#कलयुगी_शिक्षक
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अरे ...अरे ...सुनती हो इंदु ...अरे इंदु ! अरे कहाँ हो ...???"
" क्या हुआ जीइइइइई .... अभी आई ! "
" अरे अभी नही ..अभी ही आओ ...देखो ..देखो अरे देखो तो सही ..."
" क्या हुआ बोलो ...देखते नही मैं किचन में आटा सान रही हूँ ... "
" अरे देखो तो जितेंद्र अवस्थी की फोटो छपी है अखबार में ...."
" हूं ..हूं ..तो मैं क्या करूँ ...कमीना खड़ूस कहीं का मेरी बला से ..."
अरे नही मैडम इंदु देक्खो तो सही साथ में टाइटल क्या है ...."
" कहा न मुझे इस खड़ूस ..कमीने की न सूरत देखनी है न इसके बारे में कुछ सुनना है ...जाओ आप पराठे बनाओ मैं जरा नहा लूँ आज 15 अगस्त है वैसे भी मुझे जल्दी पहुंचना है विद्यालय.. नही तो ये कमीना आज फिर प्रिंसिपल के कान भर देगा ! "
" ...लेकिन सुनो तो सही ...."
तभी इंदु सारस्वत के फोन की रिंग बजती है
" हैलो मुनीर सर गुड मॉर्निंग ...हैप्पी इंडिपेंन्डेस डे ! "
" ओह्ह्ह ..थैंक्यू इंदु मेम ...आपको भी डबल आजादी मुबारक हो !"
" डबल मीन्स ? "
" अरे खड़ूस निपट गया ...अखबार नही पढ़ा आज का ...देखो कमीने की फोटो छपी है .."
" पता है तभी अपसेड हूँ सर ..इस जैसे कमीने को इतना फेम मिल रहा है और इसने हमारे फेम और लाइफ को डिप्रेस कर रखा है ...."
" अरे मेम जी टाइटल तो पढ़िए ..."
" नही पढ़ना ...मुझे इस कमीने में रत्ती भर भी इंट्रस्ट नही ! "
" कलयुगी मास्टर ने किया अपनी ही मासूम छात्रा का यौन शोषण ...मतलब फँ ..फँ ...फँसा खड़ूस हा हा हा ....."
" ओह्ह्ह माय गॉड ...व्हाट अ मूवमेन्ट ..व्हाट अ पैराडाइज न्यूज़ ...ओह्ह्ह सर आई एम् रियली वेरी हैप्पी ...कमीने के साथ यही होना था ...आज मैं बहुत खुश हूँ ...मिलते है सर स्कूल में ...आज कमीने के मुँह पर जुबान से कालिख पोतनी है .....मेरी तरफ से आपको, वर्मा सर , शालिनी मैडम , श्वेता मेडम , गीता मेडम ,, और राजेन्द्र सर को ट्रीट भी पक्की !
तभी मिस्टर सारस्वत अखबार टेबल पर पटक कर खड़े होकर बोलते है -
" ये क्या नीचता है इंदु .. तुम्हे शर्म आनी चाहिये ..एक शिक्षिका को क्या ये जुबान और ये आचरण शोभा देता है ...तुम्हे तो इस वक्त सच्चाई को समझना था ..और यदि मिस्टर अवस्थी वास्तव में गुनहगार हैं तो उसकी सजा उन्हें कानून देगा ...ये ट्रीट ..ये जुबानी फिकरे.. ये ख़ुशी ....बहुत दुःख हुआ तुम्हारा आचरण देख !"
" आप न जी चुप रहिये ...और ये अपना भाषण अपने ऑफिस में बजाइये तालियां मिलेंगी ...जीना हराम कर दिया था इस कमीने ने ....समझे आप ! "
" लेकिन गलती भी तो तुम्हारी है ...सरकार , समाज और सरोकार तुम्हे कक्षा -कक्ष छोड़कर गप्पे लड़ाने ..की अनुमति या वेतन नही देते "
" हुँह आपके मुँह लगकर में अपना मजा ख़राब नही कर सकती ओके ..मैं जा रही हूँ नहाने ! "
मिस्टर सारस्वत ने जितेंद्र अवस्थी को फोन किया लेकिन ...स्विच ऑफ़ !
मिस्टर सारस्वत ने जल्दी कपड़े बदले और बाइक लेकर मिस्टर अवस्थी के घर पहुँचे ...वहाँ ताला लगा था ....किसी ने कहा विद्यालय निकल पड़े हैं ....विद्यालय को बाइक घुमाई .... अभी झण्डारोहण में 2 घण्टे बाकि थे ...विद्यालय पहुँचकर देखा तो पूरा विद्यालय सुनसान आकाश बना था ...लेकिन तभी दो कदमों की चहलकदमी दिखी ...और साथ में सुनी झाड़ू लगने की आवाज ...कुछ पास से मगर छिपकर देखा तो पाया ये मिस्टर अवस्थी थे .... पूरे प्रांगण को झाड़ने के बाद उन्होंने उस स्थान को पानी से बुहारा और सुगन्धित किया वो स्थान जहाँ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्ज्वलित होगा ...फिर उन्होंने झंडे के डंडे की मजबूती और आदत को चेक किया ...फिर प्रांगण में एक -एक कुर्सी स्वयं उठा कर रखी ताकि दर्शकगणों को तकलीफ न हो ......मैंने चकित होकर चपरासी क्वार्टर की ओर झाँका तो वहाँ अभी भी खर्राटों की आवाजें मचल रही थी .....
