एक गुमनाम मौत ।
उसका नाम सुशीला पंवार था । उसका जनम उस दौर में हुआ था , जिसमें औरतों का फिल्मों या नाटकों में काम करना बुरा माना जाता था । उस दौर में पुरुष हीं स्त्री पात्रों का किरदार निभाते थे । उसकी पैदाइश की तारीख 23 मई 1915 थी । पिता ग्वालियर रियासत में कर्नल पद पर तैनात थे । नाम था बापू राव पंवार । सुशीला का मन बचपन से हीं नाटकों में रमता था । वह स्कूल के दिनों से हीं नारी पात्रों का अभिनय किया करती थी । उन दिनों बालिकाओं को नारी पात्र का अभिनय करने की छूट होती थी । सुशीला ने अभिनय के लिए घर छोड़ दिया । वह ग्वालियर से मुम्बई पहुँच गई । वह 16 साल की हो चली थी । उसने अपना नया नाम रखा" वनमाला" ।
एक दिन उसके पिता को किसी ने बताया कि उनकी बेटी फिल्मों में अभिनय कर रही है । कर्नल साहब के आंखों में खून उतर आया । ग्वालियर के रीगल सिनेमा में वनमाला की कोई फिल्म लगी थी । पिता फिल्म देखने पहुँचे । वे किसी दृश्य पर इतना भड़क गये कि उन्होंने पर्दे पर अपनी पिस्टल से फायर कर दिया । पर्दे का वह हिस्सा जल गया । फायर की आवाज सुन दर्शक इधर उधर भागने लगे । किसी को कुछ पता नहीं था कि हुआ क्या है ? फिल्म रोक दी गयी । कर्नल साहब भी दुःखी मन घर लौट आए । उस दिन के बाद से उन्होंने वनमाला की कोई फिल्म नहीं देखी । वनमाला को जब मराठी फिल्म में उत्कृष्ट अभिनय के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने स्वर्ण कमल प्रदान किया तो पिता की प्रतिक्रिया थी - वह कितना हीं ऊंचा क्यों न उठ जाए , पर एक दिन उसका मान सम्मान सब मिट्टी में मिल जाएगा ।
वनमाला ने हिंदी और मराठी फिल्मों में औरतों का काम करना आसान कर दिया । वह ताजा बयार लेकर फिल्मों में आई थी । उसके बाद हीं औरतों का फिल्मों में पदार्पण हुआ । वनमाला की पहली हिंदी फिल्म सिकंदर थी । उसने उस जमाने के दिग्गज अभिनेता पृथ्वी राज कपूर के साथ काम किया और किसी भी मायने में उनसे कमतर नहीं रही । आंख मिचौनी ,राजा रानी , मुस्कराहट , कादम्बरी , पर्वत पर अपना डेरा , शरबती आंखें ,परिंदे , आरती, अरबियन नाइट , छत्रपति शिवाजी जैसी तकरीबन 30 हिंदी फिल्मों में उसने काम किया था । उसी तरह वनमाला ने 5 मराठी फिल्मों में भी काम किया ।
फिल्मों में अभिनय के दौरान 1936-37 में उसकी मुलाकात आचार्य अत्रे से हुई । दोनों के बीच प्रेम बीज अंकुरित हुआ । बाद में पता चला कि आचार्य अत्रे पहले से हीं शादी शुदा थे । वे अक्सर वनमाला को शादी का झांसा देते रहे , पर शादी की नहीं । वनमाला का शोषण होता रहा । वह ठगती रही । एक दिन दुःखी होकर उसने मुम्बई महानगर छोड़ दिया । मुम्बई छोड़ते समय उसने कहा था - मेरा सब कुछ मिट गया है । मेरे पिता सही कहा करते थे । 1941 में शुरू हुआ उसका फिल्मी सफर 1956 में खतम हो गया ।
वनमाला हिमालय की कंदराओं में शांति की तलाश करती रही । अंत में वह वृंदावन आई । वृंदावन में उसका आध्यात्मिक ज्ञान और भी गहरा हो गया । लोग दूर दूर से उसके पास आते और उसके आध्यात्मिक ज्ञान गंगा में डुबकी लगाते । वह अक्सर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करती । वह वृंदावन में Art & Culture का स्कूल खोलना चाहती थी । स्थानीय प्रशासन ने उसे इस बावत कोई सहयोग नहीं दिया । वनमाला खिन्नमना हो ग्वालियर लौट आई । वह ग्वालियर जिसे सांस्कृतिक शहर का दर्जा प्राप्त था और जो उसकी जन्मभूमि थी ।
29 मई 2007 को वनमाला ने ग्वालियर में अंतिम सांस ली थी । उसे जन्मभूमि की गोद मिली , लेकिन जिस मुम्बई महानगर को उसने अपना सर्वस्य दिया था , उस मुम्बई में उसके मरने की खबर आज के संचार क्रांति के दौर में भी बहुत देर से पहुँची थी । यह गुमनाम मौत थी । मरते समय वह निपट अकेली थी । पिता ने ठीक हीं कहा था । उसकी शोहरत , इज्जत सब मिट्टी के हवाले हो गयी थी ।
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