★★★★★ #मेरी_जन्नत ★★★★★★
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" ये कौन है ....?"
" मेरे पिता .... ...मेरे सब कुछ "
" क्याया .....?"
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तेजी से रिक्शे पर चढ़कर मैंने रिक्शे वाले से कहा~
" अंकल रिक्शा तेजी से निकालना यहाँ से ....?"
" क्यूँ बिटिया....?"
अंकल की उम्र रिक्शे के पैडिल से हारने लगी ...मेरा दिल जोर-जोर से धक-धक करने लगा ....तभी
" लो बे अपना माल आ गया बे ..."
" अबे देख तो सही ...चुन्नी कहाँ ढाँक रही है ...."
" बस एक बार ...सिर्फ एक बार ...उफ्फ्फ ."
" अबे रुक बुढ्ढे जवानी का पका संतरा लेकर कहाँ भागा जा रहा है"
रिक्शा जब उन कमीनों के जत्थे से बाहर निकला तो ऐसा लगा जैसे सूरज ग्रहण से उबर गया ... कोई मरता जैसे साँसे हासिल कर गया ...किसी भूखे पेट मे रोटी का टुकड़ा उतर गया .....
मेरी आँखें छनछना कर मेरी चुन्नी को नमकीन करती चली गई ...तभी रिक्शे वाले अंकल ने रिक्शा किनारा लगा कर नीचे उतर कर मेरे सामने हाथ जोड़ दिए .....
" बिटिया मुझे और मेरे पैरों की पिंडलियों दोनों को माफ़ कर देना ...बूढ़ा हो गया हूँ ....वरना वो जुबानें खींच लेता जो एक मासूम के लिए जलील फिकरे उछालती है "
मैंने उनके हाथों को थाम लिया और बोली ~
" कोई नही अंकल .... ये तो अक्सर ही सुनती हूँ मैं ..अगर मेरा भी कोई भाई होता तो आज कम से कम यूँ डर कर नही सर उठा कर चलती मैं ...खैर आप रिक्शा चलाइये ....मुझे इंटरव्यू के लिए लेट हो रहा है "
अपनी मंजिल पर पहुँचकर... जब मैंने रिक्शे वाले अंकल को पैसे दिए तो वो बोले~
" रहने दे बिटिया... जब तुझे नौकरी लग जायेगी तो इन पैसों को किसी फकीर को दे देना ...क्या नाम है तुम्हारा बिटिया .....?"
" अंकल प्रियंका ...माँ प्यार से प्रिया बोलती है "
" अब मैं भी प्रिया ही बोलूँगा ...मेरा नाम कमरूद्दीन शेख है .... अच्छा तुम जल्दी से अंदर जाओ ....अल्लाह तुम्हे कामयाब करे "
बेशक अल्लाह या भगवान या वो कोई भी शक्ति जिसके आगे सर झुकता है वो मुझे जरूर मुझे कामयाब करती लेकिन जब मैं वक्त पर पहुँचती..... कुछ ही देर में मायूस होकर बाहर लौटी... तभी
" बेटा प्रिया... क्या हुआ ...इतना मायूस क्यूँ हो ...? सब ठीक तो रहा अंदर ....?"
मैंने दुपट्टे से आँसू पोंछकर कहा ..
" वो अंकल ...इंटरव्यू आज नही बाद में है ....आप अभी तक यहीं रुके हैं ...गये नही ...?"
" बिटिया बार -बार मन किया चले जाऊँ लेकिन बार -बार अपनी बेटी की मुहब्बत ने रोक लिया कि मेरी बेटी मुस्कुराते हुए बाहर निकले और कहे कि मुझे कामयाबी मिल गई ....अच्छा बैठो ये कोई अकेली नौकरी थोड़ा ही है देखना मेरी बिटिया एक दिन जरूर बड़ी साहब बनेगी "
पापा बचपन में ही खो चुकी हूँ ...कमरुद्दीन अंकल के इस निश्छल प्रेम ने खरीद सा लिया.... अच्छा हुआ मैंने उनको सच नही बताया वरना वो कभी खुद को माफ़ नही कर पाते .... रास्ते मे उन्होंने मुझसे बहुत सारी बातें की ...
