Monday, 19 August 2019

सांप

झूठ बोले कौवा काटे का ये जुमला बचपन से सुनता आया हूँ , हांलाकि ये जुमला अब तक सहिष्णु और बे विवादित संपत्ति है ...  मतलब सीधे शब्दों में किसी भी धर्म , पंथ अथवा समुदाय ने इसपर अपने धर्म का आधिकारिक और ठप्पे वाला दम नही भरा है ....

मेरा बड़ा कर्रा और साबुत यकीन ये भी है  कि जिस शब्द के पीछे फिर आलय लग जाये   वो शब्द एवं संज्ञा फिर ऑर्थोडॉक्स नही रहती .... मतलब शौचालय ,देवालय , मस्तालय, पुस्तकालय आदि ....

प्रथम बार  साँप को  मैंने देखा भी अपने शहर की पुस्तकालय की खिड़की में ...साँप का भला पुस्तकालय में क्या काम ...?

मैं यदि आयु से ठिगना न होता तो अवश्य नगर के चीफ एक्सक्यूटिव ऑफिसर से उस साँप को अवश्य कोई प्रशस्ति दिलवाने की अपील करता ... या फिर शहर के किसी सम्मानित सीनियर सिटीजन से उसको कोई कम्बल .. लिहाफ ..काजल ..कंघा आदि तो अवश्य दिलवाता ...लेकिन जब वो उस माननीय सर्प को कोई कलम .दवात ..स्लेट..खड़ी या फिर कोई पुस्तक देते तो मैं उनका हाथ पकड़ लेता ....

और कहता मान्यवर  ये सर्प है कोई इंसान नही है ... महोदय इसका निरादर तो न करें ... इसकी भारी भूल रही कि ये पुस्तकालय आया परन्तु मैं इस निमित्त इस सर्प हेतु सम्मान का आकांक्षी नही जबकि मैं तो इसलिए  लालायित होकर इससे प्रभावित हुआ क्यूँकि इसने अपनी गलती को त्वरित सुधारा और पुस्तकालय से विमुख होकर किसी झाड़ी या बिल की राह लेने हेतु निकल पड़ा .....

मैं लाफ़ करता हूँ अक्सर उन चिके चिल्लमों पर जो साँप को पृथ्वी का सबसे विषैला जीव घोषित करने हेतु जंगलों में उनके पीछे कैमरा लगाकर उसको डिस्टर्ब करते हैं ।।।

जबकि मैं उनसे कह सकता कि साँप का मतलब यदि विषैला या प्राण हड़पने वाला ही बताने पर तुले हो तो साँप से विषैले और फ़नफनाते जीव तो हम मनुष्य है ...

साँप को सुना कभी किसी नागिन का बलात्कार करते हुए ..? या फिर किसी प्रकार के साम्प्रदायिक दंगे करते हुए ?  कहीं नही सुना होगा साँप आपका वाला डेमोक्रेटिक है ...और इसकी आड़ में चुनाव लड़ता है ... साँप को आपने कभी विद्यार्थियों की रगों में जहर भरते भी नही देखा होगा ...अपनी जात हमारी औकात पर भेदभाव ये भी साँप को नही आता ... साँप स्वार्थपूरा होने पर बेवफाई भी नही करता ... आपके बीच रहके आपकी काट करने के प्रकरण में भी साँप पप्पू है ..  साँप सच्चा सहिष्णु है इसकी महानता इस बात से प्रचारित होती है कि ये अमर ..अकबर ..एंथोनी और अमरजीत को काटने में पहले उनका नाम या पहचान नही पूछता ...जैसे दंगे के दौरान हम ईश्वर की श्रेष्ठ व्रेस्ठ- कृति पूछती हैं....

साँप डंक चेपने से पहले न ही मॉब लिंचिंग करता है न ही राम के नारे लगवता है.... ये भला है अल्लाह हु अकबर कहकर निर्दोषों की जाने भी नही लेता ..

ये जोमैटो से न खाना आर्डर करता है न ... न मी टू टाइप की घटिया सिटियाबाजी करता है ...

ये तो उनको भी माफ कर चुका है जिसने इसके कैरेक्टर और प्रियम्बल कि धज्जियाँ उड़ाई हैं ...मतलब 100 साल का हुआ तो इच्छाधारी बनकर जंगलों में नागिन को तंग और छोटे कपड़े पहनवाकर उसके साथ पोल डाँस करे ....

