Friday, 29 November 2019

,,,,,,सुशीला पवार

एक गुमनाम मौत ।

उसका नाम सुशीला पंवार था । उसका जनम उस दौर में हुआ था , जिसमें औरतों का फिल्मों या नाटकों में काम करना बुरा माना जाता था । उस दौर में पुरुष हीं स्त्री पात्रों का किरदार निभाते थे । उसकी पैदाइश की तारीख 23 मई 1915 थी । पिता ग्वालियर रियासत में कर्नल पद पर तैनात थे । नाम था बापू राव पंवार । सुशीला का मन बचपन से हीं नाटकों में रमता था । वह स्कूल के दिनों से हीं नारी पात्रों का अभिनय किया करती थी । उन दिनों बालिकाओं को नारी पात्र का अभिनय करने की छूट होती थी । सुशीला ने अभिनय के लिए घर छोड़ दिया । वह ग्वालियर से मुम्बई पहुँच गई । वह 16 साल की हो चली थी । उसने अपना नया नाम रखा" वनमाला" ।

एक दिन उसके पिता को किसी ने बताया कि उनकी बेटी फिल्मों में अभिनय कर रही है । कर्नल साहब के आंखों में खून उतर आया । ग्वालियर के रीगल सिनेमा में वनमाला की कोई फिल्म लगी थी । पिता फिल्म देखने पहुँचे । वे किसी दृश्य पर इतना भड़क गये कि उन्होंने पर्दे पर अपनी पिस्टल से फायर कर दिया । पर्दे का वह हिस्सा जल गया । फायर की आवाज सुन दर्शक इधर उधर भागने लगे । किसी को कुछ पता नहीं था कि हुआ क्या है ? फिल्म रोक दी गयी । कर्नल साहब भी दुःखी मन घर लौट आए । उस दिन के बाद से उन्होंने वनमाला की कोई फिल्म नहीं देखी । वनमाला को जब मराठी फिल्म में उत्कृष्ट अभिनय के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद ने स्वर्ण कमल प्रदान किया तो पिता की प्रतिक्रिया थी - वह कितना हीं ऊंचा क्यों न उठ जाए , पर एक दिन उसका मान सम्मान सब मिट्टी में मिल जाएगा ।

वनमाला ने हिंदी और मराठी फिल्मों में औरतों का काम करना आसान कर दिया । वह ताजा बयार लेकर फिल्मों में आई थी । उसके बाद हीं औरतों का फिल्मों में पदार्पण हुआ । वनमाला की पहली हिंदी फिल्म सिकंदर थी । उसने उस जमाने के दिग्गज अभिनेता पृथ्वी राज कपूर के साथ काम किया और किसी भी मायने में उनसे कमतर नहीं रही । आंख मिचौनी ,राजा रानी , मुस्कराहट , कादम्बरी , पर्वत पर अपना डेरा , शरबती आंखें ,परिंदे , आरती, अरबियन नाइट , छत्रपति शिवाजी जैसी तकरीबन 30 हिंदी फिल्मों में उसने काम किया था । उसी तरह वनमाला ने 5 मराठी फिल्मों में भी काम किया ।

फिल्मों में अभिनय के दौरान 1936-37 में उसकी मुलाकात आचार्य अत्रे से हुई । दोनों के बीच प्रेम बीज अंकुरित हुआ । बाद में पता चला कि आचार्य अत्रे पहले से हीं शादी शुदा थे । वे अक्सर वनमाला को शादी का झांसा देते रहे , पर शादी की नहीं । वनमाला का शोषण होता रहा । वह ठगती रही । एक दिन दुःखी होकर उसने मुम्बई महानगर छोड़ दिया । मुम्बई छोड़ते समय उसने कहा था - मेरा सब कुछ मिट गया है । मेरे पिता सही कहा करते थे । 1941 में शुरू हुआ उसका फिल्मी सफर 1956 में खतम हो गया ।

वनमाला हिमालय की कंदराओं में शांति की तलाश करती रही । अंत में वह वृंदावन आई । वृंदावन में उसका आध्यात्मिक ज्ञान और भी गहरा हो गया । लोग दूर दूर से उसके पास आते और उसके आध्यात्मिक ज्ञान गंगा में डुबकी लगाते । वह अक्सर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करती । वह वृंदावन में Art & Culture का स्कूल खोलना चाहती थी । स्थानीय प्रशासन ने उसे इस बावत कोई सहयोग नहीं दिया । वनमाला खिन्नमना हो ग्वालियर लौट आई । वह ग्वालियर जिसे सांस्कृतिक शहर का दर्जा प्राप्त था और जो उसकी जन्मभूमि थी ।

29 मई 2007 को वनमाला ने ग्वालियर में अंतिम सांस ली थी । उसे जन्मभूमि की गोद मिली , लेकिन जिस मुम्बई महानगर को उसने अपना सर्वस्य दिया था , उस मुम्बई में उसके मरने की खबर आज के संचार क्रांति के दौर में भी बहुत देर से पहुँची थी । यह गुमनाम मौत थी । मरते समय वह निपट अकेली थी । पिता ने ठीक हीं कहा था । उसकी शोहरत , इज्जत सब मिट्टी के हवाले हो गयी थी ।

A jurny

#A_जर्नी 
★★★★★

" हैलो गाइज ...रात के बज रहें हैं बारह ...मैं आपका दोस्त आर. जे   निशांत मेहरा .....दिल टूटे या ..कोई रूठे ...कोई करे बेवफाई.. या जी.एफ . हो जाये पराई.... अब न रहेगा कोई टेंशन ...बस दबाओ एक्सरिलेटर ...दिखे कोई खाई ..या कोई बोल्डर ..धकेल दो गाड़ी ....और हो जाओ कूल ...मरना ही तो है जिंदगी से कनेक्शन.... तो क्यों लेते हो टेंशन.... गो ..मूव... प्लेयिंग दिस सांग योर लास्ट जर्नी ....."

" आकाश ....आकाश ....वो .....सामने...इडियट वो खाई है ....."

कार को उर्मिला ने हेंड ब्रेक खींच कर जेम कर दिया ....लेकिन मुझे क्या हुआ था ...मेरा दिमाग कैसे जेम हो गया ....ओह्ह माय गॉड मेरा पूरा हँसता -खेलता परिवार कार में था... मेरी पत्नी उर्मिला मेरे दोनों बच्चे वैभव और त्रिशला 

 "आर यू ऑल राइट अक्की ....कॉम डाउन बेबी ...क्या हो गया था तुमको ?"

" उर्मिला न जाने क्या हो गया था ..हाँ  याद आया ...तुमने वो आर. जे निशांत की बातें सुनी रेडियो पर ...?"

" हाँ वो तो हम रोज ही सुनते हैं ...इट्स वेरी कॉमन  एंड नॉर्मल ...हुआ क्या अक्की बताओ तो सही प्लीज ...?"

मैंने अपनी हथेलियों से अपने चेहरे पर पसीने की बूँदों को पोंछा ...और फिर  चिल्लाकर उर्मिला से कहा ...

" आर यू ड्रंक्ड...इडियट वो  कह रहा था कि मैं कार का एक्सीडेंट कर दूँ... और मैं.. मैं ..फूल उसकी बातें फॉलो कर रहा था ...फक यार "

" अक्की करेक्ट योर लेंग्वेज ...किड्स आर हेयर एंड स्लीपिंग  ....बट रियली वो ऐसा कुछ नही बोल रहा था ....बिलीव मी "

बात आई गई हो गई लेकिन सिर्फ मेरी फैमिली के लिए ...लेकिन अगले दिन में ...लेमन टेल  एफ.एम के ऑफिस गया ...और ऑनर मिस्टर कार्तिक धवन से मिला ...मैंने उन्हें कल रात की पूरी बात बताई ....और वो सीधे मुझे रिकॉर्डिंग रूम में ले गए ...

आर. जे निशांत का पूरा वायरलेस ऑडियो उन्होंने मुझे सुनाया ....लेकिन कहीं भी उसने ऐसा कुछ भी  नही कहा जिसको सुनकर मैं अपने और अपने परिवार की जान लेने पर आमादा हो गया ......

मैं मिस्टर धवन से हार्डली माफी माँग कर जब लेमन टेल एफ. एम ऑफिस से बाहर आया तभी मैंने एक सोचा कि क्यों नही एक  बार मैं आर. जे निशांत से भी मिल लूँ ....

लेकिन पूछ ताछ करने पर पता चला वो सिर्फ रात का प्रोग्राम ऑपरेट करता है ......मैं सीधे वहाँ से निकलर अपने एक साइकोलॉजिस्ट फ्रेंड दिवाकर बख्शी से जाकर मिला और उसे बीती रात की पूरी घटना सुनाई ....

" इट्स हॉररिबिल ...बट इट्स वेरी नॉर्मल ....आई थिंक या तो तुमने ज्यादा ड्रिंक कर ली होगी ...या फिर तुम आजकल पूरी नींद नही लेते ...हो सकता है तुम्हे ड्राइव करते टाइम झपकी आ गई  हो और उसी में तुमने कोई सपना देखा हो ..लेकिन क्या पता ये कुछ और हो...होता है आकाश ...इवन मेरे साथ तो अक्सर होता है ....मैं आज तलक निर्मला को नही भूल पाया और अगर मैं कहूँ कि वो इस वक्त तुम्हारे बगल की शीट पर बैठी है तो तुम बिलीव नही करोगे पर वो है ..सी इन योर लेफ्ट साइट "

मैं डर से काँपते हुए एकदम से अपनी कुर्सी से उठ खड़ा गया ..निर्मला.. दिवाकर की स्वर्गीय पत्नी है ...हाउ केन पॉसिबल ..? दिवाकर मुझे रोकता रहा लेकिन फिर मैंने सीधे घर की राह ली ...डोर बेल दी -

" अक्की ..व्हेर आर यू ...फोन घर में भूल गए ...ऑफिस में फोन किया तो पता चला तुम आज ऑफिस नही गए तो फिर तुम कहाँ थे अब तक ...?"

मैंने उर्मिला की बात का कोई जवाब नही दिया ....और सीधे बैडरूम में जाकर सो गया ...आँख खुली शाम के 5 बजे तो उर्मिला मेरे लिए कॉफी लेकर आई ....

"अक्की प्लीज शेयर मी... इट वॉज जस्ट एन इंसिडेंट बेबी प्लीज फॉरगेट ....चलो बच्चे भी जिद कर रहें हैं कोई बढ़िया सी रोमेंटिक मूवी देखकर आते हैं आज "

मैंने उर्मिला को गले से लगा लिया ....और गहरी-गहरी साँसे लेकर उसे जताया कि तुम हो तो मैं जिंदा हूँ ...तुम्हारी जिन्दगी और खुशी मेरे लिए सबसे बढ़कर है .....कॉफी पीकर मैंने शावर लिया और फिर हम सब वाल्ट्री मल्टीप्लेक्स में थे ....फ़िल्म बहुत अच्छी थी लेकिन न जाने क्यों अब भी मेरे दिमाग में कल की घटना ही घूम रही रही ....खैर फिर हमने एक अच्छे से होटल में खाना खाया और फिर हम घर चले गए .....

