#राखी
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नॉक....नॉक
" जी ! "
" मैम आई एम ए सेल्समैन ...मैम अंडर गारमेंट्स , टू पीस ,नाइटी एक्सेक्ट्रा का सैम्पल दिखा कर आर्डर बुक करतें हैं "
" सॉरी ...मुझे नही चाहिए "
" मैम एक बार देख तो लें ..मतलब इसकी कोई फीस नही है ...बिल्कुल फ्री ..."
" सॉरी नही चाहिए ..."
" मैम बॉय वन गेट वन आफर भी है टू पीस पर ....यही टू पीस आप मार्किट से परचेज करेंगी तो जी.एस. टी .."
" छी शर्म नही आती आपको ... कहा न नही चाहिए ....जाइये अब "
" ओके मैम जाता हूँ लेकिन शर्म की क्या बात ये मेरा धंधा है ....और कोई भी धंधा जिसमें धोखाधड़ी नही वो खराब या छी नही होता "
वो सेल्समैन जाने लगा और न जाने क्यूँ मुझे अपने व्यवहार पर शर्म आने लगी .... मैं उसको रोकना चाहती थी लेकिन न जाने क्यूँ मेरे गले से आवाज न निकल सकी ......
जब वो मुझे टू पीस दिखा रहा था तो उसका स्पर्श मेरी अँगुलियों को छू गया ....और अब तक मेरी अंगुलियाँ का मिजाज गर्म है ....
40 की हो गयीं हूँ लेकिन अब भी मेरी सारी उम्मीदें मरी नही बल्कि कुछ तो जिंदा हैं .....
रोहन की याद जैसे ताजा हो गई ...बिल्कुल रोहन की छप नजर आती थी उसके चेहरे में ...रोहन से मैं टूटकर प्यार करती थी ... मेरी ही कक्षा में पड़ता था ...पूरे लखनऊ में उससे खूबसूरत चेहरा और वुजूद मुझे कभी नजर नही आया ....
लेकिन मैं भी कम हसीन नही थी उस उम्र में जब चाकू -मक्खन में उतरता नही बल्कि फिसल जाता है ....तब मैं धँसना सीख रही थी ।
उम्र के जिस पड़ाव में ,, मैं फिसली वहाँ हर आम लड़की फिसल जाती है .... सिनेमा देखते हुए रोहन ने मेरा हाथ पकड़ लिया ... और अँधेरे में अपने होंठों से मेरे होंठों पर अधिकार प्राप्त कर लिया .....
उसके बाद हम रुके नही ...क्यूंकि जिस उम्र में रोहन ने मुझे असाधारण स्पर्श किया वो मेरे लिए बिल्कुल नया और रोमांच प्रदान करने वाला था ....
फिल्मों की अभिनेत्रियां भी तो यही करती थीं तो मैं क्या किसी से कम थी ....अपनी मर्यादाएँ लाँघकर मैं आखिर उस खुले बिस्तर पर पहुँच ही गई जिसके सपना हर युवती अपनी सुहागरात में मुकम्मल होते हुए देखना चाहती है .....कौमार्य तो खोया लेकिन सिर्फ कुछ आत्मग्लानि हुई ...क्यूँकि अब ये रोज की आदत सी बन गई हमारी .....
रोहन और मैं शादी करने वाले थे ...एक ही बिरादरी के थे ...और घरवालों को भी रोहन भला लगता था ...बस हम सब रुके थे तो रोहन के रोजगार में लगने तक......
एक शाम खबर लगी की रोहन का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ...मैंने ये खबर सुनते ही कोई सहारा नही बल्कि अपना पेट पकड़ा 3 माह की गर्भवती जो थी ....
सब बर्बाद हो चुका था ... रोहन की मृत्यु मात्र मृत्यु न होकर एक त्रासदी थी मेरे लिए .... हफ्ता भर कभी खामोश रही तो कभी सिसकती रही ..... और इरादा कर लिया कि अपने व्यक्तित्व को परिवार पर कलंक न बनने दूँगी ....
गोमती मुझे पुकार रही थी ...ये वो ही मेरी सहेली थी जो रोहन और मेरे हँसी-मजाक तो कभी भावुक पलों की साक्षी थी .... इसके ठंडे आँचल में पैर डुबोये हम सपने बुनते थे ...
जैसे ही मैंने गोमती में खोने के लिए अपने पैर आगे बढ़ाए ...तभी पीछे से किसी ने मुझे आवाज दी !