आदरणीय साँप तो नागिन के उस अपमान पर भी विचलित नही होता कि जब नागिन को मादक .. क्रीम ..लिपिस्टिक ..पाऊडर से पोत कर पुरुषों  के गुप्तांगों की नशे झनझनाने हेतु 70 एम .एम.  के पर्दे पर छोड़ दिया जाता है ....

यकीन मानिए साँप बेहद भला ..शिष्ट और नैतिक होता है ... उसे हमारी मॉडर्न एजुकेशन की कोई जरूरत नही उसका अपना ज्ञान-विज्ञान बेहद परिपक्व और प्रगति के पथ पर है ...

क्या हुआ जो उसने आज तक कोई सेटेलाईट या स्पेस शिप स्पेस में नही भेजा ... जबकि वो जानता है इससे घण्टा भी एक पैसे का फायदा नही ... क्यूंकि वो जानता है कि फिजूल में एलियन्स को अर्थ हेतु ललचाने में अपना  ही नाड़ा ढीला होगा .... जबकि अभी नीचे रहकर ही बहुत बीमारियों और विकास कार्यों पर खर्च करना बाकि है .....

साँप पर अगर मेरा ज्ञान और तर्क चुतिपयापे के शिरोमौर्य लगते है तो मैं उनको भी नमन करता हूँ क्यूँकि साँप ने  अपने विष को मेरे रक्त में प्रवाहित कर मुझे यही समझाया है कि जो आपके बारे में अपशब्द कहें ..गॉशिप करें ... अपना वेरी इम्पोर्टेन्ट काम छोड़कर आप को अपनी वार्तालाप का केंद्र बना लें... अपनी शादीशुदा जिंदगी और जीवनसाथी से असंतुष्ट होकर आपकी गर्ल फ्रेंड ..लिव इन ..वाली पर विशेष फोकस करें ...या फिर सदा आपसे पूछते चलें कि शादी कब करोगे ...तो सर्प वचन ये कि इनपर विशेष ध्यान न दो अपितु इनपर दया करो क्यूँकि ये दया के पात्र हैं ...
वरना जीवन मे इतने ऊहापोह के मध्य इन्होंने आपको अपने मस्तिष्क ..फैमली ..बच्चों  किचन ..बाथरूम ...संडास और बेडरूम में कैसे घुसा लिया ....

सर्प अगर कोई नीच जेंडर होता तो क्या शिव उसे अपने गले मे धारण करते ...तो रहा सहा ये कि ~

इसी महान ..तेजस्वी ..अनुशासित ..विनयशील ...ओजस्वी ...आदि .आदि सर्प के मात्र किसी सरफिरे या बिरादरी से  तड़ीपार सर्प ने मात्र मेरे पैर में दाँत गड़ाये थे ..इसके लिए वो सदा अपनी जाति में अपमानित इसलिए होगा क्यूँकि उसने सर्प प्रजाति को बदनाम ही नही किया अपितु प्राण घटकम प्रोसेस में अनुतीर्ण रहने पर उसे इसलिए भी आई .सी . यू और वैक्यूम प्रोसेस में रखा गया होगा क्यूँकि  इंसान का गंदा ..घटिया और बेवफा रक्त उसके जबड़ों में लग चुका है और इससे अन्य सर्प जाति संक्रमित भी हो सकती है ....

परन्तु ये साँप जिसने मुझे डंक दिया अवश्य मन्द बुद्धि अथवा विक्षिप्त  रहा होगा अपितु स्वप्न में भी मानव को काटकर अपने जबड़े मैला करना साँप का स्वप्न नही होता ...विशेष परिस्थिति में प्रोटोकॉल वश इसे कुछ छूट अवश्य है ....

लेकिन ये मन्दबुद्धि सर्प मेरा तो जबर भला कर गया ...मतलब मेरी विचारधारा को और अधिक प्रगाढ़ और सुदृढ़ बना गया ....जनाब साँप को मेरा सत सत नमन कि इसने मुझे अपने शुभचिंतकों और शुभचिंतकों की खाल में छिपे नक्कालों से अवगत कराया ....वो नक्काल और नीच जिनकी आवश्यकता पर मैंने अपनी जान की बाजी लगाई ...इनका वजन एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोया ... इनकी पुस्तकों की फरमाइश पूरी की ... इनके भविष्य और रोजगार पर लटकते खतरों को मुझ महा चूतिया ने ढाल पकड़कर दूसरी तरफ धकेला .....