सब सो गये ...लेकिन मेरी आँखों मे नींद नही थी ...तभी मैंने मोबाइल में टाइम देखा ....पौने बारह बज रहे थे ....मैंने चुपके से उर्मिला का हाथ अपनी कमर से हटाया और जाकर कपड़े पहने ....और चुपचाप कार लेकर मैं लेमन टेल एफ. एम के ऑफिस चला गया ...रिकॉर्डिंग कंवरशेसन  स्टूडियो का आधा दरवाजा खुला था .....

अंदर एक बहुत हैंडसम लड़का ..आर .टी टेलीफोनी रेडियो कम्युनिकेशन फ्रीक्वेंसी सेट में लिसनर्स को डील कर रहा था ......पता किया तो पता चला.. ही इज निशांत।।

निशांत ने जब लिसनर्स के लिये सांग प्ले किया तो मैंने अंदर एंट्री की ...वो सकपका गया और उसने मुझे बाहर जाने का इशारा किया ...लेकिन मैंने इंसिस्ट किया  तो उसने आधे घण्टे वेट करने को कहा ....उसका रिलीवर आने तक .........

आधे घण्टे इंतेजार के बाद जब निशांत स्टूडियो से बाहर आया मैंने उसको अपना पूरा परिचय दिया और उस घटना का उससे जिक्र किया .....वो बहुत जोर से हँसा ...और बोला ~

" सर आई एम नॉट हिप्नोटाइजर ...आई एम ओनली ए रेडियो जॉकी ...."

उसने इन सब बातों को मेरा इनकॉन्शियस वहम बताया...लगभग 15 मिनट की उसके साथ हुई बातचीत ने मेरा मन मोह लिया ...और मैं उसका एक सीरियस फैन बन गया ......

स्टूडियो से बाहर निकला तभी मुझे अपने दोस्त साइकेट्रिस्ट दिवाकर की कार भी लेमन टेल ऑफिस के आगे  पार्क मिली ....मैंने उनको कॉल लगाया तो पता चला वो मेरे साथ हुए इस इत्तेफ़ाक पर एक किताब लिख रहें हैं और आर .जे निशांत से इस संदर्भ में कोई बात करने आएं हैं ....लेकिन अंदर तो वो कहीं दिखे ही नही .....खैर वो बाहर आये और हमने कोजो बार मे बैठकर एंटीक्यूटि वाइन के दो-दो पैग लिए ....

" यार आकाश ..बहुत कुछ रिसर्च करने के बाद लग रहा है ...कोई नेगेटिव एनर्जी का  तुम पर  इनफ्लुएंस है ...."

" व्हाट ...आर यू सीरियस दिवाकर ..मीन्स यू आर सेयिंग ...अ पेरानॉर्मल नेगेटिविटी डूइंग दिस ......मतलब कोई भूत-वूत ....एक डॉक्टर होकर तुम ....."

डॉक्टर दिवाकर ने एक और पैग आर्डर किया ....और उसे एक घूँट में अंदर करके बोले ~

" मैंने तुम्हें कब कन्वेंस किया कि ..मैं बुरी आत्माओं पर बिलीव नही करता ...मैं करता हूँ बल्कि ये होती है ...मेरी बीवी मरकर भी जिंदा है आकाश ..तुम इसे पागलपन कहोगे लेकिन मैं प्रूफ कर सकता हूँ.... "

" आर यू मेड डॉक्टर ...ओके प्रूफ करो ..."

" तो देखो उस वाइन कप को ..जो उस टेबल में रखा है ..."

मैं उस काँच के वाइन कप को देखने लगा ...तभी डॉक्टर बोले ~

" निर्मला प्लीज डिस्ट्रॉय वाइन कप "

मैंने चौंककर डॉक्टर को देखा लेकिन तब तलक एक आवाज के साथ वो गिलास चकनाचूर हो गया ....मैं अपनी राउंड चेयर से खड़ा हो गया ......और मुँह फाड़ कर कभी डॉक्टर तो कभी उस वाइन कप को देखने लगा .....डॉक्टर मुस्कुराह रहे थे लेकिन मैं थरथरा कर काँप रहा था .......

उस दिन के बाद मुझे लगने लगा कि कोई है जो मुझे नुकसान पहुंचाना चाहता है ...कोई है जो मुझे जान से मार देना चाहता है ....लेकिन मेरी बात का न मेरी पत्नी उर्मिला ने यकीन किया न मेरे बच्चों ने ....लेकिन डॉकटर दिवाकर ही थे जो मुझे समझते थे ....

मेरा व्यवहार बदलने लगा ...क्यूँकि अब वो साया मुझे दिखने लगा ...महसूस होने लगा वो कभी मेरे साथ हैं तो कभी मुझे घूर रहा है.....इस वजह से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा ....तभी पता चला डॉक्टर दिवाकर कुछ हफ्तों के लिए मॉरीशस चले गए .....

मैं अकेला पड़ गया ...मेरे असमान्य व्यवहार की वजह से उर्मिला बच्चों के साथ मायके चली गई ......

मैं अब उस घर मे अकेला था जहाँ वो साया अब हर वक्त मेरे साथ था ....दिन में मैं खुद को बाथरूम में बंद कर लेता और रात को पलंग के नीचे छिपा रहता ...नींद न आने की वजह से मेरा मानसिक आधार धीरे-धीरे फिसलने लगा ...भोजन न करने के कारण  मैं बहुत कमजोर हो गया ....एक रात अचानक से घर की बत्ती ऑफ हो गई ...और तभी मुझे वो साया अपनी खिड़की पर नजर आया ....मै  भाग कर बैडरूम में चला गया ....तभी  फोन की घण्टी बजी .....मैंने तुरन्त फोन पिक किया .....

" हे आकाश मैं लौट आया हूँ ....दिवाकर बोल रहा हूँ तुम जल्दी उस घर से बाहर निकलर सीधे मेरे घर आ जाओ वरना वो साया तुम्हे मार देगा "

मैंने तुरन्त फोन कट किया और जेब में डाला ..और फिर कार की तरफ दौड़ा 12 बज रहे थे .....जैसे ही कार स्टार्ट की तभी फोन की रिंग फिर बजी ....मैंने बात करके कार को आगे बढ़ाया ...और तभी एफ. एम बजने लगा .....

" हैलो गाइज  ....मैं आपका दोस्त निशांत ...यानि निशा का अंत... अंत ही जीवन का आरम्भ है ...अंत ही नव जीवन प्रदान करता है ....क्या रखा है इस जीवन मे जहाँ हर कोई आपकी जान लेना चाहता है ...मिटा तो खुद इस जीवन को वरना कोई तुम्हारे इस जीवन को खुद मिटा देगा ....ये गहरी खाइयां तुम्हारे हर दर्द को समेट लेंगी ....समा जाओ इनमें समा जाओ ... टर्न योर कार ...टर्न एंड जम्प "

और मैंने कार को नीचे खाई में जम्प करा दिया .....अगले दिन न्यूज पेपर ने मेरी मौत की पुष्टि की और मेरी लाश  नदी में बह जाने की वजह से न तलाशी गई ...

दो दिन बाद ....जब मेरे घर में ...एक जमावड़ा सा लगा था ...तब किसी ने दरवाजा नॉक किया ....अंदर आर .जे. निशांत .डॉक्टर दिवाकर और उर्मिला शराब के नशे में धुत थे ...

" यू आर अंडर अरेस्ट फ़ॉर आ सीवियर मर्डर प्लान "

पहले तो पुलिस फिर प्लान सुनते ही उनके होश उड़ गए ....और तब वो लड़खड़ाकर गिरने लगे जब उन्होंने मुझे अपने दोनों बच्चों के साथ देखा ...

पुलिस की सख्ती में उन्होंने कुबूल किया ....कि मैं यानि आकाश गुप्ता जो समृद्धि में एक लैंड लार्ड और एक बड़ी कम्पनी का मालिक हूँ ....उसकी ब्याहता उर्मिला ...और उसके दोस्त दिवाकर के बीच अवैध संबंध हैं ...दिवाकर जिसने इसी तरह से अपनी बीवी को मानसिक बीमार बनाकर कत्ल किया ...और मेरे लिए ये प्लान बनाया ...क्यूँकि मेरी मृत्यु यदि एक्सीडेंट के अलावा और कहीं भी होती तो वो फँस सकते थे ...सिर्फ कार एक्सीडेंट ही वो एक  वजह थी जो असमान्य नही लगती ....उन्होंने बताया कि इस षडयंत्र में आर. जे निशांत को इसलिए शामिल किया गया क्यूँकि मैं रेडियों और गीतों का बहुत शौकीन हूँ ..और हमेशा ड्राइव करते हुए रेडीयो सुनता हूँ ...आर.जे .निशांत जिसकी आवाज में काबिलियत है हिप्नोटाइज करने की ....उस दिन जब मैं कार में था तब अचानक से चलती कार में फ्रीक्वेंसी बदली मेरी पत्नी उर्मिला ने वो फ्रिक्वेंशी जो लेमन टेल प्रोग्राम की नही थी लेकिन प्लान अकरोडिंग उसे आर. जे .निशांत ने फिक्स्ड किया था ....उस समय बच्चे पीछे सो रहे थे जब निशांत ने मुझे कार को खाई में डालने के लिए प्रेरित किया ....और प्लान के अक्रोडिंग उसे फेल किया उर्मिला ने हैंड ब्रेक खींचकर ..ताकि इस घटना के बाद वो अपने प्लान को आगे बढ़ा सकें ........डॉक्टर दिवाकर का मेरा विश्वास जीत कर मुझे फिर ये समझाना कि ये सब नॉर्मल नही है ....और मैं फिर इन तीनों के बुने जाल में फँसता रहा और इन तीनों पर कभी मेरा शक भी नही गहराया ... मेरी बीवी जिसे सिर्फ दिवाकर और दौलत से प्यार रहा उसने कभी रत्ती भर एहसास नही होने दिया कि वो  इस घिनौने खेल में शामिल है..बल्कि इस खेल की चीफ है..वो तो उस रात जब दिवाकर ने मुझे अपने घर फोन पर बुलाया और जैसे ही मैंने कार स्टार्ट की तब मेरी बेटी का फोन आया जिसने एक साँस में इन सबका षडयंत्र मुझे बता दिया ....जो शायद इन मक्कारों की ढिलाई की वजह से उसने सुन लिया था .....

एक औरत अगर अपने पर आ जाये तो यम से प्राण खींच लाती है ...और यदि अपने से बाहर हो जाये तो यम को प्राणों का भोग लगा सकती है ...दोस्ती जो जुड़े रहे तो मरते दम तक साथ देती है लेकिन जहां लालच  और वासना दोस्ती में शामिल हो जाये तो दम नही लेने देती .......एक सवाल था जिसको मैंने हथकड़ी पहने दिवाकर से पूछा ....

