Sunday, 24 November 2019

गामा

#आखरी_दाँव
                ★★★★★★★★★              

" अब्बे पेट है या लंगर खाना 80 रोटी उतार गया ... फिर बोलता है अब चावल लाओ "

" हल्के बोलो मालिक सटा हुआ बैठा है ....सुन न ले "
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जिला बलिया आज जरूर ' गामा ' के नाम का रौब रखता है ...लेकिन इस जिले की गलियों में मैंने बेशुमार गरीबी देखी है ...भूख ...लाचारी ..मुफ़लिसी .......और इसी भूख से कूड़े के ढेर पर सरपट नजर दौड़ाकर फिर इधर-उधर चोर नजरों से देखकर मैंने उस बच्चे को वो सड़ा पपीता उठाते भी देखा है ....जिसका आधा हिस्सा गल कर पोपला हो गया था ......

10 साल का ये बच्चा भूख से इस तरह व्याकुल था जैसे उसने कई दिनों से मात्र  भोजन का  ख्वाब देखा ....भोजन किया नही ....उसने वही पपीता पहले मस्जिद के बाहर लगे उस वुजू के नल पर धोया और फिर उसका गला हुआ हिस्सा बाकि बचे साबुत हिस्से से अलग किया ...और फिर इधर-उधर देखा और खा गया.....

तभी मैंने देखा एक औरत जो दौड़ती हुई आई और उस बच्चे का कान पकड़ कर बोली ~

" बाली ...अभी तो दो डाँसी भात डकार कर आया था मुंए ...फिर तुझे भूख लग गई .. और कहाँ से लाया ये ....?"

वो औरत जरूर उस बच्चे का कान पकड़ कर घर ले गई ...लेकिन मेरे लिए एक सवाल छोड़ गई ...कि दो डाँसी भात ...यानि दो प्लेट छक कर चावल खाया कोई बच्चा इतना कैसे भूखा और लालची हो सकता है जो कूड़ेदान से सड़ा पपीता उठाकर ऐसे खा ले जैसे गौ मैय्या चपाती एक फांक में मुँह के अंदर समा लेती है .....

बेशक झूठी होगी वो औरत ...बेशक उसकी माँ हो ...या उसकी कोई करीबी ..लेकिन वो झूठी थी ...हो सकता है सौतेली माँ हो...?

हो तो बहुत कुछ सकता था लेकिन मैंने सीधे अपने दफ्तर का दरवाजा खोला और देखा साढ़े 10 बज गए लेकिन अभी तक एक भी कार्मिक अपनी ड्यूटी पर नही आया .....जिला बलिया  के इस ग्राम में ग्राम विकास अधिकारी का पद सम्हाला है मैंने ....और आज ही नियुक्ति ली है यहाँ.... इससे पहले आजमगढ़ में कार्यरत था मैं ....

मैं यानि अभय कुमार श्रीवास्तव ...उम्र 28 साल 3 महीने ...!!!

3 दिन बाद ही वो बच्चा मुझे फिर दिखाई दिया ...दरअसल जिस दुकान से मैं दूध खरीद रहा था ...उसकी बाहर की झापड़ी में जलेबी बन रही थी और वो उन जलेबियों को देखकर ललचा रहा था ....

" क्यों रे ...नाम क्या है तेरा ....?"

" जलेबी खिलाओगे तो बताऊँगा ..?"

मैंने अजीब नजरों से उसको देखा ..फिर कहा भाड़ में जाये नही बताता तो ..और आगे बढ़ गया...लेकिन फिर पीछे पलट कर देखा और देखा उस बच्चे को जो अब भी जलेबियों पर लार गिरा रहा था ....

" चचा 100 ग्राम तोल इसके हाथ पर रख दियो ...और पैसे बताओ ..?"

" हा हा हा साहब 100 ग्राम से न भरेगा इसका नरक.. किलो भी रख दूँ तो साफ कर जाएगा ....."

फिलहाल 100 ग्राम से 250 ग्राम  तक लाकर मैंने ब्रेक दिया और वो  जलेबी हाथ में लेकर सीधे लड़ी हो गया ...

" कौन है चचा ये ....?"

" रुस्तम सिंह का बेटा बलवीर है ...बाप पहलवानी करे है इसका ..लेकिन खाली पहलवानी करे है ... कोई मेडल ..तमगा तो जीता न आज तक...."