मुहब्बत भी लुटाई और वफ़ा भी ... लेकिन इन नमक हराम के जनों ने एक बार नही पूछा आर यू ऑल राइट जुनैद सर ...?

मोहतरम साँप न होते तो मुझे इश्क के टटोले कैसे पता चलते ...बड़े मजे कि रही कि इनमें वो भी रहीं जो मुझे इश्क करने की बात कहकर सर्प दंश से जूझते मेरे निश्चेत जिस्म को बाद में कॉल करूँगी कहकर टाल गयीं ...वो भी रहीं जो बोल गई

" घुत्ता साँप क्या ऐसे काटता है "

आगे वाली ये बोल के तर्क बाजारी करने लगी कि

" बोलो साँप काटा तो जिंदा कैसे हो मैन ...?"

और वो भी थी जिसने इस वजह से फोन ही न किया कि उनके हसबैंड घर पर थे ....

यहाँ लँगोट की गाँठ काम आई और अच्छा हुआ कि मैंने सब बोला पर कभी आई लव यू टू नही बोला ....वरना ये बाजारू घण्टियाँ वास्तव में गले पड़ जाती ....

मेरी अम्मी मुबारक  अक्सर कहती हैं कि क्या मिलता है तुझे हमेशा ये मोबाइल से चिपककर ये  फेसबुक -वेसबुक बन्द कर ..और मुँह धोकर बाहर निकलकर मेरे लिए कोई बहू देख ।....

लेकिन अब अम्मी से अक्सर कहता हूँ ....कि अम्मी मुझे जो मिला फेसबुक में आकर मिला ...जो मिलता है फेसबुक में आकर मिलता है ... मुझे यहाँ वो दोस्त मिले जो मुझे अपनी जिंदगी से भी अधिक प्रेम करतें हैं ...वो भाई मिले जो कभी बड़प्पन तो कभी छुटकपन का अहसास कराकर मुझे मुकम्मल होने का एहसास देते हैं ... दिल से बेटा बोलने और मानने वाली अजीम और बड़ी हस्तियाँ मिली ....एक सगी बहन का रुतबा रखता था फेसबुक ने मुझे जांनिसार बहनों की बौछारों से पाक करवाया ....

उपर्युक्त ये कुछ पंक्तियां लिखकर भावुक सा हो गया ...लेकिन भावुकता में ही सही परन्तु इतना तो अवश्य कहना चाहूँगा कि सर्प का दंश  इसलिए मेरी जान नही ले पाया क्यूँकि मेरे साथ आपकी यानि मेरे अपनों की दुवाएँ और प्रार्थनाओं की एक पूरी फ़ौज खड़ी थी ....

शुक्रिया अजीजों .... आपकी बैचैनी पोस्ट और मेसेंजर में देखकर मुझे लगता है कि अब उत्तर भारत के किसी भी शहर में चला जाऊँ न ही भूख से मरूँगा न ही मुहब्बत के बिना .......बाकि साँप का क्या है उसे तो पता तक नही कि उसने मुझे काट कर  अपनों से जोड़ा है ।।।

नवाज़िश

आपका~
Junaid Royal Pathan

Thursday, 15 August 2019

राखी

#राखी
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नॉक....नॉक

" जी ! "

" मैम आई एम ए सेल्समैन ...मैम अंडर गारमेंट्स , टू पीस ,नाइटी एक्सेक्ट्रा का सैम्पल दिखा कर आर्डर बुक करतें हैं "

" सॉरी ...मुझे नही चाहिए "

" मैम एक बार देख तो लें ..मतलब इसकी कोई फीस नही है ...बिल्कुल फ्री ..."

" सॉरी नही चाहिए ..."

" मैम  बॉय वन गेट वन आफर भी है टू पीस पर ....यही टू पीस आप मार्किट से परचेज करेंगी तो जी.एस. टी .."