" दिवाकर ...तुझसे दोस्ती तो हमेशा के लिये आज तोड़ दी मैंने.. लेकिन जाते-जाते ये बता कि वो वाइन कप कैसे तोड़ा तूने ..?.."

" हाई एल्ट्रा इन्विजुवल बीटा रेज ....जब तूने मुझे देखा तब मैंने शॉर्ट एल्ट्रा गन से उस गिलास पर बीटा रेज स्प्रे की ....."

जिंदगी थ्रिलर और हॉरर हो सकती है ...लेकिन जिंदा इंसान से बड़ा भूत और राक्षस कोई नही ....साया तो रौशनी की किरण बना देती है या मिटा देती है लेकिन वो दर्द जो अपने देते हैं उनको वक्त भी मिटाने से हिचकता है ।।।।।।

नवाज़िश

By✨✍️

Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत (उत्तराखण्ड )

Wednesday, 27 November 2019

time traveler

#इट्स_पॉसिबल
★★★★★★★

" मेरे पास कितना वक्त है डॉक्टर साहब ...नही आज सच बोलिये प्लीज ...कितना ......?"

" ज्यादा से ज्यादा अब 6 महीने !... सुनो ..अरे सुनो... राकेश ..मिस्टर राकेश ....."

हॉस्पिटल से बाहर निकलते ही ..मैंने सबसे पहले अपने होंठों को चबाया ...फिर रुमाल से अपने चेहरे का पसीना पोंछा ..और जेब से सिगरेटकेस निकाला ...जो शरीर में हाँफती- दौड़ती कँपकँपी से जमीन पर गिर गया .....

मैंने उसे उठाकर  उसमें से एक सिगरेट निकाली और थरथराती अँगुलियों से सिगरेट को अपने होंठों पर लगाया ।।।।।

लाइटर सर्च किया ....और पाया शायद वो रूम में ही रह गया ......तभी किसी ने लाइटर से मेरी सिगरेट जलाई ......मैंने लाइटर जलाने वाले के चेहरे की ओर देखा .....और उसने तपाक से मुझसे एक सवाल पूछा.....

" कोई प्रॉब्लम है ...इतना परेशान क्यूँ दिख रहें हैं ......?"

" वो ....वो..न..नही ..ऐसा कुछ भी तो नही ....आई एम आल राइट ..थैंक्स फ़ॉर हेल्प "

मैं सिगरेट का एक गहरा कस भरकर जैसे ही आगे बढ़ा ...उस आदमी ने मुझसे कहा.....

" मुझे कुछ पैसा उधार दे सकतें हैं आप ......?"

मैं रुक गया ...और न जाने क्यों ..किस धुन में मैंने सिर्फ युक्ति की तस्वीर और डेबिट कार्ड...ए.टी. एम कार्ड निकालकर बटुवा उसे दे दिया ...ये शायद मेरी मानसिक उलझन का परिणाम था या अवश्य ही ये भावना की जाते -जाते किसी के काम आ सकूँ....

वो आदमी हैरत में था ...इस कदर हैरत में घूरकर मुझे देखने लगा मानो किसी ने उसके विश्वास के या तो परखच्चे उड़ा दिए हों या फिर किसी ने उसके धराशाई विश्वास को जिंदा कर दिया हो ....मैंने उसके काँधे को थपथपाया और मैं अपनी कार की तरफ बढ़ा और उसे स्टार्ट किया ....कुछ मीटर आगे बढ़ा ही था कि मेरी नजर अपनी कार के साइड मिरर पर पड़ी ...और मैंने देखा वो आदमी अब भी वहीं खड़ा था .........

----//

खड़ा तो आज से 3 साल पहले मैं भी कुम्भा जंक्शन में था ....सर्द ठिठुरती शाम.... और उसपर जंक्शन में सिर्फ इक्का -दुक्का इंसान ........ गाड़ी पटरी पर आ लगी ...तो मैं अपने कम्पार्टमेंट में चढ़ गया ....मैंने सबसे पहले अपने रिजर्वेशन रूम की खिड़कियाँ बन्द की और फिर  जैसे ही दरवाजा लॉक कर रहा था तभी ~~

" प्लीज हाथ खींच लो ...सिर्फ 30 मील आगे उतर जाऊँगी ...प्लीज ....!"

ट्रेन विशिल देकर हौले-हौले आगे बढ़ने लगी ..बेशक अगर वो कोई मर्दाना आवाज होती तो मैं उसके मुँह पर दरवाजा मार देता ...बेशक कोई अधेड़ ..बूढ़ी होती तब भी मना कर देता ...लेकिन 20-21 साल की वो लड़की ...जिसकी सुंदरता से मेरी आँखें चुंधियाने लगी ....मैंने तुरन्त उसे ऊपर खींच लिया .......और ट्रेन के पहियों की रफ्तार  नंगी पटरियों को चूमने लगी .....

बेशक वैसे ही जैसे मेरी आँखें उसके छुटके से स्कर्ट से उसकी नंगी टाँगों को .....

" ठंड बहुत है ....चाय -वाय तो मिलेगी नही ....थोड़ा रम लेंगी आप ...इफ यू डोंट माइंड "

" ओके ...वैसे मैं लेती नही ...लेकिन आपने मेरी हेल्प की है ...सो चियर्स "

उसके होंठों से चीयर्स सुनकर ..मैं समझ गया कि 30 मील का ये सफर मुझे 30 जन्मों तक याद रहने वाला है ......

इधर-उधर की बाते करते रहे हम ...न मैंने उसे बताया कि मेरी कोई प्रेमिका है ...और वासना के नशे में न उससे कुछ पूछने का मेरे पास वक्त था .....

धीरे-धीरे मैं उसके करीब होता रहा ...और वो मदहोश सी होती रही .....लेकिन जैसे ही मैंने नशे में हिम्मत करके उसे अपनी बाँहों में भरा ...वो चिल्ला उठी ...

" देखो साहब ....मुझे टच मत करो ....वरना मैं चिल्ला दूँगी "

" अबे ड्रामा क्यों कर रही है ...बोल कितना लेगी ..बोल ?"

वो लड़की तुरन्त तपाक से बोली ~

" साहब मैं बता नही सकती ...ठीक है आप को ऊपर-ऊपर जो करना है कर लो ...लेकिन वो नही जो आप चाहते हैं "

मैंने सोचा खाली ड्रामा कर रही है .. और मैंने उसकी हाँ में हाँ मिला दी ...शराब के नशे में न फिर उसको  कोई होश रहा न मुझको ...और जब होश मरने लगता है तो इंसान का विवेक भी जगाये से नही जगता ....

हवश शांत होते ही मैंने खड़े होकर अपनी पेंट पहनी और धप से अपनी सीट पर बैठ गया ......और मैंने एक खिड़की खोल दी ....ठंडी हवाओं के अंदर आते ही मेरा नशा भी टूटा और उसका भी ....वो खड़े होकर अपने कपड़े दुरस्त करने लगी ....मैंने 100 के पाँच नोट उसके हाथ मे रख दिये ....फिर हमारी कोई बात नही हुई ...उसका स्टेशन आया और वो जब उतरी तो बोली ~

" मुझे माफ़ कर देना साहब ...हाँ मैं वैश्या हूँ ..एक बहुत बुरी औरत ...लेकिन शराब के नशे ने मुझे बिल्कुल .....साहब मुझे माफ़ कर देना ...."

मुझे आने वाले 6 महीने तक नही पता चला कि वो लड़की क्यूँ मुझसी माफी माँग  रही थी ....लेकिन 6 महीने बाद मुझे बताया डॉक्टर ने .....

" राकेश मेरा शक वाजिब था ...यस यू आर HIV + "

मेरे पैरों तले जमीन सरक गई ....मैं गिड़गिड़ाकर डॉक्टर साहब से बोला ~

" लेकिन कैसे ...मैं ही क्यूँ .....?"

तब लगातार उस लड़की की माफ़ी मेरे कानों पर बिजली बनकर टूटने लगी .....

" इट्स ओके ...प्लीज कॉम डाउन ...राकेश मेडिकल साइंस के पास हाँलाकि इसका कोई इलाज नही ..बट हम इसके इफेक्ट को कंट्रोल कर सकतें हैं ....लेकिन अगर तुम चाहो तब ..राकेश ये कोर्स तुम्हे पूरी जिंदगी करना होगा ... एक दिन का भी नागा नही समझे ....एव्री डे आर इम्पोर्टेन्ट ..अंडरस्टैंड !
"

लेकिन मुझे पता था ये सिर्फ एक दिलासा है ...हो सकता है डॉक्टर सही बोल रहें हों .....

तभी मेरी नजर कलेंडर में गई ....15 मार्च 2001  यानि आज मेरी प्रेमिका युक्ति का जन्मदिन .....
मैंने डॉक्टर से इजाजत ली और शाम को युक्ति से इशरत बाग में मिला .....वो बोली ~

" नो ..नो .. प्रेजेंट- व्रेजेंट कुछ नही आई वोंट आ स्मूच किस इन माय लिप्स "

वो आँखें बंद करके अपने होंठों पर मेरे होंठों का इंतेजार करती रह गई .....लेकिन तब तलक मैं उसकी हद से दूर जा चुका था ...एक खत छोड़ कर जिसमें मैंने लिखा था कि ...." मुझे भूल जाना ! "

मुझे नही पता कि युक्ति मुझे भूल गई या नही लेकिन फिर मुझे अपने माँ-पापा की तेज याद आई ...याद आई अपनी बिन ब्याही बहन की ....याद आया पापा का सिवियर अस्थमा और याद आया माँ का ये कहना कि मेरा बेटा एक दिन हमारे दिन जरूर बदलेगा .....

अँधेरी सुनसान उस गली मैं ..मैं एक दीवार से सटकर बैठ गया ....और जी भर कर रोया ....अपने चेहरे को नोचने लगा ...अपने बालों को सर से उखेड़ने लगा ......और तब याद ये भी आया कि जिंदगी का एक रॉंग टर्न पूरी जिंदगी को गलत राह में धकेल देता है .....एक गलत स्टेप ...होश पर जोश को तरजीह देना इंसान को बर्बाद कर देता है ....उस दिन बाद के जरूर मैं दवाइयां खाने लगा ....लेकिन निरन्तर डिप्रेशन के चलते मेरा स्वास्थ्य गिरने लगा .....

खर्चा बहुत बड़ा था तो कार लोन के लिए बैंक तकादा करने लगा... कम्पनी में मेरी सुस्ती को देख मुझे फिर उसी पूर्व पद में स्थापित कर दिया जहाँ पूरे 5 साल काबिलियत ..निष्ठा और ईमानदारी से मैंने उससे मुक्ति पाई थी .....घर उतना पैसा भी नही भेज पा रहा था ...और ये भी भय था यदि किसी को ये राज पता चल गया तो सबसे पहले मेरी जॉब जाएगी फिर दोस्ती और उनका सहयोग .......