" ओह्ह ... बड़ा खाता है ये चचा .."

" बाप पे गया है बिल्कुल ..30 -35 रोटी उड़ा जाये वो तो ...ये तो फिर भी किलो सवा किलो से मान जाए ...."

"  30 से 35 रोटी आदमी है या बकासुर ...और किलो ..सवा किलो ...कुछ न हुआ चचा ..बच्चा है अभी ये "

इंट्रस्ट नही दिखाया चचा ने अब बात करने का क्यूँकि भीड़ बढ़ती जा रही थी .....आगे बढ़ा तो पाया वो बलवीर एक गली के मकान की दीवार पर पीठ के बल सटा उस अखबार का पन्ना चाट रहा था जिसपर अभी उसकी जलेबी बिछी हुई थी ....

" क्यूँ बे नाम -पता बताये बिना ही दौड़ गया ... कहाँ रहता है .."

.उसने हाथ से एक मकान की ओर इशारा किया ...वो आगे बढ़ा और मैं पीछे .....

वो तो किवाड़ खोल अंदर घुस गया लेकिन मैंने दरवाजे की झिरी से झाँककर देखा तो कुछ  सुना भी ....

" क्या मिले है इस पहलवानी से ...जब घर मे राशन के कनिस्तर खाली पड़े हैं... देखियो जी ...न मुझसे ये बारात का खाना बनता है न ये रोज की उधारी पर तकादा करने वालों की बाते सुनी जाती है .....लो ये इक पहलवान और बना फिर रहा है ...बाप पर गया है मुंआ बिल्कुल ....."

खटिया पर  बैठा शरीर में  तेल मलता बलवीर का बाप ....रान पर बलवीर को बिठा कर बोला ...

" देख  री बाते भी खिलाती है तो थोड़ा मक्खन डाल कर खिलाया कर ...और क्यों सोच रही है ...दंगल बढ़ रहा है ....उस्तादी की पेशगी मिलने दे ...फिर देखते जा .....तुझे भी दंगल में उतार कर जो दो-दो हाथ न कराये तो फिर कहियो ...."

ये बात सुनकर पहलवान की औरत शरमा गई ..और मुँह पर पल्लू ठूँस कर रसोई में घुस गई ....मैंने एक नजर दूसरी ओर  घुमा कर डाली तो पाया ....पहलवान के बाकि तीनों बच्चे जिनकी उम्र क्रमशः 18, 16  और 14 होगी बोरे में बैठे पढ़ाई कर रहे थे ....

तभी रुस्तम पहलवान ने उनपर एक नजर डाली और रान की पिंडली में बैठे बलवीर से बोला ...

" देख पहलवान ये बनेंगे साहब ...लेकिन तुझे बनना है गामा समझा !"

" गामा मतलब ...?"

" गामा मतलब  ..बहुत बड़े पहलवान थे ..कभी किसी से न हारे और रहा गामा का मतलब तो सुन लल्ला...जो रोटी साथ गम भी खाये ...और जो दूसरों को गम दे उनकी हड्डियां अखरोट की तरह खोल दे ...गामा मतलब जो अपने बाप का नाम 36 कोस बिखरे गाँव मे फैलाये ...जो जमीन पर पैर रखे तो धरती हिल जाए ...और दंगल में पैर रखे तो बड़े -बड़े पहलवानों की लँगोट खुल जाए ...."

बलवीर खूब ठकाका मार कर हँसा ...लेकिन उसके तीनों भाइयों ने उसकी तरह ईर्ष्या की दृष्टि डाल कर कम से कम मुझे तो जता दिया कि पहलवान और माँ के बाद बलवीर को पहला दंगल अपने भाइयों से लड़ना होगा ......

मैं आगे बढ़ गया ....और वक्त बदलता रहा ...बलवीर दिन में एक चक्कर मेरे पास जरूर मार लेता .... और मैं उसको कुछ न कुछ जरूर खिलाता .... इस पूरे गाँव में बलवीर अगर किसी का कहा मानता या किसी की इज्जत करता तो वो मैं था ......

