Tuesday, 16 July 2019

प्रेम_बनाम_प्रेम

#प्रेम_बनाम_प्रेम
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" उनकी आँखे ..जैसे हमें आज भी घूरती है ...उनका स्पर्श हमें आज भी मदहोश करता है विनय बाबू .....हम नही रह सकते उनके बिना ...नही रह सकते ....."

पिछले पैंतीस सालों से रह रहें हैं सनमपुर में .. पैंतीस में पाँच जोड़ हमारी उम्र हाथ लगती है ..... कोई कहता है मेले में अम्मा का हाथ छोड़ दिए थे बचपने में इसलिए लावारिस हो गए ...लेकिन मुंशी बनारसी दास जो रंडवे थे और हमारे दत्तक टाइप बाप भी..वो बोलते थे कि हमारी अम्मा करमजली थी ... मेले में हमारा हाथ भी छोड़ गई और हमारे ओरिजनल बाप का साथ भी ....

लेकिन फिर ओरिजिनल बाप का पता नही देते हमारे मुँह बोले बाप ...कहकर टाल देते हैं कि उसने दूसरी वाली घेर ली और उससे चार हमारी शक्ल के और बना लिए हैं ,,

बड़ी उलझी है कहानी हमारी ...पाँच के थे जब मुंशी मेले से हाँक लाये और अब चालीस के हो चुके हैं ...लेकिन अब झुण्ड में चला नही जाता ...

मुंशी की बहन ने कसरत से पाला और जब लौंडे बने तो वो ऑफ़ हो गयीं ...और हमने हमेशा ऑन रहकर मुंशी की घरवाली की भूमिका निभाई और बहन की भी ...और अब मुंशी के ऑफ़ होने पर उनकी परचून की दुकान चलाते हैं ...

मुंशी ने कभी शादी के लिए पूछा नही और हमनें कभी मन नही बनाया ....लेकिन अब लगता है कि ब्याह कर लें ...

लेकिन करें किससे ...और चुने किसे ....?

लेकिन अब औरत की कमी जीवन का आधार बन चुकी है ...इतना कि अब पूजा-पाठ में भी मन नही लगता ...खाली हो चुकी ये लकड़ी की इमारत कभी कई सारे सवाल करती है तो कभी कई सारे जवाब भी माँगती है ।।।

सच कहें तो अब संयम टूट चुका है ...इन्द्रियों का भी और मन का भी ...अब आँख सेंक लेते है औरत के बदन पर ..कभी आटा तोलते वक्त.. कभी चीनी चखते वक्त ....लेकिन ये बदलाव आकस्मिक नही था इसके पीछे थे ' देवी लाल ' ....

हमारे हमउम्र मित्र देवीलाल ..जो दिनभर हमारी ही दुकान पर पलते थे अब ... तीन चाय ..एक बण्डल बीड़ी और तम्बाकू हमपर उनका रोज का कर्ज था ...

मानते है कि हरामखोर और चरित्रहीन हैं वो लेकिन उनकी स्त्री सम्बन्धी बातें ...उनका स्त्री शरीर और अंगों पर व्याख्यान और विश्लेषण हमें मदान्त बना देता है ...

वो स्त्री की प्रत्येक आयु का विहंगम वर्णन ही नही करते अपितु उनको वशीकरण में करने का मन्त्र भी बताते ....

एक दिन सुबह जब हम दुकान का ताला खोल रहे थे तभी ~

" विनय बाबू ..फूलो ..कुप्पा हो जाओ ...मित्र औरत नही लौंडिया का रिश्ता लायें है आपके वास्ते ...बड़ी दुर्बल कच्ची उम्र और सुंदरता तो बस पूछो मत ...बोलो हाँ की न "

न कैसे कर सकते थे ..माना भोले और अत्यंत सहज है लेकिन मूर्ख नही ...उनका लौंडिया कहना अभी भी कर्ण के पटल पर नमी उत्सर्जित कर रहा था ...फौरन हाँ ही नही की अपितु देवी लाल को उपहार -चढ़ावों से भर दिया ....