" छी शर्म नही आती आपको ... कहा न नही चाहिए ....जाइये अब "

" ओके मैम जाता हूँ लेकिन शर्म की क्या बात ये मेरा धंधा है ....और कोई भी धंधा जिसमें धोखाधड़ी नही वो खराब या छी नही होता "

वो सेल्समैन जाने लगा और न जाने क्यूँ मुझे अपने व्यवहार पर शर्म आने लगी .... मैं उसको रोकना चाहती थी लेकिन न जाने क्यूँ मेरे गले से आवाज न निकल सकी ......

जब वो मुझे टू पीस दिखा रहा था तो उसका स्पर्श मेरी अँगुलियों को   छू गया ....और अब तक मेरी अंगुलियाँ का मिजाज गर्म है ....

40 की हो गयीं हूँ लेकिन अब भी मेरी सारी उम्मीदें मरी नही बल्कि कुछ तो जिंदा हैं .....

रोहन की याद जैसे ताजा हो गई ...बिल्कुल रोहन की छप नजर आती थी उसके चेहरे में ...रोहन से मैं टूटकर प्यार करती थी ... मेरी ही कक्षा में पड़ता था ...पूरे लखनऊ में उससे खूबसूरत चेहरा और वुजूद मुझे कभी नजर नही आया ....

लेकिन मैं भी कम हसीन नही थी उस उम्र में जब चाकू -मक्खन में उतरता नही बल्कि फिसल जाता है ....तब मैं धँसना सीख रही थी ।

उम्र के जिस पड़ाव में ,, मैं फिसली वहाँ हर आम लड़की फिसल जाती है .... सिनेमा देखते हुए रोहन ने मेरा हाथ पकड़ लिया ... और अँधेरे में  अपने होंठों से मेरे होंठों पर अधिकार प्राप्त कर लिया .....

उसके बाद हम रुके नही ...क्यूंकि जिस उम्र में रोहन ने मुझे असाधारण स्पर्श किया वो मेरे लिए बिल्कुल नया और रोमांच प्रदान करने वाला था ....

फिल्मों की अभिनेत्रियां भी तो यही करती थीं तो मैं क्या किसी से कम थी ....अपनी मर्यादाएँ लाँघकर मैं आखिर उस खुले बिस्तर पर पहुँच ही गई जिसके सपना हर युवती अपनी सुहागरात     में  मुकम्मल होते हुए देखना चाहती है .....कौमार्य तो खोया लेकिन सिर्फ कुछ आत्मग्लानि हुई ...क्यूँकि अब ये रोज की आदत सी बन गई हमारी .....

रोहन और मैं शादी करने वाले थे ...एक ही बिरादरी के थे ...और घरवालों को भी रोहन भला लगता था ...बस हम सब रुके थे तो रोहन के रोजगार में लगने तक......

एक शाम खबर लगी की रोहन का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ...मैंने ये खबर सुनते ही कोई सहारा नही बल्कि अपना पेट पकड़ा 3 माह की गर्भवती जो थी ....

सब बर्बाद हो चुका था ... रोहन की मृत्यु मात्र मृत्यु न होकर एक त्रासदी थी मेरे लिए .... हफ्ता भर कभी खामोश रही तो कभी सिसकती रही ..... और इरादा कर लिया कि अपने व्यक्तित्व को परिवार पर कलंक न बनने दूँगी ....

गोमती मुझे पुकार रही थी ...ये वो ही मेरी सहेली थी जो रोहन और मेरे हँसी-मजाक तो कभी भावुक पलों की साक्षी थी .... इसके ठंडे आँचल में पैर डुबोये हम सपने बुनते थे ...

जैसे ही मैंने गोमती में खोने के लिए अपने पैर आगे बढ़ाए ...तभी पीछे से किसी ने मुझे आवाज दी !

"  यामिनी ! पागल हो कि अभी पैर फिसल जाता तो..? "

अविनाश मेरे पीछे खड़ा था .. रोहन का सबसे करीबी दोस्त ... न जाने उसे देखते ही मैं क्यूँ फूट-फूट कर रोने लगी .... उसने न सिर्फ मुझे चुप कराया बल्कि मुझे हिम्मत की चन्द बूँदें भी प्रदान की ....लेकिन न चाहते हुए भी मेरे मुँह से सच निकल पड़ा  कि मैं रोहन के बच्चे की माँ बनने वाली हूँ .......

अविनाश ने एक गहरी खामोशी भरी और मुझे साथ लेकर चल पड़ा उसने मुझे मेरे घर छोड़ा और अगले दिन वो मेरे घर आया ....