" यामिनी ! पागल हो कि अभी पैर फिसल जाता तो..? "
अविनाश मेरे पीछे खड़ा था .. रोहन का सबसे करीबी दोस्त ... न जाने उसे देखते ही मैं क्यूँ फूट-फूट कर रोने लगी .... उसने न सिर्फ मुझे चुप कराया बल्कि मुझे हिम्मत की चन्द बूँदें भी प्रदान की ....लेकिन न चाहते हुए भी मेरे मुँह से सच निकल पड़ा कि मैं रोहन के बच्चे की माँ बनने वाली हूँ .......
अविनाश ने एक गहरी खामोशी भरी और मुझे साथ लेकर चल पड़ा उसने मुझे मेरे घर छोड़ा और अगले दिन वो मेरे घर आया ....
उसने बड़ी बेबाकी से मेरा हाथ ..मेरे पिताजी से माँगा ... अविनाश की सादगी और मेरे हाल को देखकर पिताजी मना न कर पाये और हाँ बोल दी ...अविनाश एक नजर मुझपर डालकर लौटने लगा और गेट तक पहुंचा
परन्तु मैंने अविनाश को वहीं रोक लिया और कहा ....
" जबकि तुम सब जानते हो तब भी ....?'
" हाँ तब भी "
" लेकिन मैं ये बच्चा नही गिराऊंगी समझे तुम !"
" मैंने कहाँ कोई शर्त रखी यामिनी "
" क्यूँ कर रहे हो ये सब ...क्यूँ ..?
" क्यूँकि रोहन से पहले से मैं तुम्हे प्यार करता हूँ समझी तुम ...उससे ज्यादा ..उसने तो तुम्हारे शरीर को स्पर्श किया है ..मैंने स्वप्न में भी कभी तुम्हें आंख उठा कर न देखा...मैं तुम्हारी आत्मा से प्रेम करता हूँ यामिनी ..."
ये बोलते ही अविनाश न रुका और मैं वहीं उसको जाते हुए देखते रही ....जैसे उस सेल्समैन को .....
वो सेल्समैन जा चुका था ... और मेरी बेटी प्रिया कॉलेज से आ चुकी थी ...प्रिया मेरी और रोहन की बेटी है ...ये सिर्फ मैं जानती हूँ या फिर अविनाश .... अविनाश इतने महान हैं कि उन्होंने कभी मुझसे दूसरी सन्तान के लिए जिद न की ताकि मेरे हृदय में पल रहा प्रिया के भविष्य से संबंधित खतरा सदैव के लिये जाता रहे ....
प्रिया नहाने चली गई लेकिन वो सेल्समैन सीढ़िया उतरकर अब मेरी खिड़की के नीचे खड़ा था ...मैं एकटक उसे घूर रही थी ...
तभी उसकी नजर मेरी नजर से टकराई और मैं शर्म से पानी -पानी हो गई .... उसने मुझे स्माइल दी और मैं भी बिना मुस्कुराये न रह पाई ......
अब वो रोज किसी न किसी बहाने मेरे घर के आगे से गुजरने लगा .... और मैं अपनी आयु से आधी होती चली गई ....सच तो ये था कि रोहन कभी मेरी आँखों से नही धुँधलाया .... क्यूँकि वो मेरा पहला और शायद अंतिम प्रेम था ....
अविनाश की मैं बहुत इज्जत करती हूँ लेकिन हजार बार चाहने पर भी मैं उनसे प्रेम न कर पाई ....
लेकिन न जाने क्या हो रहा था मुझे कि मैं सारे बंधन तोड़ के उड़ना चाहती थी ...सब कुछ भूल के आजाद फलक पर आजाद पंख खोले ....
सेल्समैन का नाम अतुल था ... और अब वो मेरे लिए अतुल नही कुछ और बन गया था ....आज उसने हद कर दी और होंटों से एक फ्लाइंग किस फेंका ....मैं घबरा कर खिड़की से एकदम से हट गई मेरा सीना अब भी साँसों की उथल -पुथल से फूल रहा था ....बड़ी जोर का कहकर निकला कि कल 10 बजे घर में आऊँगा .....
मैं शर्म से पानी -पानी होती जा रही थी ...और वर्तमान भूल भविष्य के साहिल में खड़े होकर सोचने लगी कि कल अतुल क्या करेगा .....,?
मैंने तुरन्त दर्पण में स्वयं को चुपके से झांककर देखा और अपने बासीपन पर खीझ उठने लगी ....तुरन्त ब्यूटी पार्लर गई और 3 घण्टे वहाँ बिताये ...मन मे फुलझड़ियां जल -बुझ रही थी .... और मैं अतुल की हो चुकी थी ..