मन उछल रहा था कुलेल कर रहा था ...न सिर्फ अपना रूप बदला अपितु जीवन की धूप भी बदल ली ... हज्जाम के हवाले होकर काया का रूपांतरण हुआ और उस देवी उस सुकुमारी के स्वप्न निद्रा को बाधित कर हमें निचोड़ने लगे ....

वो दिन भी आया जब वो सुहाग के जोड़े में सिमट कर हमारी प्रतीक्षा में लीन थी और हम पिस्ते- मावे वाला  दूध गटक कर उनकी ओर बढ़े ~

" सुनिए जी हमें स्पर्श करने से पूर्व हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं.."

" हूं..हूं..हाँ बोलिये न !"

" वो जी आप उम्र में हमारी पिता की उम्र के आस-पास लगते हैं ...लेकिन इस पर हमें कोई आपत्ति नही अपितु आपत्ति ये है कि हम प्रेम किसी और से करते हैं ....दीपक नाम है उनका ...और हम उन्हें नही भूल सकते "

कभी कोई हिंदी फ़िल्म देखी थी ऐसी कि सुहागरात में पत्नी , पति को अपने प्रेम की कथा सुनाती है ...आज सम्भवतः वो हमपर गुजरने वाली थी ....

जीवन की समस्त खुशियाँ जो हमारे आज पर टिकी थी हमसे धीरे-धीरे पृथक होकर खोने  लगी ....

" अब भी आप उससे प्रेम करती है अर्थात विवाह के उपरांत भी ? "

" जी ...उनकी आँखे ..जैसे हमें आज भी घूरती है ...उनका स्पर्श हमें आज भी मदहोश करता है विनय बाबू .....हम नही रह सकते उनके बिना ...नही रह सकते ....."

और अब हम उनके साथ कैसे रहें जो हमसे प्रेम क्या सहानुभूति का भी कोई रिश्ता नही रखना चाहती ...

" ठीक है ! आप उनसे सम्पर्क बनाये ...और हमसे बात करायें ...!"

हमने सोचा ऐसा करने में सम्भवतः कुछ दिवस अवश्य लगेंगे ...और हम क्या पता उनका मन जीत लें ...लेकिन तभी दामिनी की भाँति वो चटकी और तकिये के नीचे से फोन निकाल कर उन्होंने एक नम्बर डॉयल करके फोन हमें पकड़ा दिया ...

" हैलो  ! दीपक जी ! हम विनय बोल रहें हैं ...सुमन के पति ...क्या आप सुमन को अभी भी अपना सकते हैं ..?.मतलब उनसे विवाह कर सकते हैं ? "

मात्र जवाव हाँ में ही नही मिला अपितु उन्होंने कल सुबह ही आने की बात बोली ~

समय शेष ही कहाँ था ...जो रात्रि हम दोनों के मध्य प्रेम की सरिता में बहनी थी वो अब एक सूनी लकड़ी की कुर्सी में बैठ कर पौ फटने की प्रतीक्षा में जा लगी ......

इस बीच हम उनको देखते  अवश्य ...लेकिन फिर न जाने कब आँख लग गई ...

" सुनिये जी ! उजाला लगने लगा है ..."

" हाँ .हाँ ...वो... आप तैयार हो जाओ हम जरा स्नान कर लें ....."

स्नान करने गए तो वो सुहागन थी और स्नान करके लौटे तो वो पुनः कुँवारी लगने लगी ...मंगलसूत्र और सिंदूर का भी कोई सुराग न लगता था अब ....

स्टेशन की राह ली ...मेरे और उनके कदम साथ गिरने लगे ...वो कदम जिन्हें एक दूसरे के साथ जीवन भर  चलना था ..वो अब जीवन की विविध राहों को पकड़ चुके थे ...

स्टेशन पहुँचे तो देखा पीली चेक की शर्ट पहने एक युवा हमारी प्रतीक्षा में खड़ा था ...उसने आगे बढ़कर हमारी जिंदगी को अपनी बाँहों में ले लिया ...दोनों ने उसके बाद फिर पीछे पलट कर नही देखा ...हमने सोचा हमारी महानता को कुछ तो अश्रु वो दोनों उपहार में देते ....परन्तु उन्हें जल्दी थी और हमें तो अब विराम ही लगने वाला था ...