उसने बड़ी बेबाकी से मेरा हाथ ..मेरे पिताजी से माँगा ... अविनाश की सादगी और मेरे हाल को देखकर पिताजी मना न कर पाये और हाँ बोल दी ...अविनाश एक नजर मुझपर डालकर लौटने लगा और गेट तक पहुंचा

परन्तु मैंने अविनाश को वहीं रोक लिया और कहा ....

" जबकि तुम सब जानते हो तब भी ....?'

" हाँ तब भी "

" लेकिन मैं ये बच्चा नही गिराऊंगी समझे तुम !"

" मैंने कहाँ कोई शर्त रखी यामिनी "

" क्यूँ कर रहे हो ये सब ...क्यूँ ..?

" क्यूँकि रोहन से पहले से मैं तुम्हे प्यार करता हूँ समझी तुम ...उससे ज्यादा ..उसने तो तुम्हारे शरीर को स्पर्श किया है ..मैंने स्वप्न में भी कभी तुम्हें आंख उठा कर न देखा...मैं तुम्हारी आत्मा से प्रेम करता हूँ यामिनी ..."

ये बोलते ही अविनाश न रुका और मैं वहीं उसको जाते हुए देखते रही ....जैसे उस सेल्समैन को .....

वो सेल्समैन जा चुका था ... और मेरी बेटी प्रिया कॉलेज से आ चुकी थी ...प्रिया मेरी और रोहन की बेटी है ...ये सिर्फ मैं जानती हूँ या फिर अविनाश .... अविनाश इतने महान हैं कि उन्होंने कभी मुझसे दूसरी सन्तान के लिए जिद न की ताकि मेरे हृदय में पल रहा प्रिया के भविष्य से संबंधित खतरा सदैव के लिये जाता रहे ....

प्रिया नहाने चली गई लेकिन वो सेल्समैन  सीढ़िया उतरकर अब मेरी खिड़की के नीचे खड़ा था ...मैं एकटक उसे घूर रही थी ...

तभी उसकी नजर मेरी नजर से टकराई और मैं शर्म से पानी -पानी हो गई .... उसने मुझे स्माइल दी और मैं भी बिना मुस्कुराये न रह पाई ......

अब वो रोज किसी न किसी बहाने मेरे घर के आगे से गुजरने लगा .... और मैं अपनी आयु से आधी होती चली गई ....सच तो ये था कि रोहन कभी मेरी आँखों से नही धुँधलाया .... क्यूँकि वो मेरा पहला और शायद अंतिम प्रेम था ....

अविनाश की मैं बहुत इज्जत करती हूँ लेकिन हजार बार चाहने पर भी मैं उनसे प्रेम न कर पाई ....

लेकिन न जाने क्या हो रहा था मुझे कि मैं सारे बंधन तोड़ के उड़ना चाहती थी ...सब कुछ भूल के आजाद फलक पर आजाद पंख खोले ....

सेल्समैन का नाम अतुल था ... और अब वो मेरे लिए अतुल नही कुछ और बन गया था ....आज उसने हद कर दी और होंटों से एक फ्लाइंग किस फेंका ....मैं घबरा कर खिड़की से एकदम से हट गई मेरा सीना अब भी साँसों की उथल -पुथल से फूल रहा था ....बड़ी जोर का कहकर निकला कि कल 10 बजे घर में आऊँगा .....

मैं शर्म से पानी -पानी होती जा रही थी ...और वर्तमान भूल भविष्य के साहिल में खड़े होकर सोचने लगी कि कल अतुल क्या करेगा .....,?

मैंने तुरन्त दर्पण में स्वयं को चुपके से झांककर देखा और अपने बासीपन पर खीझ उठने लगी ....तुरन्त ब्यूटी पार्लर गई और 3 घण्टे वहाँ बिताये ...मन मे फुलझड़ियां जल -बुझ रही थी .... और मैं अतुल की हो चुकी थी ..

शाम को याद आया कि क्यूँ न एक हॉट नाइटी खरीद लूँ तो अविनाश से बोली कि जरा बाजार चलें ....