और मैंने उनको बताया कि लालपुर में रहती हूँ .. घर में सिर्फ माँ है... और एक छोटी बहन ...माँ ने जीतोड़ मेहनत करके हमको पढ़ाया -लिखाया ... छुटकी बहन नेहा अभी स्कूल पढ़ती है और मैं ट्यूशन पढ़ाती हूँ ....अंकल ने मुझे रास्ते मे पके अमरूद खरीद कर खिलाये और फिर वही गली से पहले उन्होंने खुद रिक्शा रोक लिया ....
" बिटिया कोई और रास्ता नही है घर का ....?"
मैं एकदम से ख्याली दुनिया से जमीन पर वापस लौटी ...
" हाँ है न ... ये दूसरा रास्ता पैदल का ...थोड़ा लम्बा है लेकिन मैं चले जाऊँगी .....आप भी चलिये न घर ... वो हनुमान मंदिर के सामने ही तो है ..."
अंकल ने मेरे सर पर हाथ रखा ...और अपने गले मे पड़े अँगोछे से आँसू पोंछकर कुछ सख्त होकर कहा
" बिटिया पुलिस में रिपोर्ट क्यूँ नही करती इनकी ...?"
मैंने अपनी सैंडिल के फीते को टाइट कर कहा ...
" अंकल किस -किस की करवाऊँ ...उस गली में शराब का कारोबार होता है ....हर नशा वहाँ पहुँच चुका है ....पुलिस दो दिन बन्द करेगी और उसके बाद अगर इन्होंने मुझसे बदला लिया या कुछ ऐसी -वैसी हरकत की तो ...अभी मुझे बहुत कुछ करना है अंकल ...इस फचड़े मे नही पड़ना चाहती.....अच्छा चलती हूँ "
मुझे पता था वो अंकल तब तलक वहाँ से न जायेंगे जब तलक मैं उनकी आँखों से ओझल न हो जाऊँ....
लेकिन वो बेटी मेरी आँखों से ओझल ही नही होती थी ...बहुत प्यारी ..तहजीबो -इज्जत वाली वो मासूम ..वो बिना बाप की नेक नूर सितारा .....मेरी कोई औलाद नही ... बीवी को इन्तेकाल हुए चार साल हो गयें हैं .... रिक्शा अब सिर्फ अपनी रोटी बनाने के लिए चलाता हूँ... क्यूँकि बेहद अकेला हूँ... दौलत जोड़कर ..कोई मिल्कियत बनाकर करना ही क्या....45 साल से रिक्शा चला रहा हूँ उम्र 62 की हो गई है ..... लेकिन न जाने क्यूँ उस बेटी को देखकर कलेजे में एक ठंडक सी उतर गई ....
हफ्ते बीत गए ...और सराय चौक के आम के पेड़ के नीचे बैठा बीड़ी पी रहा था कि तभी ...मेरी धुँधली आँखों ने कुछ देखा..... और मैंने बीड़ी फेंककर बूढ़े ,मरियल, बीमार कदमों से दौड़ लगा दी....सभी रिक्शे वाले मुझे देखने लगे ...
" हुफ ..हुफ... हुफ....बिटिया ओ बिटिया ......"
प्रिया एकदम से पलटी और मुझे देखकर चहक उठी .....उसने तेजी से मेरे पैर छुए ....और मैं अकड़ से अपने साथी रिक्शे वालों को देख रहा था जो हमेशा मुझे नीचा दिखाते हैं ...मुझे कटी पतंग... खण्डहर और न जाने क्या-क्या कहते हैं ... मेरा रसूख चढ़ने लगा था कि तभी ~
" माँ ये वही रिक्शे वाले अंकल हैं जिनके बारे में मैंने आपको बताया था ..."