समय 1 घण्टा शेष था और इस 1 घण्टे के बाद मिस्टर अवस्थी जो वास्तविक अर्थों में शिक्षक थे ...उनकी इस निष्ठा का बलात्कार होना तय था ...लेकिन सोच का विषय यह था कि मिस्टर अवस्थी के कान पर जूं तक क्यूँ नही रेंग रही थी ...? क्या उन्होंने अखबार नही पढ़ा क्या उन्हें नही पता ....?और यदि ये पाप उन्होंने किया है तो क्यूँ उनकी चित एकदम शांत है ...?क्यूँ उनमें कोई भय या बैचैनी नही ?।।। एक बार लगा कि उनके पास जाकर थोड़ा क्रोधी स्वर में बोलूँ कि -" क्या आपको शर्म नही ...क्यूँ ये ढोंग कर रहें है ...आपने ऐसा क्यूँ किया ..? क्या आपको लाज या मर्यादा नही आई ...? क्यूँ आपने शिक्षक से भक्षक बनकर अपने व्यक्तित्व और शिक्षक धर्म को तार-तार कर दिया ?"
श्री: हरि ! मेरे इष्ट है और उनकी कसम ,, मैं क्या साक्षात् श्री: हरि ! भी उनसे इन प्रश्नों को पूछकर स्वयं को लज्जित एवं ग्लानिबोध महसूस नही कर सकते लेकिन आखिर सत्य क्या है ...?पुलिस पहुँचने और मेरी भार्या के मय सहकार्मिकों के पहुँचने में मात्र 50 मिनट शेष थे ....
तभी मैंने उस बालिका के घर की राह ली जिसनें ये आरोप अपने शिक्षक पर लगाया था ....उसका घर करीब ही था ....मैंने उसके घर का दरवाजा खटखटाया ....उसके पिता ने दरवाजा खोला और आश्चर्य से मुझे देखा ...वो मुझे नही पहचाने ... और मुझे कुछ सूझा जिससे सच बेनकाब हो जाये....!
" जी ! आप कौन ..?"
" मैं कोतवाल हूँ ...आपकी बेटी को गिरफ्तार करने आया हूँ "
" क्याय्याआ ..? साहब मेरी बेटी ने क्या किया जबकि उसके साथ....."
" जिसपर आपकी बेटी ने आरोप मढ़ा है उस मास्टर ने आत्महत्या कर ली है ...और उसने अपनी आत्महत्या से पूर्व एक पत्र लिखा है जिसपर लिखा है कि आपकी बेटी ने उनपर झूठे आरोप लगाये हैं ... और वो कुछ सबूत छोड़कर भी मरे हैं जिससे ये स्पष्ट हो गया है कि आपकी पुत्री ने उनपर झूठा आरोप मढ़ा है ....."
इतना कहते ही उस व्यक्ति और उसके परिवार में हलचल मच गई ...उस संयुक्त परिवार में उसकी पत्नी ..उसका भाई ..भाई की बीवी ...और कुल मिलाकर साथ बच्चे थे जिनमें तीन कन्याएं थी ,, ...लेकिन मैं पहचान नही पाया कि आखिर वो कौनसी बालिका है जिसने मिस्टर अवस्थी पर आरोप लगाया है .....
" ये झूठ है साहब ...ये झूठ है साहब ....मेरी बेटी श्रद्धा ने कुछ नही किया ....
तभी एक लड़की अचानक से चीख पड़ी ...और दहाड़े दे देकर रोने लगी ...और फिर सम्हली और बोली -
" सर मेरे मास्टरजी ने मेरे साथ कुछ नही किया है ...वो तो देवता थे ....
" तो तुमने उनपर आरोप क्यूँ लगाया..? ( ऊँचे क्रोधी स्वर में ) "
" सर मैंने कोई आरोप नही लगाया ...सब कुछ मेरे चाचा ने किया है ....ये पिछले 3 महीनों से मेरे साथ गलत कर रहें है ....बात उस दिन की है .....
तभी उसका चाचा भाग गया , मैंने उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन वो हाथ न आया .....
मैंने लड़की के सर पर हाथ फेरा और उसे विश्वास में लिया ....वो बोली -
" सर मेरे अवस्थी सर जैसा तो पूरे स्कूल में कोई टीचर ही नही ...हमेशा हमारे हित हमारे भले को सोचते हैं .... उस दिन जब मैं तीन दिन से स्कूल न आई ....तब वो मेरे घर आये थे ....और उन्होंने इस जानवर चाचा के साथ मुझे .......सर मैं डर गई और चाचा ने मुझे धमकाया कि इससे पहले अवस्थी सर किसी से कुछ कहें तू उनपर ही आरोप लगा दे ....नही तो पूरा स्कूल तुझपर थूकेगा और तू स्कूल से बाहर निकाल दी जायेगी ....और तेरा पढ़ने और कुछ करने का सपना भी मिट्टी में मिल जायेगा ..... मैं डर गई सर ...और ....लेकिन मेरे सर निर्दोष हैं सर ...वो देवता हैं ...उनकी जगह तो मुझे मरना चाहिये था सर ....और वो रोने लगी ....मैंने आगे बढ़कर उसको सम्हाला और गले से लगाया और मिस्टर अवस्थी के लिए मेरे मन में श्रद्धा और बढ़ गई ....