---///------

डॉक्टर ने सिगरेट की सख्त मनाही की थी लेकिन अब इस भूतिया ..डरावनी और काली दुनिया में कोई तो उजाला चाहिए था ....सिगरेट जैसे ही मुँह पर लगाई तभी दरवाजे पर किसी ने नॉक किया ....

" तु..तु..तुम ...?

" जी मैं ...आकाश दीक्षित ...क्वांटम एंड पैरा कॉस्मॉस साइंटिस्ट विथ ड्रग न्यूरो ....एंड आई एम फ्रॉम इन वेरी न्यू डेली   "

" व्हाट ....तो फिर आज तुम....मतलब आपने वो मुझसे पैसे क्यों माँगे .....?"

" बिकॉज़ ...आई हैव एम्प्टी ऑफ  करंट करेंसी ....साफ-साफ कहूँ तो मेरे पास इस दौर का पैसा नही है ..... अंदर नही बुलायेंगे...?"

मैंने उस अजीब से आदमी को अंदर बुलाया ....उसे बैठने का आग्रह किया ...और उसके लिए किचन से पानी लेने गया ....जब पानी लेकर लौटा तो वो बैठा सिगरेट पी रहा था ....और टेबल में पड़ी मेरी मेडिकल फाइल को खँगाल रहा था ...मैंने उसके हाथ से फाइल तुंरत छीनी ..और उसे ऊपर अलमीरा में रख दिया ...

सिगरेट एस ट्रे में बुझाकर ...उसने  पानी की एक घूँट पीकर  मुझे मेरा पर्स वापस किया और बोला ~

" थैंक्स जेंटल मैन लेकिन ये कुछ बिल्स वगैरह थे पर्स में आपके ...इसलिए पता खोजने में परेशानी नही हुई ..... और आपकी परेशानी का कारण भी पता चल गया अब "

" म..म..मतलब ..?"

" यकीन कीजिये एड्स अब कोई लाइलाज बीमारी नही है ..बल्कि कहूँ तो हल्का सा बुखार जैसी जिसे दवाई की एक घूँट से हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है ..."

मैं सकपका गया ....और बोला 

" आप जा सकतें हैं ...मैं समझता हूँ आप जैसे लोगों को...वो लोग जो किसी की बीमारी और दुःख से भी पैसा कमाना जानते हैं ...प्लीज लीव मी अलोन "

वो आदमी खड़ा हुआ ...और बोला ...

" हारा हुआ और मायूस आदमी यही सोच रखता है ...लेकिन यकीन करें ...ये अब कोई बड़ी बीमारी नही है "

मैंने तुरंत गुस्से में उस आदमी का गला  पकड़ लिया ... उसने बड़ी इज्जत से मुझसे अपना गला छुड़वाया और बोला .....

" कंट्रोल करो सर ...ये रहा आपका पैसा ...आप भले आदमी लगे इस पूरे शहर मैं जिसने बिना कुछ पूछे -जाने मेरी मदद की ...तब ही आपके लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो गई .....कुछ नही चाहिए मुझे ...जबकि मेरे पास इतना है कि आपका ये पूरा शहर खरीद लूँ ..."

मैंने उस आदमी से अब इज्जत से पूछा ~

" कौन हैं आप ...?"

वो फिर एक सिगरेट जलाकर उसे होंठों से लगाकर बोला ~

" टाइम ट्रेवलर ....समय यात्री ....22 वी सदी ...सन 2150 ...नही समझोगे आप ... आइंस्टाइन ने कहा था कि समय यात्रा की जा सकती है बशर्ते हम लाइट की स्पीड से यात्रा कर सकें ...हॉकिन्स ने बोला था कि पेरेलर यूनिवर्स से समय यात्रा सम्भव है ....प्राचीन कथाओं में भगवान का कहीं भी प्रकट हो जाना ...पैगम्बर का मे'अराज करना .... किसी का अचानक से कहना कि ये सब वो पहले कहीं देख चुका है ....ऐसे हजारों उदाहरण जो प्रूफ करते हैं कि समय यात्रा पॉसिबल है ...और लोग जाने-अनजाने करते आ रहें हैं ...लेकिन उनके पास न कोई प्रमाण हैं न कोई समझ ..क्यूँकि ये पलों में होती और समाप्त होती है .....कोमा में गया इंसान भी अक्सर समय से आगे निकलर जब वापस लौटता है तो अक्सर कहता है कि वो किसी और दुनिया से होकर आया है ....दिस इज़ साइंस और 22 वीं शदी में मैंने यानि आकाश दीक्षित ने वो कंडीशन इंवेंट कर ली है जो हमें टाइम ट्रेवल करवा सके ......तभी इस वक्त तुम्हारे सामने खड़ा हूँ "

मुझे उसकी बात पर रत्ती भर यकीन नही था ....लेकिन उसने मुझसे कुछ देर की इजाजत माँगी और फिर कुछ देर बाद वो वापस आया .....उसने मेरी टेबल पर ही कुछ केमिकल्स  और टेबलेट्स को मिलाया और बोला ~

" इसे पी लो राकेश ....और अपनी पहले जैसी जिंदगी में लौट जाओ .....मेरा भी अब  लौटने का वक्त हो रहा है ....."

मैंने उसकी बात नही मानी और उस लिक्विड की देखने लगा ....फिर जब सर उठाया तो वो आदमी वहां मौजूद नही था ...पता नही वो कहाँ चला गया लेकिन 3 दिन तक मैंने उस लिक्विड को हाथ नही लगाया ...वो सारे रैपर्स फेंक दिए ...सब सफाई कर दी ...तभी न जाने क्यों एक दिन बढ़ती खाँसी औऱ लूज मोशन से धीरे-धीरे मरते मैंने एक बार मरने का इरादा कर लिया ....और चाकू से नश काटने लगा तभी नजर सामने उस लिक्विड पर गई ....न जाने क्या हुआ मुझे और एक घूँट में मैंने वो लिक्विड पी लिया और फिर मुझे नींद आने लगी ....

8 घण्टे बाद जागा तो ...तो शरीर को बहुत हल्का महसूस किया ...और कुछ दिन गुजरने के बाद भी न कोई खाँसी मुझे हुई न कोई सुस्ती और न किसी बीमारी ने मुझे घेरा .....जब बिल्कुल फिट हो गया तो एक दिन मैंने पुनः अपना टेस्ट करवाया ....मेरे सारे रेस्ट निगेटिव थे ...मैंने कई बार अपने टेस्ट करवाये लेकिन हर बार टेस्ट निगेटिव थे ....

मैं जी उठा झूम उठा ....युक्ति के पैरों में गिरकर उससे माफ़ी माँगी ...डॉक्टर साहब पूछते रह गए कि ये मिरिकल कैसे हुआ ...लेकिन मेरे पास कोई जवाब नही था .....मैं इस कहानी की किसी से साझा भी नही करता ..क्यूँकि इससे सिर्फ मेरा मजाक उड़ेगा ...कोई नही मानेगा ...लेकिन एक दिन टाइम ट्रेवल पॉसिबल होगा  इस बात की मुझे बेहद खुशी है ....तब तक शायद मैं जिंदा न रहूँ लेकिन मैं अगर फिर होश न खोता तो उस आदमी से कम से कम वो लिक्विड बनाने की जानकारी तो ले ही लेता जिससे तब तलक एड्स से अनगिनत लोगों की जाने तो बचाई जा सके  ।।।।।

क्यूँकि हर बार कोई मसीहा समय को फांद कर नही आयेगा ...

नवाज़िश

By~✨✍️

Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत (उत्तराखंड)

Sunday, 24 November 2019

गामा

#आखरी_दाँव
                ★★★★★★★★★              

" अब्बे पेट है या लंगर खाना 80 रोटी उतार गया ... फिर बोलता है अब चावल लाओ "

" हल्के बोलो मालिक सटा हुआ बैठा है ....सुन न ले "
____________________________________________

जिला बलिया आज जरूर ' गामा ' के नाम का रौब रखता है ...लेकिन इस जिले की गलियों में मैंने बेशुमार गरीबी देखी है ...भूख ...लाचारी ..मुफ़लिसी .......और इसी भूख से कूड़े के ढेर पर सरपट नजर दौड़ाकर फिर इधर-उधर चोर नजरों से देखकर मैंने उस बच्चे को वो सड़ा पपीता उठाते भी देखा है ....जिसका आधा हिस्सा गल कर पोपला हो गया था ......

10 साल का ये बच्चा भूख से इस तरह व्याकुल था जैसे उसने कई दिनों से मात्र  भोजन का  ख्वाब देखा ....भोजन किया नही ....उसने वही पपीता पहले मस्जिद के बाहर लगे उस वुजू के नल पर धोया और फिर उसका गला हुआ हिस्सा बाकि बचे साबुत हिस्से से अलग किया ...और फिर इधर-उधर देखा और खा गया.....

तभी मैंने देखा एक औरत जो दौड़ती हुई आई और उस बच्चे का कान पकड़ कर बोली ~

" बाली ...अभी तो दो डाँसी भात डकार कर आया था मुंए ...फिर तुझे भूख लग गई .. और कहाँ से लाया ये ....?"

वो औरत जरूर उस बच्चे का कान पकड़ कर घर ले गई ...लेकिन मेरे लिए एक सवाल छोड़ गई ...कि दो डाँसी भात ...यानि दो प्लेट छक कर चावल खाया कोई बच्चा इतना कैसे भूखा और लालची हो सकता है जो कूड़ेदान से सड़ा पपीता उठाकर ऐसे खा ले जैसे गौ मैय्या चपाती एक फांक में मुँह के अंदर समा लेती है .....

बेशक झूठी होगी वो औरत ...बेशक उसकी माँ हो ...या उसकी कोई करीबी ..लेकिन वो झूठी थी ...हो सकता है सौतेली माँ हो...?

हो तो बहुत कुछ सकता था लेकिन मैंने सीधे अपने दफ्तर का दरवाजा खोला और देखा साढ़े 10 बज गए लेकिन अभी तक एक भी कार्मिक अपनी ड्यूटी पर नही आया .....जिला बलिया  के इस ग्राम में ग्राम विकास अधिकारी का पद सम्हाला है मैंने ....और आज ही नियुक्ति ली है यहाँ.... इससे पहले आजमगढ़ में कार्यरत था मैं ....

मैं यानि अभय कुमार श्रीवास्तव ...उम्र 28 साल 3 महीने ...!!!

3 दिन बाद ही वो बच्चा मुझे फिर दिखाई दिया ...दरअसल जिस दुकान से मैं दूध खरीद रहा था ...उसकी बाहर की झापड़ी में जलेबी बन रही थी और वो उन जलेबियों को देखकर ललचा रहा था ....