12 साल न जाने कैसे उम्र की मुट्ठी से सरक गए .... और आज बलवीर 22 का हो गया है .... 22 का मतलब पूरे 22 फ़ीट का जैसे ताड़ .... उसका शरीर ऐसा था मानो उसके शरीर में आठ लोग एक साथ चिपकें हों ....जितनी मेरी बन्द मुट्ठी उतना तो उसके पैर का एक अँगूठा था ...लम्बाई तकरीबन 6.5 फ़ीट से ऊपर ...और हाथ इतने भारी और बलशाली जितनी मेरी दो राने.... पैर का जमाव और खाँचा बिल्कुल गजराज की टाँगों सा ....और फूलती छाती जिसपर सिर्फ ताकत थी और बला का आकर्षण ......

एक दिन दंगल लड़वाते रुस्तम सिंह को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे ....तब दंगल की कमान बलवीर ने सम्हाली ....इतना भारी जिस्म होने पर भी वो कुश्ती औऱ पहलवानी से उचाट था ....उसको सिर्फ एक ही शौक था और वो था खाने का ......दंगल बन्द हो गया ।

लेकिन खाने के लाले पड़ने शुरू हो गए ...तीनों भाई चुपचाप जिममेदारी से बचते हुए शहर जाकर बस गए ....और छोड़ गए 
...दमे से फूलती बीमार माँ ....लेकिन इतने पर भी बलवीर नही पिघला ...मैं जब भी कुछ समझाता गर्दन झुका कर सुन लेता लेकिन कान पर जूं न रेंगती ......

लेकिन उसका शरीर अब उसको खाने पर आमादा होने लगा था... क्यूँकि उसे जिंदा रहने के लिए इंसान का खाना नही बल्कि एक स्वस्थ्य हाथी का खाना चाहिए था ....जो बिना कुछ करे ...नामुमकिन था ....मेरी बीवी ने एक दिन उसे खिलाकर मेरे हाथ जोड़ लिए .....लेकिन मेरी माँ को पता नही उससे क्या लगाव था ....वो उसे अक्सर भोजन करा दिया करती थी ....और इसकी तैयारी उसे पौ फटने के साथ  करनी होती थी ..

एक दिन बलवीर को मैं अपने साथ शहर ले गया ...और दिन में एक होटल में हमने खाना खाया ~

" अब्बे पेट है या लंगर खाना 80 रोटी उतार गया ... फिर बोलता है अब चावल लाओ "

" हल्के बोलो मालिक सटा हुआ बैठा है ....सुन न ले "

जब खाने के बाद होटल के मालिक ने मेरे आगे बिल रखा तो मैंने कहा ~

" जानते हो कौन है ये ..." गामा पहलवान " ....ये तुम्हारे होटल में खाना खाने नही सिर्फ तुम्हारे होटल की शान बढ़ाने आया है "

" ये..ये ..ये गामा पहलवान भैया है ......"

होटल मालिक चीखकर चलते-फिरते को बुलाने लगा और फिर बलवीर को 25 लोगों के झुंड ने हाथों में उठा लिया ...पोल खुल न जाये इस डर से मैंने बलवीर को चलने का इशारा किया ...गाँव लौटते वक्त मेरी जीप का पहिया एक गड्ढे में फँस गया ...बलवीर ने उतरकर एक हाथ से जीप को उठाकर जीप गड्ढे से परे रख दी....

" देख लिया नाम का रसूख ..,देख लिया अपने शरीर की शक्ति का कमाल ...और अब भी तू सिर्फ निठल्ला घूमेगा तो याद रख ...सिर्फ एक आवारा कुत्ता बन कर रह जायेगा ...और ये भूख और शरीर तुझसे तेरा सब कुछ छीन लेगा ...पहलवान की औलाद है बलवीर... मर्द का जना है साले मर्द बनकर जी .....बनकर दिखा गामा जो तेरा बाप तुझे बनाना चाहता था वरना सोच ले आज के बाद मैं भी तुझे एक रोटी का टुकड़ा और एक मीठा बोल न दूँगा "

हिलती जीप पर बैठा बलवीर न जाने क्या सोचता रहा लेकिन मुझे रत्ती भर यकीन नही था कि वो मेरी बात पर कुछ विचार  करेगा ...

लेकिन फिर जादू हुआ ...बाप का बन्द दंगल बलवीर ने खोला ... और सुबह -शाम दंगल में वक्त बिताने लगा ....उसने अपने शरीर को पत्थर बनाना शुरू किया .....और तब तलक उसकी भूख और खुराक का बंदोबस्त मैंने और मेरी माँ ने किया .....