देर रात नजरें चुरा कर कुछ झुका कर घर लौटे तो पाया .... घर का दरवाजा खुला था ...सोचा जल्दी में भूल गए कड़ी और ताला लगाना ....

लकड़ी की सीढ़ी चढे तो पाया ...अपने ही घर में अजनबी बन गए ...घर पूरा साफ़-सुथरा था ...और मसालों की तीखी गन्ध नाक से टकराई ....आश्चर्यचकित होने ही वाले थे कि तभी

" आइये ! सुनिए आप हाथ- पैर धो लें ...हम भोजन परोसते हैं ..."

" ये क्या नाटक है सुमन ...क्या है ये सब ...?"

" कुछ नही ...क्षमा नही माँगेंगे आप से ...क्यूँकि इस लायक नही हम... आप की सेवा करेंगे ..पत्नी बनकर नही एक दासी बनकर क्या पता हमारे पाप कट जायें ...एक आप हैं जो विवाह उपरांत भी हमको स्पर्श नही किये और एक वो था जो ये चैक करने के लिए हमें होटल के एक कमरे में ले गया कि हम आपके साथ सोये तो नही ..... उसे हमारी जुबान पर विश्वास नही था और हम उसपर पर विश्वास करके आप जैसे देवता को त्याग दिए .... न आप कदापि हमपर दया न खाना ...क्यूँकि हम वास्तव में आपके नाख़ून के भी बराबर नही ...लेकिन विश्वास कीजियेगा आत्महत्या करने से अच्छा ये लगा कि आप पर आत्म को समर्पित कर दें ..."

सुमन को बाँहों में भर लिया और मुंशी की तस्वीर को देखने लगे ...समझ में नही आ रहा था कि ...किस पर विश्वास करे और किस -किस भाव को सच माने ...परन्तु अब मन में कोई भी प्रश्न शेष न रहा ...और न ही कोई वासना ....

हमारा जीवन का सफर भी अद्भुत रहा .... मुंशी कभी बता नही पाये ...कि हमारी माता उनकी ही पत्नी थी ...जो विवाह की रात ही गर्भ से थी .....और विवाह के अगले दिन ही वो अपने प्रेमी के साथ भाग गई....मुंशी बताते तो ये भी बताना पड़ता कि मेरी माँ को गंगा में धक्का भी उन्होंने ही दिया था ...हमें भी मुंशी नीचे फेंक देते लेकिन उन्हें न जाने क्यूँ हमपर दया आ गई और हमें यानि किसी गैर की औलाद को अपने घर ले आये ....और अपनी औलाद बना कर पाला ....मुंशी ने मरते वक्त हमें आधा ही सच बताया था ताकि हम पूरा सच खोज सकें .....आज पूरे दिन हम यही सोचते रहे कि जो मुंशी ने किया वो हमनें क्यूँ नही किया ....?

जवाब मिला ...क्यूँकि हम मुंशी का खून नही ....हमारा विश्वास ये रहा कि हमारी माँ को स्वयं मुंशी उसके प्रेमी को हस्तगत कर देते तो क्या पता आज वो भी जीवित होकर मुंशी के इस घर की देवी बनी होती .....

हमारा आज प्रगाढ़ विश्वास हो चला है इस बात पर कि प्रेम को सिर्फ प्रेम से ही परास्त किया जा सकता है ....लेकिन प्रेम और प्रेम के द्वन्द में विजय श्री उसी प्रेम की होगी जो  त्याग और वासना से रिक्त होगा .....सुमन बाँहों में अवश्य थी लेकिन हम अब स्वयं में नही थे ...क्यूँकि स्वयं में रहकर स्वयं को पूर्ण होता देखना असम्भव सा प्रतीत हो रहा था .....

नवाज़िश

By~

Junaid Royal Pathan