" क्यों रे ...नाम क्या है तेरा ....?"

" जलेबी खिलाओगे तो बताऊँगा ..?"

मैंने अजीब नजरों से उसको देखा ..फिर कहा भाड़ में जाये नही बताता तो ..और आगे बढ़ गया...लेकिन फिर पीछे पलट कर देखा और देखा उस बच्चे को जो अब भी जलेबियों पर लार गिरा रहा था ....

" चचा 100 ग्राम तोल इसके हाथ पर रख दियो ...और पैसे बताओ ..?"

" हा हा हा साहब 100 ग्राम से न भरेगा इसका नरक.. किलो भी रख दूँ तो साफ कर जाएगा ....."

फिलहाल 100 ग्राम से 250 ग्राम  तक लाकर मैंने ब्रेक दिया और वो  जलेबी हाथ में लेकर सीधे लड़ी हो गया ...

" कौन है चचा ये ....?"

" रुस्तम सिंह का बेटा बलवीर है ...बाप पहलवानी करे है इसका ..लेकिन खाली पहलवानी करे है ... कोई मेडल ..तमगा तो जीता न आज तक...."

" ओह्ह ... बड़ा खाता है ये चचा .."

" बाप पे गया है बिल्कुल ..30 -35 रोटी उड़ा जाये वो तो ...ये तो फिर भी किलो सवा किलो से मान जाए ...."

"  30 से 35 रोटी आदमी है या बकासुर ...और किलो ..सवा किलो ...कुछ न हुआ चचा ..बच्चा है अभी ये "

इंट्रस्ट नही दिखाया चचा ने अब बात करने का क्यूँकि भीड़ बढ़ती जा रही थी .....आगे बढ़ा तो पाया वो बलवीर एक गली के मकान की दीवार पर पीठ के बल सटा उस अखबार का पन्ना चाट रहा था जिसपर अभी उसकी जलेबी बिछी हुई थी ....

" क्यूँ बे नाम -पता बताये बिना ही दौड़ गया ... कहाँ रहता है .."

.उसने हाथ से एक मकान की ओर इशारा किया ...वो आगे बढ़ा और मैं पीछे .....

वो तो किवाड़ खोल अंदर घुस गया लेकिन मैंने दरवाजे की झिरी से झाँककर देखा तो कुछ  सुना भी ....

" क्या मिले है इस पहलवानी से ...जब घर मे राशन के कनिस्तर खाली पड़े हैं... देखियो जी ...न मुझसे ये बारात का खाना बनता है न ये रोज की उधारी पर तकादा करने वालों की बाते सुनी जाती है .....लो ये इक पहलवान और बना फिर रहा है ...बाप पर गया है मुंआ बिल्कुल ....."

खटिया पर  बैठा शरीर में  तेल मलता बलवीर का बाप ....रान पर बलवीर को बिठा कर बोला ...

" देख  री बाते भी खिलाती है तो थोड़ा मक्खन डाल कर खिलाया कर ...और क्यों सोच रही है ...दंगल बढ़ रहा है ....उस्तादी की पेशगी मिलने दे ...फिर देखते जा .....तुझे भी दंगल में उतार कर जो दो-दो हाथ न कराये तो फिर कहियो ...."

ये बात सुनकर पहलवान की औरत शरमा गई ..और मुँह पर पल्लू ठूँस कर रसोई में घुस गई ....मैंने एक नजर दूसरी ओर  घुमा कर डाली तो पाया ....पहलवान के बाकि तीनों बच्चे जिनकी उम्र क्रमशः 18, 16  और 14 होगी बोरे में बैठे पढ़ाई कर रहे थे ....

तभी रुस्तम पहलवान ने उनपर एक नजर डाली और रान की पिंडली में बैठे बलवीर से बोला ...

" देख पहलवान ये बनेंगे साहब ...लेकिन तुझे बनना है गामा समझा !"

" गामा मतलब ...?"

" गामा मतलब  ..बहुत बड़े पहलवान थे ..कभी किसी से न हारे और रहा गामा का मतलब तो सुन लल्ला...जो रोटी साथ गम भी खाये ...और जो दूसरों को गम दे उनकी हड्डियां अखरोट की तरह खोल दे ...गामा मतलब जो अपने बाप का नाम 36 कोस बिखरे गाँव मे फैलाये ...जो जमीन पर पैर रखे तो धरती हिल जाए ...और दंगल में पैर रखे तो बड़े -बड़े पहलवानों की लँगोट खुल जाए ...."

बलवीर खूब ठकाका मार कर हँसा ...लेकिन उसके तीनों भाइयों ने उसकी तरह ईर्ष्या की दृष्टि डाल कर कम से कम मुझे तो जता दिया कि पहलवान और माँ के बाद बलवीर को पहला दंगल अपने भाइयों से लड़ना होगा ......

मैं आगे बढ़ गया ....और वक्त बदलता रहा ...बलवीर दिन में एक चक्कर मेरे पास जरूर मार लेता .... और मैं उसको कुछ न कुछ जरूर खिलाता .... इस पूरे गाँव में बलवीर अगर किसी का कहा मानता या किसी की इज्जत करता तो वो मैं था ......

12 साल न जाने कैसे उम्र की मुट्ठी से सरक गए .... और आज बलवीर 22 का हो गया है .... 22 का मतलब पूरे 22 फ़ीट का जैसे ताड़ .... उसका शरीर ऐसा था मानो उसके शरीर में आठ लोग एक साथ चिपकें हों ....जितनी मेरी बन्द मुट्ठी उतना तो उसके पैर का एक अँगूठा था ...लम्बाई तकरीबन 6.5 फ़ीट से ऊपर ...और हाथ इतने भारी और बलशाली जितनी मेरी दो राने.... पैर का जमाव और खाँचा बिल्कुल गजराज की टाँगों सा ....और फूलती छाती जिसपर सिर्फ ताकत थी और बला का आकर्षण ......

एक दिन दंगल लड़वाते रुस्तम सिंह को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे ....तब दंगल की कमान बलवीर ने सम्हाली ....इतना भारी जिस्म होने पर भी वो कुश्ती औऱ पहलवानी से उचाट था ....उसको सिर्फ एक ही शौक था और वो था खाने का ......दंगल बन्द हो गया ।

लेकिन खाने के लाले पड़ने शुरू हो गए ...तीनों भाई चुपचाप जिममेदारी से बचते हुए शहर जाकर बस गए ....और छोड़ गए 
...दमे से फूलती बीमार माँ ....लेकिन इतने पर भी बलवीर नही पिघला ...मैं जब भी कुछ समझाता गर्दन झुका कर सुन लेता लेकिन कान पर जूं न रेंगती ......

लेकिन उसका शरीर अब उसको खाने पर आमादा होने लगा था... क्यूँकि उसे जिंदा रहने के लिए इंसान का खाना नही बल्कि एक स्वस्थ्य हाथी का खाना चाहिए था ....जो बिना कुछ करे ...नामुमकिन था ....मेरी बीवी ने एक दिन उसे खिलाकर मेरे हाथ जोड़ लिए .....लेकिन मेरी माँ को पता नही उससे क्या लगाव था ....वो उसे अक्सर भोजन करा दिया करती थी ....और इसकी तैयारी उसे पौ फटने के साथ  करनी होती थी ..

एक दिन बलवीर को मैं अपने साथ शहर ले गया ...और दिन में एक होटल में हमने खाना खाया ~

" अब्बे पेट है या लंगर खाना 80 रोटी उतार गया ... फिर बोलता है अब चावल लाओ "

" हल्के बोलो मालिक सटा हुआ बैठा है ....सुन न ले "

जब खाने के बाद होटल के मालिक ने मेरे आगे बिल रखा तो मैंने कहा ~

" जानते हो कौन है ये ..." गामा पहलवान " ....ये तुम्हारे होटल में खाना खाने नही सिर्फ तुम्हारे होटल की शान बढ़ाने आया है "

" ये..ये ..ये गामा पहलवान भैया है ......"

होटल मालिक चीखकर चलते-फिरते को बुलाने लगा और फिर बलवीर को 25 लोगों के झुंड ने हाथों में उठा लिया ...पोल खुल न जाये इस डर से मैंने बलवीर को चलने का इशारा किया ...गाँव लौटते वक्त मेरी जीप का पहिया एक गड्ढे में फँस गया ...बलवीर ने उतरकर एक हाथ से जीप को उठाकर जीप गड्ढे से परे रख दी....

" देख लिया नाम का रसूख ..,देख लिया अपने शरीर की शक्ति का कमाल ...और अब भी तू सिर्फ निठल्ला घूमेगा तो याद रख ...सिर्फ एक आवारा कुत्ता बन कर रह जायेगा ...और ये भूख और शरीर तुझसे तेरा सब कुछ छीन लेगा ...पहलवान की औलाद है बलवीर... मर्द का जना है साले मर्द बनकर जी .....बनकर दिखा गामा जो तेरा बाप तुझे बनाना चाहता था वरना सोच ले आज के बाद मैं भी तुझे एक रोटी का टुकड़ा और एक मीठा बोल न दूँगा "

हिलती जीप पर बैठा बलवीर न जाने क्या सोचता रहा लेकिन मुझे रत्ती भर यकीन नही था कि वो मेरी बात पर कुछ विचार  करेगा ...

लेकिन फिर जादू हुआ ...बाप का बन्द दंगल बलवीर ने खोला ... और सुबह -शाम दंगल में वक्त बिताने लगा ....उसने अपने शरीर को पत्थर बनाना शुरू किया .....और तब तलक उसकी भूख और खुराक का बंदोबस्त मैंने और मेरी माँ ने किया .....

दंगल लड़कर उसने बड़े-बड़े सूरमाओं को चित किया...अब 36 गाँव मे उसके नाम का डंका बजने लगा ....वो गामा के नाम से जाना जाने लगा ....अब न उसके पास भूख की कमी थी ...न शोहरत की और न दौलत की .....

आज बेशक उसका बाप जिंदा होता तो उसपर नाज करता ....लेकिन मैं जिंदा था और मुझे नाज था खुदपर की मेरी एक बात से प्रभावित होकर उसने खुद को पूरी तरह बदल दिया....गामा मुझसे अब बेहद कम मिलता था  ...वक्त ही नही था उसके पास .....और फिर आया वो दिन जब मेरा ट्रांसफर लेटर मेरे हाथ में आया...गामा उस पूरे दिन दंगल न गया ...इतने विशाल पर्वत की आँख में आज आँसू थे ....उसने मेरा सामान खुद अपने हाथ से ट्रक में रखवाया ...और जब मैं लौट रहा तो मेरे पाँव छूकर बोला ~

" साहब ...बाप ने बलवीर पैदा किया था ...और आप गामा पैदा करके जा रहे हो ....माँ भी नही रही अब तो ....दस्तखत दे दो मरूँ तो जलाने आ जाओगे "

एक चपट लगाई मैंने गामा को और तीन सीढ़ियों पर चढ़कर उसे अपने गले लगाया .....शहर जाकर तीन महीने ही बीते थे कि पता चला गामा को किसी ने उकसा कर नेशनल पहलवान " जाँगो " को चैलेंज करवा दिया है ....वो जाँगो जिससे लड़कर आज तलक कोई जिंदा न बचा ...दंगल आज 12 बजे था ...मैंने अखबार फेंका पर्स उठाया और चप्पल पहने ही बस स्टॉप को दौड़ लगा दी ...मुझे पता था 11 बजे तक मैं गाँव पहुँच जाऊँगा और गामा को रोक लूँगा .....लेकिन ट्रैफिक से लड़ता मैं तब दंगल के पास पहुँचा जब गामा और जाँगो आमने सामने थे ...

मैं चिल्लाता रहा भीड़ काटता रहा लेकिन मेरी आवाज मुझ में ही दफ्न हो गई ....गामा ने हर पैंतरे को आजमा लिया लेकिन वो राक्षस जाँगो सिर्फ एक पैंतरे की तलाश में था जिसे उसका किलर पंच कहते थे ....और लगभग 25 मिनट उससे जूझता गामा ...थक कर निढाल हो गया ...तभी जाँगो ने फॉउल खेलकर घुटने को गामा के गुप्तांगों में दे मारा और जैसे ही गामा घुटनों में आया उसने गामा की गर्दन पर हाथ डालकर उसकी गर्दन तोड़ दी ......

खूब हंगामा बरपा गांव वालों ने जाँगो को वहीं पीट-पीट कर निढाल कर दिया लेकिन अकेले तन्हा जो जिस्म जमीन पर आँखें खोल कर गिरा था .....वो मेरा बच्चा गामा था ....वो गामा जो छुपकर कूड़ेदान का पपीता खाते हुए मुझे मिला था ... गामा को जाँगो ने नही मैंने मारा है ...मैंने ही उसे दंगल के लिए उकसाया था ..... मैंने उसकी लाश के करीब बैठकर चिल्ला-चिल्ला कर धूल अपने सर पर डाली ...अपना मुँह नोचा ...कपड़े फाड़े लेकिन गामा के कान पर जूं तक न रेंगी ...

गामा का शव अगले दिन बड़े धूम धाम से उठा लेकिन अभी उसकी उम्र मरने की नही थी ...बल्कि वो जीता तो मैं जीता ...उसके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देकर नंगे पैर नशे जैसी हालत में लौटते हुए मुझे गामा के वो शब्द और वो झलक याद आ रही थी जब उसने कहा था .....

" " साहब ...बाप ने बलवीर पैदा किया था ...और आप गामा पैदा करके जा रहे हो ....माँ भी नही रही अब तो ....दस्तखत दे दो मरूँ तो जलाने आ जाओगे "

नवाज़िश

By~✨✍️

Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत (उत्तराखण्ड )

( कथा प्रेरणा Abhishek Srivastava साहब )

( कथा चित्र " ओरिजनल गामा पहलवान )Google

Wednesday, 13 November 2019

याक़ूत

#स्याह !
                ______________

" काले हुए तो क्या हुआ साहब ..आपकी तरह हैं तो इंसान ही न ......!"

_________________________

" न भात न खायेंगे अम्मी ...पेले ये बताओ ...अल्लाह का लंग कैसा है ...?"

" तू...तू... तू ...पागल हो गया है क्या ..जुल्फि....अल्लाह तौबा ...चल चुप -चाप भात खा फिर हमें खेत भी जाना है ...अब्बू अकेले हैं वहाँ "

" हलामी हैं छब ...काला-कलूटा ..कोल भट्टाल ..कोलाखान बोलतें हैं ..."

" जुल्फि ...जुल्फि...कहाँ जा रहा है अरे रुक तो सही ...बेटा ...रुक ..."

जुल्फिकार अब बड़ा होने लगा था ..अब तक सब इसलिए सह लेता था क्यूँकि अक्ल नही थी ..और ये भी नही पता था कि लोग जब उसको काला-कलूटा बोलतें है तो असल में वो उसका मजाक बना रहे होते हैं ... लेकिन वो खिल -खिलाकर हँसता था ..उसके साथ के बच्चे उसके रंग से इतनी घिन करते थे कि जुल्फि के हाथ की कोई चीज खाते भी नही थे ....

बच्चों के अंदर ये एहसास कैसे पैदा हुए खुदा जाने लेकिन आज जुल्फि को पहली बार इस रोज की बेइज्जती की शिकायत करते हुए देखा . .आँखों में मन भर भारी आँसू लेकर....सुबह से निकला दिन का थका और भूखा मेरा बच्चा न जाने कहाँ दौड़ गया ....

मैं उसके आने की राह देखती रही कि भूख उसको वापस अपनी अम्मी के पास खींच लायेगी लेकिन मेरी और पेट दोनों की मजबूरी मुझे खेत में ले गई ....जहाँ मेरे मियाँ हल चला रहे थे ......

" सुनो जी ...."

मैंने तमाम बात जुल्फि के अब्बू को कह सुना दी ....

" तो क्या ऋषि कपूर कहें उसको ...साला मनहूस ...न शक्ल का भला न अक्ल का ...जानती हो अभी बताया उसके मास्टर ने कई दिनों से स्कूल नही जा रहा है ....देखो आज रात साले सूअर की खाल खींच लूँगा "

उस रात मैं हाथ जोड़ती रही अपने शौहर के कि मर जायेगा मेरा बच्चा ..लेकिन वो न माने दिन -भर का भूखा -प्यासा मेरा बच्चा इस बेइंतहा मार से बेहोश हो गया .....

रात को 1 बजे तलक उसका सर अपनी गोद मे लेकर दीवार के सहारे बैठी रही ....और तब उसे होश आया ....

" अ..अम.. अम्मी भूत लदी है ..."

मेरी आँखों से खिताब बेजार आँसू मेरे चाँद के चेहरे पर झरने लगे हैं... और उसका सर तकिए पर रखकर ..मैं सीधे बावरची खाने को भागी ....और फिर रोटी का पहला लुकमा जो ही उसके मुँह में डाला ...

" अब्बू ...अम्मी ..कल्लू को खाना खिला रही है ...."

मेरा  छोटा बेटा  जाग गया था  ..और अपने बड़े भाई को कल्लू बोल रहा था ....तभी मेरे शौहर खाट से उठकर आये ....और जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ से खाने की रकाबी फेंकने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ....मैंने आज शर्म का हर पर्दा जैसे एहतिराम के मिम्बर पर रख दिया ...उनकी आँखों में अपनी बेबाक आँखें पैवस्त कर दी ...वो खड़े-खड़े जम से गये ....और पीछे हट गए ....मैंने अपने लाल को अपने हाथों से खाना खिलाया ...और तब आँखें छल-छल करके बरस पड़ी जब मेरी मासूम बिटिया सबीना हाथों में पानी का कुल्हड़ लिए खड़ी थी ..डरी ..सहमी लेकिन अपने भाई की मुहब्बत से लबालब ...

वक्त कुछ आगे बढ़ा और जुल्फि 18 का हो गया ...इस 18 कि उम्र में वो मेट्रिक में तीन दफा फेल हुआ और पढ़ाई छोड़ दी ...बाप के साथ दिनभर खेत मे बैल की तरह जुता रहता ...

" सुनो आइशा कुछ कहना चाहते हैं तुम से ...."

" बोलो !"

" सनीमा देखने चलोगी हमारे साथ ...कल शहर जा रहें है ...दिन तलक लौटा लायेंगे "

" काहे ...काहे चलें ...पगला गए हो कल्लू ..कालीचरन ?"

" वो प्यार करते हैं तुमसे तबी न बोला "

" छी ..वैक ..अपनी शक्ल देखी है कभी मनहूस तूने ...उल्टा तवा ..कल्लूटा ..सोचा भी कैसे तूने ...अब बोला तो अब्बा से बोल दूँगी समझा ...चल हट रास्ता छोड़ "

आइशा ने फिर भी अपने  अब्बू से कह ही दिया..बड़ी माफी दरयाफ्त कर बात को अपने मियाँ तलक न पहुँचने दी ...फिर एक दिन जब मैं अपने बच्चे और मियाँ को खेत मे खाना खिला रही थी ...तभी मेरा छुटका बेटा दौड़ते हुए आया .....

" कल्ल.....जुल्फि भाईजान ..वो सबीना का दुपट्टा खींच लिया ..रियासत खान के लौंडे ने ...."

मैं आवाज लगाती रही ...लेकिन जुल्फि हाथ में फड़वा लिए दौड़ चुका था ...रियासत खान गांव का दबंग आदमी था ...उसके अब्बू उसके पीछे दौड़े ...लेकिन तब तलक देर हो चुकी थी ....जुल्फि ने वो फड़वा रियासत खान के बेटे के सर पर मार दिया था .....

अपने बच्चे की भागती पीठ ही नजर आती है आज भी सपने में ...जुल्फि ने सोचा उसके हाथों कत्ल हो गया है लेकिन वो लड़का बड़ी हुज्जत और इलाज से बच गया ....लेकिन जुल्फि फिर कभी वापस न लौटा .......

----/////---///-----

लौटता भी कैसे ... भला अम्मी और सबीना के सिवा मुझे चाहता ही कौन था वहाँ .... लेकिन आज इस शहर में ....परछाई भी अपनी नही .... 

" क्यों बे हरामी ...साले अंदर कर दूँगा ...अगर कल यहाँ सोते हुए दिखा तो समझा ...चल फूट यहां से "

पुलिस वाले कि बात में दम नही था ....लेकिन उसका जिस्म और डंडा उसकी बात में वजन पैदा कर रहा था .....

" साहब ...फिर इतना बता दो कि इस शहर में वो कौनसी जगह होगी जहाँ मैं सो सकूँ "

पुलिस वाले ने मुझे घूर कर देखा और बोला ...

" कहाँ अपने पूरब से हो का ...?"

मैंने एक साँस में सब न जाने क्यों उसे बताया दिया ....

" देखियो बे लौंडे ...ये फड़वे वाली बात किसी और से मत कहियो समझा ...अब चल मेरे घर में ...नही तो ठंड से मर जायेगा यहाँ "

राधेश्याम तिवारी नाम का वो पुलिस वाला मुझे अपने घर ले गया ....वहाँ मुझे उसकी बीवी मिली जो मेरे ही रंग की थी ...बड़ी इज्जत से उसने मुझे खाना खिलाया ...और मैं सो गया ...

अगले दिन जब तिवारी जी ड्यूटी पर चल दिये तब मैं सोकर उठा ...तो चाय भी मिली और नाश्ता भी ...और पता चला कि इनका मेरी ही उम्र का लड़का एक  मोटर साईकिल के एक्सीडेंट में मारा गया ...अब समझा तिवारी जी मुझे यहाँ क्यों लेकर आये ...तभी

" बहुत भुलक्कड़ हो गयें हैं ये ...अब बताओ अपना फोन और परस भी भूल गए ...चित्रलोक में आज ड्यूटी है उनकी ..सुना कोई फ़िल्म की शूटिंग चल रही है ...ये उनको दे आओगे वहां ....?"