दंगल लड़कर उसने बड़े-बड़े सूरमाओं को चित किया...अब 36 गाँव मे उसके नाम का डंका बजने लगा ....वो गामा के नाम से जाना जाने लगा ....अब न उसके पास भूख की कमी थी ...न शोहरत की और न दौलत की .....

आज बेशक उसका बाप जिंदा होता तो उसपर नाज करता ....लेकिन मैं जिंदा था और मुझे नाज था खुदपर की मेरी एक बात से प्रभावित होकर उसने खुद को पूरी तरह बदल दिया....गामा मुझसे अब बेहद कम मिलता था  ...वक्त ही नही था उसके पास .....और फिर आया वो दिन जब मेरा ट्रांसफर लेटर मेरे हाथ में आया...गामा उस पूरे दिन दंगल न गया ...इतने विशाल पर्वत की आँख में आज आँसू थे ....उसने मेरा सामान खुद अपने हाथ से ट्रक में रखवाया ...और जब मैं लौट रहा तो मेरे पाँव छूकर बोला ~

" साहब ...बाप ने बलवीर पैदा किया था ...और आप गामा पैदा करके जा रहे हो ....माँ भी नही रही अब तो ....दस्तखत दे दो मरूँ तो जलाने आ जाओगे "

एक चपट लगाई मैंने गामा को और तीन सीढ़ियों पर चढ़कर उसे अपने गले लगाया .....शहर जाकर तीन महीने ही बीते थे कि पता चला गामा को किसी ने उकसा कर नेशनल पहलवान " जाँगो " को चैलेंज करवा दिया है ....वो जाँगो जिससे लड़कर आज तलक कोई जिंदा न बचा ...दंगल आज 12 बजे था ...मैंने अखबार फेंका पर्स उठाया और चप्पल पहने ही बस स्टॉप को दौड़ लगा दी ...मुझे पता था 11 बजे तक मैं गाँव पहुँच जाऊँगा और गामा को रोक लूँगा .....लेकिन ट्रैफिक से लड़ता मैं तब दंगल के पास पहुँचा जब गामा और जाँगो आमने सामने थे ...

मैं चिल्लाता रहा भीड़ काटता रहा लेकिन मेरी आवाज मुझ में ही दफ्न हो गई ....गामा ने हर पैंतरे को आजमा लिया लेकिन वो राक्षस जाँगो सिर्फ एक पैंतरे की तलाश में था जिसे उसका किलर पंच कहते थे ....और लगभग 25 मिनट उससे जूझता गामा ...थक कर निढाल हो गया ...तभी जाँगो ने फॉउल खेलकर घुटने को गामा के गुप्तांगों में दे मारा और जैसे ही गामा घुटनों में आया उसने गामा की गर्दन पर हाथ डालकर उसकी गर्दन तोड़ दी ......

खूब हंगामा बरपा गांव वालों ने जाँगो को वहीं पीट-पीट कर निढाल कर दिया लेकिन अकेले तन्हा जो जिस्म जमीन पर आँखें खोल कर गिरा था .....वो मेरा बच्चा गामा था ....वो गामा जो छुपकर कूड़ेदान का पपीता खाते हुए मुझे मिला था ... गामा को जाँगो ने नही मैंने मारा है ...मैंने ही उसे दंगल के लिए उकसाया था ..... मैंने उसकी लाश के करीब बैठकर चिल्ला-चिल्ला कर धूल अपने सर पर डाली ...अपना मुँह नोचा ...कपड़े फाड़े लेकिन गामा के कान पर जूं तक न रेंगी ...

गामा का शव अगले दिन बड़े धूम धाम से उठा लेकिन अभी उसकी उम्र मरने की नही थी ...बल्कि वो जीता तो मैं जीता ...उसके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देकर नंगे पैर नशे जैसी हालत में लौटते हुए मुझे गामा के वो शब्द और वो झलक याद आ रही थी जब उसने कहा था .....

" " साहब ...बाप ने बलवीर पैदा किया था ...और आप गामा पैदा करके जा रहे हो ....माँ भी नही रही अब तो ....दस्तखत दे दो मरूँ तो जलाने आ जाओगे "

नवाज़िश

By~✨✍️

Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत (उत्तराखण्ड )

( कथा प्रेरणा Abhishek Srivastava साहब )

( कथा चित्र " ओरिजनल गामा पहलवान )Google

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