Monday, 9 September 2019

मुहब्बत

#A_पेंटर_लिबर्टी
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" मतलब कर लोगे ...मतलब लग न रिया कि कर लोगे ...."

" आपकी पत्नी को भी लगता था इंस्पेक्टर साहब कि नही कर पाऊँगा लेकिन कल  बुलाया है उन्होंने "

" तेरी माँ का ------ कौन से काम की बात कर रहा है बे ..? '

" सेक्स और क्या ....? "

इंस्पेक्टर खड़ा हुआ और उसने अन्धाधुंध घूँसे और थप्पड़ उस लौंडे के चेपने शुरू किये ... दो कॉन्स्टेबिल भी उसका साथ देने लगे तभी मैं सरकने लगा  ..... "

" ओये .. ओये ...तेरी माँ का साले तू कहाँ भाग रहा है  बे तू ही लाया है साले इसको ...पकड़ मंगत राम इसे और इसे भी खोल के रख दे ....."

दिन भर कुटने और रात भर थाने में जख्म  सेंकने के  बाद अक्ल आई कि ..किसी  भी माँ  के जने की बात का यकीन एकदम नही कर लेना चाहिए ....

ये हरामी कल मुझे गफूर  भाई की चाय की दुकान में मिला था नाम तो  बताया नही लेकिन बोला पेंटर है तो थाने ले आया जहाँ की पेंटिंग का ठेका मैंने लिया था ....और इस झांटू ने  इंस्पेक्टर की बीवी के  बारे में उल्टा-पुल्टा बोलकर मेरे पिछवाड़े को
जहन्नम के संतरियों को सौंप दिया।।

   सुबह दोनों को संग धक्का देकर थाने के दरवाजे से बाहर फेंका गया .... और मैंने सीधे उस लौंडे का गला पकड़ लिया ....

" क्यूँ बे भूतनी के ...क्या जरूरत थी इंस्पेक्टर से ऐसा बोलने की साले ठेका भी गया और इज्जत भी ...."

" क्या गलत बोला जमाल भाई जो सच था वही बोला .... "

" अबे  ब ..बाहर चल भूतनी के कहीं फिर सुन लिया इंस्पेक्टर ने तो गोश्त रख हड्डियाँ बाहर फेंकेगा ..."

हम दोनों थाने के परिसर से बाहर  निकले । और मैंने ऑटो को हाथ दिया ......

" मैं तो चला बेटा.... अब कभी मुँह न दिखाईयों अपना समझा !"

" जमाल भाई कुछ पैसा उधार दोगे ... बाद में लौटा दूँगा "

मैं तुरन्त ऑटो से बाहर निकला और उसका मुँह ताकते हुए बोला -

" अबे कब लौटाएगा ...? कहाँ लौटाएगा ? न तू मुझे जानता है और न मैं तुझे ... चल बोल कितना चाहिये ..?"

" यही कुछ पाँच हजार ...?"

" भूतनी के चुड़ैल बैठ गई तेरी अक्ल पर ...जानता है कितना होता है पाँच हजार ...?"

" हाँ ! कभी मेरे एक दिन का खर्चा हुआ करता था...."

मैं उसका चेहरा ताकता रहा ..तभी -

" भाई जाम लगायेगा क्या ...जल्दी बैठ नही तो मैं चला "

पता नही क्या जादू था उस लौंडे के चेहरे में कि 500 रुपये का नोट उसके हाथ मे देकर फिर पीछे मुड़कर उसको दुबारा नही देखा ... लेकिन फिर ऑटो के शीशे से उसे देखता रहा जब तक वो पूरी तरह धुँधला नही गया ..

दो हफ्ते बीत गये ... एक दिन एक एक बिल्डिंग के पेंटिंग के ठेके के वास्ते जमुना नगर जा रहा था तभी -

" ए भाई ..ए... रोक तो जरा ..."

ऑटो वाले ने  ब्रेक मारे और मैंने उसका भाड़ा देकर ....

" और भैय्ये अबे यहाँ क्या कर रहा है ...?."

" जमाल भाई सलाम... आपके पैसे लौटा नही सकता ये मेरी घड़ी रख लो अपने पाँच सौ लेने के बाद बाकि एक एड्रेस पर भिजवा देना "

" क्याया ..और कितने की होगी ये ...मतलब घड़ी ?"

" शायद यही कोई तीस -चालीस हजार की !'

" मजे लूट रिया है बे तीस -चालीस हजार की होती तो क्या उस दिन तू मुझसे पाँच हजार उधार माँगता ? "

" मेरे पास पैसे नही है ..नही तो आपके पाँच सौ अपनी मेहनत की कमाई से चुकाता ... ये हराम की कमाई के पैसे नही देता आपको ..."