मैंने पर्स और मोबाइल हाथ में लेने से पहले ...एक सवाल दागा 

" अगर इन्हें लेकर भाग गया तो ..?"

" पूरबिया मिट्टी  नमकहराम सपूत नही जनती  बेटे ...ये लो जल्दी दे आओ "

सिर्फ बेटा शब्द बार -बार दिमाग मे मृदंग बजा रहा था ...चित्रलोक पहुँया...

" कहाँ ..अबे कहाँ घुस रहा है बे कालिये ....?"

" वो हवलदार तिवारी जी से मिलना है ये सामान देना है उनको अंदर ...."

" अबे हरामी ....चला रिया है ...साले शूटिंग देखने घुसना चाहता है अंदर ....अरमान खान की फ़िल्म है साले और हम उनकी सिक्योरटी में है समझा "

मैं दूसरी तरफ से घुसने की कोशिश करने लगा वहाँ भी वही हाल था ...बड़ी अजीब बात थी जहाँ बाहर पुलिस को होना चाहिए था वो अंदर थी और ये सिक्योरिटी वाले बाहर ...मैं फिर गेट के पास पहुँचा....

" भैय्या सिर्फ एक बार ...अच्छा उन्हें ही बुलवा दो ..."

" तेरी माँ का कलूटे ...कहा न अरमान खान की फ़िल्म है "

 गुस्से की हद अब पार हो चुकी थी क्यूँकि उस झाड़ ने मेरी अम्मी की गाली दी थी ...मैं चीख कर बोला ~

" अबे तो क्या खुदा हो गया अरमान खान ...अबे है तो इंसान ही ।।अबे चाटने -चुटने न घुस रिया हूँ उसे अंदर ...समझा और घण्टा भी गाली न दियो हमारी अम्मी को वरना एक फड़वा तुम्हारे सर पर भी दे मारेंगे .."

जैसे ही सिक्योरटी वाले ने मेरे ऊपर हाथ उठाना चाहा 
..तभी

" ठहरो ..जॉइंट ...इस लौंडे को अंदर भेजो "

वो आदमी मुझे किनारे ले जाकर बोला ~

" क्यूँ बे चरबी चढ़ गई है साले 
..? डंडा घुसवा देंगे पिछवाड़े पर समझा ...काला कहीं का "

" काले हुए तो क्या हुआ साहब ..आपकी तरह हैं तो इंसान ही न ......!"

वो आदमी मुझे देखता ही रह गया ...और बोला ...

" यही डायलॉग कैमरे के सामने बोल सकता है फटेगी तो नही तेरी ?'

" सच बोलने में कच्चे दूध के जनों की फटती है साहब ..मेरी अम्मी ने बहुत गाढ़ा दूध पिलाया है मुझे "

तिवारी जी दौड़े चले आये ...लेकिन उनको पीछे किया गया .....और जिंदगी में पहली बार मेरी अम्मी के बाद किसी ने मुझे सजाया ..सँवारा ....कैमरा सामने था  और अल्फाज जुबान में ......

उसके बाद न जाने फिर क्या हुआ ...मैंने कभी पीछे मुड़कर ही नही देखा ....और आज जब...कामयाबी का पहला जाम मेरे हिस्से में आया तो मेरे पैर उखड़ने लगे .. साँसे फूलने लगी ....एक से बढ़कर एक हसीन तर हसीनाएं मुझे हवा में चुम्बन फेंक रही थी ... वो मुझे छूना चाहती थीं ....यहाँ तक उन्होंने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया ....लेकिन मैं बढ़ता ही जा रहा था .... 

मेरे कान में अब भी ये कामयाबी की आवाजें नही बल्कि वो लफ्ज अब भी धमाके कर रहे थे जो माँ के पेट से जमीन पर उतरने के बाद मुझे मिले...

" कालिया ..कलूटा ..कोलतार .....उल्टा तवा ...मनहूस..हरामी ....मैंने आँख मींच कर  कानों पर हाथ रख लिए ....तभी फिर एक आवाज मद्धम -मद्धम छनते हुए मेरे कानों में टकराई ....जो मेरी अम्मी अक्सर मुझसे कहा करती थी ...

" तू चाँद है बेटा ....उजला अल्लाह ने इसलिए नही बनाया तुझे क्यूँकि तू मैला हो जाता "

मैंने आँखें खोली और कानों से हाथ हटाया ...सामने मंच पर मेरी अम्मी माइक लिए खड़ी थी उसकी आंख में आँसू थे और उसी मंच पर एक किनारे खड़े हवलदार साहब ..उनकी बीवी और मेरी बहन सबीना भी थी ....लेकिन आँखे और सर झुकाकर मेरे अब्बू और भाई भी थे ....और दुनिया के किसी कोने से आइशा भी  जरूर ये मंजर देख रही होगी...मुझे हरगिज नही पता उसका क्या हाल होगा ..लेकिन मैं अब भी सुकून में नही हूँ .. अवार्ड लिया ...तालियां बजी ...नाम फिजा में हर सू फैला ...लेकिन एक सवाल अब भी बाकी रह गया .....

" कि हर काले स्याह रंग को अपनी चमक ,अपना हुनर मनवाकर ही इज्जत मिलेगी ..या फिर अभी हमें एक  और आजादी   मिलनी बाकि है ...वो आजादी जो हमें कुछ हद तो इंसान बना सकती है ......और हमारी इस बेहद स्याह सोच जो जानवरों में भी कहीं नही पलती उसे जमींदोज कर सकती है "

नवाज़िश

By ✍️
Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत (उत्तराखंड )

Friday, 1 November 2019

मेरी_जन्नत

★★★★★ #मेरी_जन्नत ★★★★★★
_____________________________________

" ये कौन है ....?"

" मेरे पिता .... ...मेरे सब कुछ "

" क्याया .....?"
-------------------------------------------------------------
तेजी से रिक्शे पर चढ़कर मैंने रिक्शे वाले से कहा~

" अंकल रिक्शा तेजी से निकालना यहाँ से ....?"

" क्यूँ बिटिया....?"

अंकल की उम्र रिक्शे के पैडिल से हारने लगी ...मेरा दिल जोर-जोर से धक-धक करने लगा ....तभी

" लो बे अपना माल आ गया बे ..."

" अबे देख तो सही ...चुन्नी कहाँ ढाँक रही है ...."

" बस एक बार ...सिर्फ एक बार ...उफ्फ्फ ."

" अबे रुक बुढ्ढे जवानी का पका संतरा लेकर कहाँ भागा जा रहा है"

रिक्शा जब उन कमीनों के जत्थे से बाहर निकला तो ऐसा लगा जैसे सूरज ग्रहण से उबर गया ... कोई मरता जैसे साँसे हासिल कर गया ...किसी भूखे पेट मे रोटी का टुकड़ा उतर गया .....

मेरी आँखें छनछना कर मेरी चुन्नी को नमकीन करती चली गई ...तभी रिक्शे वाले अंकल ने रिक्शा किनारा लगा कर नीचे उतर कर मेरे सामने हाथ जोड़ दिए .....

" बिटिया मुझे और मेरे पैरों की पिंडलियों दोनों को माफ़ कर देना ...बूढ़ा हो गया हूँ ....वरना वो जुबानें खींच लेता जो एक मासूम के लिए जलील फिकरे उछालती है "

मैंने उनके हाथों को थाम लिया और बोली ~

" कोई नही अंकल .... ये तो अक्सर ही सुनती हूँ मैं ..अगर मेरा भी कोई भाई  होता तो आज कम से कम यूँ डर कर नही सर उठा कर चलती मैं ...खैर आप रिक्शा चलाइये ....मुझे इंटरव्यू के लिए लेट हो रहा है "

अपनी मंजिल पर पहुँचकर... जब मैंने रिक्शे वाले अंकल को पैसे दिए तो वो बोले~

" रहने दे बिटिया... जब तुझे नौकरी लग जायेगी तो इन पैसों को किसी फकीर को दे देना ...क्या नाम है तुम्हारा बिटिया .....?"

" अंकल प्रियंका ...माँ प्यार से प्रिया बोलती है "

" अब मैं भी प्रिया ही बोलूँगा ...मेरा नाम कमरूद्दीन शेख है .... अच्छा तुम जल्दी से अंदर जाओ ....अल्लाह तुम्हे कामयाब करे "

बेशक अल्लाह या भगवान या वो कोई भी शक्ति जिसके आगे सर झुकता है वो मुझे जरूर मुझे कामयाब करती लेकिन जब मैं वक्त पर पहुँचती..... कुछ ही देर में मायूस होकर बाहर लौटी... तभी

" बेटा प्रिया... क्या हुआ ...इतना मायूस क्यूँ हो ...? सब ठीक तो रहा अंदर ....?"

मैंने दुपट्टे से आँसू पोंछकर कहा ..

" वो अंकल ...इंटरव्यू आज नही बाद में है ....आप अभी तक यहीं रुके हैं ...गये नही ...?"

" बिटिया बार -बार मन किया चले जाऊँ लेकिन बार -बार अपनी बेटी की मुहब्बत ने रोक लिया कि  मेरी बेटी मुस्कुराते हुए बाहर निकले और कहे कि मुझे कामयाबी मिल गई ....अच्छा बैठो ये कोई अकेली नौकरी थोड़ा ही है देखना मेरी बिटिया एक दिन जरूर बड़ी साहब बनेगी "

पापा बचपन में ही खो चुकी हूँ ...कमरुद्दीन अंकल के इस निश्छल प्रेम ने खरीद सा लिया.... अच्छा हुआ मैंने उनको सच नही बताया वरना वो कभी खुद को माफ़ नही कर पाते .... रास्ते मे उन्होंने मुझसे बहुत सारी बातें की ...

और मैंने उनको बताया कि लालपुर में रहती हूँ .. घर में सिर्फ माँ है... और एक छोटी बहन ...माँ ने जीतोड़ मेहनत करके हमको पढ़ाया -लिखाया ... छुटकी बहन नेहा अभी स्कूल पढ़ती है और मैं ट्यूशन पढ़ाती हूँ ....अंकल ने मुझे रास्ते मे पके अमरूद खरीद कर खिलाये और फिर वही गली से पहले उन्होंने खुद रिक्शा रोक लिया ....

" बिटिया कोई और रास्ता नही है घर का ....?"

मैं एकदम से ख्याली दुनिया से जमीन पर वापस लौटी ...

" हाँ है न ... ये दूसरा रास्ता पैदल का ...थोड़ा लम्बा है लेकिन मैं चले जाऊँगी .....आप भी चलिये न घर ... वो हनुमान मंदिर के सामने ही  तो है ..."