बहुत सारी बातें की उन माँ -बेटी ने मेरे साथ और अपने घर आने की दावत भी दी ....लेकिन एक शर्मिंदगी एक हिचकिचाहट मेरे अंदर दौड़ती रही ...मेरे फटे गंदे कपड़े ...बे संवरी दाढ़ी ...गंदली धुँधली आँखे ...नंगे पैर ....लेकिन बड़े नाज वाली वो बिटिया मेरी मजबूरी समझ गई और उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर मुझे आँखों से इत्मिनान दिया कि पाक मुहब्बत में इन चीजों की कोई गुंजाईश नही .....
जब मेरी बच्ची आगे बढ़ने लगी तो मैंने कहा ~
" मेरी बच्ची बस दो पल रुक जा मैं आया ..."
मैं दौड़कर मुनीर की रेहड़ी पर गया ....और बोला~
" एक झांप जामुन तोल दे मुनीर "
मुनीर रपट कर रूखा होता हुआ बोला~
" पहले के पचहत्तर रुपये हैं पहले के अब और उधार न दूँगा ...."
" खुदा के लिए बेइज्जत न कर... चाहे तो मेरा रिक्शा गिरवी रख ले ...लेकिन इस वक्त बेटी के सामने शर्मिंदा हो जाऊँगा ..."
मुनीर पसीज गया और मैं जामुन लेकर दौड़ता हुआ प्रीति बिटिया के पास गया .....उसने लौटते वक्त भी मेरे पैर छुए और उसकी अँगुलियों का एहसास मुझे अब तलक हवा में उड़ा रहा है .....
बड़े तहजीब वाली मेरी बच्ची ....जब तलक नजरों में पूरी धुंधला न गई तब तलक वहीं मूरत बनकर खड़ा रहा ......
उसके जाते ही ...तन कर चलता हुआ जब अपनी रिक्शा जमात की ओर लौटा तो ....उनके मुँह उतरे हुए थे ....सब मुझसे नजरें चुरा रहे थे .......
10 दिन बाद रिक्शा वीर चौक पर लाल -बत्ती पर सवारी के साथ रुका था मेरा.. तभी ....पीछे से आवाज आई.....
" अंकल ....अंकल...."
प्रिया पीछे से दौड़कर आई ....और जल्दी में मेरे पैर छूकर बोली....
" कल मोशन टावर पर मेरा इंटरव्यू है मुझे दुआ दीजिये ....."
हरी बत्ती लग चुकी थी ....मैंने उसके सर पर हाथ फेरा ....और एक ही साँस में हजार दुवाएँ अपनी बच्ची के नाम कर दी और मजबूरन मुझे आगे बढ़ना पड़ा ...लेकिन अपनी बच्ची को बार-बार पलट कर देखता रहा ..
अगली सुबह तड़के उसके घर के बाहर रिक्शा लगा दिया ....और सामने के हनुमान मंदिर की बैठक ड्योढ़ी में जाकर बैठ गया .... बार- बार मन किया कि प्रिया को पुकारूँ ...उसके घर में जाऊँ ...लेकिन मेरे खाली हाथ और शर्मिंदगी ने मुझे तीन घण्टे रोके रखा ....
तभी उजले सूरज की किरन बनकर मेरी बच्ची अपने देहलीज से अपने मुबारक कदम लेकर बाहर निकली...और मैंने दूर से ही उसकी हजारो बलायें अपने नाम कर ली ...मैं तुरन्त उसके पास पहुँचा ....और बोला ~
" बैठो बेटी ...."
वो तीनों माँ-बेटी मुझे हैरत से घूरने लगे ....तभी प्रिया बोली -
"अंकल आप ...आप कब आये ...और अंदर क्यों नही आये ? "
मैंने इतराते हुए कहा~
" वो सामने जब पंडित जी आरती कर रहे थे तब आया ....लेकिन अब चलो तुम्हे देर हो जाएगी "
छलछला गई मेरी बेटी और बोली ~
" मतलब आप तीन घण्टे से बाहर ....अंकल आपने ये अच्छा नही किया ...मैं नाराज हूँ आपसे "
जैसे खुदाई का कोई फरिश्ता रूठ गया हो मुझसे ...उसके नाराज कहते ही मेरी आँखें भी भर आईं ...