शाम को याद आया कि क्यूँ न एक हॉट नाइटी खरीद लूँ तो अविनाश से बोली कि जरा बाजार चलें ....
बहुत सीधे हैं अविनाश ... सीधे चल पड़े ..... मैं नाइटी देखने में व्यस्त थी कि तभी मेरी नजर अविनाश पर पड़ी ....वो एक बहुत ही सुंदर और मादक औरत के हाथ जोड़ रहे थे ....मैं नाइटी छोड़ चोरी -छिपे उन दोनों के करीब पहुँची और ...
" अवि मैं फिर कह रही हूँ छोड़ो इस झड़ी औरत को और देखो मुझे ... कम्पनी के आधे शेयर तुम्हारे होंगे ...तुम मालिक होगे उसी कम्पनी के जिसके तुम आज एक मामूली एम्प्लॉय हो ....देखो मुझे और देखो उस मोटी -भद्दी और जाहिल औरत को ..."
" मैम अब आप मर्यादाएँ पार कर रहीं हैं ...आप मेरी धर्म पत्नी जिसे मैं अपनी जान से ज्यादा प्यार करता हूँ उसकी बेइज्जती कर रहीं हैं ...मैं माना आपका एम्प्लॉय हूँ लेकिन आपने मुझे खरीदा नही है ...."
" ओक अवि ...अब मैं तुम्हारे हाथ नही जोड़ूँगी अब जब तुम्हे लगे मेरे पास आ जाना बॉय "
मैं वहीं गढ़ गई ...दुनिया का शायद ही कोई आदमी हो जो खुली औरत और खुले पैसे को लात मार दे और वो भी एक बहुत मामूली और बेगैरत औरत के लिए .....अविनाश के पहले ही क्या कम एहसान थे मुझपर कि आज जैसे उन्होंने मुझे खरीद ही लिया ..... तुरन्त दौड़ के अविनाश की बाहों में जा गिरी और फूट-फूट कर रोने लगी ....अविनाश कुछ समझ नही पाये और फिर हम घर लौट आये .....अब मुझे भगवान नही अविनाश की पूजा करनी थी उसकी दासी बनकर सारा जीवन बिताना था उनकी खुशी ही मेरा प्राश्चियत था ....लेकिन तभी अगले दिन का भय पुनः लौट आया ....सारी रात बिस्तर पर करवट बदलती रही ....और कल के बारे में सोचती रही ....
कल भी आया और दरवाजा भी खुला .....
" आओ अतुल अंदर आओ.....अविनाश ये अतुल हैं इनसे मिलवाने के लिये ही मैंने आज आपको ऑफिस से छुट्टी लेने को कहा था ...अतुल ये मेरे पति अविनाश और ये मेरी बेटी प्रिया .....प्रिया मामा जी के पैर छुओ बेटा!"
अतुल कुछ समझता इससे पहले ही राखी की थाली लेकर मैं उसके करीब पहुँची और हल्के से बोली -
" पहली नजर में ही मैंने आपको अपना भाई मान लिया था क्यूँकि मेर कोई भाई नही लेकिन कल जो तुमने हरकत कि मुझे शर्म आती है कि तुमको मैंने अपना भाई माना ...मैं इसलिए तुमको देखती -मुस्कुराहती थी कि मुझे लगा तुम्हारे रूप में मुझे मेरा भाई मिल गया ....लेकिन तुम्हारी आँखें खोलना जरूरी था ...अगर अब भी थोड़ी गैरत बची हो तो कल से मुझे अपना चेहरा मत दिखाना.....
अतुल चला गया जितनी आत्मग्लानि मुझे थी शायद उतनी ही अतुल को भी लेकिन आज जब अविनाश की जोगन बनकर उनके नाम की माला जपती हूँ तो बस एक ही बात सोचती हूँ कि यदि उस दिन राखी का त्योहार न होता तो मुझे फिर कौन उस जाल से बचाता जो मैंने जाने-अनजाने खुद अपने लिए बुन लिया था ....
दरवाजे की बेल बजी मैंने दरवाजा खोला और मैं डर के मारे सिहर गई ....
" अतुल तुम ...?"
" एक गलती तो भगवान भी माफ करता है दीदी ....आप तो मेरी बहन हैं ...आज राखी है तो चला आया क्यूँकि मेरी भी इस दुनिया में कोई बहन नही "
अतुल का हृदय शांत था मगर मेरी आत्मग्लानि अब भी मुझे कचोट रही थी लेकिन फिर सब शांत होने लगा जब मेरे भाई ने अपनी कलाई को आगे बढ़ाया .......और मैं राखी की थाली लेने दौड़ पड़ी
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
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