अंकल ने मेरे सर पर हाथ रखा ...और अपने गले मे पड़े अँगोछे से आँसू पोंछकर कुछ सख्त होकर कहा

" बिटिया पुलिस में रिपोर्ट क्यूँ नही करती इनकी ...?"

मैंने अपनी सैंडिल के फीते को टाइट कर कहा ...

" अंकल किस -किस की करवाऊँ ...उस गली में शराब का कारोबार होता है ....हर नशा वहाँ पहुँच चुका है ....पुलिस दो दिन बन्द करेगी और उसके बाद अगर इन्होंने मुझसे बदला लिया या कुछ ऐसी -वैसी हरकत की तो ...अभी मुझे बहुत कुछ करना है अंकल ...इस फचड़े मे नही पड़ना चाहती.....अच्छा चलती हूँ "

मुझे पता था वो अंकल तब तलक वहाँ से न जायेंगे जब तलक मैं उनकी आँखों से ओझल न हो जाऊँ....

लेकिन वो बेटी मेरी आँखों से ओझल ही नही होती थी ...बहुत प्यारी ..तहजीबो -इज्जत वाली वो मासूम ..वो बिना बाप की नेक नूर सितारा .....मेरी कोई औलाद नही ... बीवी को इन्तेकाल हुए चार साल हो गयें हैं .... रिक्शा अब सिर्फ अपनी रोटी बनाने के लिए चलाता हूँ... क्यूँकि बेहद अकेला हूँ... दौलत जोड़कर ..कोई मिल्कियत बनाकर करना ही क्या....45 साल से रिक्शा चला रहा हूँ उम्र 62 की हो गई है ..... लेकिन न जाने क्यूँ उस बेटी को देखकर कलेजे में एक ठंडक सी उतर गई ....

हफ्ते  बीत गए ...और सराय चौक के आम के पेड़ के  नीचे बैठा बीड़ी पी रहा था कि तभी ...मेरी धुँधली आँखों ने कुछ देखा..... और मैंने बीड़ी फेंककर बूढ़े ,मरियल, बीमार कदमों से  दौड़ लगा दी....सभी रिक्शे वाले मुझे देखने लगे ...

" हुफ ..हुफ... हुफ....बिटिया ओ बिटिया ......"

प्रिया एकदम से पलटी और मुझे देखकर चहक उठी .....उसने तेजी से मेरे पैर छुए ....और मैं अकड़ से अपने साथी रिक्शे वालों को देख रहा था जो हमेशा मुझे नीचा दिखाते हैं ...मुझे कटी पतंग... खण्डहर और न जाने क्या-क्या कहते हैं ... मेरा रसूख चढ़ने लगा था कि तभी ~

" माँ ये वही रिक्शे वाले अंकल हैं जिनके बारे में मैंने आपको बताया था ..."

बहुत सारी बातें की उन माँ -बेटी ने मेरे साथ और अपने घर आने की दावत भी दी ....लेकिन एक शर्मिंदगी एक हिचकिचाहट मेरे अंदर दौड़ती रही ...मेरे फटे गंदे कपड़े ...बे संवरी दाढ़ी ...गंदली धुँधली आँखे ...नंगे पैर ....लेकिन बड़े नाज वाली वो बिटिया मेरी मजबूरी समझ गई और उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर मुझे आँखों से इत्मिनान दिया कि पाक मुहब्बत में इन चीजों की कोई गुंजाईश नही .....

जब मेरी बच्ची आगे बढ़ने लगी तो मैंने कहा ~

" मेरी बच्ची बस दो पल रुक जा मैं आया ..."

मैं दौड़कर मुनीर की रेहड़ी पर गया ....और बोला~

" एक झांप जामुन तोल दे मुनीर "

मुनीर रपट कर रूखा होता हुआ बोला~

" पहले के पचहत्तर रुपये हैं पहले के अब और उधार न दूँगा ...."

" खुदा के लिए बेइज्जत न कर... चाहे तो मेरा रिक्शा गिरवी रख ले ...लेकिन इस वक्त बेटी के सामने शर्मिंदा हो जाऊँगा ..."

मुनीर पसीज गया और मैं जामुन लेकर दौड़ता हुआ प्रीति बिटिया के पास गया .....उसने लौटते वक्त भी मेरे पैर छुए और उसकी अँगुलियों का एहसास मुझे अब तलक हवा में उड़ा रहा है .....

बड़े तहजीब वाली मेरी बच्ची ....जब तलक नजरों में पूरी धुंधला न गई तब तलक वहीं मूरत बनकर खड़ा रहा ......

उसके जाते ही ...तन कर चलता हुआ जब अपनी रिक्शा जमात की ओर लौटा तो ....उनके मुँह उतरे हुए थे ....सब मुझसे नजरें चुरा रहे थे .......

10 दिन बाद रिक्शा वीर चौक पर लाल -बत्ती पर सवारी के साथ रुका था मेरा.. तभी ....पीछे से आवाज आई.....

" अंकल ....अंकल...."

प्रिया पीछे से दौड़कर आई ....और जल्दी में मेरे पैर छूकर बोली....

" कल मोशन टावर पर मेरा इंटरव्यू है मुझे दुआ दीजिये ....."

हरी बत्ती लग चुकी थी ....मैंने उसके सर पर हाथ फेरा ....और एक ही साँस में हजार दुवाएँ अपनी बच्ची के नाम कर दी और मजबूरन मुझे आगे बढ़ना पड़ा ...लेकिन अपनी बच्ची को बार-बार पलट कर देखता रहा ..

अगली सुबह तड़के उसके घर के बाहर रिक्शा लगा दिया ....और सामने के हनुमान मंदिर की बैठक ड्योढ़ी में जाकर बैठ गया .... बार- बार मन किया कि प्रिया को पुकारूँ ...उसके घर में जाऊँ ...लेकिन मेरे खाली हाथ और शर्मिंदगी ने मुझे तीन घण्टे रोके रखा ....

तभी उजले सूरज की किरन बनकर मेरी बच्ची अपने देहलीज से अपने मुबारक कदम लेकर बाहर निकली...और मैंने दूर से ही उसकी हजारो बलायें अपने नाम कर ली ...मैं तुरन्त उसके पास पहुँचा ....और बोला ~

" बैठो बेटी ...."

वो तीनों माँ-बेटी मुझे हैरत से घूरने लगे ....तभी प्रिया बोली -

"अंकल आप ...आप कब आये ...और अंदर क्यों नही आये ? "

मैंने इतराते हुए कहा~

" वो सामने जब पंडित जी आरती कर रहे थे तब आया ....लेकिन अब चलो तुम्हे देर हो जाएगी "

छलछला गई मेरी बेटी और बोली ~

" मतलब आप तीन घण्टे से बाहर ....अंकल आपने ये अच्छा नही किया ...मैं नाराज हूँ आपसे "

जैसे खुदाई का कोई फरिश्ता  रूठ गया हो मुझसे ...उसके नाराज कहते ही मेरी आँखें भी भर आईं ...

" बिटिया... मुझे माफ़ कर दो ...मेरी बच्ची आगे से ये गलती कभी न करूँगा"

प्रिया ने आगे बढ़कर मेरे मुँह पर हाथ रख दिया और बोली ~

" मैंने एसे ही कह दिया था आप तो मेरे पि......."

वो कहते -कहते रुक गई और मैं सुनते -सुनते महरूम रह गया ....लेकिन फिर वो रिक्शे में बैठ गई ....जैसे ही मैंने रिक्शे कर पैडिल पर पंजे रखे तभी एक आवाज ने मुझे अपने पन  का कड़ा चाबुक मारा ~

" भाईसाहब ....आज दिन का खाना आप यहीं खायेंगे... आपको प्रिया की कसम "

मस्त मलंग  कच्चा जहर नसों में दौड़ने लगा और मैंने ' इंशा अल्लाह ' कहकर रिक्शा आगे बढ़ाया....

कुछ देर बाद ....

" हाय ...हाय ...मस्त जवानी ..."

" कभी मेरे साथ कोई रात गुजार "

" क्या पहन रखा है अंदर ..."

सब्र का बाँध ढह गया ....सीधे रिक्शे से उतर कर ईंट का टुकड़ा उठाकर उन नीचों के गुच्छे में उछाल दिया ...वो ईंट का टुकड़ा सीधे एक मवाली के सर पर टकराया और उसके सर से खून बहने लगा ....ये देखकर बाकि मवाली मुझ पर टूट पड़े ....मुझे लात-घूँसों की न आवाजें सुनाई दे रही थी न किसी दर्द की ....मुझे बस अपनी बच्ची का चेहरा दिखाई दे रहा था जो उस जालिम भीड़ से मेरे लिए लड़ रही थी .....

मेरा आखरी वक्त आ चुका था ....लेकिन अल्लाह का शुक्रिया कि उसने मेरे लिए प्रिया
को भेजा... मेरे लिए अपने नूर को भेजा.... इतना प्यार मेरी वालिदा के बाद मुझे किसी ने नही किया जितना ये बच्ची करती है ...लेकिन उसके इंटरव्यू की फिक्र ने मुझे मरते-मरते फिर शर्मिंदा कर दिया ......

जब मेरी आँख ऑपरेशन के कमरे में खुली ....तो मैंने सुना ~

" ये कौन है ....?"

" मेरे पिता .......मेरे सब कुछ "

" क्याया .....?"

प्रिया ने " पिता " कहा था मुझसे यानि कमरुद्दीन से ...एक आलीशान बच्ची ने मुझे पिता कहा था ....या खुदा अब इससे बेहतर लफ्ज अपने लिए  पूरी जिंदगी जी लूँ तब भी नही सुन सकता ....या अल्लाह मौत से पहले मेरे दाँयें हाथ में इतनी जान दे दे कि मैं ये हाथ अपनी बच्ची के सर पर रख सकूँ .......

प्रिया को गले की गरारी से रिसती आवाज से अपने पास बुलाया और जब वो मेरे करीब आई तो मैंने लाख कोशिश की.. कि अपना हाथ उठा सकूँ...मेरी समझदार बच्ची मेरे जज्बात समझ गई ....और उसने खुद वो हाथ उठा कर अपने सर पर रख लिया ......

और इससे बेहतर नजारा ...इससे बेहतर छुअन ..इससे बेहतर एहसास भला और क्या होगा ....मैंने यकीनन जान दे दी लेकिन मैं अक्सर अब भी प्रिया के आस-पास ही बना रहता हूँ ....

पुलिस की एक  बहुत बड़ी अफसर बनकर उसने मेरे कातिलों को उनके अंजाम तक पहुँचाया लेकिन मैं अब भी जन्नत की ओर पीठ करके खड़ा हूँ ...अंदर नही जाना चाहता क्यूँकि मेरी बच्ची ..मेरी जन्नत मुझे अब भी खमोशी में अक्सर पुकारती है.....

नवाज़िश

By~✍️

Junaid Royal Pathan

🥀 रानीखेत ( उत्तराखंड )