" तू न बिल्कुल पागल है बे ...चूतिया घड़ी को हजारों की बता रहा है और फिर फिल्मी डायलॉग ...अच्छा सुन अभी काम पर निकल रहा हूँ फिर मिलता हूँ ..."

" जमाल भाई गले नही मिलोगे "

गले लगा और जब बिल्डिंग के ठेके के रेट तय कर रहा था तभी पसीना पोंछने के लिए जेब से रुमाल निकाला ...और रुमाल संग एक घड़ी जेब से गिरी -

" अबे जमाल जरा दिखाना तो ये घड़ी .."

" ये ..ये..इंजीनियर साहब "

" अबे ! मतलब काम जम के चल रहा है इतनी महँगी घड़ी वो भी जेब मे इतनी लापरवाही से रख के घूम रहा है  "

उसका गले लगना याद आया और तभी मैंने इंजीनियर साहब से पूछा -

" अच्छा बाबूजी जरा देखते हैं ..जरा सही -सही कीमत बताईयो तो इसकी "

" यही कोई पचास या साठ हजार ..मेरे बॉस के पास भी य...."

मैं दौड़ता रहा ...रुका नही ...वो लौंडा सच बोल रहा था ...पसीने से तरबतर मैं वहीं पहुँचा जहाँ वो बैठा था ...लेकिन अब वहाँ सन्नाटा था ....आंख से न जाने क्यूँ कुछ आँसू जुदा हो गए ...साला अजीब सा रहस्य था वो लौंडा ....

तीन दिन तलक बल्ली मारान ,चाँदनी चौक , की हर गली हर चौक पर उसे तलाशा वो न मिला लेकिन उसकी दी हुई घड़ी अब भी धड़क रही थी ....

अगले दिन जब सब्जी तरकारी लेकर लौट रहा था तो तभी मैंने उस लौंडे को अपनी गली के चरसी लौंडो के साथ देखा ...

" भाई आपकी अंगूठी यही कोई 10 हजार की बिकी ये लो पैसा ...और ये रहा आपका माल ..ओरिनल है बिल्कुल ..कर्रा सूखा हुआ ..एक दम खींचोगे तो जन्नत घूम आओगे ..."

" तू यहाँ क्या कर रहा है ...और ये क्या है ... चलो बे निकलो यहां से नही तो अभी पुलिस को बुलाता हूँ ... "

वो चरसी लौंडे भग लिए लेकिन वो टिका रहा ...

" कौन है भाई तू... और तूने अपनी अँगूठी उनको क्यों दी ...कितने की थी ..."

" यही कोई तीस -चालीस हजार की ...."

" अबे तेरी हर चीज तीस-चालीस हजार की क्यूँ होती है बे ? जानता है वो घड़ी कितने की है ....? पूरे पचास -साठ हजार की ....चल थाने चल तेरी अँगूठी वापस दिलवाता हूँ इन चरसियों ने तुझे लूट लिया "

" रहने दो जमाल भाई मुझे पता है वो झूठ बोल रहे हैं ...आप जाओ आपके घर वाले आपका इंतजार कर रहे होंगे ..."

दो कदम आगे बढ़ा फिर पीछे लौटा ...

" चल मेरे साथ चल ...भाई मानता है तो मना मत करियो "

बीवी ने मुँह बनाया लेकिन मेरे बच्चे उस लौंडे से प्यार करने लगे ...कागज पे वो हर चीज उसने जिंदा उतार दी जो मेरे बच्चों ने उससे डिमांड की ...

महज दो रोटी खाकर वो सो गया ...रात को उठकर जब मैंने उसका हाल लिया वो अपनी जगह पर नही था ....थे तो दस हजार रुपये यानि मेरी दो रोटी की कीमत ....मेरी बीवी भी मेरे पीछे खड़ी थी ..मेरी आँख से बहते आँसू उसको बता रहे थे कि मुझपर क्या गुजर रही है ...एक पल में उसे सब बयाँ कर दिया....

वो तो सिसकती रही लेकिन मैं रात के अँधेरे में उसे खोजने निकल गया ..उसको जो बहुत बार मिलने के बाद भी मुझसे कभी मिल नही पाया ....

और फिर मिला तो एक पेड़ के नीचे कमर पेड़ से लगाये आंख मूँदें हुए ....उसकी बगल में दो कुत्ते सो रहे थे ....

" चल हट ..चल हट ..कौन है यार तू ...ख़ुदा के लिए बता यार ...?"

"बैठो जमाल भाई एक सिगरेट भर लूँ फिर बताता हूँ... उसने चरस को सिगरेट में भरा और कस लेकर बोला-

" एक बहुत बड़े पालिटीशयन का बेटा हूँ मैं ..वो देखो सामने मेरे बाप की फोटो भी लगी है ..."