बहुत सीधे हैं अविनाश ... सीधे  चल पड़े ..... मैं नाइटी देखने में व्यस्त थी कि तभी मेरी नजर अविनाश पर पड़ी ....वो एक बहुत ही सुंदर और मादक औरत के हाथ जोड़ रहे थे ....मैं नाइटी  छोड़ चोरी -छिपे उन दोनों के करीब पहुँची और ...

" अवि मैं फिर कह रही हूँ छोड़ो इस झड़ी औरत को और देखो मुझे ... कम्पनी के आधे शेयर तुम्हारे होंगे ...तुम मालिक होगे उसी कम्पनी के जिसके तुम आज एक मामूली एम्प्लॉय हो ....देखो मुझे और देखो उस मोटी -भद्दी और जाहिल औरत को ..."

" मैम अब आप मर्यादाएँ पार कर रहीं हैं ...आप मेरी धर्म पत्नी जिसे मैं अपनी जान से ज्यादा प्यार करता हूँ उसकी बेइज्जती कर रहीं हैं ...मैं माना आपका एम्प्लॉय हूँ लेकिन आपने मुझे खरीदा नही है ...."

" ओक अवि ...अब मैं तुम्हारे हाथ नही जोड़ूँगी अब जब तुम्हे लगे मेरे पास आ जाना बॉय "

मैं वहीं गढ़ गई ...दुनिया का शायद ही कोई आदमी हो जो खुली औरत और खुले पैसे को लात मार दे और वो भी एक बहुत मामूली और बेगैरत औरत के लिए .....अविनाश के पहले ही क्या कम एहसान थे मुझपर कि आज जैसे उन्होंने मुझे खरीद ही लिया ..... तुरन्त दौड़ के अविनाश की बाहों में जा गिरी और फूट-फूट कर रोने लगी ....अविनाश कुछ समझ नही पाये और फिर हम घर लौट आये .....अब मुझे भगवान नही अविनाश की पूजा करनी थी उसकी दासी बनकर सारा जीवन बिताना था उनकी खुशी ही मेरा प्राश्चियत था ....लेकिन तभी अगले दिन का भय पुनः लौट आया ....सारी रात बिस्तर पर करवट बदलती रही ....और कल के बारे में सोचती रही ....

कल भी आया और दरवाजा भी खुला .....

" आओ अतुल अंदर आओ.....अविनाश ये अतुल हैं इनसे मिलवाने के लिये ही मैंने आज आपको ऑफिस से छुट्टी लेने को कहा था ...अतुल ये मेरे पति अविनाश और ये मेरी बेटी प्रिया .....प्रिया मामा जी के पैर छुओ बेटा!"

अतुल कुछ समझता इससे पहले ही राखी की थाली लेकर मैं उसके करीब पहुँची और हल्के से बोली -

" पहली नजर में ही मैंने आपको  अपना भाई मान लिया था क्यूँकि मेर कोई भाई नही लेकिन कल जो तुमने हरकत कि मुझे शर्म आती है कि तुमको मैंने अपना भाई माना ...मैं इसलिए तुमको देखती -मुस्कुराहती थी कि मुझे लगा तुम्हारे रूप में मुझे मेरा भाई मिल गया ....लेकिन तुम्हारी आँखें खोलना जरूरी था ...अगर अब भी थोड़ी गैरत बची हो तो कल से मुझे अपना चेहरा मत दिखाना.....

अतुल चला गया जितनी आत्मग्लानि मुझे थी शायद उतनी ही अतुल को भी लेकिन आज जब अविनाश की जोगन बनकर उनके नाम की माला जपती हूँ तो बस एक ही बात सोचती हूँ कि यदि उस दिन राखी का त्योहार न होता तो मुझे फिर कौन उस जाल से बचाता जो मैंने जाने-अनजाने खुद अपने लिए बुन लिया था ....

दरवाजे की बेल बजी मैंने दरवाजा खोला और मैं डर के मारे सिहर गई ....

" अतुल तुम ...?"

" एक गलती तो भगवान भी माफ करता है दीदी ....आप तो मेरी बहन हैं ...आज राखी है तो चला आया क्यूँकि मेरी भी इस दुनिया में कोई बहन नही "

अतुल का हृदय शांत था मगर मेरी आत्मग्लानि अब भी मुझे कचोट रही थी लेकिन फिर सब शांत होने लगा जब मेरे भाई ने अपनी कलाई को आगे बढ़ाया .......और मैं राखी की थाली लेने दौड़ पड़ी

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan