घण्टाल " बन गया .....
अब न कोई अभिभावक मेरे पास अपने बच्चों को गणित सीखने भेजता है और न कोई समझता है कि मैं उनके बच्चों को कुछ सीखा सकता हूँ ....चहुँ दिशाओं में महान और विक्रमोशीर्य शिक्षक पद की गरिमा को दागदार करने वाला अब मैं गुरु घण्टाल स्वयं में .. मोम की भाँति गल रहा हूँ .....
शिक्षक तो छोड़ो हर चलता-फिरता भी मुझे पान का पीकदान समझने लगा है ......लेकिन प्रणब दास जिसकी वजह से आज मैं इस दिन और समय की भेंट चढ़ा वो अब भी मुझे धैर्य धारण करने की सीख दे रहें हैं .....वो कह रहें हैं कि अब भी मैं हारा नही ...वो बोलते थक नही रहें हैं कि चुनौतियाँ भी वीरों के समक्ष आती हैं .....
लेकिन जब उनका ये कागजी साहस पीते -पीते उबकाई आ गई तो दीवार पर टंगी उनकी तस्वीर को उठा कर फर्श पर पटक कर एक चूतिया को उसका उचित पारितोषिक प्रदान किया .....
अगले दिन शिक्षक दिवस था ....सर झुकाकर उस सभागार में बैठा था जहाँ शिक्षक फूल के कुप्पा होकर अपनी तारीफों और प्रशस्तियों का लुत्फ लूट रहे थे
.....हर बच्चा उनकी तारीफ गले से करता -करता वो याद किये हुए शब्द भूल भी जाता जिन्हें उसे रटाया गया था ......
लेकिन मन ऊब गया इस पेशे और इस समाज से... सोचा कहीं दूर निकल जाऊँ जहाँ कृत्रिमता का लंगर कम से कम इतनी बेशर्मी से तो न लुटता हो ।।।।।
कुर्सी छोड़ी ....और आगे बढ़ा ही था तो कानों से आवाज टकराई ....
" सर प्लीज ...सर प्लीज बैठ जाइये .... सर कक्षा बारह में पहुँच गई हूँ
..बच्ची थी उस क्षण लेकिन अनुभव फिर भी रखती थी कि पिता और पुरुष का स्पर्श कैसा होता है .... सर अब तक लज्जा के कारण न कह पाई लेकिन आज कहूँगी क्यूँकी ये साल मेरा इस विद्यालय में अंतिम वर्ष है .. आपने मुझे उस दिन आलिंगन में लिया ...सर पता चला कि एक पिता का स्पर्श कैसा होता है ....सर जब आपने मुझे गले लगाया तो आज भी याद है आपके वो कानों पर पड़ते शब्द कि बार -बार आप एक ही नाम दोहरा रहे थे .... " मेरी बच्ची ...मेरी बेटी ..मेरी गुड़िया "
सर आपने उस दिन के बाद कभी मुझे आँख उठा कर नही देखा लेकिन सर सदैव आपके स्पर्श और स्नेह के लिए तरसती रही मैं... क्यूँकि मेरे पिता नही है सर ....सर विद्यार्थी न भी समझे तो प्लीज सर अपनी बेटी के सर पर एक बार हाथ रख दें ...क्यूँकि मेरी माताजी सदैव कहती हैं कि जिसके पिता प्रणव दास जैसे वास्तविक शिक्षक हों उनका पुत्र भी एक सच्चा शिक्षक है जो इस कलयुग में सिर्फ इसलिए अवतरित हुआ है कि शिक्षक की खाल में छिपे उन छद्म शिक्षकों को शिक्षक होने का वास्तविक मर्म और कर्म सीखा और समझा सके..."
मृत देह में मात्र उस बालिका ने न मात्र प्राण डाले अपितु आंखों में वो समुद्र हिला दिया जो जम सा गया था ...वो दौड़ के मेरी ओर आई और मेरे चरणों पर गिर गई ....... तालियों की मूसला धार बारिश के मध्य मैं सिर्फ आँखें बंद करके अपने अपमान की बौछार के दागों को अपने से गिरते -टूटते हुए सुन रहा था .....
उस बालिका को चरणों से उठाया ..उसके सर पर हाथ रखा उसे एक क्षण में करोड़ों आशीष से स्नान करवाया और दौड़ पड़ा उन बिखरे शीशों के टुकड़े बिनने जो मेरे पिता यानि एक सच्चे शिक्षक प्रणव दास की तस्वीर के इर्द -गिर्द जमा थे .......जो चीख -चीख कर कह रहे थे कि एक सच्चा शिक्षक न कभी मरता है और न कभी हारता है ।।।
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
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