" तुम रमाकांत सिंह के बेटे हो ..?"

" हाँ ...मगर मुझे इसपर अफसोस है कि मेरा बाप रमाकांत सिंह है ...."

" क्यूँ...?"

" क्यूँकि ये आदमी इंसान नही ... ये कातिल है खूनी है ..और मजे की बात ये है कि मैं सब कुछ जानते -बूझते इसका कुछ नही उखाड़ सकता ...."

" मेरी कुछ समझ में नही आ रहा है भाई "

" जमाल भाई ...माँ बहुत पहले मर चुकी है बस तस्वीरों में जिंदा रखा है मैंने उसे ...पेंटिंग का शौक है मुझे ....दीप्ति जिसमें मुझे मेरी माँ की छाप दिखाई देती थी और वही मुहब्बत भी उसे मेरे बाप ने खत्म कर दिया ...."

" म..मतलब ...?"

" उसका खून करवा दिया मेरे बाप ने ...क्यूँकि वो छोटी जात से थी ... और मेरे बाप को डर था कि कहीं उसका वोट बैंक उससे खफा न हो जाये .... ये देश जिसे गर्व है अपनी डेमोक्रेसी पर असल में जात - मजहब और क्षेत्र की राजनीति का ये केंद्र बन चुका है ... डेमोक्रेसी के नाम पर यहाँ सिर्फ मजाक होता है ..काबिलियत और कर्म नही यहाँ रसूख और सम्प्रदाय देखकर  नेता चुना जाता है ....आपको बोर लग रही होंगी मेरी बाते..दरअसल मुझे भी बोर ही लगती है ...बस सोचा था दीप्ति संग एक साधारण जिंदगी गुजार दूँगा ...हमेशा उसकी तस्वीरें बनाऊँगा ...उसको प्यार करूँगा ...अपनी माँ के साथ जो लम्हे न जी सका वो दीप्ति के साथ जीकर मरूँगा ....लेकिन अब जब वो ही नही है तो न जान चाहिये न जिंदगी "

"तुम्हारे पिता को मालूम है कि तुम कहाँ हो ...मतलब उन्होंने तुम्हे खोजा नही ...?"

" लेटर छोड़ के आया हूँ उनके लिए अगर मुझे खोजा या पाया तो समझ लेना तुम्हारा असली चेहरा समाज के सामने नंगा कर दूँगा ...और वैसे भी बीवी और औलाद से ज्यादा एक बेगैरत पॉलिटिशियन को अपनी कुर्सी प्यारी होती है ...."

पता नही चल रहा था कि रो जाऊँ या खामोश हो जाऊँ ....कि तभी एक आवाज पेड़ के पीछे से आई ...

" हिमाचल का नाम सुने को विवेक बाबू ..... वहीं शिफ्ट कर दिया है तुम्हारी दीप्ति को फैमली संग ..."

एक करंट से लगा उस लौंडे को और वो उठकर पेड़ के पीछे भागा -

" तुम कैसे जानते हो दीप्ति को ...और मेरा नाम ...?"

" तुम्हारे बाप के कार्यकर्ता हैं भाई... या यूँ कहूँ तुम्हारे बाप के हर बुरे काम के अदने से सिपाही .....दीप्ति को ट्रक से ठोकने मुझे ही भेजा था ...लेकिन साली न जाने क्यूँ उसमें अपनी बेटी की छाप दिखाई दी ...तो समझा-बुझा कर हिमाचल छोड़ आया ...नही मान रही थी तो बोला कि विवेक बाबू की जान को खतरा है .....मान गई ...जितना पैसा तुम्हारे  बाप ने उसे ठोकने को मुझे दिया था उससे उन्हें हिमाचल शिफ्ट करा दिया ...जाओ तुम्हारी आजादी  तुम्हारी राह देख रही है ....हिमाचल के एक पहाड़ी गाँव जो शिमला से यही कोई 40 मील दूर है वहीं तुम्हारी आजादी तुम्हारा इन्तेजार कर रही है ..."

विवेक ने उस शराबी का माथा चूमा और मेरे गले लगा फिर दौड़ा और फिर लौटा ...और बोला -

" जमाल भाई कुछ पैसा उधार दोगे ...बाद में लौटा दूँगा "

हल्के से गाल पर चपत लगाई और और उसके दस हजार रुपये उसके हाथ मे धरे और अगले दिन यानी आजादी के दिन उसकी घड़ी लौटाने और उन दो प्यार के आजाद परिंदों से मिलने बीवी -बच्चों संग हिमाचल जा रहा हूँ ...

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

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