" बिटिया... मुझे माफ़ कर दो ...मेरी बच्ची आगे से ये गलती कभी न करूँगा"
प्रिया ने आगे बढ़कर मेरे मुँह पर हाथ रख दिया और बोली ~
" मैंने एसे ही कह दिया था आप तो मेरे पि......."
वो कहते -कहते रुक गई और मैं सुनते -सुनते महरूम रह गया ....लेकिन फिर वो रिक्शे में बैठ गई ....जैसे ही मैंने रिक्शे कर पैडिल पर पंजे रखे तभी एक आवाज ने मुझे अपने पन का कड़ा चाबुक मारा ~
" भाईसाहब ....आज दिन का खाना आप यहीं खायेंगे... आपको प्रिया की कसम "
मस्त मलंग कच्चा जहर नसों में दौड़ने लगा और मैंने ' इंशा अल्लाह ' कहकर रिक्शा आगे बढ़ाया....
कुछ देर बाद ....
" हाय ...हाय ...मस्त जवानी ..."
" कभी मेरे साथ कोई रात गुजार "
" क्या पहन रखा है अंदर ..."
सब्र का बाँध ढह गया ....सीधे रिक्शे से उतर कर ईंट का टुकड़ा उठाकर उन नीचों के गुच्छे में उछाल दिया ...वो ईंट का टुकड़ा सीधे एक मवाली के सर पर टकराया और उसके सर से खून बहने लगा ....ये देखकर बाकि मवाली मुझ पर टूट पड़े ....मुझे लात-घूँसों की न आवाजें सुनाई दे रही थी न किसी दर्द की ....मुझे बस अपनी बच्ची का चेहरा दिखाई दे रहा था जो उस जालिम भीड़ से मेरे लिए लड़ रही थी .....
मेरा आखरी वक्त आ चुका था ....लेकिन अल्लाह का शुक्रिया कि उसने मेरे लिए प्रिया
को भेजा... मेरे लिए अपने नूर को भेजा.... इतना प्यार मेरी वालिदा के बाद मुझे किसी ने नही किया जितना ये बच्ची करती है ...लेकिन उसके इंटरव्यू की फिक्र ने मुझे मरते-मरते फिर शर्मिंदा कर दिया ......
जब मेरी आँख ऑपरेशन के कमरे में खुली ....तो मैंने सुना ~
" ये कौन है ....?"
" मेरे पिता .......मेरे सब कुछ "
" क्याया .....?"
प्रिया ने " पिता " कहा था मुझसे यानि कमरुद्दीन से ...एक आलीशान बच्ची ने मुझे पिता कहा था ....या खुदा अब इससे बेहतर लफ्ज अपने लिए पूरी जिंदगी जी लूँ तब भी नही सुन सकता ....या अल्लाह मौत से पहले मेरे दाँयें हाथ में इतनी जान दे दे कि मैं ये हाथ अपनी बच्ची के सर पर रख सकूँ .......
प्रिया को गले की गरारी से रिसती आवाज से अपने पास बुलाया और जब वो मेरे करीब आई तो मैंने लाख कोशिश की.. कि अपना हाथ उठा सकूँ...मेरी समझदार बच्ची मेरे जज्बात समझ गई ....और उसने खुद वो हाथ उठा कर अपने सर पर रख लिया ......
और इससे बेहतर नजारा ...इससे बेहतर छुअन ..इससे बेहतर एहसास भला और क्या होगा ....मैंने यकीनन जान दे दी लेकिन मैं अक्सर अब भी प्रिया के आस-पास ही बना रहता हूँ ....
पुलिस की एक बहुत बड़ी अफसर बनकर उसने मेरे कातिलों को उनके अंजाम तक पहुँचाया लेकिन मैं अब भी जन्नत की ओर पीठ करके खड़ा हूँ ...अंदर नही जाना चाहता क्यूँकि मेरी बच्ची ..मेरी जन्नत मुझे अब भी खमोशी में अक्सर पुकारती है.....
नवाज़िश
By~✍️
Junaid Royal Pathan
🥀 रानीखेत ( उत्तराखंड )