मैंने उस बालिका से स्कूल ड्रेस पहनने का अनुरोध किया ...वो झिझकी और संकोच करने लगी ...लेकिन फिर अवस्थी सर को बेकसूर साबित करने की बात पर राजी हो गई ....उसके घर के हर कतरे की आँख में आँसू थे ....उसका बाप असहाय था ...उसके मन में एक रोष एक गुस्सा था लेकिन उससे लगती एक गंभीर याचना भी थी कि ....कहीं उसकी बेटी का मजाक और उसकी इज्जत की धज्जियां न उड़ जाए ....???
मैं उसे लेकर सीधे विद्यालय की ओर रवाना हुआ ...मैं पीछे था और पुलिस की गाड़ी आगे...लेकिन मेरे पीछे मेरी भार्या इंदु और उसका स्टाफ भी कार में था ...
सबने विद्यालय में एक साथ पैर धरा... सबकी नजर मिस्टर अवस्थी पर जाकर रुक गई जो तिरंगे को सजा और फूलों से भरकर , उसे बाँधकर.. ऊँचा और ऊँचा उठा रहे थे ......
जैसे ही पुलिस इंस्पेक्टर ने मिस्टर अवस्थी की जानिब कदम बढ़ाया ...वो कन्या दौड़कर मिस्टर अवस्थी के कदमों में गिर पड़ी -
" सर ..सर ..आप जीवित हैं सर ...सर मुझे क्षमा कर दीजिये ...सर मुझे दण्ड दीजिये मैंने आप जैसे देवता और सच्चे शिक्षक पर आरोप लगाया ...सर ...सर ...."
मिस्टर अवस्थी ने उसे अपने कदमों से उठाया और बोले -
" श्रद्धा तुमनें मुझपर नही अपितु समाज पर आरोप लगाया ...तुम्हारा दोष कुछ भी नही बेटी !... दोष तो उस समाज का है जिसने तुम जैसी मेधावी छात्रा को ये करने में विवश किया ...बेटी ! मैंने तुम्हे क्षमा किया लेकिन उस समाज को क्षमा नही किया जिसने अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं से मुँह मोड़ रखा है ...."
मेरी बीवी और उसके साथियों को ये बात अंदर तक भेद गई लेकिन मुझे ख़ुशी हुई ......झण्डारोहण हुआ और पुलिस लाव -लश्कर के असली आरोपी और दोषी की गिरफ्तारी को निकल पड़ी .....
जब सांस्कृतिक कार्यक्रम समाप्त हुआ तो मैंने मिस्टर अवस्थी से जोर देकर ये ये पूछा -
" आपको डर नही लगा साहब ...?"
" कैसा डर मिस्टर सारस्वत ! डर उसे लगेगा जिसकी निष्ठा और कर्म , कर्तव्य के अतिरिक्त कुछ और सोचे ....मेरा कर्म शिक्षण हैं और मेरा धर्म भी यही है ..... और जिसका धर्म और कर्म शिक्षा बन जाता है परमेश्वर उसकी ढ़ाल और उसका संरक्षण बन जाता है "
मैंने इंदु की ओर डरते -डरते देखा ...लेकिन उसकी आँखों में पश्चाताप था ...और कुछ नमी भी ...मैंने उसके काँधे पर हाथ धरा और बोला -
" उदास न हो , प्रफुल्लित हो उठो ...और धन्यवाद दो श्री: हरि ! को ,कि उन्होंने तुम्हें उस रथ का यात्री बनाया जिसकी लगाम मिस्टर अवस्थी जैसे सच्चे और आदर्श शिक्षक के हाथ में हैं...इनसे यदि तुम भी एक छात्रा की भाँति शिक्षा लोगी तो विश्वास करो इंदु ...मुझे और प्रत्येक सच्चे शिक्षक को तुमपर गर्व होगा ........और हाँ याद रखना हमेशा पुरुष गलत हो ये बात यदि सत्य होती तो अवश्य इसे गीता , रामायण , कुरआन या बाइबिल में उकेरा जाता !"
खैर अगले दिन मैं सुबह ही ...अखबार के प्रत्येक स्टॉल पर पहुँचा हर पन्ना पलटा लेकिन कहीं भी यथार्थ कलयुगी शिक्षक हेतु एक भी पंक्ति नही मिली .....माफ़ीनामा तो दूर की कौड़ी थी ......लेकिन कहीं किसी कोने में ये छपा जुरूर दिखा कि
" सत्यमेव जयते !"
..........नवाज़िश
#जुनैद..........